पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

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Tuesday, May 6, 2025

भूपेंद्र भूपी दियां कवतां

  

अज पेश हन कवि भूपेंद्र जम्वाल भूपी होरां दियां पंज कवतां। 

मूह्रली तस्वीर : जपानी चित्रकार असाई चू दा सन 1887 च जलरंग च बणाया इक पहाड़ी ग्रां दा चित्र  




  1  

फ़िक्र जे है तां

दुखां   गमां   ते  न्हस्सा  कर

खिड़खिड़ करी के हस्सा कर

 

तर्फ़ैनां  ते नी  आस लगाणी

अपणिया कमरा कस्सा कर

 

हर  कोई  नी अपणा हुन्दा

जाळां बिच मत फस्सा कर

 

गल्ल कोई ना कौड़ी लग्गें

एह  देह्या जादू झस्सा कर

 

चन्द्रमें ते है  छैळ थोबडू

तू लेप्पां मत घस्सा कर

 

आळी टाळी  कैह्नो करनी

फ़िक्र जे है तां दस्सा कर

 

लोकां 'ने भावें मिलदी रैह

दिले 'च मेरे ही बस्सा कर

  

   

मोमो खांदे चल

 रळीमिळी के सुणदे कने सुणान्दे चल

इक्की दूए दे अथरू फिरी बगान्दे चल

 

महंगी कॉफ़ी पीणे दे दिन बीती गए

खोखें बेही के सस्ते मोमो खांदे चल

 

गल्लां   मुकदियाँ   नी  थियाँ  करी-करी

तिह्नां दिनां जो याद करी मुस्कान्दे चल

 

हत्थां-ओंगळीं  पकड़ी  घुमदे  फिरदे  रहे

हुण देई तसल्ली दिलां जो पत्यान्दे चल

 

किस्मता   बिच  लिखेया  होणा इञा  ही

एही सोची के हाक्खीं जो समझान्दे चल

 

अपणे  फ़र्ज़  नभाणे  मने  जो मारी के

दोस्ती सच्ची दिले ते हुण नभान्दे चल

 

ख़ुश  जे  है  तां  खुश  ही रेह्यां जानी तू

अगले जन्मे मिलणे दी सौंह खांदे चल

 

 

   

चढ़ाई  उप्पर  चूंडिया  फिरी थल्लें फोड़ना

सिक्खें कोई तुसां ते दिल किह्ञा तोड़ना

 

दराटे  लेई  निहाळा  दे सांजो तुसां पता है

मिलदेयां ही तुसां दिल मुंडिया ते मरोड़ना

 

न्हठी न्हठी  चलदा  है  फिरी  तुसां  पासे  जो

कितना कि रोकणा दिल कितना कि होड़ना

 

चीण्डू लाई  के  अरो  रोणा भी नीं दिंदे तुसां

कुसा कूणां लुक्की असां संघा एह घरोड़ना

 

देह देह्या  भी  चाहिदा  नीं कुसी कन्ने करना

एह हाल दिक्खी कुसीने दिल कुनीं जोड़ना

 

   

'मैं भी घुलेया घोळ'

गल्ल बड़ी पुराणी है

फिरी भी मैं सुनाणी है

जवानी हाली आइओ नी थी

ताहलू दी एह कहाणी है

 

मेला कुफरी दा था आया

रौणक बड़ी भारी थी

इस बरी पैसे डबल खर्चणे

कित्तियो ख़ूब त्यारी थी

 

टमक टंगोए  छिंज बज्जी

छोकरमत्ता लगाई चुंग

मैं भी घुळना सोची लेया

मन 'च मेरे आया जुंग

 

लीतडू , घटारू , दाणु , माणु

सारे ही कुद्दी पेयो थे

थोड़े चिरे'च कमीज़ पजामा

जिस्में पर नी रेह्यो थे

 

लंगोट कस्सी के दंद दस्से

नां लखाई दित्ता अपणा

दिले'च तरीक़े सोची रखे

कुस दाएं है विरोधी नपणा

 

पहली कुश्ती  तोते कने

घटारुए दी थी घुळाई गेई

तोतें धोबी पछाड़ लगाया

घटारू इकदम पेया ढेई

 

हाइबो हाइबो करदा सैह

पिढ़े ते बाहरे जो नसेया

दो पल मैं भी खज्जळ होया

अज्ज कुथू मैं आई फसेया

 

सारे हल्ला पाणा लग्गे

तोता गेम है कड्डी गेया

घटारू बचारा ऐसा नट्ठा

कपड़ेयां भी सैह  छडी गेया

 

मेरा दिल कुछ कमणा लग्गा

मिंजो ने क्या होंगा सीन

कुछ न कुछ सोचणा पौणा

नी तां बज्जी जाणी बीन

 

हिम्मत करी जुगाड़ लगाया

चिपळू भाई मैं कित्ता त्यार

दोयो मिली जुली कमांगे

जित्त होए भौवें होए हार

 

जाहलू  असां दी बारी आई

किस्मता छडी दित्ता किल्ला

चिपळुए ने कोई होर मेळेया

मिंजो कने जोधा मिल्ला

 

जोधे सिद्धे जफ्फी पाई 'ती

कस्सी के मैं पकड़ी पाया

इह्ञा जिक्केया मुंडका तिन्नी

बड़िया मुश्कला ने साह आया

 

कड़कड़ हड्डियां बोली पेइयाँ

लत्तां बाहीं नी रेह्या त्राण

सारे ही गुआs दुखणा लग्गे

लग्गें निकली जाणे प्राण

 

झोटेयां साहीं जैल्लें जोधें

बांह जाहलू मरोड़ी मेरी

पिट्ठी कड़ाके कढी दित्ते

सज्जी जंघ  करी'त्ती  ढेरी

 

छडी दे जोधे! पैरां पौन्दा

मैं तिसने फ़रियाद लगाई

जेहड़े मिलगे तू ही रखेयाँ

असां दूह्नी दी सब कमाई

 

तरस तिसजो आया थोडा

दित्ती मुंडिया जो आज़ादी

जान बची तां मत्थे टेके

कदी नी घुळगा सौंह खाह्

 

हार मन्नी के ढैन्दा पौन्दा

पिढ़े कंढे मैं आई पुज्जा

इक्क बारी लोक हसदे दुस्से

तिसते बाद नी कुछ भी सुज्झा

 

हाख खुड़ी जे त्रिये दिने

हस्पताले दा कमरा दुस्सा

अपणी हालत दिक्खी तां

अप्पू पर ही आया गुस्सा

 

समझ आया जे हिम्मता बाहर

कदी भी कुछ नी करना

जे कोई लीस्सा होए डराणा

पर जे तगड़ा होए तां डरना

 

अक्ल आई पर हड्डां भनाई

अज्जे बाद नी पंगा लैणा

पैह्लें अपणा आप परखणा

बादे विच कुछ चुकणा थैणा

 

तुसां कदी गलती मत करदे

गल्ल मेरी हुण लेया मन्नी

इत्थी मत इसा छड्डी जांदे

सौगी लेई जानेयो गट्ठी बन्नी

 

   

मैं बेह्लड़ नाकारा बन्दा

कम्मे ने हत्थ लांदा नी

रड़काटी चौद्धर चौबी घण्टे

घरें पैर टकांदा नी ।

 

कदी कुथकी कदी कुथकी नचेया

निचले बैह्णा औंदा नी

सुपने विच भी भाषणबाजी

चैना ने कदी सौंदा नी

 

घरे वाळेयां भी छडेया खुल्ला

जित्थू मर्जी रिड़क प्रांह

फ़िक्र फाका नी टबरे दा तां

घुमदा रेह हुण तांह तुआंह।

 

खब'नी पैरें चक्कर कितने

उपरे वालें पाई छड्डेओ

कमाणा कुछ भी औंदा नी पर

मीनकिया साहीं टुंड अड्डेयो

 

एह चौद्धर कदी ओह चौद्धर

खामखाह ही पाई लेइओ

अपणे आपे जो लायक़ समझदा

हाक्खीं पट्टी छाई गइओ

 

अक्ल पल्ले नी कौड्डिया दी

होर अपणी मैं क्या सुणां

बस इतणा ही है बथेरा कि

नां बड़ा कने उज्जड ग्रां 

भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी

कांगड़ी कनै हिंदी दे लेखक, टांकरी लिपि दे जाणकार, 

शिक्षा विभाग च सेवारत कनै आकाशवाणी च आकस्मिक उद्घोषक    

Friday, December 30, 2022

हिमाचली पहाड़ी चर्चा



है हिमाचली भाषा नाम की कोई भाषा?

असां दिया भाषा दे बारे च चर्चा मतेयां सालां ते चलियो है। कदी जरा तेज होई जांदी कदी मंदी। इलैक्शनां परंत दिव्य हिमाचल आळेयां इक दिन चर्चा कराई। तिसते परंत दूंह् लेखकां आशुतोष गुलेरी कनै यतिन होरां अलग-अलग लेख भी लिखे। एह् लेख कनै अखबारा दी चर्चा दयारे पर है। हुण भूपिंद्र भूपी होरां भी अपणे वचार रखे हन। गल गांह् बधै, इस ताईं एह् लेख भी एत्थी पेश है। एह् लेख भी हिंदिया च है।  

   

अक्सर हिमाचल प्रदेश के लिए आजकल 'हिमाचली भाषा' की वक़ालत की जाने लगी है । जैसा कि कहा जाने लगा है कि प्रदेश की सब भाषाओं को मिलाकर एक राज्य भाषा बनाई जाए तो यहाँ प्रश्न यह उठता है कि क्या यह आवश्यक है कि किसी प्रदेश के भाषा-वैविध्य को समाप्त करके सब भाषाओं या बोलियों की खिचड़ी बनाकर एक नई भाषा बना दी जाए जो किसी भी क्षेत्र की अपनी न हो ? मेरा मानना है कि भाषा-विस्तार के सामान्यतः दो प्रकार होते हैं : जनजातीय और भौगोलिक ।  जनजातीय भाषाओं पर जनजाति का बंधन रहता है। जनजाति विशेष के लोग किसी भी क्षेत्र में रहते हुए अपनी भाषा सीख ही लेते हैं और यदि भौगोलिक आधार की बात करें तो ऊपरी हिमाचल की बोलियां निचले हिमाचल प्रदेश के लोगों को समझ भी नहीं आतीं। वहीं बघाट, सुकेत/मंडी, कहलूर, कांगड़ा घाटी, चम्बा डुग्गर/पुंछ/रजौरी, मीरपुर और पोठोहार या पोठवार आदि क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियां या भाषाएं लगभग एक ही तरह के व्याकरण पर आधारित हैं।

ऐसे में इस पहाड़ी प्रदेश के लिए अगर अलग भाषा की परिकल्पना की जाती है तो एक 'लोकप्रिय और स्थापित' भाषा को आधिकारिक भाषा बनाया जा सकता है परंतु इसे दैनिक व्यवहार में शामिल करने के लिए सबको विवश नहीं किया जा सकता। कितनी ही भाषाएं या बोलियां पिछले कुछ वर्षों में प्रचलन से बाहर हो गई हैं। कुछ भाषाओं या बोलियों को मारकर किसी एक भाषा को थोप देना निस्संदेह किसी भी समाज के लिए हानिकारक है। जिस प्रकार भारतवर्ष की अनेक भाषाएं देश की विविधता में चार चाँद लगाती हैं, उसी प्रकार हिमाचल प्रदेश की संस्कृति और भाषा में विविधता प्रदेश की  सुंदरता को बढ़ाती है। संस्कृति का विनाश सभ्यता के विकास के साथ होता आया है। समाज जितना सभ्य या तथाकथित शिक्षित बनता जा रहा है, उतना ही अपनी संस्कृति और मातृभाषा से दूर होता जा रहा है। बहुत से लोग अपनी मातृभाषा को केवल इस भ्रम में मार चुके हैं कि उन्हें अपनी भाषा किसी 'उच्च संसाधन भाषा' के सामने तुच्छ लगती है।

हिमाचल की बोलियों, भाषाओं  को आम तौर पर पहाड़ी भाषा कह दिया जाता है, परन्तु दुविधा यह भी है कि नेपाल से लेकर कन्धार सीमा तक के पहाड़ी लोग अपनी-अपनी भाषा को 'पहाड़ी' नाम से ही पुकारते हैं। ऐसे में हिमाचल प्रदेश के लिए किसी एक राज्य-भाषा का रास्ता कैसे साफ़ हो सकता है; यह विचारणीय है। हिमाचली भाषाएं हो सकती हैं परंतु हिमाचली भाषा नाम की कोई एक भाषा कम से कम इस पहाड़ी प्रदेश में तो सम्भव प्रतीत नहीं होती।

भाषा किसी सीमा में नहीं बाँधी जा सकती । ज़िलों, प्रदेशों या देशों की सीमाओं में तो बिल्कुल भी नहीं! कांगड़ा, हमीरपुर, राजौरी और यहाँ तक कि रावलपिंडी तक के लोग बिना किसी तीसरी भाषा का सहारा लिए अपनी मातृभाषा में आसानी से वार्तालाप कर सकते हैं। संस्कृतनिष्ठ होने के कारण पहाड़ की भाषाओं को कम नहीं आंका जा सकता। उदाहरण के लिए धौलाधार से शिवालिक तक के ऊँचे-नीचे पठारी भाग अर्थात कांगड़ा घाटी में बोली जाने वाली कांगड़ी भाषा न केवल निचले हिमाचल के चार-साढ़े चार ज़िलों, पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों और जम्मू के कुछ भागों में बोली जाती है बल्कि पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में भी बोली जाती है । फिर भी इस भाषा को एक 'न्यून संसाधन भाषा' माना जाता है, क्योंकि हम इस भाषा और इसके जैसी अन्य पहाड़ी भाषाओं का महत्त्व स्वयं ही नकारते जा रहे हैं। ऐसी किसी भी विकासशील भाषा की महत्ता किसी भी उच्च संसाधन वाली विकसित भाषा से कम नहीं आंकी जा सकती।

 जो लोग यह जानना चाहते हैं कि 'पहले भाषा आई फिर व्याकरण' उनके लिए मैं स्पष्ट कर दूँ कि व्याकरण के बिना किसी भी भाषा की कल्पना भी नहीं की जा सकती । व्याकरण लिखा जाना और व्याकरण होना, दो अलग-अलग बातें हैं। व्याकरण नहीं लिखा जाना किसी भाषा का दुर्भाग्य हो सकता है, परन्तु यह कहना कदापि उचित नहीं है कि कोई भाषा बिना व्याकरण के ही रही, जब तक उसका व्याकरण लिखा नहीं गया ।

एक और बात, भारत की भाषा को भारती, आंध्र प्रदेश की भाषा को आंध्री या केरल की भाषा को केरली नहीं कहा जाता । पड़ोसी राज्य उत्तराखंड को ही ले लीजिए यहाँ दो मुख्य भाषाएं हैं: कुमाउँनी और गढ़वाली। अब क्या उत्तराखंड के लोगों को उत्तराखंडी नाम से अलग भाषा बना लेनी चाहिए ? जब तक हम बारीकी से अध्ययन नहीं करते हम अनुमान लगा लेते हैं कि जो क्षेत्र का नाम है, भाषा का भी नाम  भी उसी के अनुरूप होगा । परन्तु हमेशा ऐसा होना आवश्यक नहीं है। किसी अन्य ज़िले के व्यक्ति को यह लग सकता है कि लाहौल की भाषा  का नाम 'लाहुली' होगा। ठीक वैसे ही अन्य राज्य के किसी व्यक्ति को लग सकता है कि हिमाचल के लोगों की भाषा 'हिमाचली' होगी परन्तु हिमाचल प्रदेश के बाशिंदे भी यही बात कहें तो अटपटा लगता है। अब हिमाचल प्रदेश जैसे बहुभाषी राज्य की पहाड़ी बोलियों और भाषाओं को ज़बरदस्ती मिलाकर हिमाचली भाषा जैसा काल्पनिक नाम दे देना क्या तर्कसंगत है? (रेखांकन: डाॅ. अरुणजीत ठाकुर)  

भूपेंद्र भूपी 


Friday, June 18, 2021

तकनीकी परिवर्तन और हमारी भाषा (एक)



हिमाचली पहाड़ी भासा दे प्रेमी अपणिया भासा ताईं बड़े फिक्रमंद रैंह्दे। सारेयां जो ई लगदा भई असां दी भासा दिन-ब-दिन मरदी जादी। एह् गल काफी हद तक सही है। पर भासा पर कम भी होआ दा। तकनीकी सहूलियत मिल्ला दी। सूबे दी भासा अकादमी कनै ऐनआईटी हमीरपुर अनुवाद दा इक ऐप बणा दे। गूगल आळेयां कांगड़ी, मंडियाळी कनै महासुवी बोलियां दे कीबोर्ड बणाई ते। अज असां हिमाचली साहित्यकार भूपी जमवाल होरां नै इस बारे च ही गल करा दे। शायद तस्वीर थोड़ी साफ होऐ। गल तकनीका दे बारे च है इस करी असां एह् सवाल जवाब हिंदिया च करा दे, तां जे समझणे जो असानी रैह्।     

 

तकनीकी परिवर्तन और हमारी भाषा  (एक)    

पहाड़ी दयार: गूगल जीबोर्ड पर हिमाचल की कांगड़ी, मंडियाली और महासुवी बोली को शामिल किया गया है। सिर्फ इन बोलियों के चुनाव के पीछे क्या कारण रहे होंगे? और इस काम में किन लोगों का योगदान रहा है

भूपी जमवाल:  गूगल कीबोर्ड पर कांगड़ी, मण्डियाली  और  महासुवी को शामिल करने के पीछे हिमाचल प्रदेश के किसी व्यक्तिविशेष की भूमिका नहीं है । छानबीन करने पर पता चला है कि गूगल के अपने ऑटोमेटेड सिस्टम से ही यह तय होता है कि किस किस भाषा का प्रयोग लोग आम तौर पर अधिक करते हैं। उसके बाद क्षेत्र विशेष की उन भाषाओं के बारे में गूगल टीम निर्णय लेती है। हिमाचल की इन भाषाओं के सम्बंध में यही हुआ है। इनके साथ विश्व भर की कई अन्य भाषाएं भी गूगल कीबोर्ड पर आईं थीं। 

 

पहाड़ी दयार: इन कीबोर्डों की उपयोगिता क्या है? उपयोगकर्ता हिंदी के कीबोर्ड की जगह इनका इस्तेमाल क्यों करेगा? क्या इस परियोजना और एनआईटी द्वारा विकसित किए जा रहे अनुवाद ऐप का परस्पर कोई संबंध है? अगर नहीं है तो भी उस प्रोजेक्ट के बारे में भी बताएं। 

भूपी जमवाल:  जहाँ तक इन कीबोर्ड्स की उपयोगिता का प्रश्न है , यह तीनों अभी शुरुआती दौर में हैं। कहीं कहीं तो केवल नाम और वर्णों के क्रम को ही बदला गया है। इन तीन भाषाओं के सम्बंध में यह ज्ञातव्य है कि महासुवी कीबोर्ड में शब्द भंडार अत्यंत सीमित है। मण्डियाली में कुछ बेहतर है जबकि कांगड़ी कीबोर्ड इन सबमें बेहतरीन बन पड़ा है। कांगड़ी कीबोर्ड में कई शब्दों को वॉइस कमांड से भी अच्छे से टाइप किया जा सकता है। हालांकि एक सबसे बड़ी कमी इन कीबोर्ड्स में यह है कि '' के लिए इनमें स्थान ही नहीं है। जबकि '' इंडिक कीबोर्ड में पहले से उपलब्ध था।

अब, क्योंकि इन  कीबोर्ड्स का अभी अपडेटेड वर्ज़न नहीं आया है, उपयोगकर्ता को इंडिक कीबोर्ड (मेरे मतानुसार) अधिक सुविधाजनक लगेगा। 

एनआईटी द्वारा विकसित किए जा रहे कांगड़ी हिंदी अनुवाद डिवाइस का इन कीबोर्ड्स के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। एनआईटी का प्रोजेक्ट एक ऐसा डिवाइस तैयार करने का था जो कांगड़ी का हिंदी और हिंदी का कांगड़ी भाषा में अनुवाद कर सके । इस प्रोजेक्ट के प्रथम चरण में अनुवाद के लिए डेटासेट बनाना था जिसमें पचीस-तीस साहित्यकार सम्मिलित थे और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिवर्सल डिपेंडेंसी के आधार पर कांगड़ी भाषा को क्वालीफ़ाई करवाना था , जिसमें हिमाचल प्रदेश के दो साहित्यकारों ने कार्य किया । यूनिवर्सल डिपेंडेंसी के अंतरराष्ट्रीय डैशबोर्ड पर वर्तमान में भारतवर्ष की कुल दस भाषाएं ही अब तक शामिल हो पाई हैं । हिमाचल प्रदेश की कांगड़ी भाषा इनमें से एक है।  

पहाड़ी दयार: इन परिवर्तनों का हिमाचली भाषा की मुहिम पर क्या असर पड़ेगा? क्या अब हिमाचल की एक नहीं अनेक भाषाएं होंगी

भूपी जमवाल:  जहाँ तक हिमाचली भाषा प्रश्न है, यह वही भाषा है जिसे हम पहाड़ी भाषा के नाम से जानते रहे हैं। लेकिन लगभग हर पहाड़ी क्षेत्र की भाषा को पहाड़ी कहा जाता है, इसलिए हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भाषाओं को मिलाकर हिमाचली भाषा के सृजन की मुहिम छेड़ी गई। प्रदेश की कोई न कोई आधिकारिक भाषा तो होनी ही चाहिए परन्तु हिमाचल प्रदेश की एक भाषा बनाने की राह में अनेक भाषाओं का स्वतंत्र अस्तित्व एक बड़ा रोड़ा है। कांगड़ी , चम्बेयाली , मण्डियाली , कहलूरी , बघाटी आदि को कुछ हद तक मिलाकर एक बनाया जा सकता है। जनजातीय बोलियों को छोड़ भी दिया जाए तो भी सिरमौरी, महासुवी, कुल्लुवी

 
सिराजी आदि जिनका व्याकरण बिल्कुल अलग है उन्हें निचले हिमाचल की बोलियों के साथ मिलाना अत्यंत कठिन है। व्यावहारिक तौर पर पूरे प्रदेश के लिए एक भाषा की कल्पना करना मुश्किल है। किसी एक भाषा को उसे जानने, बोलने वालों की अधिक संख्या के आधार पर आधिकारिक भाषा ज़रूर बनाया जा सकता है।  

पहाड़ी दयार: तकनीक भाषा के प्रयोग की सुविधा बढ़ा रही है। इसके बरअक्स जीवन में हम अपनी भाषा बोली का कितना प्रयोग कर रहे हैं? आगे भाषा का किस प्रकार का भविष्य आप देखते हैं?

भूपी जमवाल  
भूपी जमवाल:  तकनीक निस्संदेह भाषा के प्रयोग में सुविधाएं बढ़ा रही  है। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि अब बहुत से लोग अपनी  मातृभाषा का प्रयोग करते समय हीन भावना से ग्रसित नहीं होते।  सोशल  मीडिया की भूमिका भी इसमें बहुत अच्छी रही है। लोग अपनी  भाषा में  अपनी बात रखने लगे हैं। जहाँ तक भाषा के भविष्य का प्रश्न  हैनिश्चय ही  हमारी भाषा उन्नति के पथ पर अग्रसर होती रहेगी।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  पहचान होने से अब तकनीकी और भाषा विज्ञान के  आधार पर भी  विकास की पूर्ण सम्भावना है। शीघ्र ही वर्तनी और उच्चारण  सम्बन्धी  मानकीकरण होने की भी आशा है।  

Sunday, July 26, 2020

हिंदुस्तानी फ़ौज : बहादर भी दिलदार भी


26 जुलाई कारगिल विजय दिवस 
दे मौके पर देसे ताईं शहीद होणे वाळे वीर जुआनां जो 
विनम्र श्रद्धांजलि कनै सादर नमन।



पेश है भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी' होरां दा इक लेख।      


हिंदुस्तानी फ़ौज : बहादर भी दिलदार भी

कारगिल दी लड़ाई दुनियां दियां बाकी लड़ाइयां ते 'लग्ग थी। इसा लड़ाइया विच दो ऐसे मुल्क लड़ा दे थे जिह्नां वल्ल परमाणु हथियार थे । जाहलू हिंदुस्तानी फ़ौजी सर्दियां विच अपणेयां बंकरां ते उतरी के वापस आए ताहलू ही पाकिस्तानी फौजियां तिह्नां मोर्चेयाँ पर कब्ज़ा करने दी साज़िश करी लेइओ थी। सन 1999 दे मई महीने दी तिन्न तारीख जो डंगरां चारने वालेयां दस्सेया तां फौजा जो पता लगा कि मोर्चेयाँ पर पाकिस्तान देयाँ फौजियां कने उग्रवादियां कब्ज़ा करी लेया है। त्रीएं दिनें जाहलू असां दे फ़ौजी ओत्थू गए तां तिह्नां पर पाकिस्तानियाँ दा हमला होया कने सैह शहीद करी दित्ते गए। नौ मई 1999 जो तिह्नां असां देयाँ हथियारां वगैरह जो भी उड़ाई दित्ता। हालात ऐसे थे कि सांजो एह भी पता नी था कि पाकिस्तान दे कितने सपाही तित्थू हैंन। 
  कारगिल दियां चोटियां दे नाँ नी हैंन ; बस नम्बर हैंन। जिञा पॉइंट 4875, पॉइंट 5140 वगैरह । 
 पर एह चूण्डियां सांजो ताईं बहुत ही ख़ास हैंन। इह्नां ते सिद्धे थल्ले श्रीनगर-लेह हाईवे है। इसी रस्ते ते लेह दे इलाके जो सामान कने राशन भेजेया जांदा है। हालांकि इक्क सड़क वाया मनाली भी है पर सैह ज़ादा लंबी है। दुश्मण उप्पर पहाड़ियां पर बैठेया था कने असां दे फ़ौजी थल्ले थे। जे सड़का जो नुक्सान हुंदा तां लेह तक पुज्जणा बड़ा औक्खा होई जाणा था। इसा वजह ते भी तिह्नां ते तौळी तौळी कब्ज़ा छडाणा ज़रूरी था। पर दुश्मणे दी पोज़िशन खरी थी , इस करी के असां दी फ़ौज ओत्थू पुज्जी नी पा दी थी । इसा लड़ाइया विच असां दे मते बहादुर अफ़सर कने फ़ौजी शहीद होई गए । एयरफोर्स जो दख़ल दैणा पेया , बड़िया मुश्कला कने हालात काबुए विच औणा लग्गे । कैप्टन सौरव कालिया,कैप्टन विक्रम बत्रामनोज पांडेय, शीशराम, विनोद , राजकुमार , गणपत सिंह  वगैरह केइयाँ इसा लड़ाइया विच शहादत लेई। लगभग दूंह महीनेयाँ बाद लड़ाई ख़त्म होई। 
     जित्थू तिकर दुश्मणे दी गल्ल है पाकिस्तान एह भी मन्नणे जो त्यार नी था कि घुसपैठ करने वाळे पाकिस्तान दे फौजी थे। असां देयां फौजियां कने तिह्नां ऐसियां ऐसियां बेचिळस हरकतां कित्तियाँ थियाँ कि दिखणे वाळेयां दा काळजा कम्बी जाएं। कैप्टेन सौरभ कालिया दिया देह्इया दिक्खी के कुसी दा भी खून उबाळ खाई जाए , इतनी बुरी हालत कित्ती गेइयो थी। ऐसा घटिया कने राक्शां वाळा कम्म पाकिस्तान ही करी सकदा था।  दूजी तरफ़ असां देयाँ अफ़सरां जाहलू दिखेया कि तिह्नां दा इक्क कैप्टन बहुत ही बहादरिया ने लड़ा दा, तां तिह्नां बाकी पाकिस्तानी फौजियां साहीं तिसदा आखरी संस्कार करने ताईं तिसजो दबाया नी बल्कि तिस दे शरीरे जो बाक़ायदा सम्हाळी के रखेया कने दिल्ली पुजाई के पाकिस्तान हाई कमीशन दे हवाले कित्ता । सैह पाकिस्तान दा कैप्टन कर्नल शेरखान ( तिसदे दादुए तिसदा नाँ ही 'कर्नल' शेर ख़ान रखी दित्तेया था, पर तिसदा रैंक कैप्टन ही था ) था। हिंदुस्तानी अफ़सरां तिसदिया बहादरिया जो पछैणी के पाकिस्तान सरकार जो एह सन्देसा भजवाया कि इस अफसर जो ज़रूर कोई बड्डा सम्मान मिलणा चाहिदा है। पर पाकिस्तानियाँ तिस दिया देह्इया लैणे ते भी मना करी दित्ता। ख़ैर जाहलू तिस कप्ताने दे रिश्तेदार कने ग्राएँ दे बाकी लोक पाकिस्तान सरकार पर दबाव लग्गे पाणा तां पाकिस्ताने मन्नी लेया कने बादे विच कैप्टन कर्नल शेर खान जो पाकिस्तान दा सबते बड्डा फौजी सम्मान निशाने हैदर दित्ता। 
     असां दी फौज न सिर्फ़ बहादर है बल्कि बड्डे दिले वाळी भी है। असां देयाँ अफ़सरां पाकिस्तान वाळेयां साहीं बेचिळसां वाळियां हरकतां नी कित्तियाँ बल्कि दुश्मणे जो भी सम्मान दुआणे दी कोशिश कित्ती। कारगिल दिया लड़ाइया देयाँ चौंह बहादर लड़ाकेयां जो देशे दा सबते उच्चा सम्मान परमवीर चक्र मिल्ला, जिह्नां विच दो हिमाचल दे , कैप्टेन विक्रम बत्रा ( शहादत ते बाद )कने राइफलमैन संजय कुमार भी शामल हैंन। अज्ज कारगिल विजय दिहाड़े उप्पर हर हिंदुस्तानी दिले ते अपणिया फ़ौजा जो सलाम करादा है ; सैह जागा दे तां असां सौआ दे हैंन।
      --- भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी'