पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Thursday, July 25, 2024

मुंबई डायरी - इक

अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शहर छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी  रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। पेंटिंग : सुधीर पटवर्धन    


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काळयां पत्‍थरां दा छलोया पहाड़

जिह्यां इक्‍की घरे च कई माह्णू रैंह्दे, तिह्यां ही इक्‍की माह्णूए च कई माह्णू, इक्‍की घरे च कई घर, इक्‍की ग्रांए च कई ग्रां कनैं इक्‍की शैह्रे च कई शैह्र होंदे। मुंबई, दिल्‍ली या कुसी भी शैह्रे दे नाएं ते असां दे मने च जेह्ड़ी तस्‍वीर बणदी, तिसा तस्‍वीरा च तिस शैह्रे च रैह्णे वाळी जादातर अबादी शामल नीं होंदी। असां साही ज्‍यादातर लोग तिसा दा हिस्‍सा नीं होंदे। सैह् शैह्रां दिया पचाळिया कुतकी नेह्रियां कूंणा च तिसा तस्‍वीरा ते हटी नै इक बड़ी लग कनैं औक्‍खी जिंदगी जीणे ते ज्‍यादा घसीटा दे होंदे। अंतर ग्रां च बी होंदे पर जीणे दियां स्थितियां च इतणा अंतर नीं होंदा। उपरे ते भाई चारा, समाजे दा दवाब कनैं जड़ां इक होणे दे कारण माड़ी देह्ई सहानुभूति कनैं कठेवा होंदा। शैह्रां च भी एह् जड़ां खास करी नैं पैह्लिया पीढ़िया दे बड़े कम्‍में ओंदियां। एह् पीढ़ी जेह्ड़ी जड़ां दे दूर पराईया जमीना च रोजी-रोटी तोपणा आईयो होंदी। 

जेह्ड़े नेवी, मिलटरी, सरकारी या दूईंया नौकरियां पर लगी नैं बाह्र जांदे, तिन्‍हां जो इन्‍हां जड़ां दी इतणी जरूरत कनैं किह्लपण नीं होंदा। तिन्‍हां ब्‍हाल नौकरिया दे फंग होंदे कनैं जड़ां ब्‍हाल हटणे दे मौके कने दस्‍तूर बी होंदा। सैह् बाह्र जाई नैं भी ग्रां ते दूर नीं होंदे।

दो दिन पैह्लें ही इक मिल्ला। सैह् हिमाचल जाई ने आया था। तिसदा सुआल था – सुअरगे साही जमीना  छडी तुसां ऐत्‍थू कजो फसयो। तिस जो ता जवाब देई ता पर एह् सुआल मेरे होश सम्‍हालने ते बाद ही मेरे पिछें पिया गया था। 

मैं सोचदा एत्‍थू मुंबई च देह्या क्‍या था? असां दे बुजुर्गां 1800 सौ मील ते पैह्लें साह् ही नीं लिया। ग्रां च देह्ये  क्‍या दुख तकलीफ थे। जिस ताईं सैह् तिन्‍नां-तिन्‍नां दिनां दी इक बड़ी ही कठण मसाफरी करी नै बंबई पूजदे थे। समाने दा बौझा चुकी मीलां पैदल चलणे ते बाद ढिळकदियां बसां मिलदियां थिह्यां। लकड़ें देह्यां बैंचा दियां सीटां वाळियां खड़-खड़ करी हिलकदियां रेलां। खिड़कियां ते होआ सौगी क्‍योलयां दा धूं जादा ओंदा था। जाह्लू रेला ते उतरदा था माह्णू ता कपड़यां समेत मूंह भी काळा होई गिया होंदा था। 

एूत्‍थू मुंबई च बी आई नैं क्‍या मिलदा था। गैरजां च चटाईयां दे बिस्‍तरे,  टेक्सियां धोणे दी मजूरिया कनैं डरैबर बणने दा सुपना। तैह्ड़ी गडियां घट होंदियां थियां। गडियां कनैं डरैबरां दा भी रुतबा भारी होंदा था। एही इक गल थी जिसा ताईं असां दे गबरू कताबां बेची डरैबर बणना मुंबई दौड़ी ओंदे थे। तिस जमाने च ठीक-ठाक पढ़यां दी दिल्लिया या हिमाचल च नौकरिया दी जुगत बणी जांदी थी। घट पढ़यां दे हिस्‍से फौजा ते लावा हिमाचल दे  नैड़े-तैड़े जेह्ड़े कम ओंदे थे, तिन्‍हां दिया तुलना च मुंबई आई डरैबर बणना फायदे दा सौदा था। एह् अंदाजा इसा गला ते लगाया जाई सकदा कि तैह्ड़ी मुंबई दे टैक्‍सी ड्राइबर इंडियन आईल साही पीएसयू कनैं सरकारी नौकरियां दी तुलना च अपणी टैक्‍सी चलाणा पसंद करदे थे। 

एह् 1980 तिकर चलया। उसते बाद पटरोल अंबर छूणा लगी पिया। उपनगरां च ऑटो-रिक्‍सा आई गिया। इक दौर देह्या बी आया जे सीएनजी नी ओंदी ता हिमाचली टैक्सियां वाळे टैक्सियां कनैं मुंबई जो आखरी जय महाराष्‍ट्र करने दिया हालता च पूजी चुक्‍यो थे। जे‍ह्ड़ा हुण करोना ते बाद हिमाचलियां दा मुंबई नै टैक्‍सी व्‍यवसाय वाळा संबंध लगभग खत्‍म होई गिया। इस तैह्ड़ी ही खत्‍म होई जाणा था।        

एह् बड़ी अजीब गल है। हिमाचल च मेरे घरे ते धोलाधार सुझदी थी। ऐत्‍थू मुंबई च काळयां पत्‍थरां दा छलोया पहाड़। इस जो होर छिलणे ताईं रोज 1 बजे कनैं 5 बजे सुरंगा लगदियां थियां। प्‍हाड़े ते पत्‍थर बह्रदे थे। इन्‍हां पत्‍थरां जो पीह्णे ताईं क्रेशर लगयो थे। भ्‍यागा ते लई ने संझा तिकर खटारा ट्रक ढोह्-ढुहाई करदे रैंह्दे थे। इक्‍की पास्‍सें दिन भर मजदूर-मजदूरनियां तसलयां भरी-भरी पत्‍थरां क्रेशरां च पादें कनैं दुअे पास्‍सें तयार रेता-गिट्टियां ने ट्रकां भरना लगी रैंह्दे थे। सारा दिन होआ च धूड़ा दा राज होंदा था। मेरी मा चौबी पैह्र इसा धूड़ा पूंह्जणा लगी रैंह्दी थी। संझा जाई क्रेशर बंद होंदा था ता चैन पोंदी थी।

क्रेशरां दे बक्‍खें इक दस्सां खोळियां दी चाल थी। तिसा चाली च कूणे वाला कमरा मेरा घर था। क्रेशरां कनैं मेरे घरे दे बिच इक पतळी देह्ई कच्‍ची सड़क थी। ऐत्‍थू म‍राठिया च कमरे जो खोळी बोलदे कनैं इकी सैधी ने बणया कमरयां दी लेणी जो चाल बोलदे। मुंबई च चालीं च रैह्णे-जीणे दी इक नूठी संस्‍कृति थी। मराठी च इस पर मता सारा साहित्‍य लखोया। मराठी दे हास्‍य व्‍यंग लेखक पु. ला. देशपांडे दा इक बड़ा परसिध व्‍यंग कथा संग्रह है ‘बटाटया ची चाळ’। तिस पर इस नाएं दा इक बड़ा मजेदार नाटक मुंबई च अज भी मंचित होंदा रैंह्दा।    

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काले पत्‍थरों का छिला हुआ पहाड़

 जैसे एक घर में कई इंसान रहते हैं, उसी तरह एक इंसान में कई इंसान,  एक घर में कई घर, एक गांव में कई गांव और एक शहर में कई शहर होते हैं। मुंबई, दिल्‍ली या किसी भी शहर के नाम से हमारे मन में जो तस्‍वीर बनती है, उस शहर में रहने वाली अधिकांश आबादी उस तस्‍वीर में शामिल नहीं होती है। हमारी तरह ज्‍यादातर लोग उसका हिस्‍सा नहीं होते हैं। वे शहर के पिछवाड़े किसी अंधेरे कौने में उस तस्‍वीर से हट कर एक बड़ी अलग और कठिन जिंदगी जीने से ज्‍यादा घसीट रहे होते हैं। गांवों में भी विषमताएं होती है परंतु जीने की स्थितियों में इतना अंतर नहीं होता है। ऊपर से समाज का दवाब,  भाईचारा और जड़ों के एक होने के कारण थोड़ी सी सहानुभूति और एकजुटता होती है। शहरों में भी यह जड़ें खास कर  पहली  पीढ़ी के बहुत काम आती हैं। जो जड़ों से दूर पराई जमीन में रोजी-रोटी ढूंढने आई होती है। 

जो नेवी, सेना, सरकारी या दूसरी नौकरियों के लिए बाहर जाते हैं, उन्‍हें इन जड़ों की इतनी जरूरत और अकेलापन महसूस नहीं होता है। उनके पास नौकरी के पंख होते हैं और जड़ों के पास लौटने के अवसर और दस्‍तूर भी होते हैं। वे बाहर जा कर भी गांव से दूर नहीं होते हैं। 

दो दिन पहले हिमाचल घूम कर आया एक बंदा मिला। उसका सवाल था – स्‍वर्ग जैसी जमीन को छोड़ तुम यहां कहां फसे हो। मैंने उसे तो जवाब दे दिया परंतु यह सवाल मेरे होश संभालने के बाद से मेरे पीछे पड़ा है। 

मैं सोचता हूं यहां मुंबई में ऐसा क्‍या था, जिसके लिए हमारे बुजुर्गों ने 1800 सौ मील के पहले सांस ही नहीं ली। गांव में ऐसे क्‍या दुख तकलीफ थे, जिनके कारण वे तीन-तीन दिनों की एक बड़ी ही कठिन यात्रा कर के मुंबई भाग आते थे। सामान का बोझ उठा मीलों पैदल चलने के बाद हिलती-डुलती बसें मिलती थीं। लकड़ी के बैंचों वाली सीटें और खड़-खड़ करती रेलें। खिड़कियों से हवा कम और कोयलों का धुंआ ज्‍यादा आता था। जब रेल से उतरते थे तो कपड़ों के साथ मुंह भी काला हो गया होता था। 

यहां मुंबई में आ कर भी क्‍या मिलता था। गैरेजों में चटाईयों के बिस्‍तरे,  टेक्सियां धोने की मजदूरी और ड्राईवर बनने का सपना। उस समय गाड़ियां कम होती थीं और गाड़ियों के साथ-साथ ड्राईवर का रुतबा भी भारी होता था।  इसी एक बात के लिए हमारे युवा किताबें बेच कर ड्राईवर बनने मुंबई भाग आते थे। उस जमाने में ठीक-ठाक पढ़े-लिखों का दिल्ली या हिमाचल में नौकरी का जुगाड़ बन जाता था। कम पढ़े-लिखों के हिस्‍से में फौज के अलावा हिमाचल के आस-पास जो काम आते थे, उनकी तुलना में मुंबई आ कर ड्राईवर बनना फायदे का सौदा था। इस का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय मुंबई के टैक्‍सी ड्राईवर इंडियन आईल जैसी  पीएसयू और सरकारी नौकरी की तुलना में अपनी टैक्‍सी चलाना ज्‍यादा पसंद करते थे। 

यह दौर 1980  तक चला। उसके बाद पैट्रोल आसमान छूने लगा और उपनगरों में ऑटो-रिक्‍शा आ गया। एक दौर ऐसा भी आया यदि सीएनजी नहीं आती तो हिमाचली टैक्सियों वाले टैक्सियों और मुंबई दोनों को आखिरी जय महाराष्‍ट्र करने की हालत में पहुंच चुके थे। हिमाचलियों का मुंबई से टैक्‍सी व्‍यवसाय वाला संबंध कोरोना के बाद अब जा कर खत्‍म हुआ। इसने तभी खत्‍म हो जाना था।      

यह बड़ी अजीब बात है। हिमाचल में मेरे घर से धौलाधार दिखती थी। यहा मुंबई में काले पत्‍थरों का छिला हुआ पहाड़। जिसे और छीलने के लिए रोज 1 बजे और 5 बजे सुरंगें लगायी जाती थीं। पहाड़ से पत्‍थर बरसते थे। इन पत्‍थरों को पीसने के लिए क्रेशर लगे थे। सुबह से लेकर शाम तक खटारा ट्रक ढुलाई करते रहते थे। एक तरफ दिन भर मजदूर-मजदूरनियां तसले भर-भर पत्‍थरों को क्रेशरों में डालते और दूसरी तरफ तैयार रेत-गिट्टियों को ट्रकों में भरने लगे रहते थे। सारा दिन हवा में धूल का राज होता था। मेरी मां इस धूल को पौंछने में लगी रहती थी। शाम को जाकर  क्रेशर बंद होते तो चैन पड़ती थी। 

क्रेशरों के बगल में एक दस खोलियों की चाल थी। उस चाल में कोने वाला कमरा मेरा घर था। क्रेशरों और मेरे घर के बीच एक पतल़ी सी कच्‍ची सड़क थी। यहां म‍राठी में कमरे को खोली बोलते हैं और एक सीध में बनी कमरों की पंक्ति को चाल बोलते हैं। मुंबई में चालों में रहने-जीने दी एक अनूठी संस्‍कृति थी। मराठी में इस पर बहुत सारा साहित्‍य लिखा गया है। मराठी के हास्‍य व्‍यंग लेखक पु. ला. देशपांडे का एक बड़ा प्रसिद्ध कथा संग्रह है ‘बटाटया ची चाळ’। उस पर इस नाम का एक बड़ा मजेदार नाटक मुंबई में आज भी मंचित होता रहता है।   

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।

Saturday, July 6, 2024

यादां फौजा दियां

 



फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदे, तिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती थी 22 नवंबर 2020 जो, दूंई जबानां च। हर म्हीनैं तुसां तक एक किस्त पूजी है बिना नागा। फौजी जीवन दे किस्मां किस्मां दे अनुभव तुसां पढ़े। अज पेश है इसा लड़िया दा पंचताह्ळुआं मणका। इस मण्के कन्नै ही असां जरा क बसौं लैणा है। अग्गैंं चली नै इन्हां मण्केयां दी माळा जारी रखणे दा इरादा है। थोड़े होर नौंएं तौर तरीके नै।    


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समाधियाँ दे परदेस च 


फौज च गिणे-चुणे सूबेदाराँ जो ही सूबेदार मेजर बणने दा मौका मिलदा है। इक यूनिट च इक्को ही सूबेदार मेजर हौंदा है। जेकर मैं सूबेदार मेजर बणदा ताँ मिंजो यूनिट ते कुसी तोपखाना ब्रिगेड हैडकुआटर जाँ तोपखाने दे कुसी दूजे उच्चे हैडकुआटर च अपॉइंटमेंट मिलणी थी। 

फौज च सालाना गुप्त रिपोर्टां प्रमोशन च खास रोल निभाँदियाँ हन्न। तिस वक्त सूबेदार मेजर बणने ताँईं सीनियरिटी दे बेस पर सूबेदाराँ दे इक बैच जो 105 नंबराँ दे स्केल पर परखेया जाँदा था। तिन्हाँ च तकरीबन 80 नंबर सालाना गुप्त रिपोर्टां दे हौंदे थे कनैं बाकी 25 नंबर फील्ड सर्विस, मैडल, कोर्स ग्रेडिंग, बगैरा ताँईं हौंदे थे।  मेरी फील्ड सर्विस बहोत घट थी। 5 नंबराँ ते मिंजो सिर्फ इक जाँ डिढ़ नंबर मिलणे वाळा था। मेरे सत्त मैडलां च मिंजो सिर्फ इक मैडल ही इक नंबर दुआणे वाळा था।  मेरा सूबेदार मेजर बणना मेरी सालाना गुप्त रिपोर्टां पर डिपेंड  करदा था। प्रमोशन ताँईं बैच दे सारे सूबेदाराँ दी पिछलियाँ पंज रिपोर्टां दी जाच-परख हौंदी थी।  मेरिट लिस्ट बणदी थी।  जिस साल जितणियाँ वैकेंसिंयाँ हौंदियाँ थियाँ, मेरिट च औंणे वाळे तितणे सूबेदार प्रमोशन ताँईं चुणे जाँदे थे कनै सीनियरिटी दे मुताबिक, जिंञा-जिंञा वैकेंसी हौंदी थी प्रमोट करी दित्ते जाँदे थे।  हरेक सूबेदारे जो तिन्न मौके मिलदे थे। 

तिस यूनिट च औंणे ते पैह्लैं मेरियाँ सारियाँ सालाना गुप्त  रिपोर्टां ‘आउटस्टेंडिंग’ थियाँ।  बस तिस यूनिट दी पैहली रिपोर्ट ही ‘अबव ऐवरेज’ थी जेह्ड़ी मिंजो हुणकणे सीओ ते पैहलकणे सीओं  दित्तिह्यो थी।  तिस सीओ साहबे जो मेरी  इमानदारी कनै सिद्धा-साफ बोलणे दी आदत शायद खरी नीं लगदी थी। तिन्हाँ शुरू-शुरू च तोपखाना रिकॉर्ड, नासिक रोड केंप च खुद जायी करी मिंजो अपणी यूनिट ते कढणे दी खूब कोशिश कित्ती थी अपर तिन्हाँ दी इक भी नीं चली थी। सैह् मिंजो पर इक ही रिपोर्ट लिक्खी सके थे अगली रिपोर्ट लिखणे ते पैहलैं तिन्हाँ दा दूइया ठाहरी तबादला होयी गिया था। हुणकणे सीओ साहब होराँ दियाँ लिक्खियाँ  मेरियाँ लगातार तिन्न रिपोर्टां ‘आउटस्टेंडिंग’ रहियाँ थियाँ अपर तिन्हाँ दी लिक्खिह्यो चौथी कनै आखिरी रिपोर्ट ‘अबव ऐवरेज’ थी। इस तरहाँ मेरियाँ आखिरी पंज रिपोर्टां च दो ‘अबव ऐवरेज’ कनैं तिन्न ‘आउटस्टेंडिंग’ थियाँ। 

मेरे बैच दे सूबेदार तिस ही साल सूबेदार मेजर दे प्रमोशन ताँईं परखे जाणे वाळे थे।  मिंजो पता था  कि मेरा नाँ ‘मेरिट लिस्ट’ च औंणे वाळा नीं है। जेकर आखिरी रिपोर्ट ‘आउटस्टेंडिंग’ हौंदी ताँ मैं मेरिट लिस्ट च औंणे दी थोड़ी-बहोत मीद करी सकदा था।  तिस आखिरी रिपोर्ट जो लिक्खणे ते किछ दिनाँ परंत  तिन्हाँ सीओ साहब होराँ दी भी पोस्टिंग हौयी गयी थी। दरअसल सैह् स्टडी लीव पर चली गै थे।  पता नीं तिन्हाँ जो इस गल्ल दा एहसास था भी जाँ नीं कि सैह् मेरियाँ सूबेदार मेजर बणने दियाँ मीदाँ गास पाणी फेरी गै थे। अपर मिंजो इस गल्ल दा पता चली गिया था कि सैह् नौंयें सीओ साहब जो मेरे बारे च जे किछ भी दस्सी करी गै थे सैह् खरा ही था। 

नौंयें सीओ साहब सिख अफसर थे। यूनिट दी कमाण संभाळने ते परंत तिन्हाँ इक सैनिक सम्मेलन कित्ता। सैनिक सम्मेलन दे खत्म हौंणे पर तिन्हाँ जुआनाँ जो चले जाणे ताँईं ग्लाया। हाले च सिर्फ अफसर कनै जेसीओ ही बैठी रैह्। सीओ साहब होराँ बारियें-बारियें सारेयाँ कन्नैं हत्थ मिलाया कनैं गल्ल-बात कित्ती। मिंजो नैं हत्थ मिलायी करी तिन्हाँ पुच्छेया,

“भगत राम साहब, सूबेदार मेजर कदी बणा दे?”

“सर, मैं सूबेदार मेजर नीं बणी पाणा है,” मैं उदास होयी करी जवाब दित्ता था।

ताह्लू तिन्हाँ ‘टू आई सी’ साहब होराँ जो ग्लाया था कि सैह् मेरे बारे च तिन्हाँ कन्नैं गल्ल करन। सैनिक सम्मेलन ते आयी करी ‘टू आई सी’ साहब होराँ मेरियाँ सालाना गुप्त रिपोर्टां दिया फाइला लई करी सीओ साहब होराँ कन्नैं मिल्ले थे।  तिन्हाँ दिनाँ च सालाना गुप्त रिपोर्टां दियाँ दो कापियाँ बणदियाँ थियाँ। पहली कापी रिकॉर्ड ऑफिस जो भेजी जाँदी थी कनैं दूजी कापी यूनिट च रैंह्दी थी। 

तिस ते परंत कमाण आफसर होंरा मिंजो अपणे दफ्तर च सद्दी नैं ग्लाया था,

“साहब, मैं एह् एनश्योर करना है कि तुसाँ सूबेदार मेजर बणन।” 

“सर, मैं अंडर-पोस्टिंग है। मिंजो नॉर्थ-ईस्ट च जाणा है। नौंयीं यूनिट हौंणी, पता नीं मैं सही परफॉरमेंस दर्ज करवायी भी पाँअ्गा जाँ नीं,”

मेरिया गल्ला जो बिच ही टोकदेयाँ तिन्हाँ बोल्या था,

“मैं इस गल्ल दा यकीन भी करह्गा कि तुसाँ इस यूनिट ते इक होर एसीआर लई करी जाह्ण। पोस्टिंग ताँ तुसाँ ताह्ली जाँणा है जाह्लू मैं तुसाँ जो भेजणा है।” 

मिंजो नीं लगदा था कि सीओ साहब होराँ मिंजो ज्यादा दिन तिकर जाणे ते रोकी सकणे वाळे थे अपर तिन्हाँ दे बोल कनैं सोच मिंजो ताँईं हौंसला बद्धाणे दा स्नेहा देया दे थे।  तिन्हाँ दिनाँ च भारत दी संसद पर उग्रवादी हमला हौयी गिया। पछमी सरहद पर ‘ऑपेरशन पराक्रम’ दे तहत फौज दा जमाबड़ा हौया।  मेरी सैह् यूनिट थलसेना दी इक ताकतवर ‘स्ट्राइक कोर’ दा हिस्सा थी जिन्नैं राजस्थान दी सरहद पर पाकिस्ताने उप्पर हमला करना था। आर्मी  हैडकुआटरैं उत्तर-पछम च तैनात  टुकड़ियाँ ते बाहर जाणे वाळी सब्भ पोस्टिंगां तरंत, अगले हुक्म तिकर, रोकी  दित्तियाँ थियाँ। मैं भी अपणी यूनिटा कन्नैं बीकानेर दे अक्खे-बक्खे  दे इलाके च चला गिया था। 

म्हारी तिस ‘स्ट्राइक कोर’ जो जाह्लू संयुक्त राज्य अमरीका दे उपग्रहाँ अग्गैं बद्धदेयाँ दिक्खेया ताँ तदकणे अमरीकी राष्ट्रपति होराँ असाँ दे तदकणे प्रधानमंत्रिये जो खबरदार कित्ता था।  पता नीं चूक कुत्थू होइयो थी पर तिसा दा ठीकरा म्हारे कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल साहब दे सिरे पर फोड़ी करी तिन्हाँ जो रातोंरात कमाण ते हटायी दित्ता गिया था कनैं तिस ‘स्ट्राइक कोर’ दी कमाण दूजे लेफ्टिनेंट जनरल जो देई दित्ती थी।  असाँ जो रातों-रात पिच्छे ट्हायी-ता था।  सैह् रात कयामत दी रात थी, पता ही नीं चल्ला दा था कि क्या हौआ दा है? 

कारगिल दी जंग च, जित्थू भारत दियें फौजैं बहादुरिया कन्नैं लड़ी करी दुश्मण मारी नह्ठाया था, 527 भारत दे फौजियाँ दियाँ जानाँ गइयाँ थियाँ अपर ‘ऑपेरशन पराक्रम’ च बगैर लड़ेयाँ ही 798 भारतीय फौजियाँ जो अपणे प्राणां ते हत्थ धोणा पई गै थे। ‘ऑपेरशन पराक्रम’ च देशैं गुआया मता किछ था कनैं खट्टेया किछ भी नीं था। तिस ताँईं काफी हद तिकर अनपढ़, अद्धपढ़, निक्कमी, लापरवाह, निर्दयी कनैं बड़बोली भारतीय पोलिटिकल लीडरशिप जिम्मेदार थी।

 

(इति)

  

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समाधियों के प्रदेश में (पैंतालीसवीं कड़ी)

 

सेना में गिने-चुने सूबेदारों को ही सूबेदार मेजर बनने का अवसर मिलता है। एक यूनिट में एक ही सूबेदार मेजर पाया जाता है। अगर मैं सूबेदार मेजर बनता तो मुझे यूनिट से किसी तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय अथवा तोपखाने के किसी अन्य उच्च मुख्यालय में नियुक्ति मिलनी थी। 

सेना में वार्षिक गोपनीय रिपोर्टें पदोन्नति में विशेष भूमिका निभाती हैं।  उस समय सूबेदार मेजर बनने के लिए वरिष्ठता के आधार पर सूबेदारों के एक बैच को 105 अंकों के पैमाने पर आंका जाता था।  उनमें से तकरीबन 80 अंक वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों के होते थे और शेष 25 अंक फील्ड सर्विस, पदक, कोर्स ग्रेडिंग, इत्यादि  के लिए होते थे।  मेरी फील्ड सर्विस बहुत कम थी।  5 अंकों में से मुझे महज एक या डेढ़ अंक मिलने वाला था। मेरे सात पदकों में से मुझे केवल एक पदक ही एक अंक दिलाने वाला था।  मेरा सूबेदार मेजर बनना मेरी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों पर निर्भर  करता था।  इसके लिए बैच के सभी सूबेदारों  की पिछली पांच रिपोर्टों का मूल्याँकन होना था।  मेरिट लिस्ट बनायी जाती थी। जिस वर्ष जितनीं वैकेंसी हों, मेरिट में आने वाले, उतने सूबेदार प्रमोशन के लिए चुन लिए जाते थे और वरिष्ठता के अनुसार, जैसे-जैसे वैकेंसी होती थी पदोन्नत कर दिये जाते थे।  प्रत्येक सूबेदार को तीन अवसर मिलते थे। 

उस यूनिट में आने से पहले मेरी सभी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टें ‘असाधारण’ थीं।  बस उस यूनिट की पहली रिपोर्ट ही ‘औसत से ऊपर’ थी जो मुझे वर्तमान सीओ से पहले वाले सीओ ने दी थी।  उन सीओ साहब को मेरी  इमानदारी और स्पष्टवादिता संभवतः पसंद नहीं थी।  उन्होंने शुरू-शुरू में तोपखाना अभिलेख, नासिक रोड केंप में व्यक्तिगत तौर पर जाकर मुझे अपनी यूनिट से निकालने के भरसक प्रयास किये थे लेकिन उनकी एक भी न चली थी। वे मुझ पर एक ही रिपोर्ट लिख पाये थे अगली रिपोर्ट लिखने से पहले उनका दूसरी जगह पर तबादला हो गया था। वर्तमान सीओ साहब द्वारा लिखित मेरी लगातार तीन रिपोर्टें ‘असाधारण’ रही थीं परंतु उनके द्वारा लिखी गयी चौथी और अंतिम रिपोर्ट ‘औसत से ऊपर’ थी। इस तरह मेरी अंतिम पांच रिपोर्टों में से दो ‘औसत से ऊपर’ और तीन ‘असाधारण’ थीं। 

मेरे बैच के सूबेदार उसी वर्ष सूबेदार मेजर के प्रमोशन के लिए परखे जाने वाले थे।  मुझे पता था कि मेरा नाम ‘मेरिट लिस्ट’ में आने वाला नहीं है। अगर अंतिम रिपोर्ट ‘असाधारण’ होती तो मैं मेरिट लिस्ट में आने की थोड़ी-बहुत उम्मीद कर सकता था।  उस अंतिम रिपोर्ट को लिखे जाने के कुछ दिन बाद उन सीओ साहब का भी तबादला हो गया था।  दरअसल वे स्टडी लीव पर चले गये थे।  पता नहीं उन्हें इस बात का एहसास था भी या नहीं कि वे मेरी सूबेदार मेजर बनने की उम्मीदों  पर पानी फेर गये थे।  परंतु मुझे इस बात का पता चल गया था कि वे नये सीओ साहब को मेरे बारे में जो कुछ भी बता कर गये थे वो अच्छा ही था। 

नये सीओ साहब सिख अफसर थे। यूनिट की कमान संभालने के बाद उन्होंने एक सैनिक सम्मेलन किया। सैनिक सम्मेलन की समाप्ति पर उन्होंने जवानों को चले जाने के लिए कहा। हाल में केवल अफसर और जेसीओ ही बैठे रहे। सीओ साहब ने बारी-बारी सभी से हाथ मिलाया और बातचीत की। मुझ से हाथ मिला कर उन्होंने पूछा,

“भगत राम साहब, सूबेदार मेजर कब बन रहे हो?”

“सर, मैं सूबेदार मेजर नहीं बन पाऊंगा,” मैंने उदास हो कर जवाब दिया था। 

तभी उन्होंने उप-कमान अधिकारी महोदय से मुखातिब हो कर कहा था कि वे मेरे बारे में उनसे बात करें। सैनिक सम्मेलन से लौट कर उप-कमान अधिकारी महोदय मेरी वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों की फाइल लेकर सीओ साहब से मिले थे। उन दिनों वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट की दो प्रतियाँ बनती थीं। पहली प्रति अभिलेखागार को भेज दी जाती थी और दूसरी प्रति यूनिट के साथ रहती थी।  

उसके बाद कमान अधिकारी महोदय ने मुझे अपने दफ्तर में बुला कर कहा था,

“साहब, मैं यह एनश्योर (सुनिश्चित) करूंगा कि आप सूबेदार मेजर बनें।” 

“सर, मैं अंडर-पोस्टिंग हूं। मुझे नॉर्थ-ईस्ट में जाना है। नयी यूनिट होगी, पता नहीं मैं सही परफॉरमेंस दर्ज करवा भी पाऊंगा या नहीं,”

मेरी बात को बीच में टोकते हुए उन्होंने कहा था,

“मैं इस बात का यकीन भी करूंगा कि आप इस यूनिट से एक और एसीआर लेकर जाएं। पोस्टिंग तो आप तभी जाँयेगे जब मैं आप को भेजूंगा।” 

मुझे नहीं लगता था कि सीओ साहब ज्यादा दिन तक मुझे जाने से रोक पायेंगे परंतु उनके शब्द और सोच मेरे लिए उत्साहवर्धक संदेश दे रहे थे।  तभी एक दिन भारतीय संसद पर उग्रवादी हमला हो गया।  पश्चिमी सीमा पर ‘ऑपेरशन पराक्रम’ के तहत सेना का जमाबड़ा हुआ।  मेरी वह यूनिट थलसेना की एक ताकतवर ‘स्ट्राइक कोर’ का हिस्सा थी जिसने राजस्थान की सीमा पर पाकिस्तान पर आक्रमण करना था।  सेना मुख्यालय ने पश्चिम में तैनात टुकड़ियों से बाहर जाने वाली सभी पोस्टिंगें तत्काल प्रभाव से अगले आदेश तक स्थगित कर दी थीं। मैं भी अपनी यूनिट के साथ बीकानेर के आसपास के क्षेत्र में चला गया था। 

हमारी उस ‘स्ट्राइक कोर’ को जब संयुक्त राज्य अमरीका के उपग्रहों ने आगे बढ़ते देखा तो तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति ने हमारे तत्कालीन प्रधानमंत्री को खबरदार किया था। पता नहीं चूक कहाँ हुई थी पर उसका ठीकरा हमारे कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल साहब के सिर पर फोड़ कर उन्हें रातोंरात कमान से हटा दिया गया था और उस ‘स्ट्राइक कोर’ की कमान दूसरे लेफ्टिनेंट जनरल के सुपुर्द कर दी गयी थी। हमें रातों-रात पीछे हटा लिया गया था। वह रात कयामत की रात थी, पता ही नहीं चल पा रहा था कि हो क्या रहा है? 

कारगिल युद्ध में, जहाँ भारतीय सेना ने वीरता से लड़ कर शत्रु को मार भगाया था, 527 भारतीय सैनिकों की जानें गयी थीं परंतु ‘ऑपेरशन पराक्रम’ में बिना लड़े ही 798 भारतीय सैनिकों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा था। ‘ऑपेरशन पराक्रम’ में देश ने बहुत कुछ खोकर कुछ भी हासिल नहीं किया था। काफी हद तक इसका श्रेय अनपढ़, अद्धपढ़, अकुशल, लापरवाह, असंवेदनशील और बड़बोले भारतीय राजनैतिक नेतृत्व को जाता है। 

(इति)


हिमाचल प्रदेश के जिला काँगड़ा से संबन्ध रखने वाले भगत राम मंडोत्रा एक सेवानिवृत्त सैनिक हैं। उनकी  प्रकाशित पुस्तकें हैं ―
     
 
जुड़दे पल, रिह्ड़ू खोळू, चिह्ड़ू मिह्ड़ू, परमवीर गाथा.., फुल्ल खटनाळुये दे, मैं डोळदा रिहा, सूरमेयाँ च सूरमे और
हिमाचल के शूरवीर योद्धा।
यदाकदा 
'फेस बुक' पर 'ज़रा सुनिए तो' करके कुछ न कुछ सुनाते रहते हैं।


Thursday, June 6, 2024

यादां फौजा दियां


 फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदे, तिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। ता असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती है, दूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा चुताह्ळुआं मणका। 


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समाधियाँ दे परदेस च (चताह्ळ्मीं कड़ी)

 

मैं देवलाली च तिस वक्त जिस यूनिट च था सैह् भारत दी फौज दे तोपखाने दी एक छोटी यूनिट थी जिस्सेयो ‘सर्वेलेंस ऐंड टारगेट एक्विजिशन बैटरी’ दे नाँ ते जाणेयाँ जाँदा था। 

फौज दी हर यूनिट च, हर महीनें, इक ‘सैनिक सम्मेलन’ हौंदा है जिसदी चेयरमैनशिप तिस यूनिट दे कमाण अफसर होराँ करदे हन्न। एह् रुआज अंग्रेजाँ दे जमाने ते चली औआ दा है। इसजो पहलैं ‘दरबार’ बोल्या जाँदा था।  आजाद भारत च ‘दरबार’ जो ‘सैनिक सम्मेलन’ दा नाँ देई  दित्ता गिया।  सैनिक सम्मेलन च यूनिट दे सारे अफसर, जेसीओ कन्नै दूजे रैंक शामिल हौंदे हन्न।  सैनिक सम्मेलन च कमाण अफसर यूनिट दे डिसिप्लिन, ट्रेनिंग, खेलकूद, बगैरा पर अपणी पोळसियाँ दी जाणकारी अपणे मतैहताँ जो दिंदे हन्न कनैं सब्भ दी भलाई कन्नैं जुड़ेह्यो सुझावां कनै शिकायताँ जो सुणदे हन्न। 

नायक नारायण सिंहें मेरे समझाणे कनै डाँटणे ते  लाँस हौळदार दे रैंक पैह्नी लैह्यो थे।  तिस दौरान इक सैनिक सम्मेलन होया था। तिस सैनिक सम्मेलन च जाह्लू कमाण अफसर होराँ  सुझाओ कनैं शिकायताँ मंगियाँ ताँ इक नायक (नाई) उठी खड़ौता कनै बोलणा लग्गेया “महोदय, असाँ दे मानजोग हैडक्लर्क, सूबेदार भगत राम साहब रेलवे वारंट देणे च भेदभाओ बरतदे हन्न।  मैं स्टेशन च जद अपणी बीबी-बच्चेयाँ जो लई आया ताँ साहब होराँ मिंजो फ्री रेल वारंट दित्ता अपर जाह्लू मैं अपणी फैमिली जो घर भेजणे ताँईं फ्री रेल वारंट मंगेया ताँ तिन्हाँ एह् ग्लायी करी सिद्धी नाँह् करी दित्ती कि छे महीनेंयाँ दे अंदर फ्री फेमिली वारंट नीं देई  सकदे। तिन्हाँ मिंजो सिर्फ कन्सेशन वाउचर ही दित्ता जद कि सैह् होरनाँ जो फ्री फैमिली वारंट दिंदे रैह् हन्न।”  

एह् सुणदेयाँ ही मैं तरंत अपणी कुर्सी ते उठी खड़ौता कनै कमाण अफसर होराँ जो ग्लाणा लग्गा था, “सर, एह् इल्जाम मिंजो पर लगाया गिह्या है इस ताँईं मिंजो इसदा जवाब देणे दी इजाजत दित्ती जाए।”  कमाण अफसर साहब होराँ मिंजो बक्खी दिक्खी नै बोले, “हैडक्लर्क साहब, तुसाँ बैठी जा।” अपणी सफाई च बोलणे दा मौका नीं मिलणे पर मिंजो बहोत गुस्सा आया था।  जिंञा ही मैं सैनिक सम्मेलन ते वापस मुड़ी करी अपणे दफ्तर च आयी नै बैठया, कमाण अफसर होराँ मिंजो ते आई.ए.एफ.टी-1707 (IAFT-1707) वारंट बुक कनै ‘वारंट इसू रजिस्टर’ मंगी लै थे।  तिन्हाँ तिस मामले दी छाणबीण ताँईं इक इन्क्वायरी बठाळी दित्ती थी जिस च इक मेजर, सूबेदार  मेजर कनै बैटरी हौळदार मेजर शामिल थे।  तिन्नैं कमेटियैं दो-तिन्न घंटेयाँ च अपणा कम्म निपटाइता कनैं तिस नायक (नाई) दे लगाह्यो इल्जाम गलत पाये  थे। 

जाह्लू सूबेदार मेजर साहब इन्क्वायरी वाळा कम्म निपटायी करी मेरे ऑफिस च आये ताँ मैं तिन्हाँ ते मजाक-मजाक च पुच्छेया था, “एस.एम. साहब, काह्लू लटका दे मिंजो फांसी पर?”  “ओ साहब, इंञा ही, इस नाई दी मत मारी गइह्यो। तुसाँ कुसी जो गलत तरीके नै कोई वारंट इसू नीं कित्तेह्या है। हाँ, इक जुआने जो छे महीनेंयाँ ते पैह्लैं तुसाँ रिजर्वेशन करुआणे ताँईं वारंट दित्तेह्या है अपर सैह् छै महीने पूरे हौंणे ते परंत ही छुट्टी गिह्या है।” 

“एसएम साहब, नाई दी मत ताँ मारी गइह्यो ही है, मिंजो लग्गादा सीओ साहब दी मत भी मारी गइह्यो है। मिंजो कल सीओ साहब दा इंटरव्यू चाहीदा।” 

“कजो, क्या होयी गिया?” एसएम साहब होराँ हैराण होयी करी मिंजो ते पुच्छेया था। 

“साहब, इंटरव्यू दे टैमें तुसाँ भी ताँ तित्थू ही हौंणा है। ताह्ली सुणी लैन्ह्यों। हाँ, मैं सैनिक सम्मेलन च होयी तिसा गल्ला दे सिलसिले च ही सीओ साहब कन्नैं गल्ल करनी है।” मैं जवाब दित्ता था। 

उंञा ताँ मैं सीओ साहब कन्नै दिन भर च कई बरी मिलदा था, अपर तिस वक्त मैं विधिवत इंटरव्यू मंग्गेया था किंञा कि मैं समझदा था कि भरे सैनिक सम्मेलन च मेरे कैरेक्टर पासैं उंगळी ठुआई गयी कनै सीओ साहब नैं मिंजो सफाई देणे दा मौका ही नीं दित्ता था। मिंजो सीओ साहब दा इंटरव्यू मिली गिया था। जिंञा ही मैं सीओ साहब जो सेल्यूट कित्ता, तिन्हाँ मिंजो ते पुच्छेया था, “हाँ साहब, क्या होया?” 

“सर, मिंजो उप्पर सैनिक सम्मेलन च सरेआम इल्जाम लगाया गिया। तिस पर तुसाँ क्या कित्ता?” मैं तिन्हाँ ते पुच्छेया। 

“मैं जाँच कित्ती जिसा च तिस नायक दी गल्ल गलत पायी गयी।” 

“मिंजो तुसाँ तिस वक्त सारी यूनिट दे साह्म्णे सफाई देणे दा मौका नीं दित्ता। हुण यूनिट जो कुण दसह्गा कि मेरा कोई कसूर नीं है।” 

“मैं नीं समझदा कि सारी यूनिट जो दसणा जरूरी है।” 

“अपर सर, मैं समझदा कि यूनिट जो एह् दसणा जरूरी है कैंह् कि एह् मेरे कैरेक्टर पर झूठी तोहमत है।” 

“हैडक्लर्क साहब, तुसाँ चांह्दे क्या?” 

“सर, मैं सारेयाँ जो एह् दसणे ताँईं अगले सैनिक सम्मेलन दी निहाग नीं करना चांह्दा। पता नीं तैह्ड़िया तिकर मैं जाँ तुसाँ इस यूनिट च रैह्ण जाँ नीं रैह्ण। मैं चांह्दा कि अज्ज ते लगातार तिन्न ‘रोल कालाँ’ च, डियूटी जेसीओ साहब एह् सुणांन कि पिछले सैनिक सम्मेलन च हैड क्लर्क दे उप्पर लगाया गिया इल्जाम गलत था। मैं एह् हौंदा दिक्खणे ताँईं हर रोल काल दे वक्त हाजिर रैंह्गा।” 

सीओ साहब दा चेहरा तमतमाणा लगी पिया था। ताह्ली तिन्हाँ अपणे मेज दे सज्जैं पासैं खड़ोह्तेयो सूबेदार मेजर साहब होराँ जो ग्लाया था, “एसएम साहब, जिंञा हैड क्लर्क साहब चांह्दे, तिंञा कित्ता जाये।” कनैं गुस्से नैं मिंजो ग्लाया था, “साहब, तुसाँ जाई सकदे हन्न। 

मैं तिन्हाँ जो विधिवत सैल्यूट देई करी तिन्हाँ दे ऑफिस ते बाहर आयी गिया था। 

मिंजो पता था जेह्ड़ा भी हौआ दा था सैह् मिंजो ताँईं खरा नीं हौआ दा था। मिंजो लग्गा दा था मेरा सूबेदार मेजर बणने दा सुपना, बस सुपना ही रैह्णे वाळा है। 

(अग्गैं, अगलिया कड़िया च….) 

 

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समाधियों के प्रदेश में (चवालीसवीं कड़ी)

 

 मैं देवलाली में उस समय जिस यूनिट में था वह भारतीय सेना के तोपखाने की एक छोटी यूनिट थी जिसे ‘निगरानी एवम् लक्ष्य खोज बैटरी’ के नाम से जाना जाता था। 

सेना की हर यूनिट में, हर महीने, एक ‘सैनिक सम्मेलन’ होता है जिसकी अध्यक्षता उस यूनिट के कमान अधिकारी महोदय करते हैं। यह परम्परा अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। इसे पहले ‘दरबार’ कहा जाता था।  स्वतंत्र भारत में ‘दरबार’ को ‘सैनिक सम्मेलन’ का नाम दे दिया गया। सैनिक सम्मेलन में यूनिट के सभी अधिकारी, जेसीओ और अन्य रैंक सम्मिलित होते हैं। सैनिक सम्मेलन में कमान अधिकारी यूनिट के अनुशासन, प्रशिक्षण, खेलकूद, इत्यादि पर अपनी नीतियों से अपने अधीनस्थों को अवगत कराते हैं और सर्वहित से संबंधित सुझावों और शिकायतों को आमंत्रित करते हैं। 

नायक नारायण सिंह ने मेरे समझाने और डाँटने के फलस्वरूप लाँस हवलदार के रैंक पहन लिये थे।  इसी दौरान एक सैनिक सम्मेलन हुआ था। उस सैनिक सम्मेलन में जब कमान अधिकारी महोदय ने सुझाव और शिकायतें आमंत्रित कीं तो एक नायक (नाई) उठ खड़ा हुआ और कहने लगा, “महोदय, हमारे माननीय हैडक्लर्क, सूबेदार भगत राम साहब रेलवे वारंट जारी करने में भेदभाव करते हैं।  मैं स्टेशन में जब अपने बीबी-बच्चों को लाया तो साहब ने मुझे फ्री रेलवे वारंट दिया लेकिन जब मैंने अपनी फेमिली को घर भेजने के लिए फ्री रेलवे वारंट मांगा तो उन्होंने यह कह कर साफ मना कर दिया कि छह् महीनों के अंदर फ्री फेमिली वारंट नहीं दिया जा सकता। उन्होंने मुझे केवल कन्सेशन वाउचर ही दिया जब कि वह दूसरों को फ्री फेमिली वारंट देते रहे हैं।”  

यह सुनते ही मैं तुरंत अपनी कुर्सी से खड़ा हो कर कमान अधिकारी से मुखातिब हुआ, “महोदय, यह इल्जाम मुझ पर लगाया गया है अतः मुझे इसका जवाब देने की अनुमति दी जाए।” कमान अधिकारी साहब मेरी तरफ देख कर बोले, “हैडक्लर्क साहब, आप बैठ जाइये।” अपनी सफाई में बोलने का मौका न मिलने पर मुझे बहुत क्रोध आया था।  जैसे ही मैं सैनिक सम्मेलन से लौट कर अपने कार्यालय में आ कर बैठा, कमान अधिकारी ने मुझ से आई.ए.एफ.टी-1707 (IAFT-1707) वारंट बुक और ‘वारंट इसू रजिस्टर’ मांग लिए थे।  उन्होंने उस मामले की छानबीन के लिए एक इन्क्वायरी बैठा दी थी जिसमें एक मेजर, सूबेदार  मेजर और बैटरी हवलदार मेजर शामिल थे।  उस कमेटी ने दो-तीन घंटो में अपना काम निपटा लिया और उस नायक (नाई) द्वारा लगाये आरोप गलत पाये थे।  

जब सूबेदार मेजर साहब इन्क्वायरी वाला काम निपटा कर मेरे ऑफिस में आए तो मैंने उनसे मजाक-मजाक में पूछा था, “एस.एम. साहब, कब लटका रहे हो मुझे फांसी पर?”  “ओ साहब, ऐसे ही, इस नाई की मत मारी गयी है। आपने किसी को गलत ढंग से कोई वारंट इशू नहीं किया है। हाँ, एक जवान को छह महीने से पहले आपने रिजर्वेशन कराने के लिए वारंट दिया है लेकिन वह छह महीने पूरे होने के बाद ही छुट्टी पर गया है।” 

“एसएम साहब, नाई की मत तो मारी ही गयी है, मुझे लगता है सीओ साहब की मत भी मारी गयी है। मुझे कल सीओ साहब का इंटरव्यू चाहिए।” 

“क्यों क्या हो गया?” एसएम साहब ने हैरान हो कर मुझ से पूछा था। 

“साहब, इंटरव्यू के समय आप को तो वहाँ होना ही है। वहीं सुन लीजिएगा। हाँ, मैंने सैनिक सम्मेलन में हुई उसी बात के बारे में सीओ साहब से बात करनी है” मैंने जवाब दिया था। 

वैसे तो मैं सीओ साहब से दिन भर में कई बार मिलता था, लेकिन उस समय मैंने विधिवत इंटरव्यू मांगा था क्योंकि मैं समझता था कि भरे सैनिक सम्मेलन में मेरे चरित्र की ओर उंगली उठायी गयी और सीओ साहब ने मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया था। मुझे सीओ साहब का इंटरव्यू मिल गया था। जैसे ही मैंने सीओ साहब को सेल्यूट किया, उन्होंने मुझ पूछा था, “हाँ साहब, क्या हुआ?” 

“सर, मुझ पर सैनिक सम्मेलन में सरेआम इल्जाम लगाया गया। उस पर आपने क्या किया?” मैंने उनसे पूछा। 

“मैंने जाँच की जिसमें उस नायक की बात गलत पायी गयी।” 

“मुझे आपने उस समय सारी यूनिट के सामने सफाई देने का मौका नहीं दिया। अब यूनिट को कौन बताएगा कि मैं निर्दोष हूं?” 

“मैं नहीं समझता कि सारी यूनिट को बताना जरूरी है।” 

“लेकिन सर, मैं समझता हूं कि यूनिट को यह बताना जरूरी है क्योंकि यह मेरे चरित्र पर झूठा लाँछन है।” 

“हैडक्लर्क साहब, आप चाहते क्या हो?” 

“सर, मैं सभी को यह बात बताने के लिए अगले सैनिक सम्मेलन का इंतजार नहीं करना चाहता। पता नहीं तब तक मैं या आप इस यूनिट में रहें या न रहें। मैं चाहता हूं कि आज से लगातार तीन ‘रोल कालों’ में, डियूटी जेसीओ साहब यह सुनायें कि पिछले सैनिक सम्मेलन में हैड क्लर्क पर लगाया गया आरोप गलत था। मैं यह होता देखने के लिए हर रोल काल के समय उपस्थित रहूंगा।” 

सीओ साहब का चेहरा तमतमाने लगा था। तभी उन्होंने अपने मेज की दायीं ओर खड़े सूबेदार मेजर साहब से कहा था, “एसएम साहब, जैसे हैड क्लर्क साहब चाहते हैं, वैसा किया जाए।” और गुस्से से मुझे कहा था, “साहब, आप जा सकते हैं।” 

मैं उन्हें विधिवत सैल्यूट दे कर उनके ऑफिस से बाहर आ गया था। 

मुझे पता था जो भी हो रहा था वह मेरे लिए सही नहीं हो रहा था। मुझे लग रहा था मेरा ‘सूबेदार मेजर’ बनने का सपना बस सपना ही रहने वाला है। 

(आगे, अगली कड़ी में…)


हिमाचल प्रदेश के जिला काँगड़ा से संबन्ध रखने वाले भगत राम मंडोत्रा एक सेवानिवृत्त सैनिक हैं। उनकी  प्रकाशित पुस्तकें हैं ―
     
 
जुड़दे पल, रिह्ड़ू खोळू, चिह्ड़ू मिह्ड़ू, परमवीर गाथा.., फुल्ल खटनाळुये दे, मैं डोळदा रिहा, सूरमेयाँ च सूरमे और
हिमाचल के शूरवीर योद्धा।
यदाकदा 
'फेस बुक' पर 'ज़रा सुनिए तो' करके कुछ न कुछ सुनाते रहते हैं।


Friday, May 17, 2024

मुकदी गल्ल मुकदी नीं, अग्गें बधदी



सुरेश भारद्वाज निराश होरां दा कविता संग्रह मुकदी गल्ल इसी साल छपेया है। भूमिका दे तौर पर निराश होरां हिमाचली पहाड़ी भाषा दे बारे च अपणी चिंता प्रकट कीतिओ है। राजीव त्रिगर्ती होरां निराश जी दियां कवतां पर अपणे विचार रखणे ते पैह्लें भाषा दे नाएं दे बारे च अपणा मत रखेया है। असां इसा भाषा दा सफर तदूं ते दिक्खेया  है जदूं इसा जो पहाड़ी गलांदे थे। लोक सूबे दी अपणी भाषा बणाणे दे खाब दिखदे थे। इक ता अजादिया ते बाद असां दे प्रांत ज्यादातर भाषा आधार पर बणे। दूआ केंद्र च भी अंगरेजी हटाई नै हिंदी ल्यौणे दी योजना थी। हिमाचली भी सोचदे थे असां भी पहाड़ी अपणी भाषा बणाई चलाई लैणी। पर जिञा असां दियां नदियां दा पाणी सुकी गया तिञा ई भाषा दा सपना भी टुटी गया। एह् सुपना दुबारा दिखणे दी कोशिश कीती ता हिमाचली पहाड़ी नां चलेया। पर सिरें नीं चढ़ेया। हाली भी कोससां होआ दियां।  हुण इक नौंई सोच आई है भई सूबे दी इक भाषा नीं है, मतियां हन। हुण दिखदे हन एह सोच कितणी कारगर हुंदी है। लेखक भाषाविद् क्या सोचदे, जनता क्या बोलदी कनै राजनेता क्या करदे। एह बैह्स लम्मी चलणे आळी है। फिलहाल अपणिया भाषा च लिखदे रेह्या, नां जे मर्जी दिंदे रेह्या। इसी नजरिए नै एह्थू पढ़ा - सुरेश भारद्वाज निराश दी कविता दे बारे च राजीव त्रिगर्ती दे विचार कनै इसा कताबा चा ते निराश होरां दियां दो कवितां।  

    

‘मुकदी गल्ल’ कवि सुरेश भारद्वाज निराश दी चैथी किताब है। एह् तिह्ना दी पहाड़ी भाषा बिच दूज्जी किताब है। इसा किताबा बिच कविये दियाँ छोटियाँ-बड्डियाँ कठेरी करी कुल 60 कविताँ हन्, जेह्ड़ियाँ लाह्देयाँ-लाह्देयाँ विषयाँ जो अप्पू बिच समाहित करने बिच पूरियाँ समर्थ हन्। कवि अपणिया गल्ला गलान्दा-गलान्दा एह् भी मनदा जे अपणिया भाषा बिच लिखणे दा अपणा लाह्दा ही मजा है। कवि इसा गल्ला जो मनदा जे असाँ दी हिमाचली पहाड़ी बड़ी मिट्ठी कने समृद्ध भाषा है। कवि मनदा जे अपणिया भाषा बिच सुखे ने लखोई जान्दा। कविये जो अपणिया भाषा बिच लिखणा खरा लगदा। खरा लगणा कने सुखे ने लखोणा, कविए दियाँ इ्ह्ना गल्लाँ दी गवाही कविये दियाँ कविताँ अप्पू ही देई दिन्दियाँ।

सुरेश भारद्वाज निराश 
पहाड़ी कविता संग्रह: इक अम्मां थी, समर्पित इश्क ,
मुकदी गल्ल। हिंदी गजल संग्रह: मेेेरा इश्क 
इवादत खुदा की   
कवि अपणियाँ कविताँ काँगड़िया बिच लिखदा पर तिसा भाषा जो हिमाचली पहाड़ी नाँ दिन्दा। किताबा बिच प्रयुक्त काँगड़ी भाषा बिच पंजाबी कने पश्चिमी पहाड़ी दा सिद्धा प्रभाव है। अज्ज काँगड़िया जो पश्चिमी पहाड़ी दे नेड़ें ही मन्नेया जान्दा, हालाँकि ग्रियर्सन होराँ इसा जो पंजाबिया दे डोगरी रूपे दे नेड़े दस्सेया था। काँगड़ी शब्दे दे पुराणे प्रयोगे जो दिखदेयाँ एह् इक्क सर्वमान्य कने पुराणे अस्तित्वे वाळी भाषा है।

कुल मिलाई करी हिमाचली पहाड़ी नाँ देणे पर कविये दी कोई गलती नीं दुस्सा दी। एत्थू इक्क अणशोध सोच हिमाचले दियाँ भाषां दे अस्तित्वे उप्पर खतरा बणियो। कुछ लोकां दा विचार है कि जिसा भाषा बिच मता साहित्य होणा कने मतेयां  लोकां गलाणी सैह् हिमाचली होणी। अज्ज दुनिया दियां मतियां भाषां मरी गइयां कने मतियां दा अस्तित्व खतरे बिच है। असां मतियां भाषां बचाणे दा पुण्य करिये तां हिमाचले बिच ही भाषां दा गुलदस्ता बणाई सकदे। हिमाचले बिच हिमाचली भाषा नीं, हिमाचली भाषाँ हन्। हिमाचले दियाँ सारियाँ भाषाँ जो सरोह्णे कने सरोह्यियाँ जो मठोणे दा मौका मिलणा ही चाहिदा। दरअसल कविये दियाँ कविताँ काँगड़िया बिच हन्, कने काँगड़िया दिया कुसी भी किताबा दे ओणे पर काँगड़ी बोलणे बाळेयाँ जो गर्व होणा चाहिदा। काँगड़िया दियाँ इह्ना खरियाँ कविता दा रज्जी स्वागत होणा चाहिदा। उइयाँ इस स्वागते ताएँ कविताँ अप्पू ही अपणी गवाही दिन्दियाँ दुसदियाँ।कवि समाजे देयाँ सारेयाँ पक्षां जो अपणियाँ कविताँ बिच रखदा। सैह् सारियाँ कविताँ बिच रीति-रिवाज, रैह्ण-सैह्ण, खाण-पीण, देश-प्रेम, सामाजिक व्यवहार कने जिन्दगिया दियाँ मतियाँ सारियाँ गल्लाँ जो जेह्ड़ियाँ असाँ सामणे औन्दियाँ तिह्ना जो हू-ब-हू कागजे पर तुआरी करी अपणेयाँ सारेयाँ पाठकाँ साह्मणे रखणे दी कोशिश करदा ही दुसदा है।

कवि अपणिया कविता ‘राती दा मरया’ बिच गलान्दा जे अज्जकल असाँ दे समाजे बिच ताकतवर लोक गरीबाँ देयाँ हकाँ जो मारा दे। जेह्ड़ा असाँदे समाजे जो बंडणे दा इक्क कारगर तरीका है। कवि आश्वस्त है जे बेल्ला इक्को देया सदा ही नी रैह्न्दा। टैम सारेयाँ दा ही ओंदा। सैह् पियोहेयाँ-दरड़ोहेयाँ अन्दर उम्मीदा दी जोत बाळदा -

बड्डियाँ जोकाँ है खून लेया चूसी

गरीबाँ दा हक्क कितणा करी मरोणा

सूरज ता सबदा है चढ़दा निराश

मत सोच्चें इन्नी कदी नी घरोणा।

अज्ज असाँ दे समाजे बिच होड़ लगियो। जेह्ड़ा भी कमा दे तिस दा मता हिस्सा बड्डेया-बड्डेयाँ घराँ जो बणाणे पर मुकाई देया दे। समाजे दा दस्तूर अजकल देह्या है जे बच्चे तिह्ना उच्चियाँ हवेलियाँ जो छड्डी करी अपणे भविष्य बणाणे दा वास्ता देई दुज्जेयाँ शहराँ बिच बस्सी जा दे या तां विदेशां बिच बस्सी करी अपणे देशे जो कने तिस घरे जो भुली जा दे। इक्क टैम ओआ दा तां तित्थू कुत्तेयाँ-बिल्लेयाँ दा बास्सा होई जा दा-

बड्डे-बड्डे महल खरेड़े

एत्थू कुत्तेयाँ बिल्याँ सूणा।

इसा ‘टूह्णमटूणा’ कविता बिच ही कवि मजदूराँ दिया स्थितिया, राजनीतिया बिच व्यापक भ्रष्टाचारे जो सोग्गी ही प्रस्तुत करदा। सैह् बड़ा सहज होई करी राजनीति करने वाळेयाँ कने समाजे बिच अपणा स्वार्थ सिद्ध करने वाळेयाँ लोकाँ पर टोंट कसदा गलान्दा-

अज्जे तिक तूँ लोक ही दूह्ते

पता नी अप्पूँ कदी परसूणा।।

‘इक्क अम्मा थी’ इस नाएँ कन्ने कविये दी पैह्ली काँगड़ी कविता दी किताब छपी थी। इसा किताबा जो पढ़देयाँ इसा किताबा बिच भी इक्क कविता ‘अम्मा’ नाएँ कन्ने मिलदी है। एह् कविता भी इक्क अम्मा थी इसा कविता जो ही बधाऽ दी। उइयाँ एह् छोटी है पर भावाँ कन्ने टुंडमुंडियाँ भरोइयो अपणी पडछैण बणाणे बिच कुसी रचना ते घट्ट नीं है-

खुआन्दी थी कदी कमाई करी टब्बरे जो,

तिन्ना पुतराँ च अज्ज अम्मा बंडोई गई।

‘यादाँ दे झरोखे ते’ कविता भी ‘इक्क अम्मा थी’ कविता दा ही ताजा हिस्सा बझोन्दी। एह् इक्क लम्मी कविता है। अम्मा दी जीवनचर्या कने चरित्र इसा कविता बिच बड़ा ही सटीक बझोन्दा है-

टब्बरे दी तकदीर थी अम्मा

ईश्वर दी तस्वीर थी अम्मा

बापुए दी तदबीर थी अम्मा

अपणे ताईं फकीर थी अम्मा।

कवि लोहड़ी गीते दे नाएँ तित्थ-त्योहाराँ जो बड़ा डुग्गा याद करदा। लोहड़िया दे चितराँ बिच इक्क चित्तर दिखणे जोग्गा है-

रीत-रूआजाँ मत भुलायाँ

सणे घरैतां लोहड़ी मनायाँ

बैही ने किट्ठे खा खिचड़ी.....!

इसा किताबा बिच कवियें इक्क कविता लिखियो ‘पर्यावरण..इक्क जरूरत’। इसा कविता बिच सैह् पर्यावरणे दिया समस्या जो लई करी डूग्घा चिन्ददा। पर्यावरणे पर चिन्दणा अजकणे जमाने दा सारेयाँ ते जरूरी चिन्दण है। पर्यावरण उप्पर खतरा असाँदिया पूरिया सभ्यता उप्पर खतरा है। इस खतरे दा कारण भी असाँ ही हन्, कैंह् जे सारा कितेया कराया असाँ दा ही है। पर्यावरण रक्षा दा सन्देश कवि इस तरीके ने दिन्दा -

पेड़ लगांह्गे बर्खा होणी

नीं तां साह्ड़ी फसल मरोणी 

दाणा फक्का किछ नी मिलणा  

भुक्खेयाँ किह्ञा निन्दर ओणी

किह्ञा निन्दर ओणी

पेड़ लगा सारे भाऊ, पेड़ लगा........।। 

‘जीणे दी क्या गल्ल करिये’ कविता बिच अजकणे सामाजिक परिवेश जो ढाळदा कवि अपणेयाँ शब्दाँ बिच बड़े ही सरस रूपे बिच साह्मणे ओन्दा। कवि जीवने जो लई करी मता आश्वस्त नीं दुस्सा दा। तिस्सेयो सारे माहौले बिच इक्क बदलाव बझोआ


दा-

मुश्किल हन हालात जीणे दी क्या गल्ल करिये

मिल्ला दे आघात जीणे दी क्या गल्ल करिये।

‘कोई आसरा मिलदा’ कविता बिच भी कवि बदलोयाँ हालाताँ कने बदलोयो पर्यावरणे दी ही गल्ल करदा। ‘बिट्टी जम्मी बधाई लैह्’ कविता कविये दे इस संग्रहे दी इक्क मती याद रक्खी जाणे वाळी कविता है। कवि प्रगतिवादी विचाराँ ने भरोया है। बिट्टिया दे जमणे दिया खुशिया जो कवि जिस नोएँ रूपे बिच प्रस्तुत करदा सैह् अनुकरणीय है। जातके बिट्टिया दे अन्तरे जो हटाणे ताएँ जेह्ड़ी पैह्ल ज़रूरी है तिसा जो साह्मणे अणदी एह् पूरिया दी पूरी कविता ही जरूरी है। फिरी भी इह्ना दूँह् पाह्ळियाँ बिच दिक्खा-

पूजा-पाठ कराई लैह्

नूहाँ ते कुळज पुजाई लैह्।

कित्तियो असाँ खरी कमाई

स्हाड़ें घरें जे बिट्टी आई।

मतियाँ कविताँ बिच कवि समझौतावादी होन्दा चला जान्दा। सैह् अपणे मुखर होन्दे विद्रोही स्वभावे जो देरे तिकर नीं ढोन्दा। एह् देह्याँ तेवराँ वाळियाँ कविताँ बिच सैह् इक्क कविता ‘समझौता’ नाएँ ने भी लिखदा-

जे मिल्ले सैह् खाणा पौंदा,

ईह्याँ ही दिल पतियाणा पौंदा।

कविये  दे दिले बिच ‘बड़े गहरे भाव दिलाँ दे’ जोज्झेयाँ खान्दे। प्यारे दा मल्हम सारेयाँ जख्मा भरी दिंदा। ऐह् प्यार इसा धरतिया कन्ने हैं कने सैह् कुथी ग्राएँ कुथी खड्डाँ-नाळुआँ दे रूपे बिच साह्मणे ओन्दा।

राजीव कुमार त्रिगर्ती 
कवि और भाषाविद् 
हिंदी कविता संग्रह: गूलर का फूल (2008)
ज़मीन पर होने की खुशी (2020)
प्रेम में होना (2024)
पहाड़ी  कविता संग्रह छपणे आळा है। 

छंदे दे नाएँ पर कवियाँ दे बिच इक्क तुकबंदी दी परम्परा भी प्रचलित है। कवि अपणियाँ मतियाँ सारियाँ रचनाँ बिच तिसा परम्परा दा अनुसरण करदा ही सामणे ओन्दा। अनुप्रास परम्परा दा निर्वाह जरूर इसा तुकन्दिया दे माध्यमे ने होन्दा कने कविताँ बिच लय बणाई रखदा। वर्तनी जो लई करी हाल्ली काँगड़िया बिच मतियाँ कमियाँ हन्। कवि भी तिह्ना ते अछूता नी रेह्यी सकदा था। कुसी पराणिया साहित्यिक भाषा दिया वर्तनिया बिच भी कुसी दा मुकक्कल होणा आसान नीं हैं फिरी साहित्यिक रूपे ने कांगड़ी तां हाल्ली अपणे अंगणे बिच घंघाळू ही देआ दी है। होळें-होळें काँगड़िया दिया वर्तनिया दा इक्क पक्का, सर्वमान्य कने टिकाऊ रूप साह्मणे ओणा है। कविये दा एह् लिक्खेया भी तिस रस्ते बिच इक्क टप्पा बणना है।


मुकदिया गल्ला उप्पर मुकदी गल्ल एह् है जे एह् किताब कविये दे व्यापक दृष्टिकोणे जो प्रस्तुत करदी। कविताँ पढ़ी करी सारा कुछ अपणे नेड़े-तेड़े लगदा। नोटबंदी, जीएसटी पर भी कवि अपणे विचार रखदा, पर इहना कविताँ बिच सिर्फ इक तरफा गल्ल है कने इह्ना नीतियाँ दा इक तरफा समर्थन ही है। मुकदेयाँ संस्काराँ कने समाजे दे ढैन्दे रूपे ते भी कवि बड़ा दुखी है। मंहगाई कने होर अजकणे मुद्दे भी कविये दियाँ नजराँ ते अछूते नीं हन्।

‘इक्क अम्मा थी’ एह् कविये दी पैह्ली काँगड़ी कविता दी किताब थी। पैह्ली किताब होणे पर भी तिसा किताबा दा प्रभाव सारे जनमानस उप्पर पेआ था। कविये दिया प्रतिभा जो दिखदेयाँ तिस तरीके दियाँ रचना दी उम्मीद सारेयाँ पाठकाँ जो कविये ते जरूर रैह्यी कने रैह्णी। तिह्ञा ही इसा किताबा बिच भी कविये दिया उच्चिया सोच्चा दे ढक्के ते चूंडिया तिकर दर्शन होन्दे। कविये बाह्ली नोआँ रचणे दी ताकत भरोइयो। उम्मीद है इसा ताकता दे दर्शन सताबी ही अगलिया किताबा बिच होणे हन् कने भाषा दे साहित्ये वाळे बाग्गे बिच नोंआँ फुल्ल खिड़ना है।  


सुरेश भारद्वाज निराश दियां दो कवतां 


अम्मां

अम्मां अज्ज सतराँ बरयाँ दी होई गेई

उआने ते उट्ठी ओबरिया जाई सोई गेई

 

खुआंदी थी कदि कमाई करी टव्वरे जो

तिन्ना पुत्रां च अज्ज अम्मां बंडोई गेई

 

चाऽ करी करी तिन्ना पालेया था टव्वर

टब्बरे जो अज्ज सैह फालतु होई गेई

 

बणाई बणाई खिंदाँ भरियाँ थियाँ बिलगां

अज्ज इक्की खंदोलुएं अप्पूं लपटोई गेई

 

अम्मां सौए ओबरिया पौहें सौए उआने

टब्बरे देयाँ तान्याँ अज सैह डंगोई गेई

 

रली मिली किह्याँ करनी ऐं तंग अम्मां

लाड़ी बी मिंजो कनै थी सखलोई गेई

 

जिन्हीं राज कित्ता कदि बीह्याँ माह्णुआ

दिक्खी दूरी तिन्हाँ दी अप्पू सँगोई गेई

 

जदूँ चलदियाँ थियाँ जंघाँ था जोर जीह्वा

नी सरीर हुण चलदा जीब भी चुपोई गेई

 

ठगदी थी टब्बरे जो गुड़े दे इक्क ढेलुऐ नै

ब्रते रै बहाने अज्ज सैह अप्पूं ठगोई गेई

 

दिक्खी दुख बच्चयाँ दा बहांदी थी अथरु

लकोई दुख अपणा मुँह ढक्की रोई गेई

 

उम्र सारी कित्ता अम्मां सबनीं दा भला

सच मेरी अम्मां अज्ज सबनां ते लुटोई गेई

 

सुआंदी थी सुक्कैं थी अप्पूं सौंदी गिल्लैं

अथरुआं नै अम्मां अप्पूं गिल्ली होई गेई

 

इतणे भारी पिट्टे तू अम्मां कजो स्यापे

छुटी गेई जलबाँ अज्ज हाख बी मटोई गेई

 

क्या गेई अम्मां निमौड़ा मैं बी होई गिया

रेही गिया किह्ला किस्मत बी बदलोई गेई

 

गलांदी थी मिंजो छोरु बणी जा माह्णु

मिंजो तिसारी अज्ज गल्ल समझोई गेई

 

सुणी नी सकदा कदि बुराई मैं अम्मां दी

गलाया कुन्नी ज़रा क सैः कालजें छोई गेई

 

बड़े कलेस दित्ते थे तिसा जो मैं मित्रा

भार अपणे दुखांरा सैह किल्ली इ ढोई गेई

 

'निराश' मेरियाँ नीताँ नी मिंजो माफ करना

अम्मां दी सुणी नी लाड़िया दी सुणोई गेई

 

भुल्ली गै

 

कैंह मान रखणा भुल्ली गै

कैंह ध्यान रखणा भुल्ली गै

 

घड़ोलू मटणा भुल्ली गै

सूतर कतणा भुल्ली गै

 

नाम जपणा भुल्ली गै

किस्ती-पतणा भुल्ली गै

 

खंड जोड़े आद नी रेहे

गोआ सटणा भुल्ली गै

 

बड्यां दी बडियाई भुल्ली

पैरां च नपणा भुल्ली गै

 

लोकां दी बुराई हरदम

कर्म अपणा भुल्ली गै

 

हीटरां देही मत मारी

अग तपणा भुल्ली गै

 

मीट शीट कुत्तेयां जो

ग्राह रखणा भुल्ली गै

 

बर्फिया दा डब्बा लीता

प्रौणा सखणा भुल्ली गै

 

तीणी उपर रसो बणाई

अपूं चखणा भुल्ली गै

 

चमचागिरि बथेरी कित्ती

पैरां चट्टणा भुल्ली गै

 

जाणी ले भेत बगाने

अपणे दसणा भुल्ली गै

 

नज़र तिन्हाँ दी मेरी यारी

अपणी मखणां भुल्ली गै

 

संबला था मै ही बणाया

भांडे घसणा भुल्ली गै

 

सबना खूब मिसरे जोड़े

काफिया रखणा भुल्ली गै

 

मार पेई इतणी स्कूलें

बच्चू नसणा भुल्ली गै

 

रत्ती भर नीं बेह्ल लोकां

ज़रा क हसणा भुल्ली गै

 

चुकया जाह्लु अम्मां चिमटा

गंड्डू लहस्णा भल्ली गै

 

भगौत पुराण दैण मापे

सौरेयाँ बसणा भुल्ली गै

 

डीजें कित्ता बेड़ा गर्क

अपणा नचणा भुल्ली गै

 

जदूँ दा आया बैड बाक्स

दौणी कसणा भुल्ली गै

 

सारें पासें धूम तुसाँ दी

स्हांजो जचणा भुल्ली गै

 

भत भटूरु सारे खांदे

स्हांजो पचणा भुल्ली गै

 

सुणेया चुड़ेलां लोक बेठे

स्हांजो सचणा भुल्ली गै

 

बदनै सारे मसाज करिगे

सिरे झसणा भुल्ली गै

 

सारी दुनियाँ डंग्गीत्ती

अप्पूं जो डसणा भुल्ली गै।

 

कन्न भरना सिखी लै

रस्णा बसणा भुल्ली गै

 

लोकां जो पाईयाँ जफ्फियाँ

मिंजो तकणा भुल्ली गै