हिन्दिया दा इक रसाला है साखी । तिसे दे अंक 39 बिच गुजरातिया दे मशहूर कवि नाटककार सितांशु यशश्चंद्र होरां दा इक लेख कनै इक कविता छपियो है। अनुवाद भी तिन्हां अप्पू ही कीतेयो। असां जो लग्गा भई कवता अज के बग्ते जो बड़े सम्पूर्ण कनै छैळ ढंगे नै पेश करा दी है। तुसां ताईं पेश है पैह्लैं पहाड़ी कनै तिसते बाद हिन्दी च एह् गुजराती कवता। गुजराती ते हिन्दी अनुवाद : सितांशु यशश्चंद्र । पहाड़ी अनुवाद : अनूप सेठी। पहाड़ी अनुवादे पर सलाह-सूतर तेज सेठी होरां दितेया।
कुमार गंधर्वे गैं इक गूंगे बग्ते दी मंग
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो
दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व
तिज्जो बोली दित्था था कल जिन्हां, अज तिन्हां असां जो भी साफ गलाई ता
हुण जे नीं छड्डी अजाद संघे नै गाणे दी
ख्वाइश
तां जींदे नीं बचणा है जादा हुण इसा
दुनिया च
सैह्मयो जेह्
कुछ बेबस, कुछ मर्जिया नै चुप देह् इस बग्तें भी किछ गलाणा है,
तू ता समझी लैंह्गा इसा गल्ला, कोमकली ।
असां भी गाणा है दुबारा, जिञा तैं गाई नै दस्सेया, दुबारा
भौएं असां न होन पंडित भीमसेने साह्यी
लम्मे सुरे दे काबल
निक्के निक्के पगां नै करह्गे पार असां, एह् लम्मा जेह्या फासला, जिञा तैं कीता
भौएं न रही सकिए राजनगरे च, टोळी लैंह्गे असां अपणा देवास।
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो दुबारा
गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे
बग्ते जो दुबारा अपणे देवासे च रैह्णा सखाअ,
राजनगरां ते दूर
क्या हुंदा देवासे च, कोमकली ; किञा मरी जांदा कुमार,
फिरी भी किञा जींदा रैंह्दा गंधर्व ;
अपणे बणायो रागां च गाई नै दस्सा असां जो
दस्सा, कैंह् कम्मै नीं औंदा कोई इक्को ई घराना
तैं बणाया किञा हर इक घराने च अपणा घर,
गाई नै सुणाह् संगीत समारोहे च नीं, अपणे निर्दयी किह्लपणे
ओह्थी ते असां सारे सुणा दे हन अज, सारियां ठाह्रीं अज देवास
हर आम आदमिये दी अमरता दा गुप्त राज़
दुबारा गाई नै दस्स असां जो,
नौंए मिल्लयो संघे नै, शिवपुत्र
सुणया है जदूं बमार था तू, गाई नीं सकदा था,
तू सुणदा था तदूं पंछियां जो, हौआ जो,
बूटेयां जो कनै देवासे दी दयावान रुखियाईया
जो
असां जो भी सखाह् किञा एह् सुणना
पता है असां जो हुण मुस्कल है, सोशल मीडिया दे बग्ते च, मनचाह्या सुणना
भी
असां दिया हौआ ते गुआची गइयो हुण पंछियां
दी चैह्क
अपणे ही चार चफेरे घुमदी है असां दी हौआ,
अपणे ही जैकारे दी गर्जना करदी
हौआ दी भंवीरी बणी नै रुक्खां पुटदी
चलियो है
हर इक देवासे जो फटेयो बदळे दिया बौछारा
च समेटी लैंदी है, हुण एह् भतोइयो हौआ
सुलताने दे राज-हाथिये जेह्यी, कबीरे बखा जो बधदी जांदी
सैह्मयो जेह् हन असां ।
चुप्पिया दा बग्त सुरु होई गेया सारिया सृष्टिया च ।
‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’, सुआल पुच्छा फटेयां फेफड़यां दा
फुफकार भरोयो आरोह च, कोमकली कुमार ।
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे
बग्तें सिखणा है होर भी किछ, तेह्ते,
सिखणा है तेरे ते धीरज, शिवपुत्र,
छींह सालां दा सैह् तेरा देवासी धीरज ।
गिणती करना सखाअ असां जो, इन्सानी सुरां दी बक्ख बक्खरियाँ लय दी,
जिञा सखाया होणा पंडित देवधरें तिज्जो,
दस्स असां जो तां छींह सालां च कितणे
हुंदे म्हीने?
इक्की म्हीने च तां कितणे हुंदे दिन? इक्की दिने च घंटे, घंटेयां दे पल?
किञा बिताइए सैह् इक पल,
हलाहल कनै अमृत, दूह्ईं नै घुळेया पल?
कदूं आया तिस सठयाउंए-कपड़े दिया बुणाइया
च इक्की कुमार गंधर्वे दिया मौता दा पल?
कदूं आया, देरा ते, दूए कुमार गंधर्वे दे जमणे दा पल?
किञा हुंदी सैह् कबीरी बुणाई?
सखाह् मेरे काह्ळे पेयो बग्ते जो अपणे
तिन्हां छीं: सालां दा ध्रेठ
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे
बग्ते जो क्षय ते अक्षय तक जाणे दा रास्ता दस, चिर
कुमार
अकाल ग्रसया है अज एह् धरयाया धरयाया
थल्ले-यो लौंह्दा बग्त,
भोगे ‘खा जो
दौड़-भज्जा दा तेज नाच बहु-ताला है ।
इस’च ई
सुणाअ अपणी रस-भरिया उआजा च
विलंबित इकताला च तेरा अप्पू बणाया राग
गांधी मल्हार,
तेरे राग गांधी मल्हारे च, विलंबित इकताला च, करुणा नै,
सुणाह् सारयां जो, ‘तुम हो धीर’ ।
अपणैं घरैं गाई नैं अज सुणाह् असां जो, घरानेयां ते दूर, ‘तुम हो धीर...’,
कबीरे दी रसभरी वाणी सुणाह् असां जो
गांधी मल्हारे च,
विलंबित, इकताला च, ‘धीर’
फटाफट सब किछ लई लैणा सखाया जांदा है मेरे
बग्ते जो अज,
कई घराने डटयो बहु-ताले चार चफेरें अपणे
अपणे रागे दा समूहगान कराणे ताईं असां ते,
देह् देह् इस गूंगे बग्ते जो गुणगुणना
सखाह्, सिर्फ अपणे देवासे च
राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे
बग्ते जो भी
निकेयां पगां नै ही भौंए, पर लम्मे रस्ते पर, अपणिया ही ऊर्जा नै,
अपणे ही तरीके नै
अपणा राग गाणा है दुबारा,
क्या हे साधना, क्या है रियाज़, दवा क्या है कनै इलाज,
दस्सा कोमकली कुमार, अमर गंधर्व
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| सितांशु यशश्चंद्र प्रसिद्ध गुजराती कवि, नाटककार, अनुवादक और शिक्षाविद |
कुमार गंधर्व के पास एक गूंगे समय की
मांग
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले, चुप्पी साधे, मेरे समय को
फिर से गाना सिखाओ, कुमार गंधर्व
तुम्हें कह दिया था कल जिन्होंने, आज उन्होंने हमें भी साफ कहा है
अब अगर छोड़ न दी मुक्त कंठ से गाने की
ख्वाहिश,
तो जिन्दा नहीं बचोगे ज्यादा अब इस
दुनिया में
सहमे से,
कुछ अवश, कुछ स्वेच्छया चुप से इस समय को भी कुछ कहना है,
तुम तो जान पाओगे इसे, कोमकली.
हमें भी फिर से गाना है, जैसे तुमने गा दिखाया, फिर से
भले ही पंडित भीमसेन की लंबी सुरावट के
हम काबिल न हो
छोटे छोटे कदमों में पार करेंगे हम, यह लंबा सा फासला, जैसे तुमने किया
भले ही राजनगर में नहीं रह पाएं, ढूंढ़ लेंगे हम अपना अपना देवास.
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले चुप्पी
साधे मेरे समय को फिर से गाना सिखाओ,
कुमार गंधर्व.
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय
को फिर से अपने देवास में रहना सिखाओ,
राजनगरों से दूर
क्या होता है देवास में, कोमकली; कैसे मर जाता है कुमार,
फिर भी कैसे जीवित रहेता है गंधर्व;
अपने बनाये रागों में गा कर हमें दिखाओ.
कहो, कैसे काम नहीं
आता कोई एक ही घराना,
कैसे तुमने बनाया हर घराने में अपना
खुदका घर,
गा कर सुनाओ, संगीत समारोह में नहीं, अपने निष्ठुर एकांत में,
वहीं से हम सब सुनते हैं आज, सभी जगह आज देवास
हर आम आदमी की अमरता का गुप्त रहस्य फिर
से गा कर बतलाओ हमें,
नवप्राप्त कंठ से, शिवपुत्र
कहते हैं जब बीमार थे तुम, गा नहीं सकते थे,
तुम सुना करते थे तब पंछीयों को, हवा को,
पेड़ों को और देवास के सदय सूखेपन को
हमें भी सिखाओ कैसे यूँ सुनना
जानते हैं हम अब मुश्किल है, समूह संचार के समय में, मनचाहा सुनना भी
अब पंछीयों की चहचहाट खो चुकी है हमारी
हवा,
अपनी ही चारों और घूमती है हमारी हवा,
अपने ही जयघोष की गर्जना करती
चक्रवात बन पेड़ों को उखाड़ती चली है
हर देवास को फटे बादल की बौछार में सिमट
लेती है,
अब यह प्रमत्त हवा,
सुलतान के राजगज जैसी, कबीर की ओर आगे बढ़ती जाती है
सहमे से हैं हम.
चुप्पी का समय शुरु हो गया है सारी
सृष्टि में.
'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो', प्रश्न पूछो फटे हुए फेफड़ों का,
फुत्कार भरे आरोह में, कोमकली कुमार.
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय
को सीखना है और भी कुछ, तुमसे,
सीखना है तुम से धैर्य, शिवपुत्र,
छह साल का वह तुम्हारा देवासी धैर्य.
गिनती करना सिखाओ हमें, मानव स्वर के विविध लयों की,
जैसे सिखाया होगा पंडित देवधर ने
तुम्हें.
कहो हमें छह साल के कितने होते हैं, तब,
माह?
एक माह के कितने होते है दिन, तब ?
एक दिन के घंटे, घंटो के पल ?
कैसे बितायें वो एक पल, हालाहल और अमृत, दोनों से घुली पल ?
कब आया उस धैर्यपट की बुनाई में एक कुमार
गंधर्व के मृत्यु का पल ?
कब आया, देर से, दूजे कुमार गंधर्व के जन्म का पल ?
कैसे होती है वो कबीरी बुनाई ?
सिखाओ मेरे अधीर समय को तुम्हारे उन छह
वर्षों का धैर्य
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय
को क्षय से अक्षय तक जाने का मार्ग बताओ, चिर कुमार
अकाल ग्रस्त है आज यह प्यासा प्यासा
हासोन्मुख समय,
भोगोन्मुख भागदौड़ का द्रुत नृत्य बहुताल
है.
इसी में सुनाओ अपनी जलभरी आवाज में
विलंबित एक ताल में तुम्हारा खुद का
बनाया राग गांधी मल्हार,
तुम्हारे राग गांधी मल्हार में, विलंबित एकताल में, करुणा से,
सुनाओ सभी को, 'तुम हो धीर'.
अपने घर में गा कर आज हमें सुनाओ, घरानों से दूर, 'तुम हो धीर...'
कबीर की जलभरी बानी सुनाओ हमें राग गांधी
मल्हार में,
विलंबित, एकताल से, 'धीर'
अविलंब सब कुछ पाने का सिखाया जाता है
मेरे समय को आज,
अनेक घराने तुले पड़े हैं बहुताल चहुँदिश
अपने अपने राग का समूहगान हमसे करवाने में,
ऐसे इस गूंगे समय को गुनगुनाना सिखाओ
सिर्फ,
अपने अपने देवास में
राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय
को भी
नन्हें कदमों से सही, पर लंबे रास्ते पर, अपनी ही ऊर्जा से, अपनी ही तरह
अपना खुद का राग फिर से गाना है,
क्या है साधना, क्या है रियाज, औषध क्या है और उपचार,
कहो, कोमकली कुमार, अमर गंधर्व


