वरयाम सिंह होरां पिछलेयां पंजांह्'क सालां ते अपणी माबोली सराजी च कवता लिखा दे हन। तिन्हां दे तिन कवता संग्रह छपेयो हन। हिंदी समाज च वरयाम सिंह रूसी भाषा दे ज्ञाता कनै अनुवादक दे रूप च मशहूर हन। अनवाद दियां कोई दो दर्जन कताबां हन। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय च रूसी भाषा दे प्रोफैसर रिटैर होणे परंत अपणे घरैं बंजार रैंह्दे। कनै लोक संस्कृति, लोक भाषा पर चिंतन मनन लेखन करा दे। पिछले साल इन्हां दी कताब आई 'अपने आलोक में'। इस च इन्हां दियां सराजी कवतां कनैं तिन्हां दे हिन्दी अनुवाद हन। अज असां इसा कताबा पर गल करनी है। पैह्लैं पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च। एह् समीक्षा अनूप सेठी नै लिखियो है। पर सारेयां ते पैह्लैं कुछ सुआल जुआब - असां सुआल भेजे कनै वरयाम होरां जुआब दित्ते। सुआल जुआब हिन्दिया च हन।
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| वरयाम सिंह |
प्रश्न 1: ‘अपने आलोक में’ संग्रह में आपके तीन सराजी कविता संग्रहों की मूल और हिन्दी कविताएं हैं। इन संग्रहों के नाम क्या हैं, ये कब कब कब छपे हैं?
वरयाम सिंह: ‘उछ़टी मारनी डिया’ संकलन 1983 में प्रकाशित हुआ था। 1986 में
हिमाचल अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया था। दूसरा संकलन ‘प्रियाशे आपणे’ 1988 में और तीसरा ‘एहड़ौ हांह पेड़’ 1997 में छपा था।
प्रश्न 2: आपका दिल्ली और विदेशों में लंबा
प्रवास रहा है। क्या ये कविताएं घर से दूर परदेस में रहते हुए लिखी गई हैं? इनका रचनाकाल क्या है?
वरयाम सिंह: अधिकांश बंजार से बाहर दिल्ली और मास्को में रहते हुए।
रचनाकाल: 1980-83, 84-86, 87-96
प्रश्न 3: अपनी
बोली में लिखने की प्रेरणा कहां से मिली? क्या आपका सराजी लेखन हिमाचली भाषा के पचास साल पुराने आंदोलन से भी प्रेरित
रहा है?
वरयाम सिंह: प्रोत्साहन ठाकुर मौलू राम और चंद्रशेखर पुरोहित जी से।
अपनी बोली में लालचंद प्रार्थी और महेश्वर सिंह जी के भाषण सुनना अच्छा लगता था।
प्रेरणा मिली रूस के अवार भाषा के कवि रसुल हमजातोव से, विशेषकर ‘मेरा दागिस्तान’ पुस्तक से। किसी हिमाचली आंदोलन से नहीं।
प्रश्न 4: आप
हिन्दी में भी कविता लिखते रहे हैं। आप यह कैसे तय करते हैं कि कौन सी रचना किस
भाषा में लिखी जाए?
वरयाम सिंह: हिंदी कविता का पाठक अमूर्त-सा लगता रहा है। सराजी कविता का
पाठक जैसे अपने साथ, अपने पास
बैठा-खड़ा दिखाई देता है। विषय तय करता है कि हिंदी में लिखूं या सराजी में।
प्रश्न 5: आपने
टेलिफोन पर भाषा और कविता के संबंध में कुछ कहा था। अगर मुझे गलत याद नहीं रहा है
तो यह कि भाषा से तय होता है कि कैसी कविता लिखी जाएगी। कृपया इस प्रक्रिया को
विस्तार से बताएं। क्या एक ही समय में लिखी जा रही हिन्दी और सराजी कविता पूरी तरह
अलग होगी? यह मैं इसलिए भी पूछ रहा हूं
क्योंकि एक तो मैं आपकी रचना प्रक्रिया में भाषा की भूमिका जानना चाहता हूं, दूसरे यह जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आपकी सराजी
कविता का कथ्य और डिक्शन प्रचलित हिमाचली कविता से अलग और आधुनिक भारतीय कविता के
करीब है।
वरयाम सिंह: कविता का मुहावरा और किसे संबोधित है रचना- यही तय करते हैं
डिक्शन। हिंदी में मेरी आधी कविताएं सराजी जनपद के समाज और जीवन से जुड़ी हुई हैं।
प्रश्न 6: क्या
आप अब भी सराजी में लिख रहे हैं? हिमाचली भाषा या भाषाओं
के बारे में अब आप क्या सोचते हैं? पहले एक हिमाचली भाषा
का आंदोलन था, अब अपनी अपनी भाषा का परचम है।
हमें अपनी भाषाओं के बारे में क्या करना चाहिए?
वरयाम सिंह: आजकल कविताओं से अधिक सराजी की शब्द-संपदा पर सोच और लिख
रहा हूं। सामान्य जीवन से जुड़े शब्द हिंदी की अपेक्षा संस्कृत के समीप हैं, अर्थात तद्भव और तत्सम हैं- ऐसा क्यों? वाक्य रचना (syntax) हिंदी से अलग क्यों ? लोक रामकथा और
कृष्णकथा तुलसीदास और व्यास कृत कथाओं से अलग क्यों ? आजकल ऐसे ही विषयों पर विचार चल रहा है।
प्रश्न 7: अपनी
स्थानीय भाषा की कविता को हिन्दी में अनुवाद करने का अनुभव कैसा रहा? क्या दिक्कतें आईं और क्या आसानी रही?
वरयाम सिंह: सबसे बड़ी दिक्कत वर्तनी की है। बहुत-सी ध्वनियां हैं जिनके
लिए देवनागरी में वर्ण (अक्षर) नहीं। हम दोनों मैं और पत्नी तारा नेगी इस समस्या
का हल ढूंढने में लगे हैं। तारा नेगी कहानियां रचते हुए और मैं कविताएं...।
प्रश्न 8: आपकी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर चारों
कोनों में चार मोटिफ हैं। क्या इनका कुछ विशेष आशय है?
वरयाम सिंह: मोटिफ मुझे भी समझ नहीं आये। इन्हें हर पृष्ठ पर डाला है मेरे प्रकाशक ने जो कभी जे.एन.यू में अध्ययनरत थे। उन्होंने गंगा प्रसाद विमल के निर्देशन में बहुत वर्ष पूर्व पी.एच.डी. की थी।
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| सराजी कविता संग्रह : प्रियाशे आपणे |
वरयाम सिंह दियां सराजी कवतां
वरयाम सिंह होरां दे कवता संग्रह ‘अपने आलोक में’ जो पढ़ना इक जुदा जेह्या अनुभव था। वरयाम जेएनयू च रूसी पढ़ान्दे थे। रूस जाई नै पढ़ाई कीत्तियो कनै यूरोप भी घुम्मेया। रैह्णे आळे हन हन बंजार दे सराजी भाई। इन्हां दी मशहूरी रूसी दे अनुवादक दे तौर पर जादा है। हिंदिया च कवतां दियां दो कताबां हन कनै सराजी भाषा च तिन्न। ‘अपने आलोक में’ कताबा च वरयाम होरां सराजी दियां तिन्नों ही कताबां दियां कवतां दे हिंदिया च अनुवाद कीतेयो हन। पैह्ली कताब 1983 च छपी थी - उछ़टी मारनी डिया। इसा जो हिमाचल अकादमिया दा इनाम मिल्लेया है। दूई कताब 1988 च आई - प्रियाशे आपणे। कनै त्री कताब 1997 च आई - एहड़ौ हांह पेड़। ‘अपने आलोक में’ कताबा च इक्की पासैं सराजी है, दूए पासैं हिन्दी। मतलब असां दी सराजी कवता हिन्दी पाठके वह्ल भी पूजी गई।
मैं अपणियां जादातर बोलियां समझी लैंदा पर कुछ नीं औंदियां। कुलुवी थोड़ी बौह्त समझा आई जांदी पर सराजी भाषा फर्क है। करड़ी लगदी। इस करी मैं पैह्लें इसा कताबा दियां कवतां हिंदिया च पढ़ियां, तिसते परंत सराजी च। बाद च एह् सोची नै हिंदी सराजी कठियां पढ़ियां भई दूईं भाषां च कवतां दा साादर्यबोध अक्खैं बक्खैं बझोई जाऐ।
इसते पैह्लें मुंबइया दे अपणे कुशल कुमार होरां दी कताब ‘मुठ भर अंबर’ आई थी। तिन् भी अपणियां पहाड़ी कवतां दा हिंदी अनुवाद अप्पू ही कीतेया है। तित्थी भी दोयो भाषां आह्मणो-साह्म्णै थियां। कुशले दी जुबान मेरियां जुबाना नै मिलदी है। ता पढ़ना सौखा रेह्या। कुशले दे अनुवाद दा डिक्शन भी पहाड़िया दे नेड़ैं है। मतलब तिन्हां दिया हिंदी अनुवादे आळी कवतां च कांगड़ी या पहाड़ी या हिमाचली भाषा दी खुशबू मिलियो हुंदी है।
वरयाम सिंह दी कविता दा डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषां दे डिक्शन दे नेड़े है। गौर करने आळी गल है भई सराजी भाषा दिया कवता च आधुनिक भारतीय कविता दा डिक्शन मिल्लै। हुणे तक मैं जितणी हिमाचली कवता पढ़ियो, तिसा दा डिक्शन, तिसा दी बुनावट कनै बनावट, तिसा दा कथ्य लोक कनै पारंपरिक कवता दे नेड़ैं है। अपवाद छड्डी नै। हिमाचली कवता वाच्य कवता दे नेड़ैं है।
वरयाम होरां दी कवता अपणे घर, परिवार, ग्रां, खेह्तर, बूटे, जंगल, सूबा, लोक वगैरह नै डुग्घा कनै आत्मीय संवाद करदी है। कवि अपणे परिवारे सौगी-सौगी लोक देवतेयां, ग्रां देयां लोकां दी जिंदगी कनै मने जो निरखदा-परखदा रैंह्दा है। पशु-पक्षियां, बूटेयां- बणां दी खोज-खबर लैंदा रैंह्दा है। इसा गल्ला दी तस्दीक कुछ कवतां दे नां ते होई जाणी है। जिंञा रोटी, बात (रास्ता), डागे (ढोर), डाब्बू कुत्ते ताईं, शोह्रू री खरी (बच्चे दा दुख), म्हारे लोके री बेटड़ी, गाड़ा री हाका (नदी दियां अवाजां), देओ रै खरै (दुख देवते दे), मंणश होर डागे (म्हाणू कनै पशु), देओ नारायण, साजे री धियाड़ (संगरांदी दा दिन), बाकरे बै (बकरे नै), मनुआळ (मोनाल), गुच्छी, हमें च़ेलू (पक्षी असां), पूळा (पूलें), टोहल (चट्टान), थकी खील (थकी गेयो फुल्ल), जुणा छ़ेके बुढ़ळे होई (बुड्ढे होई गेयो जेह्ड़े), वगैरा।
अपणे आळे-दुआळे दे संसारे दे सुखां-दुखां, पीड़ां-तकलीफां, सुपनेयां-मुल्लां दी खोज-खबर सैह् अपणेयां इन्हां किरदारां दी मार्फत लई लैंदे।। इन्हां कवतां ते असां जो पता लगदा भई कवि अपणिया दुनिया च किंञा खड़ोतेया है। सैह् इसा दुनिया दा हिस्सा भी है कनै इसा ते बाह्र इसा दा गुआह भी है। एह् लिप्तता- निर्लिप्तता कनै साक्षी भाव सिर्फ प्राणी जगत तक ही नीं है। तिह्दी नजर अपणे देवते पर भी है, रुक्खे कनै टोह्ला पर भी है। मतलब कविए दिया पळोह्डा च सब किछ है। कविये जो इस सारे ब्रह्मांडे च अपणे यानी इंसाने दिया जगह दी भी खबर है। इसा कताबा दी अखीरली कवता है - ‘मंणशू पृथ्वी रै’ यानी माह्णू पूथ्विया दे। इसा कवता च असां दिया पछाणा या अस्मिता दे स्तर खुलदे जांदे। जिंञा कविये तो अपणे इलाके च ‘बुहाल’ गलांदे। कुल्लू जिले च सैह् ‘सराजी’ है। सूबे च ‘कुल्लुवी’। मुल्के दिया राजधानिया च ‘हिमाचली’ कनै विदेसां च ‘हिंदूस्तानी’। कविये दी नजर ऐत्थी ही नीं रुकी। इसते बाद सैह् पृथ्वी ग्रह पर दिखदा। तिह्जो सारे लोक अपणे सक्के लगदे। फिरी सैह् इसा पृथ्विया च बसियो सभ्यता जो मंगल कनै शुक्र ग्रहे ते दिखदा। आखर च कविये दी दृष्टि असां जो सुझदी। सैह् बोलदा भई कौमां च भेदभाव है, इसी करी नै कुछ म्हाणू हन, कुछ म्हाणू नीं लगदे। मतलब असां दी सोच देह्यी होई गइयो है भई असां कुछ म्हाणुआं जो छोटे म्हाणू समझदे। जातीं दा भेदभाव कनै गैर बराबरी इसा विराट कल्पना च चंद्रमे च धब्बेयां साह्यी सुझदी। एह् भेदभाव असां दिया पृथ्विया पर मौजूद है।
वरयाम होरां दियां कवतां च तिन्हां दी दृष्टि तिन्हां दे विषय कनै कवता दे ताणे-बाणे च सुझी जांदी। इसते अलावा तिन्हां दियां कवतां दे आखिर च इक युक्ति हुंदी है। मतलब इक्की किस्मा दा नचोड़ हुंदा है। कुछ उदाहरण दिक्खा।
ढोर कवता डंगरेयां पर है। तिसा दे आखिर च इक विडंबना है,
डागै हूंदा डागै
ऐसा गौला कि तीया डागै।
पर कीबै हुंदा होळे
कोई मंणश
डागै?
डाबू कुत्ते पर लिखी कविता –
पिंझै ल्हाऊणै रै मकाबलै मंज़े
कूत्ते का मूकै मंणश निखली जोंहै।
....
हां आसा आपू, डाबुआ, मंणशा री ईज़त कौरनै आलौ
पर केह् कौरनी कूत्ते का भी कूत्ते मंणशा री ईज़त !
गाड़ा (नदी) री हाका कवता दा अंत
दिक्खा –
आज़ ज़ेहे लागै हूंदै चैणदे बूण
शई हूर्ण चैणदे मंणश।
वरयाम होरां दी कवता अपणे लोक जो सहज-संवेदन तरीके नै दिखदी है। भावुकता नीं है। सुक्के विचार भी नीं प्रीतेह्यो। बिंबां प्रतीकां कनै भाषा दा मता वजन नीं है। सहज-संवेदन दी डोरी पकड़ी नै मद्धम सुरे च सैह् अपणे लोक-संसारे जो साकार करदे। माता होऐ, याणा होऐ, रुक्ख होऐ, पशु होऐ, सैह् तिन्हां दे सुखे-दुखे दा ताणा-बाणा हौळैं-हौळें बुणी कढदे। कुती कुती व्यंजना-विडंबना दे स्हारैं दुख-तकलीफ उजागर होई जांदी है।
बकरे पर लिखियो कवता पढ़ने परंत
पाठके दे मने पर गुम जेह्यी चोट लगदी है। बकरे दी बचारगी कनै आदमिये दा लालच कवता
खत्म होणे परंत भी गूंजदा रैंह्दा। इसा च व्यंग्य दी हौळी मार भी है।
दाच लागौ मूछ़ा च़कौऊंदौ...
चेह्ल-मरेह्ळी मची मसाले-हौल्जा ज़ंदर...
काआ-कूते बी पूजी बास
जिन्हां लोकां बकरे जो बढणे, पकाणे, खाणे दी रीत बणाइयो है, तिन्हां दा जिक्र इसा कवता च नीं है। कवि बाकी सबनां दिया बेसबरिया दा जिक्र करदा कनै बकरे जो गलांदा भई तेरी जिंदगी हुण जादा नीं है बचियो। आदमिये दा जिक्र कीते बगैर बचारे बकरे नै होणे आळी हिंसा जो बिना भावुकता ते पेश कीतेया है।
इन्हां कवतां दा अनुवाद वरयाम होरां अप्पू ही कीतेया है। शायद एह् इक्की तरीके दी पुनर्रचना है। तिन्नों संग्रह इन्हां दिल्ली रैह्ंदेयां लिखयो हन।
वरयाम सिंह
की सराजी कविताएं
वरयाम सिंह
के कविता संग्रह ‘अपने आलोक में’ को पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव था। वरयाम सिंह जेएनयू में
रूसी भाषा के प्रोफेसर रहे हैं। मूलत: कुल्लू के बंजार इलाके यानी सिराज घाटी के
बाशिंदे हैं। आप मुख्यतः रूसी भाषा से अनुवाद, विशेषकर काव्य अनुवाद के लिए विख्यात हैं। हिंदी में आपके दो कविता संग्रह हैं
और हिमाचली सराजी में तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। ‘अपने आलोक में’ पुस्तक में वरयाम जी ने अपने तीनों सराजी काव्य संग्रहों की कविताओं का हिंदी
में अनुवाद किया है। इनका पहला संग्रह है - उछ़टी मारनी डिया (1983) हिमाचल अकादमी
द्वारा पुरस्कृत। दूसरा संकलन है प्रियाशे आपणे (1988) और तीसरा एहड़ौ हांह पेड़ (1997)।
‘अपने आलोक में’ संग्रह द्विभाषी है, एक तरफ सराजी कविता और दूसरी तरफ इसका हिंदी रूपांतर। इस तरह सराजी कविता हिन्दी पाठक तक पहुंचती है।
हिमाचल में कई भाषाएं हैं। अधिकांश भाषाएं मुझे समझ आ जाती हैं। कुछ हद तक कुल्लुवी भी आ जाती है, लेकिन सराजी भाषा किंचित और भिन्न है, इसलिए उतनी आसानी से समझ में नहीं आती। इसलिए पुस्तक में मैंने पहले हिंदी रूपांतर पढ़ा बाद में सराजी। फिर दूसरे पाठ में सराजी और हिंदी दोनों साथ-साथ पढ़े। ताकि दोनों रूपों में कविताओं के सौंदर्य का भान हो जाए।
इससे पहले मुंबई निवासी हिमाचली कवि लेखक अनुवादक कुशल कुमार का संग्रह ‘मुठ भर अंबर’ आया था। उसमें भी कवि ने स्वयं पहाड़ी कविता का हिंदी में अनुवाद किया था और दोनों रूप आमने-सामने थे। कुशल की भाषा मेरी भाषा से मिलती है इसलिए उसे मैं सहजता से पढ़ सका था। कुशल के अनुवाद का डिक्शन भी पहाड़ी से मिलता जुलता है यानी उनके हिंदी अनुवाद में पहाड़ी या कांगड़ी या हिमाचली की सुगंध व्याप्त रहती है।
वारयाम सिंह की कविता का डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषाओं के करीब है। यह रेखांकनीय बात है कि सराजी भाषा में आधुनिक भारतीय कविता के डिक्शन की छटा देखने को मिले। अब तक जो हिमाचली कविता मैंने पढ़ी है, उसका डिक्शन, उसकी बुनावट और बनावट, उसका कथ्य लोक और पारंपरिक कविता के करीब दिखता है। हिमाचली कविता वाच्य कविता के अधिक करीब रहती है।
वरयाम सिंह की कविता अपने घर, परिवार, गांव, खेत-खलिहान, पेड़, जंगल, प्रदेश, लोक आदि से आत्मीय और गहन संवाद की कविता है। कवि अपने घर के सदस्यों के साथ-साथ लोक देवताओं, गांव के लोगों के जीवन और मन:स्थितियों को निरखता-परखता है। पशुओं, पक्षियों, पेड़ों, जंगलों की खोज-खबर लेता है। यह बात कुछ कविताओं के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाएगी। जैसे रोटी, (बात) रास्ता, (डागे) ढोर, डाब्बू कुत्ते के लिए, (शोह्रू री खरी) बच्चे का दुख, हमारे इलाके की औरतें, नदी की आवाजें, (देओ रै खरै) दुख देवता के, मनुष्य और ढोर, देओ नारायण, संक्रांति का दिन, बकरे से, मोनाल, गुच्छी, (हमें च़ेलू) पक्षी हम, पूलें, (टोहल) चट्टान, (थकी खील) थक गए हैं फूल, बूढ़े हो गए जो, आदि। कोष्ठकों में सराजी भाषा के शीर्षक हैं।
अपने आसपास की दुनिया के सुख-दुख, दुख-तकलीफ, सपनों-मूल्यों की खोज-खबर वे अपने इन पात्रों के जरिए लेते हैं। इन कविताओं से पता चलता है कि कवि किस तरह अपने संसार में स्थित है। वह उस दुनिया का हिस्सा भी है और उससे बाहर आकर इसका साक्षी भी है। यह लिप्तता और निर्लिप्तता तथा साक्षी भाव केवल प्राणी जगत तक ही सीमित नहीं है। उसकी नजर अपने देवता पर भी है, पेड़ और चट्टान पर भी है। यानी कवि के आगोश में सब कुछ है। कवि को इस सारे ब्रह्मांड में अपने यानी मनुष्य की स्थिति का भी पता है। संग्रह की अंतिम कविता है ‘मंणशू पृथ्वी रै’ यानी ‘मनुष्य पृथ्वी के’। इस कविता में हमारी पहचान या अस्मिता के स्तर खुलते चले जाते हैं। जैसे कवि के अपने इलाके में उसकी ‘बुहाल’ नाम से पहचान है, जिले में वह ‘सराजी’ के नाम से जाना जाता है, राज्य के स्तर पर वह ‘कुल्लुवी’ है, देश की राजधानी में ‘हिमाचली’ और विदेश में वह ‘हिंदूस्तानी’ है। इसके बाद कवि पृथ्वी ग्रह पर देखता है तो उसे सभी देशों के नागरिक अपने परिजन लगते हैं। आगे वह पृथ्वी में बसी सभ्यता को मंगल और शुक्र ग्रह से देखता है। अंत में कवि की दृष्टि का परिचय हमें मिलता है, जब वह देखता है कि कौमों के भेदभाव के कारण कुछ मनुष्य दिखते हैं, कुछ मनुष्य नहीं दिखते हैं। यानी हमारी इस तरह की कंडीशनिंग हो गई है कि हम कुछ मनुष्यों को कमतर मनुष्य के रूप में देखते हैं। जातियों के भेदभाव का दंश या असमानता उसकी इस विराट कल्पना में चांद पर धब्बों की तरह दिखती है। और यह भेद हमारी पृथ्वी पर विद्यमान है।
वरयाम सिंह
की कविताओं में उनकी दृष्टि का पता उनके विषय चयन और कविता के ताने-बाने से चल
जाता है। साथ ही कविताओं के अंत में उनकी एक अपनी युक्ति भी रहती है। एक तरह से
उनका एक निष्कर्ष होता है। कुछ उदाहरण देखें।
ढोर कविता
पशुओं पर है। इसके अंत में एक विडंबना है,
क्यों होते हैं मनुष्य
मनुष्य होते हुए भी ढोर
कुत्ते पर
लिखी कविता की पंक्तियां हैं-
पूंछ हिलाने की प्रतियोगिता में
मनुष्य निकले हैं कुत्तों से आगे
कैसे इज्जत करें कुत्ते से भी कुत्ते आदमी की
नदी की
आवाज़ कविता का अंत इस तरह होता है-
कराह रहे हैं जैसे आज जंगल
कराह रहे होंगे मनुष्य कल
वरयाम सिंह की कविता अपने लोक को सहज संवेदन के ढंग से देखती है। कहीं भी भावुकता या भाव विह्वलता नहीं है; शुष्क विचार प्रधानता भी नहीं है; बिंबों प्रतीकों और भाषा का अतिरिक्त भार नहीं है। सहज संवेदन की डोर पकड़ कर धीमे सुर में वे अपने लोक संसार को साकार करते हैं। माता हो, बच्चा हो, पेड़ हो, पशु हो, वे उसके सुख-दुख का ताना-बाना धीमे धीमे बुन देते हैं। कहीं-कहीं व्यंजना और विडंबना के माध्यम से दुख-तकलीफ उजागर होती है।
बकरे पर
लिखी कविता पढ़ने के बाद पाठक के मन पर गुम सी चोट लगती है। बकरे की बेचारगी और
मनुष्य का लालच कविता के बाद गूंजता रहता है। व्यंग्य की धीमी मार भी वहां है।
अपनी मूंछें हिला रहा है द्राट
...
पागल हुए जा रहे हैं मिर्च मसाले
...
कव्वों-कुत्तों तक पहुंच गई है
पक रहे बकरे की महक
जिन लोगों ने बकरे को काटने, पकाने, खाने की परंपरा बनाई है उनका जिक्र इस कविता में नहीं है। कवि बाकी सब की बेसब्री का जिक्र करता है और बकरे को बताता है कि अब तेरा जीवन ज्यादा नहीं बचा है। मनुष्य के जिक्र के बिना बकरे जैसे निरीह प्राणी के प्रति हिंसा को भावुकता के बिना पेश किया गया है।
इन कविताओं का सराजी से हिंदी में रूपांतरण वरयाम सिंह जी ने खुद किया है। शायद एक तरह से यह पुनर्रचना ही है। पंक्ति दर पंक्ति अनुवाद नहीं है। हो सकता है यहां तीनों संग्रहों में से चुनी हुई कविताएं ली गई हों। कहीं-कहीं कवि ने सराजी की कुछ पंक्तियों को हिंदी पाठ के लिए जरूरी नहीं समझा है। पर इससे कविता के कविता होने में कोई कमी नहीं आती है। चूंकि कवि खुद अनुवाद कर रहा है इसलिए वह इस तरह की छूट लेने के लिए स्वतंत्र है। कोई अन्य व्यक्ति अनुवाद करता तो शायद वह ऐसी छूट नहीं ले पाता।
बहरहाल ! सराजी कविताओं का यह आस्वाद हिंदी पाठक के लिए सुखदाई है। इससे दूर दराज के समाज, वहां की भाषा की सामर्थ्य का अंदाजा हमें हो जाता है।
सराजी भाषा में तीनों संग्रह वरयाम सिंह ने दिल्ली में रहते हुए लिखे हैं। इस बात का खास महत्व है। यह उनके अपने लोक, अपने मूल प्रदेश और अपनी भाषा के प्रति लगाव को तो प्रकट करता ही है, दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए अपनी मूल भाषा में कविता लिखने के लिए समर्पित रहना उनके बहुआमामी कवि व्यक्तित्व से हमारा परिचय कराता है। यह भी गौरतलब बात है कि ये सभी कविताएं अपने मूल प्रदेश से नालबद्ध हैं। दिल्ली जैसे महानगर का जीवन इनकी सराजी कविता में दिखाई नहीं देता। कविता और स्थानिकता की पड़ताल करने के लिए शायद वरयाम जी की हिन्दी और सराजी कविता का तुलनात्मक अध्ययन किए जाने की जरूरत है।


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फेसबुक पर प्राप्त प्रतिक्रियाएं -
ReplyDeleteकला कौशल
'लौटेंगे दिन कविताओ के'' रूसी कवयित्री का अनुवाद वरयाम सिंह के द्वारा किया गया है।जिसकी भूमिका नामवर सिंह ने लिखी है। बेहतरीन अनुवाद है। पढ़कर कविता मन में उतर गयी थी। बहुत बधाई!
Prayag Shukla
बहुत सुंदर
Devendra Choubey
बहुत सुन्दर...कविता को यूं ही सभ्यता -समीक्षा से नहीं जोड़ा गया है।
लीलाधर मंडलोई
ReplyDeleteअनूप जी आपने वरयाम जी की सराजी कविताओं पर लिखकर एक बड़ा काम यह किया है कि लोक चेतना की मौलिक और अनुदित रचनाओं के अलक्षित समय को मूर्त किया है।वरयाम जी की स्थानीयता ,दृष्टिगत प्रतिबद्धता, भाषा प्रेम और विरल संवेदना लोक से आधुनिक साहित्य
तक एक ज़रूरी राग पुल निर्मित करते हुए भाषा में वस्तु का वरयाम जी जो उत्खनन करते हैं वह हमज़ातोव की तरह मौलिक और सार्वभौमिक काम की श्रेणी में शुमार योग्य है।
Ishita Rajan
ReplyDeleteमाननीय Varyam Singh Sir का यह संग्रह मैंने भी पढ़ा है! सराजी बोली, कुल्लवी से मिलती जुलती होने पर भी, समझने में कठिनाई होती है। जब सर के स्वयं किए अनुवाद पढ़ने को मिले, तो मूल कविता को पढ़ने की अनुभूति हुई! सराजी कविता में जिस तरह लोक जीवन छलक आता, हिन्दी अनुवाद पढ़ने पर मुझे वैसा ही अनुभव हुआ!
Mohan Sahil
ReplyDeleteवरयाम जी की सराजी कविताओं को पढ़ना चाहिए. ठियोग से अधिक दूर नहीं है सराज क्षेत्र. इसलिए समझना भी कठिन नहीं होगा।
शैलेश सिंह
बहुत खूब.
Julmiram Singh Yadav
बहुत सुंदर। हमारे लिए हिमाचल की एक नई भाषा शरागी और उसकी मिट्टी की गंध से परिचित कराने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ।
Vijay Kumar
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लेख अनूप जी। वरयाम सिंह जी के अनुवादों से तो हम सब खूब परिचित हैं।उनकी कविताओं पर लिखकर आपने हमारे लिए एक नया गवाक्ष खोल दिया है।
Anup Sethi
Vijay Kumar जी पिछले महीने वे मिले तो आपको बहुत प्रेम से याद कर रहे थे।
Vijay Kumar
Anup Sethi यह उनका बड़प्पन है।1980 में उनकी रूसी कवि अलक्सान्द्र ब्लोक की कविताओं के अनुवाद की पुस्तक आयी थी। उस पर सोमदत्त जी के संपादन में निकलने वाली" साक्षात्कार" पत्रिका में एक टिप्पणी लिखी था जिसका आनंद अभी तक मेरे भीतर व्याप्त है। विशेषकर ब्लोक की बहुचर्चित कविता "ट्वेल्व" के अपने अनुवाद के द्वारा हिंदी जगत को उन्होंने परिचित करवाया था, वह एक अद्भुत अनुभव था।
Tejkumar Sethi
ReplyDeleteमां बोली कहीं की भी हो, उसे संभालना सुरक्षित रखना हमारा दायित्व है । वरयाम सिंह जी के सराजी भासा के प्रति उनके प्रेम को देख कर मन गद्गद् हो जाता है । इतने पढ़े लिखे और अनुभवी वरयाम जी ने प्रशंशनीय काम किया है। उनसे हमें प्रेरणा लेनी चाहिये ।
Magawa Lagan
ReplyDeleteVaryam Singh
सौची- जाचा नीं जाचा रौही मेले नीं मेले !
Vikram Katoch
बहुत बढ़िया समीक्षा 🙏
Rekha Parmar
Hamare shan-a-Banjar kullu
अ जे य
ReplyDeleteसवाल महत्वपूर्ण हैं । कविता की दृष्टि से भी और भाषा के मुद्दे पर भी। बेहद सटीक लेकिन बहुत मितभाषिता के साथ जवाब दिए हैं , कहीं कहीं बचते हुए ।
प्रश्न संख्या 6 के चार हिस्से हैं । वरयाम जी ने केवल पहले और अंतिम हिस्से का जवाब दिया है। बहस तलब और खास तौर पर मेरे लिए रोचक प्रश्न इस छटे सवाल के दूसरे और तीसरे हिस्से में हैं। वरयाम जी ने उन्हें अनुत्तरित छोड़ दिया है। कारण का अंदाज़ा लगा सकता हूँ। इन का उत्तर विवाद खड़ा कर सकता है। यह भी संभव है मैं गलत सोच रहा हूँ।
"पहले एक हिमाचली भाषा का आंदोलन था "
मैं सहमत नहीं। आप दोनों सीनियर हैं, लेकिन मुझे याद पड़ता है आंदोलन "पहाड़ी भाषा" का था, न कि "हिमाचली भाषा" का। मेरी सूचना मे "हिमाचली भाषा" का नरेटीव बिलकुल नया है और यह टर्म अभी इक्कीसवीं सदी में ही उभरा है। वह भी आंदोलन की तरह नहीं विमर्श की तरह । छिटपुट चर्चाओं मे ही। यदि "हिमाचली भाषा" टर्म का इस्तेमाल इकीसवी सदी से बहुत पहले हुआ है , और यदि आंदोलन के अर्थ में हुआ है तो प्रमाण देखना चाहूंगा। मेरी जानकारी गलत हो सकती है, ऐसा है तो उस के लिए क्षमा याचना । to be continued....
अ जे य
ReplyDeleteहिमाचली ( हिमाचल की विभिन्न) भाषाओं के बारे वरयाम जी अपने विचार प्रकट कर सकते थे। उन्होंने कुछ इंटरव्यूज़ और पोडकास्ट्स में "हिमाचली भाषाओं" ( एक नहीं बहुवचन) के अस्तित्व को स्वीकारा है। ये कुछ बारीकियाँ हैं, जो यदि स्पष्ट नहीं की गई तो पहाड़ी भाषा आंदोलन के इतिहास बारे भ्रम फैल सकता है। वर्तमान में जो विमर्श है उस मे और पूर्व में जो जो आंदोलन था ; दोनों के स्वरूप में बहुत फर्क है। पहले डोगरी की तर्ज़ पर एक पहाड़ी भाषा "बनाने" की कवायद थी। लगभग जबरन।मतलब हिमाचल की दो दर्जन से अधिक पूर्णतया भिन्न भाषाओं को एक ही डंडे ( आठवीं अनुसूची) से हांकने की कोशिश, जो कि संभव नहीं था। वर्तमान में रवैया नरम हुआ है और आंदोलन अब विमर्श में बदल चुका है। और इन हिमाचली भाषाओं के कम से कम चार ध्रुव बनते दीखते हैं : मेरा अपना जो आकलन है, आज की तारीख में कोई यदि सदेच्छा और कठोर परिश्रम का सहारा ले तो ज़्यादा से ज़्यादा इस तरह की पोलराईज़ेशन की संभावना दिखती है -
1. खश: सिरमौर, अपर महासू, बुशहर, सिराज, कुल्लू,
2.भारतीय आर्य: चंबा , लाहुल के चिनल और लोहार समुदाय, कांगड़ा, ऊना, हमीर पुर, मंडी, सुकेत, बिलासपुर, लोअर महासू
3. तिब्बती / भोटी : चंबा का भटोर, लाहुल स्पिति का मयाड़, रंगलो , कोकसर, तोद्, स्पिति , किन्नौर का अपर किन्नौर और विभिन्न जगहों पर बसे हुए खंपा , बेता, तिब्बती।
4. अन्य हिमालयी इंडीजिनस ( किरात किन्नर) : लाहुल और किन्नौर की ये कुल मिला कर लगभग सात आठ भाषाएँ हैं और इन में परस्पर विलय की कोई संभावना नहीं है। चूंकि ये सब अलग अलग और अतिविशिष्ट एथनो लिंग्विस्टिक अस्मिताएं हैं, जो हिमाचल के अलावा अफगानिस्तान, मकबूज़ा कश्मीर,लदाख, उत्तराखंड, नेपाल, सिक्किम, अरुणाचल, सेवन सिस्टर्स, असम और बर्मा तक बिखरे पड़े हैं। कोई भी अपनी पहचान को सरेंडर नहीं करने वाला ।
करे भी क्यों? जब इस देश में डोगरी का पंजाबी में विलय नहीं हो सकता...., कांगड़ी का डोगरी में विलय नहीं हो सकता ..... किश्त बाड़ी का भद्रवाही में विलय नहीं हो सकता... गोजरी और गादी के अपने परचम हैं। जब कि दूर से देखने पर ये सब एक ही पंजाबी के डायलेक्ट (कुछ अलग लहजे) प्रतीत होते हैं।
इन चार समूहों को मिला कर राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी या प्रांतीय स्तर पर डोगरी जैसी एक मोनोलिथिक भाषा बनाना चाहें तो भावी दो सदियों तक भाषिक आंदोलन या फिर वर्चस्व तथा दमन की प्रक्रिया चलानी पड़ेगी। या दोनों ही।
यह प्रश्न सं 6 के संदर्भ में था। यदि यह चर्चा आगे बढ़ पाई तो तो अन्य प्रश्नों और उत्तरों पर भी विस्तृत चर्चा हो सकती है। कम से चार और सवाल जवाब यहाँ ऐसे हैं जो लंबी बहस की डिमांड करते हैं ।
Anup Sethi
ReplyDeleteअ जे य तब हिमाचली नहीं पहाड़ी भाषा का ही आंदोलन था। (मुझे ही यहां हिमाचली शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए था।) उन अर्थों में आंदोलन था भी या नहीं, कह नहीं सकते। सपना जरूर था। और पहाड़ी भाषा का यह सपना राजभाषा हिंदी के समानांतर बुना गया था क्योंकि हिमाचल का गठन भी पहाड़ी राज्य के तौर पर हुआ। इसलिए जैसे केंद्र में राजभाषा हिंदी बनी वैसे ही लोग चाहते थे हिमाचल में भी पहाड़ी भाषा राजभाषा के रूप में अपना ली जाए या 'विकसित' कर ली जाए। जब यह सपना बिखरने लगा और अस्मिताओं के दौर में अपनी अपनी भाषा की अस्मिता जागने लगी, उत्तराखंड भी बन गया, लोगों को यह भी भान हो गया कि पहाड़ी का क्षेत्र बहुत व्यापक है हिमाचल तक सीमित नहीं इसलिए उसे हिमाचली पहाड़ी की तरह चलाने की कोशिश की गई। केंद्र के स्तर पर राजभाषा हिंदी अन्य शक्तियों के कारण अपना एक वजूद खड़ा कर पाई। पहाड़ी या हिमाचली पहाड़ी के साथ ऐसा नहीं हुआ।
अ जे य
ReplyDeleteAnup Sethi ऐसा शायद इस लिए हुआ कि हिंदी के पीछे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की ताकत थी, विजन था, ध्येय था और संस्थान थे। पहाड़ी भाषा के पीछे महज़ चंद हिमाचली लेखकों एक भावुक सपना था और पंजाबी और हिंदी जैसे भाषाओं की तरह एक राष्ट्रीय साहित्यक पहचान अर्जित करने का सपना।
पहाड़ी राज्य महज़ एक भू - राजनीतिक इयत्ता थी। यह हिंदी जैसी उस तरह से कोई भाषिक इयत्ता नहीं थी। हिंदी तो समय ले कर बनाई गई -- उर्दू में से। अलग लिपि प्रचारित की गई । शब्दावली गढ़ी गई।
ज़्यादातर डोगरी को संविधान में जगह मिलने पर और डोगरी लेखकों को ईनाम मिलने पर यह भावना जोर मारने लग ग ई। और विशेष कर मैने ऊपर जो दूसरा भाषिक समूह बनाया है उन लोगों को प्रबल संभावना दिखती थी। उस मे से भी कांगड़ा के लेखकों ने तो लगभग आंदोलन ही शुरू कर दिया था। बहुत लोगों ने इसे अवार्ड के लिए आंदोलन कहा। लेकिन मैं इसे अस्मिता के संकट की तरह ही देखता हूँ। और इस की संवेधानिक स्वीकृति की डिमांड को जायज़ मानता हूँ। बशर्ते कि इस का नाम कांगड़ी रखा जाए, या हिमाचली ( अन्य समूहों को आपत्ति न हो तो)! कांगड़ी भाषा साहित्यक दृष्टि से सशक्त और समृद्ध है। बोलने समझने वालों की संख्या भी ज़्यादा है। पहाड़ी नाम फिलहाल अवैज्ञानिक और अनैतिक है। गलत है। इसे एक भाषा के रूप में इवाल्व होने में सदियाँ लगेगीं वो भी यदि कोई इस दिशा में रिलिजियसली और मिशनरी भावना से काम करे तो। लेकिन तब तक लघु अस्मिताओं का विमर्श बहुत आगे पहुँच चुका होगा। मेरी समझ में पहाड़ी भाषा का मोनोलिथ एक मिथक ही है। हाँ जो इस आंदोलन में हैं, उन के पास अवश्य कोई दलील होगी इस की। उन की भावना का सम्मान करता हूँ 🙋
Anup Sethi
अ जे य वरयाम जी ने मौलूराम ठाकुर को याद किया है। मौलूराम जी की नजर से हिमाचल की भाषा पहाड़ी को बदले हुए वक्त में देखना दिलचस्प होगा। उन्होंने तो पहाड़ी का व्याकरण भी लिखा है। कहीं उसकी समीक्षा आलोचना भी पढ़ने को नहीं मिली।
अ जे य
हिमाचल में समीक्षा की परंपरा नहीं है। हम लोग केवल प्रशस्तियाँ सुन सकते हैं
जय प्रकाश
ReplyDeleteबहुत सुंदर लगा पढ़ कर। सोशल मीडिया पर नये तरह का प्रभावी अनुप्रयोग। कई नई बातें इतनी सहजता से सीधे आप दोनों महानुभावों के बीच से निकल कर हम तक पहुंचीं। इसके लिए आप दोनों को हार्दिक बधाई 🌹
दीपक गिरकर
बहुत सुंदर
Shveta Jain
ReplyDeleteसिराजी भाषा पर और काम होना चाहिए। मेरा ख़याल यह है कि सिराजी की जिन ध्वनियों के लिए देवनागरी में अक्षर नहीं हैं, उनके लिए अक्षर बनाए जाने चाहिए, जो कहीं न कहीं देवनागरी से मिलते-जुलते हों ताकि वे दूसरे लोगों की समझ में भी आएँ। वरयाम भाई को इस दिशा में आगे काम करना चाहिए और सिराजी के युवा प्रयोगकर्ताओं को इस काम की तरफ़ आकर्षित करना चाहिए। सिराजी में लगातार नई-नई किताबें प्रकाशित हों, इस तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। बेशक वे किताबें द्विभाषी हों और सिराजी के साथ-साथ एक ही जिल्द में हिन्दी में भी उनका अनुवाद छपे। इस काम में अपना सहयोग देने के लिए मैं हर तरह से प्रस्तुत हूँ।
रमेश राजहंस
ReplyDeleteधन्यवाद।
Devendra Choubey
महत्वपूर्ण।
जब देश में भाषावार प्रांतों का गठन हो रहा था। तब हमारे प्रदेश के नेतृत्व को पहाड़ी भाषा के आधार पर हिमाचल प्रदेश के निर्माण में सफलता प्राप्त हुई। यह हमारे लिए बहुत ही गौरव की बात है। अन्यथा इस बात की पूरी संभावना थी कि प्रदेश का काफी बड़ा हिस्सा आज पंजाब का हिस्सा होता है। तब हमारी यह पहाड़ी बोलियां भाषाएं पंजाबी की उपबोली बनकर खुद को कितना सहेज पातीं। वैसे प्रदेश का गठन भी एक पहाड़ी भाषा के लिए नहीं हुआ था। यह पहाड़ी बहुत सारी बोलियों के समूह का नाम था। इनमें से बहुत सारी मिलती-जुलती थी और कुछ बहुत ही अलग।
ReplyDeleteप्रदेश बनने के बाद उत्साह में प्रदेश के लिए एक भाषा या मानकीकरण की कोशिशें आरंभ करना एक बड़ी भूल साबित हुआ। इससे मेरी पहाड़ी और तेरी पहाड़ी का खेल आरंभ हो गया और बाद में इसे हिमाचली नाम दे कर इस रायते को समेटना की कोशिश की गई। इससे रायते के साथ कढ़ी भी फैल गई है।
मेरा निजी मत है कि हमारी भारतीय भाषाओं का भविष्य साहित्य और कला माध्यमों में ही बचा हुआ है। शिक्षा से हमारी सभी भारतीय भाषाएं बाहर हो चुकी है और सरकारी कार्य-व्यापार में अलंकारिक और दिखावटी भूमिका रह गई है। ऐसे में मुझे लगता है कि हमें अपने जन जीवन में अपनी भाषाओं के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। इसी के चलते मैं अपनी मां बोली बोलता भी हूं और लिखना भी हूं और उनसे भी बोलता हूं जो मेरी बोली आते हुए भी बोलना नहीं चाहते हैं। अब मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है मैं जो बोल या लिख रहा हूं वह कांगड़ी है या हिमाचली।
ऐसे में जब वरयाम सिंह जैसे वरिष्ठ साहित्यकार अपनी मां बोली सराजी में लिखते हैं। तो हमारा हौसला बढ़ता है और ताकत भी मिलती है।
कुशल कुमार