पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

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Wednesday, July 29, 2026

शब्दकोश : पुस्तक चर्चा

 


अज पेश है मंडयाली शब्दकोश पर अशोक दर्द दी समीक्षा। पैह्लें पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च 


लोकभाषा बचाणे दी दिशा च प्रशंसा दे काबिल कोशिश -मंडियाली शब्दकोश

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मेरेयां हत्थां च पकड़ी कताब मंडयाली शब्दकोश जो पढ़दे होए सारेयां छा पैह्ले मां बोली मंडियाली खातर लेखिका वास्ते कृष्ण चंद्र महादेविया दे शुभकामना संदेश दियां एह् पंक्तियां दिक्खा -"जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

उसदे बाद डॉक्टर गंगाराम राजी देयां शब्दां च - "शब्दकोश शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को यह मददगार भी साबित होता है ।अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।

अग्गे लिक्खदे ने - "आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं । आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

 इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

 शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथी कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं ।"

मंडियाली शब्दकोश कताबा दे पैहले हिस्से च 'आंग' शब्द यानी एक संख्या जो लेई करी इकानवें पृष्ठ दे आखरी शब्द 'त्रेखड़ा' यानी त्रैं लोकां दा समूह तक लगभग तिन्न छा साढ़े तिन्न हजार शब्द हिंदी अर्थ समेत दर्ज हन्न।

इनां संकलित शब्दां दी खूबसूरती या विशेषता गलाई लियो के एह् शब्द लोकजीवने दे केईयां पहलुआं ई दर्शांदे लोकभाषा दे एह् शब्द जेहड़े या ता विलुप्त होई गे या विलुप्त हौणे दे कगार पुर हन्न। उदाहरण वास्ते एह् शब्द दिक्खे जाई सकदे हन्न, जियां- कन्वाला यानी लकड़िया दी ओ बड्डी परात जिसा च आट्टा गुन्नेया जांदा था।

अज्ज धातु दियां परातां आई जाणे कन्ने एह् लकड़िया दे बर्तन रसोई घरां छा गायब होई गे हन्न अते कन्ने ई शब्द बी लोकभाषा छा गायब होई गे। नौइयां पीढ़िया वास्ते एह् शब्द अबूझ हन्न।

उदाहरण वास्ते दुआ शब्द ऐ 'आगल' यानी पालकी जो लग्गे दे डंडे जिनां ई कहार चुकदे हन्न। आज्ज मोटरां दे युगे च पालकी लोकजीवन छा गायब होई जा दी अते कन्ने ई लोकभाषा दा एह् शब्द बी।

ईयां ई लोकजीवने छा विलुप्त हुंदे संस्कारां दे शब्द हौन्न या औजारां दे, बर्तनां दे हौन्न या व्यवहार दे, प्रकृति दे उपादानां दे हौन्न या के बदलोंदे मौसमां दे, मानव- स्वभाव, बोली -वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक उपयोग, कपड़े लत्ते, गैहणे वंदे इत्यादि ताईं उपयोग च आणे आल़े शब्द जेहड़े - जेहड़े बी लेखिका दे ज़हन छा गुजरे हन्न या जिनां शब्दां कन्ने लोकजीवन दी पारखी लेखिका दा अपणे बचपन छा लेई करी हूणे तक परिचय रिया ऐ उनां ई लेखिका ने बड़ी संजीदगी अते सलीके ने इस शब्दकोश दी कताबा च संचित करी लिया ऐ।

कताबा दे अगले हिस्से च पृष्ठ संख्या 92 छा लेई करी 143 तक 1045 मंडियाली मुहावरे अते लोकोक्तियां हिंदी अर्थ कन्ने दर्ज हन्न।

किच्छ उदाहरण दिक्खा -"अंधेयां ते खूह लंघाणे" -यानी कोई जेहड़ा काम्म नी करी सकदा ओ करवाणा।

"अणजाण विद्या खायै पराण " -यानी जेहड़ा काम्म नी आंदा ओ नी करणा चैच्दा।

"किच्छ गाई रा किच्छ बाई रा " -यानी मिल्या जुल्या।

"घींघे घोल़े " -यानी लड़ाई झगड़ा।

"गल़ा गुट्ठा दैणा" -यानी अति करणी।

ईयां मते सारे मुहावरे ते लोकोक्तियां जेहड़े लोकजीवन च बरते जांदे हन्न लेखिका ने इकट्ठे करणे दा इक्क ऐतिहासिक प्रयास कित्ता ऐ।

कताबा दे आखरी हिस्से च पृष्ठ संख्या 144 छा 170 तक "मंडी दे सांस्कृतिक परिवेश च शब्दां दी भूमिका"  दे तहत लगभग 448 शब्दां ई इकट्ठा कित्ता ऐ।

उदाहरण दिक्खा - "पंजणी देणी" यानी बेटी दी विदाई।

"चोगा" यानी दूल्हे ई पुआई जाणे आल़ी पोशाक (शेरवानी साई)

शेरवानी दे युग च हूण चोगा भी नी रिया ते चोगा शब्द बी।

"बिंदु" -यानी जन्मदिन पुर हलवा या मिठाई बगैरह रिश्तदारां ई दैणे ई बिंदु गलांदे।

लोकजीवन च लोकभाषा दा अपणा महत्व हुंदा ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक-संस्कृति, लोक-सभ्यता, अते सदियां छा चला करदे लोकाचारां अते लोक विश्वासां दी पुच्छैण करांदी ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन दी धरोहर अते पूंजी हुंदी ऐ। 170 पृष्ठां दे कलेवर च सजी दी एह् कताब लोकजीवन दे केइयां शब्दां ई सहेजदी लोक वास्ते इक्क खूबसूरत उपहार ऐ।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जेहड़ा इस शब्द धरोहर ई कताबा दे रूपे च सहेजणे - संभाल़णे दा ऐतिहासिक अते प्रशंसा जोग काम्म कित्ता ऐ इनी आणे आल़ियां पीढ़ियां वास्ते प्रकाश स्तंभ दा काम्म करणा, मेरा ऐसा मन्नणा ऐ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका दे मुताबिक - "यह बोली (मंडयाली ) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की और अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है ।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं । यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है । व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था । अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।"

आखिर च इस खूबसूरत कताबा वास्ते लेखिका जो मतियां मतियां शुभकामनां अते बधाईयां।

निसंदेह एह् कताब भावी पीढ़ियां दी धरोहर ऐ अते लोकभाषा अते लोकजीवन दे शोधार्थियां ते पाठकां वास्ते प्रकाश स्तंभ।

आशावादी हां, इसा कताबा च पाठकां अते शोधार्थियां च अपणी जगह अप्पू बणाणे दा सामर्थ्य ऐ।



लोकभाषा को बचाने की दिशा में श्लाघ्य प्रयास: मंड्याली शब्दकोश

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हस्तगत पुस्तक मंडयाली शब्दकोश को पढ़ते हुए सबसे पहले मां भाषा मंड्याली से लेखिका के लिए शुभकामना संदेश की ये पंक्तियां -बकौल आदरणीय कृष्ण चंद्र महादेविया- "जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

तत्पश्चात डॉ गंगाराम राजी के शब्दों में- शब्दकोष तो शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को मददगार भी साबित होता है। अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।"

आगे लिखते हैं आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथ कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं । 

इस मांड्याली शब्दकोश पुस्तक के प्रथम भाग में  "आंग" यानी एक संख्या लेकर इकानवे पृष्ठ के अंतिम शब्द "त्रेखड़ा" यानी तीन लोगों का समूह तक लगभग तीन से साढ़े तीन हजार शब्द हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

इन संकलित शब्दों की खूबसूरती या विशेषता कह लीजिए कि ये शब्द जीवन के विविध आयामों को इंगित करते स्थानीय बोली के वे शब्द हैं जो या तो विलुप्त हो गए हैं या लोकजीवन से विलुप्त होने के कगार पर हैं।

उदाहरण के लिए ये शब्द देखे जा सकते हैं जैसे- कन्वाला अर्थात लकड़ी की वह बड़ी परात जिसमें आटा गूंथा जाता था।

आज धातु की परातें आ जाने के बाद ये लकड़ी के बर्तन रसोई घरों से गायब हो गए हैं साथ ही शब्द भी विलुप्त हो गए हैं। नई पीढ़ी के लिए यह शब्द अबूझ है।

उदाहरण के लिए दूसरा शब्द "आगल" अर्थात पालकी को लगे डंडे जिन्हें कहार उठाते हैं, आज गाड़ियों के युग में पालकी लोग जीवन से गायब होती जा रही है और साथ ही शब्द भी।

इस तरह लोकजीवन से विलुप्त होते संस्कारों के शब्द हों या औजारों के,  बर्तनों के हों या व्यवहार के, प्रकृति के विभिन्न उपादानों के शब्द हों या मौसमों के बदलने के, मानव स्वभाव, बोली-वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक-प्रयोग, वस्त्रों-आभूषणों के लिए प्रयुक्त शब्द, जो जो शब्द लेखिका के जहन से गुजरे हैं या जिन शब्दों के साथ लोक जीवन की पारखी लेखिका का अपने बचपन से लेकर अब तक परिचय रहा है उन्हें लेखिका ने बड़ी संजीदगी व सलीके से इस शब्दकोश की पुस्तक में संचित कर लिया है।

पुस्तक के अगले भाग में पृष्ठ संख्या 92 से लेकर 143 पृष्ठ तक लगभग 52 पृष्ठों में 1045  मंडियाली मुहावरों व लोकोक्तियों (कहावतों) का संचयन किया है। ये मुहावरे व लोकोक्तियां भी हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

कुछ उदाहरण देखिए- "अन्धेया थे खूह लंघाणे" अर्थात् जो सक्षम न हो उससे काम करवाना।

"अणजाण विद्या खाए पराण" अर्थात् जो काम नहीं आता वह नहीं करना चाहिए।

"कुछ गाई रा कुछ बाई रा" अर्थात् मिला जुला।

"घींघे घोल़े" अर्थात् लड़ाई झगड़ा ।

"गल़ा गुट्ठा देणा" अर्थात् अति करना।

इस तरह बहुत सी लोकोक्तियां व मुहावरे जो लोक जीवन में प्रयुक्त होते हैं, लेखिका ने उन्हें संचित करने का श्लाघ्य प्रयास किया है।

अंतिम भाग में पृष्ठ संख्या 144 से 170 तक "मंडी के सांस्कृतिक परिवेश में शब्दों की भूमिका" के अंतर्गत लगभग 448 शब्दों का संचयन किया है।

उदाहरण देखिए -"पंजणी देणी" अर्थात् बेटी की विदाई।

"चोगा" अर्थात यह दूल्हे को पहनाया जाता था जो शेरवानी की तरह का होता है।

शेरवानी के युग में अब चोगा शब्द विलुप्त होने के कगार पर है।

"बिंदु" अर्थात जन्मदिन पर हलवा या मिठाई आदि सबंधियों को देने को बिंदु कहते हैं।

लोक जीवन में लोकभाषा का अपना महत्व होता है ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक संस्कृति, लोक सभ्यता और सदियों से चले आ रहे लोकाचार लोक विश्वास की परिचायक होती है ।

लोक भाषा लोकजीवन की धरोहर होती है। 170 पृष्ठों के कलेवर में सजी यह पुस्तक लोकजीवन के विभिन्न शब्दों को सहेजती खूबसूरत धरोहर है।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जो इस शब्द धरोहर को पुस्तक के रूप में सहेजने का ऐतिहासिक एवं श्लाघनीय कार्य किया है। यह पुस्तक भावी पीढ़ियों के लिए लोकजीवन के विविध आयामी अध्ययन के लिए प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका के अनुसार - यह बोली (मंडयाली) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की ओर अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं। यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है। व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था। अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।

अंत में, इस खूबसूरत पुस्तक मांड्याली शब्दकोश के लिए लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई। नि:संदेह यह पुस्तक भावी पीढ़ियों की धरोहर है तथा लोकभाषा व लोकजीवन के अध्येताओं के लिए एक प्रकाश पुंज भी। आशावादी हूं  प्रबुद्ध पाठकों व शोधार्थियों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान स्वयं बना लेगी।

समीक्ष्य कृति: मंड्याली शब्दकोश

संचयन: रूपेश्वरी शर्मा पुरानी मंडी , मंडी, हिमाचल प्रदेश 

कुल पृष्ठ : 170 कुल मूल्य ₹400 प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन c- 515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी नई दिल्ली- 110012

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित 

Sunday, July 12, 2026

पुस्तक चर्चा कनै बिलासपुर लेखक संघ

 


बिलासपुर लेखक संघ 1996 च बणया। तिसते परंत एह् लगातार लेखकां जो जोड़ने कनै पढ़ने लिखणे दी संस्कृति बणाणे दे कम्मे च लगेया है। इस साल इन्हां इक पहाड़ी कविता संकलन हिम वाग्धारा प्रकाशित कीती है। इसा कताबा दे संकलनकर्ता रवींद्र कुमार शर्मा हन। अज पढ़ा इसा कताबा पर अनूप सेठी दी समीक्षा पहाड़ी हिन्दी दूंई भाषां च। कन्नै ही रवींद्र कुमार शर्मा दी संघ दे कम्मां पर इक टिप्पणी भी है। 


                                                       

सोचणे वचारणे दी प्रेरणा देणे आळी कताब 

हिम वाग्धारा पहाड़ी कवता दा इक साझा संकलन है। एह् बिलासपुर लेखक संघें छापेया है। इस च पैंती कवियां दियां तकरीबन डेढ़सौ कवतां हन। एह् सारे ही कवि बिलासपुर लेखक संघ नै जुड़ेयो हन।

इसा कताबा च असां जो पहाड़ी कवता दे सौगी कवता, लोक, संस्कृति वगैरा दे बारे च सोच-वचार करने दे कई मुद्दे मिलदे हन। एह् इसा कताबा दी इक खूबी है।

अजकणे बग्तैं लेखक संघ औह्लैं होई गेयो हन। सैह् कदी-कदाएं गोष्ठियां संगोष्ठियां ता कराई लैंदे हन, कताबां छापणे दी जिम्मेदारी लेखक संघ नीं लैंदे। हिन्दिया च सहकारी प्रकाशन दी कोसस होई थी पर कामयाब नीं रही। बिलासुपर लेखक संघे दी एह् बड़ी खरी पैह्ल है। एह् कम्म पहाड़ी भाषा ताईं होया है, एह् होर भी महत्वपूर्ण है।पहाड़ी भाषा दा साहित्य हाली संगरोआ दा है। इसयो बाल लाणे दी जरूरत है। कवता छापणे दा मंच प्रदान करना अपणे आप च ही इक बड्डा सहयोग है। अजकला लेखक अपणियां कताबां अप्पू ही छापदे या प्रकाशके जो पैसे दयी नै छपांदे। देह् देह् महौले च लेखक संघे दा एह् कदम सराहणेजोग है।

इस संकलने दे कवि लग-लग पेशयां नै जुड़ेयो हन। इन्हां च मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अफसर, शिक्षाविद्, बैंकर, फौजी, फौजी अफसर, लग-लग विषयां दे अध्यापक-प्राध्यापक शामल हन। हिन्दी भाषा साहित्य पढ़ाणे आळे तां हन ही हन। लग-लग पेशयां च कम्म करने आळे कवियां दे जीवन अनुभव भी लग-लग होणे। तिन्हां दे एह् अनुभव तिन्हां दिया कवतां च कुस तरीके नै औआ दे, इह्दी पड़ताळ मजेदार होणी है। क्या इन्हां दी कवता पहाड़िया दी मौजूदा कवता च कुछ नौंए आयाम जोड़ा दी है या बणिया बणाइया लीका पर ही चल्ला दी है।   

संरूकृत दे विद्वान डाक्टर लेखराम शर्मा होरां अपणे ‘श्रद्धा सुमन’ च कविता दियां कुछ कसौटियां दस्सियां हन कनै रचनां जो परखणे दी जिम्मेदारी समझदार पाठकां दे जिम्मै लाह्इयो है। तिन्हां दे वक्तव्य ते कुछ गल्लां ध्यान खिंजणे आळियां हन-

साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:

भर्तृहरि दे नीतिशतक दे इस श्लोके दा मतलब है-

जिस माह्णुए गैं साहित्य, संगीत कनै कला नीं हुंदी, सैह् साछात ऐसा जनौर हुंदा है जिसयो न पूछ लगियो हुंदी न सिंग।

 

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥

एह् श्लोक आचार्य मम्मट दे मशहूर ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’ चा ते है। 

इह्दा मतलब है भई कविता लिखणे ताईं एह् चीजां चाहिदियां-  शक्ति, निपुणता, लोक व्योहार, शास्त्र, काव्यां दा अध्ययन, काव्य जाणने आळेयां ते शिक्षा लैणा कने काव्य रचना करने दा अभ्यास करना। 

डॉ. शर्मा होरां कालिदासे दे हवाले नै एह् भी गलाया है भई इन्हां रचना दा मूल्यांकन समझदार पाठक ही करी सकदे। एह् त्रैहो बिंदु बड़े जरूरी हन। समाज च कला साहित्य दी जरूरत सदा ही रैह्णी है। समाज दे बिच्च भावक या सहृदय होणा इ चाहिदे। इसी तरीके नै काव्य रचना करने दे जेह्ड़े कारक या शर्तां तिन्हां ‘काव्यप्रकाश’ ते गणाइयां, तिन्हां दा भी बड़ा महत्व है। कविये जो निपुण होणा ही पौणा है, तिह्जो लोक कनै शास्त्र दा ज्ञान भी होणा चाहिदा, सैह् काव्य दी पढ़ाई करदा होऐ मतलब तिह्जो अपणी काव्य परंपरा दा ज्ञान होऐ, तिनी कविता लिखणा सिक्खेया होए कनै सैह् कविता लिखणे दा अभ्यास भी करदा होऐ। कविता लिखणे दियां एह् कसौटियां या शर्तां असान नीं हन। असां चा ते मते सारे कवि शौकिया कवता लिखदे। इस करी नै शायद एह् कसौटियां पचौह्लैं रही जांदियां होण। असां मंझ ऐसे भी रचनाकार हन, जेह्ड़े पूरिया गंभीरता नै रचनाकर्म च रुज्झयो रैंह्दे। बग्ते दिया छाणनिया ही इन्हां सारेयां दे योगदान नै न्याय करना है। 

फिलहाल असां ताईं एह् जरूरी है भई असां दिया भाषा च लोक लिखा दे हन। कनै तिसयो प्रकाश च ल्यौणे दे सामूहिक प्रयास होआ दे। एह् सब किछ ऐसे समय च होआ दा है, जिस समय च भाषा-विमर्श कनै कला कर्म कई किस्मां दे बोझां हेठ दबोया है। भाषा अपणिया अस्मिता दी लड़ाई लड़ा दी है। तिसा दा एकीकरण नीं, विखंडन होआ दा है। जिंदगिया च कला संस्कृति दे नायें पर बड़ी भारी चकाचौंध नै लशकारयां मारदी होड़ लगियो है। तिस बिच असां दा ‘लोक’ अपणी पछाण बचाणे कनै दसणे दिया होड़ा च हफ्फी-हफ्फी जा दा है। असां दिया भाषा दी कविता पचांह् छुटदे जा दे कनै इह्दे बदलोंदे जा दे इस ‘लोक’ जो पकड़ने दी कोशश करदी बझोआ दी है। इसा शिनाख्ता च सैह् सारे साझे अतीत जो थम्मी रखणा चाह् दी है, कनै वर्तमान जो नकारदी चलदी है। कनै एह् सब कुछ कविता दे स्टीरियो टाइप साह्यी हुंदा है। असां जो कविता च जीवन अनुभव ते निकळयो महीन काव्य संसार दी निहाळप है। 

सुरु च मैं जिकर कीता था भई इस संकलने च शामिल कवियां चा ते कइयां हिंदिया च पीएचडी कीतियो है। हुण एह् गल मैं तां छेड़ी कैंह् कि पहाड़ी भाषा दी वर्तनी दा मानकीकरण करना बड़ा जरूरी है। दूई गल एह् भई असां दिया भाषा दे कई लफ्जां दी ध्वनि देवनागरी लिपि च सटीक तरीके नैं नीं लखोंदी। इस करी नै ऐसियां ध्वनियां ताईं कुछ खास चिह्न या नशाण बणाणा चाहिदे। कुछ दिन पैह्लें कुल्लुवी भाषा ताईं यतिन पंडित होरां चर्चा छेड़ी थी। लफ्जां दी वर्तनी दे मानकीकरण ताईं असां दे एह् विद्वान कवि बड़ा योगदान देयी सकदे। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे च योजना बणाई नै कम्म शुरु कराई सकदा। असां अपणिया भाषा दे लफ्जां जो अपणी जानकारी, समझ कनै अपणे इलाके दे उच्चारण दे स्हाबे नै लिखदे। इस करी नै वर्तनी बखरी-बखरी होई जांदी। इसा जो इक्को जेह्या बणाणे ताईं विद्वानां जो मेहनत करना पौणी है। 

इस संकलने दी भूमिका कनै कवि परिचय हिन्दिया च दित्तेया है। खबरै इस दे पिच्छैं एह् सोच होणी भई हिन्दिया दिया वजह नै पहाड़ी कवियां जो बड्डे फलक पर पेश कीता जाई सकै। पहाड़ी भाषा दे प्रेमी चांह्गे भई कवियां जो पहाड़ी भाषा च ही पेश कीता जाऐ। कवि परिचय बारे इक गल होर नी समझ आई भई कुछ कवियां दा परिचय बड़े विस्तार नै दित्तेया कनै कुछ कवियां दे सिर्फ नां ही हन। हालांकि इस संकलन दे जादातर कवि काफी टैमे ते लिखा दे हन कनै तिन्हां दियां कई कताबां भी छपियां हन।   


                                                      

 सोचने विचारने की प्रेरणा देने वाली किताब

हिम वाग्धारा पहाड़ी कविता का एक साझा काव्य संकलन है। इसे बिलासपुर लेखक संघ ने प्रकाशित किया है। इसमें पैंतीस कवियों की करीब डेढ़ सौ कविताएं हैं। ये सभी कवि बिलासपुर लेखक संघ से जुड़े हैं।

इस संकलन से हमें पहाड़ी कविता के साथ साथ कविता, लोक, संस्कृति आदि के बारे में सोच-विचार करने के कई मुद्दे मिलते हैं। यह पुस्तक की एक खूबी है।

आज के दौर में लेखक संघ ओझल से हो गए हैं। उनके परचम तले गाहे-बगाहे गोष्ठियां संगोष्ठियां हो जाती हैं। पुस्तक प्रकाशन की जिम्मेदारी लेखक संघ नहीं उठाते। एक जमाने में हिन्दी में सहकारी प्रकाशन की कोशिश हुई पर सफल नहीं रही। बिलासपुर लेखक संघ की यह एक स्वागतयोग्य पहल है। और यह काम पहाड़ी भाषा के लिए हुआ है, यह और भी महत्वपूर्ण है। पहाड़ी भाषा का साहित्य अभी विकास के रास्ते पर है। इसे तरह-तरह के समर्थन-सहयोग की जरूरत है। कविता के प्रकाशन का मंच प्रदान करना अपने आप में बड़ा सहयोग है। आजकल लेखक प्राय: खुद ही अपनी पुस्तकें प्रकाशित करते हैं या प्रकाशक को पैसा देकर छपवाते हैं। ऐसे माहौल में लेखक संघ का यह कदम सराहनीय है।

इस संकलन में शामिल कवि अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हैं। इसमें मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद्, बैंकर, सेनानी, विज्ञान गणित विषयों के अध्यापक-प्राध्यापक शामिल हैं ; हिन्दी भाषा साहित्य के अध्यापक-प्राध्यापक तो हैं ही। विविध क्षेत्रों के कवियों के जीवन अनुभव में भी विविधता होगी। यह जानना दिलचस्प होगा कि जीवन अनुभवों की यह विविधता उनकी कविता में कितनी और किस तरह से आई है। क्या यह कविता पहाड़ी कविता के मौजूदा ढांचे में कुछ नए आयाम जोड़ रही है या बनी बनाई लीक का अनुसरण कर रही है। 

संस्कृत के विद्वान डॉक्टर लेखराम शर्मा ने अपने ‘श्रद्धासुमन’ में काव्य के कुछ निकष प्रस्तुत किए हैं और रचनाओं के आकलन की जिम्मेदारी सुधी पाठकों को सौंपी है। उनके वक्तव्य में से कुछ बातों को रेखांकित किया जाना चाहिए –

साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:

भर्तृहरि के नीतिशतक के इस उद्धरण का अर्थ है-

जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से रहित होता है, वह साक्षात् एक ऐसे पशु के समान है जिसके न तो पूँछ है और न ही सींग।

 

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥

यह श्लोक आचार्य मम्मट के प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' का है। इसका अर्थ है शक्ति, निपुणता, लोक व्यवहार, शास्त्र, और काव्यों का अध्ययन, काव्यज्ञों से शिक्षा व अभ्यास काव्य रचना के कारण हैं।

डॉ. शर्मा ने कालिदास के हवाले से यह भी कहा है कि इन रचनाओं का मूल्यांकन सुधी पाठक ही कर सकते हैं। ये तीनों ही बिंदु महत्वपूर्ण हैं। समाज में कला साहित्य की आवश्यकता हमेशा रहेगी। समाज में भावक या सहृदय होने ही चाहिए। इसी तरह काव्य रचना के कारकों का भी अत्यंत महत्व है। कवि को निपुण होना होगा, उसे लोक और शास्त्र का ज्ञान हो, वह काव्य का अध्ययन करता हो यानी उसे अपनी भाषा की काव्य परंपरा का ज्ञान हो, उसने काव्य रचना की शिक्षा ली हो और काव्य लिखने का पर्याप्त अभ्यास उसे हो। काव्य रचना के ये निकष कठिन हैं।

हम में से बहुत से कवि शौकिया कविता लिखते हैं। इसलिए ये निकष शायद नजरअंदाज भी हो जाते होंगे। हमारे बीच ऐसे भी रचनाकार हैं जो निश्चित ही गंभीरता से रचनाकर्म में निबद्ध हैं। समय की छलनी ही इन सबके योगदान के साथ न्याय करेगी। फिलहाल हमारे लिए यह मूहत्वपूर्ण है कि हमारी भाषा में लिखा जा रहा है। और उसे प्रकाश में लाने के सामूहिक प्रयास हो रहे हैं। यह सब ऐसे समय में घटित हो रहा है जब भाषा-विमर्श और कला-कर्म कई तरह के दबाव झेल रहा है। भाषा अपनी अस्मिताओं की लड़ाई लड़ रही है। उसका एकीकरण नहीं, विखंडन हो रहा है। जीवन में कला और संस्कृति के नाम पर बेहद तेज चकाचौंध भरी होड़ है। उसके बीच हमारा ‘लोक’ अपनी पहचान बचाने और दिखाने की दौड़ में हांफ रहा है। हमारी भाषा की कविता इस ‘लोक’ के पीछे छूटते जाते और बदलते हुए रूप-स्वरूप को पकड़ने की कोशिश कर रही प्रतीत होती है। इस शिनाख्त में वह सारे साझे अतीत को थामे रहना चाहती है, वर्तमान को नकारती चलती है। और यह सब काव्य के स्टीरियो टाइप की तरह होता है। हमें कविता में जीवन अनुभवों पर आधारित महीन काव्य संसार का इंतजार है। 

शुरू में मैंने जिक्र किया है कि इस संकलन में शामिल कवियों में से कई हिंदी में पी एचडी प्राप्त हैं। यहां इस बात का जिक्र इस संदर्भ में किया जा रहा है क्योंकि पहाड़ी भाषा की वर्तनी का मानकीकरण किया जाना जरूरी है। दूसरे यह कि हमारी भाषा के बहुत से शब्द या उनकी ध्वनियां देवनागरी लिपि में पूरी तरह से व्यक्त नहीं हो पाती हैं। इसलिए उनके लिए कुछ खास चिह्न तय किए जाने चाहिए। पिछले दिनों कुल्लुवी के संदर्भ में यतिन पंडित ने इस बारे में चर्चा भी की थी। शब्दों की वर्तनी के मानकीकरण में हिंदी भाषा के हमारे ये विद्वान महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे में योजना बनाकर काम कर सकता है। अभी तक भाषा या शब्दों का प्रयोग हर कोई अपनी जानकारी और समझ तथा इलाकाई उच्चारण के आधार पर करता है। इसलिए वर्तनी में भिन्नता मिलती है। इसे स्थिर करने के लिए विद्वानों को मेहनत करनी होगी। 

संकलन की भूमिका और कवि परिचय हिन्दी भाषा में दिया गया है। शायद इसके पीछे यह विचार रहा हो कि इस तरह पहाड़ी कवियों को बेहतर या व्यापक फलक पर प्रस्तुत किया जा सकेगा। पहाड़ी भाषा के प्रेमी चाहेंगे कि उन्हें प्रस्तुत भी पहाड़ी भाषा में किया जाए। कवि परिचय के संबंध में भी यह समझ नहीं आता है कि कुछ कवियों का परिचय तो अति विस्तार से दिया गया है और कुछ एक का केवल नाम ही है। हालांकि इस संकलन के अधिकांश कवि लंबे समय से रचनारत हैं और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।    

                                                      

बिलासपुर लेखक संघ का परिचय

 

बिलासपुर लेखक संघ की स्थापना 3 अगस्त 1996 को तथा इसका पंजीकरण 19 सितंबर 1996 को पंजी. करण संख्या 287/96 के अंतर्गत हुआ। तब से लेकर आज तक संघ लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इसकी स्थापना का उद्देश्य था कि साहित्यकारों व लेखकों को एक मंच प्रदान किया जा सके, रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देकर आपसी सहयोग से उनको आगे बढ़ाया जा सके तथा लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में काम किया जा सके। हमारी मां बोली पहाड़ी के अस्तित्व को बचाये रखना बहुत आवश्यक है जिसके लिए हम सभी को प्रयास करने होंगे। पश्चमी पहाड़ी की कहलूरी बोली के संवर्धन और संरक्षण के लिए बिलासपुर लेखक संघ सदैव प्रयत्नरत है। लेखक संघ का यह भी प्रयत्न रहेगा कि शोध करके कहलूरी बोली की प्राचीनता, विश्वभाषाओं से साम्य और संस्कृत भाषा का कहलूरी बोली पर प्रभाव स्थापित किया जा सके। इस समय बिलासपुर लेखक संघ के लगभग एक सौ सदस्य हैं जो विभिन्न विधाओं में लिख कर अपने साहित्य का प्रकाश चारो दिशाओं में फैला रहे है तथा अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में फैली बुराईयों से आमजन को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। संघ के सदस्यों द्वारा व्यक्तिगत रूप में भी कई किताबें लिखी गई हैं जबकि सांझा संग्रह भी प्रकाशित किये गए है। बिलासपुर लेखक संघ द्वारा अपने सदस्यों के सहयोग से "कहलूरा री कलम", "कहलूर की विभूतियां'""" कहलूर की कलम "श्री श्री 1008 बाबा कल्याण दास उर्फ काले बाबा'", "कल्याण गीता", कहलूर की कलम भाग 2' कहलूर की कहानी" के अलावा और भी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं। बिलासपुर लेखक संघ रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा दे रहा है। मासिक बैठकों, कवि गोष्ठियों व सेमिनारों के माध्यम से निरंतर साहित्य की सेवा में लगा है तथा युवा लेखकों को अपने साथ जोड़ने के लिए प्रयासरत है। संघ की कोशिश है कि उसके लेखकों द्वारा रचित अधिक से अधिक साहित्य प्रकाशित होकर लोगों के सामने आए। 







Monday, April 6, 2026

पुस्तक चर्चा

 


वरयाम सिंह होरां पिछलेयां पंजांह्'क सालां ते अपणी माबोली सराजी च कवता लिखा दे हन। तिन्हां दे तिन कवता संग्रह छपेयो हन। हिंदी समाज च वरयाम सिंह रूसी भाषा दे ज्ञाता कनै अनुवादक दे रूप च मशहूर हन। अनवाद दियां कोई दो दर्जन कताबां हन। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय च रूसी भाषा दे प्रोफैसर रिटैर होणे परंत अपणे घरैं बंजार रैंह्दे। कनै लोक संस्कृति, लोक भाषा पर चिंतन मनन लेखन करा दे। पिछले साल इन्हां दी कताब आई 'अपने आलोक में'। इस च इन्हां दियां सराजी कवतां कनैं तिन्हां दे हिन्दी अनुवाद हन। अज असां इसा कताबा पर गल करनी है। पैह्लैं पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च। एह् समीक्षा अनूप सेठी नै लिखियो है। पर सारेयां ते पैह्लैं कुछ सुआल जुआब - असां सुआल भेजे कनै वरयाम होरां जुआब दित्ते। सुआल जुआब हिन्दिया च हन।   

वरयाम सिंह

प्रश्न 1:               ‘अपने आलोक में’ संग्रह में आपके तीन सराजी कविता संग्रहों की मूल और हिन्दी कविताएं हैं। इन संग्रहों के नाम क्या हैं, ये कब कब कब छपे हैं?

वरयाम सिंह:     ‘उछ़टी मारनी डिया’ संकलन 1983 में प्रकाशित हुआ था। 1986 में हिमाचल अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया था। दूसरा संकलन ‘प्रियाशे आपणे’ 1988 में और तीसरा ‘एहड़ौ हांह पेड़’ 1997 में छपा था।

प्रश्न 2:              आपका दिल्ली और विदेशों में लंबा प्रवास रहा है। क्या ये कविताएं घर से दूर परदेस में रहते हुए लिखी गई हैं? इनका रचनाकाल क्या है?

वरयाम सिंह:     अधिकांश बंजार से बाहर दिल्ली और मास्को में रहते हुए। रचनाकाल: 1980-83, 84-86, 87-96

प्रश्न 3:              अपनी बोली में लिखने की प्रेरणा कहां से मिली? क्या आपका सराजी लेखन हिमाचली भाषा के पचास साल पुराने आंदोलन से भी प्रेरित रहा है?

वरयाम सिंह:     प्रोत्साहन ठाकुर मौलू राम और चंद्रशेखर पुरोहित जी से। अपनी बोली में लालचंद प्रार्थी और महेश्वर सिंह जी के भाषण सुनना अच्छा लगता था। प्रेरणा मिली रूस के अवार भाषा के कवि रसुल हमजातोव से, विशेषकर ‘मेरा दागिस्तान’ पुस्तक से। किसी हिमाचली आंदोलन से नहीं।

प्रश्न 4:              आप हिन्दी में भी कविता लिखते रहे हैं। आप यह कैसे तय करते हैं कि कौन सी रचना किस भाषा में लिखी जाए?

वरयाम सिंह:     हिंदी कविता का पाठक अमूर्त-सा लगता रहा है। सराजी कविता का पाठक जैसे अपने साथ, अपने पास बैठा-खड़ा दिखाई देता है। विषय तय करता है कि हिंदी में लिखूं या सराजी में।

प्रश्न 5:              आपने टेलिफोन पर भाषा और कविता के संबंध में कुछ कहा था। अगर मुझे गलत याद नहीं रहा है तो यह कि भाषा से तय होता है कि कैसी कविता लिखी जाएगी। कृपया इस प्रक्रिया को विस्तार से बताएं। क्या एक ही समय में लिखी जा रही हिन्दी और सराजी कविता पूरी तरह अलग होगी? यह मैं इसलिए भी पूछ रहा हूं क्योंकि एक तो मैं आपकी रचना प्रक्रिया में भाषा की भूमिका जानना चाहता हूं, दूसरे यह जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आपकी सराजी कविता का कथ्य और डिक्शन प्रचलित हिमाचली कविता से अलग और आधुनिक भारतीय कविता के करीब है।

वरयाम सिंह:     कविता का मुहावरा और किसे संबोधित है रचना- यही तय करते हैं डिक्शन। हिंदी में मेरी आधी कविताएं सराजी जनपद के समाज और जीवन से जुड़ी हुई हैं।

प्रश्न 6:              क्या आप अब भी सराजी में लिख रहे हैं? हिमाचली भाषा या भाषाओं के बारे में अब आप क्या सोचते हैं? पहले एक हिमाचली भाषा का आंदोलन था, अब अपनी अपनी भाषा का परचम है। हमें अपनी भाषाओं के बारे में क्या करना चाहिए?

वरयाम सिंह:     आजकल कविताओं से अधिक सराजी की शब्द-संपदा पर सोच और लिख रहा हूं। सामान्य जीवन से जुड़े शब्द हिंदी की अपेक्षा संस्कृत के समीप हैं, अर्थात तद्भव और तत्सम हैं- ऐसा क्यों? वाक्य रचना (syntax) हिंदी से अलग क्यों ? लोक रामकथा और कृष्णकथा तुलसीदास और व्यास कृत कथाओं से अलग क्यों ? आजकल ऐसे ही विषयों पर विचार चल रहा है।

प्रश्न 7:              अपनी स्थानीय भाषा की कविता को हिन्दी में अनुवाद करने का अनुभव कैसा रहा? क्या दिक्कतें आईं और क्या आसानी रही?

वरयाम सिंह:     सबसे बड़ी दिक्कत वर्तनी की है। बहुत-सी ध्वनियां हैं जिनके लिए देवनागरी में वर्ण (अक्षर) नहीं। हम दोनों मैं और पत्नी तारा नेगी इस समस्या का हल ढूंढने में लगे हैं। तारा नेगी कहानियां रचते हुए और मैं कविताएं...।

प्रश्न 8:              आपकी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर चारों कोनों में चार मोटिफ हैं। क्या इनका कुछ विशेष आशय है?

वरयाम सिंह:     मोटिफ मुझे भी समझ नहीं आये। इन्हें हर पृष्ठ पर डाला है मेरे प्रकाशक ने जो कभी जे.एन.यू में अध्ययनरत थे। उन्होंने गंगा प्रसाद विमल के निर्देशन में बहुत वर्ष पूर्व पी.एच.डी. की थी।


सराजी कविता संग्रह : प्रियाशे आपणे 
                           

वरयाम सिंह दियां सराजी कवतां

वरयाम सिंह होरां दे कवता संग्रह ‘अपने आलोक में’ जो पढ़ना इक जुदा जेह्या अनुभव था। वरयाम जेएनयू च रूसी पढ़ान्दे थे। रूस जाई नै पढ़ाई कीत्तियो कनै यूरोप भी घुम्मेया। रैह्णे आळे हन हन बंजार दे सराजी भाई। इन्हां दी मशहूरी रूसी दे अनुवादक दे तौर पर जादा है। हिंदिया च कवतां दियां दो कताबां हन कनै सराजी भाषा च तिन्न। ‘अपने आलोक में’ कताबा च वरयाम होरां सराजी दियां तिन्नों ही कताबां दियां कवतां दे हिंदिया च अनुवाद कीतेयो हन। पैह्ली कताब 1983 च छपी थी - उछ़टी मारनी डिया। इसा जो हिमाचल अकादमिया दा इनाम मिल्लेया है। दूई कताब 1988 च आई - प्रियाशे आपणे। कनै त्री कताब 1997 च आई - एहड़ौ हांह पेड़। ‘अपने आलोक में’ कताबा च इक्की पासैं सराजी है, दूए पासैं हिन्दी। मतलब असां दी सराजी कवता हिन्दी पाठके वह्ल भी पूजी गई। 

मैं अपणियां जादातर बोलियां समझी लैंदा पर कुछ नीं औंदियां। कुलुवी थोड़ी बौह्त समझा आई जांदी पर सराजी भाषा फर्क है। करड़ी लगदी। इस करी मैं पैह्लें इसा कताबा दियां कवतां हिंदिया च पढ़ियां, तिसते परंत सराजी च। बाद च एह् सोची नै हिंदी सराजी कठियां पढ़ियां भई दूईं भाषां च कवतां दा साादर्यबोध अक्खैं बक्खैं बझोई जाऐ। 

इसते पैह्लें मुंबइया दे अपणे कुशल कुमार होरां दी कताब ‘मुठ भर अंबर’ आई थी। तिन् भी अपणियां पहाड़ी कवतां दा हिंदी अनुवाद अप्पू ही कीतेया है। तित्थी भी दोयो भाषां आह्मणो-साह्म्णै थियां। कुशले दी जुबान मेरियां जुबाना नै मिलदी है। ता पढ़ना सौखा रेह्या। कुशले दे अनुवाद दा डिक्शन भी पहाड़िया दे नेड़ैं है। मतलब तिन्हां दिया हिंदी अनुवादे आळी कवतां च कांगड़ी या पहाड़ी या हिमाचली भाषा दी खुशबू मिलियो हुंदी है। 

वरयाम सिंह दी कविता दा डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषां दे डिक्शन दे नेड़े है। गौर करने आळी गल है भई सराजी भाषा दिया कवता च आधुनिक भारतीय कविता दा डिक्शन मिल्लै। हुणे तक मैं जितणी हिमाचली कवता पढ़ियो, तिसा दा डिक्शन, तिसा दी बुनावट कनै बनावट, तिसा दा कथ्य लोक कनै पारंपरिक कवता दे नेड़ैं है। अपवाद छड्डी नै। हिमाचली कवता वाच्य कवता दे नेड़ैं है। 

वरयाम होरां दी कवता अपणे घर, परिवार, ग्रां, खेह्तर, बूटे, जंगल, सूबा, लोक वगैरह नै डुग्घा कनै आत्मीय संवाद करदी है। कवि अपणे परिवारे सौगी-सौगी लोक देवतेयां, ग्रां देयां लोकां दी जिंदगी कनै मने जो निरखदा-परखदा रैंह्दा है। पशु-पक्षियां, बूटेयां- बणां दी खोज-खबर लैंदा रैंह्दा है। इसा गल्ला दी तस्दीक कुछ कवतां दे नां ते होई जाणी है। जिंञा रोटी, बात (रास्ता), डागे (ढोर), डाब्बू कुत्ते ताईं, शोह्रू री खरी (बच्चे दा दुख), म्हारे लोके री बेटड़ी, गाड़ा री हाका (नदी दियां अवाजां), देओ रै खरै (दुख देवते दे), मंणश होर डागे (म्हाणू कनै पशु), देओ नारायण, साजे री धियाड़ (संगरांदी दा दिन), बाकरे बै (बकरे नै), मनुआळ (मोनाल), गुच्छी, हमें च़ेलू (पक्षी असां), पूळा (पूलें), टोहल (चट्टान), थकी खील (थकी गेयो फुल्ल), जुणा छ़ेके बुढ़ळे होई (बुड्ढे होई गेयो जेह्ड़े), वगैरा। 

अपणे आळे-दुआळे दे संसारे दे सुखां-दुखां, पीड़ां-तकलीफां, सुपनेयां-मुल्लां दी खोज-खबर सैह् अपणेयां इन्हां किरदारां दी मार्फत लई लैंदे।। इन्हां कवतां ते असां जो पता लगदा भई कवि अपणिया दुनिया च किंञा खड़ोतेया है। सैह् इसा दुनिया दा हिस्सा भी है कनै इसा ते बाह्र इसा दा गुआह भी है। एह् लिप्तता- निर्लिप्तता कनै साक्षी भाव सिर्फ प्राणी जगत तक ही नीं है। तिह्दी नजर अपणे देवते पर भी है, रुक्खे कनै टोह्ला पर भी है। मतलब कविए दिया पळोह्डा च सब किछ है। कविये जो इस सारे ब्रह्मांडे च अपणे यानी इंसाने दिया जगह दी भी खबर है। इसा कताबा दी अखीरली कवता है - ‘मंणशू पृथ्वी रै’ यानी माह्णू पूथ्विया दे। इसा कवता च असां दिया पछाणा या अस्मिता दे स्तर खुलदे जांदे। जिंञा कविये तो अपणे इलाके च ‘बुहाल’ गलांदे। कुल्लू जिले च सैह् ‘सराजी’ है। सूबे च ‘कुल्लुवी’। मुल्के दिया राजधानिया च ‘हिमाचली’ कनै विदेसां च ‘हिंदूस्तानी’। कविये दी नजर ऐत्थी ही नीं रुकी। इसते बाद सैह् पृथ्वी ग्रह पर दिखदा। तिह्जो सारे लोक अपणे सक्के लगदे। फिरी सैह् इसा पृथ्विया च बसियो सभ्यता जो मंगल कनै शुक्र ग्रहे ते दिखदा। आखर च कविये दी दृष्टि असां जो सुझदी। सैह् बोलदा भई कौमां च भेदभाव है, इसी करी नै कुछ म्हाणू हन, कुछ म्हाणू नीं लगदे। मतलब असां दी सोच देह्यी होई गइयो है भई असां कुछ म्हाणुआं जो छोटे म्हाणू समझदे। जातीं दा भेदभाव कनै गैर बराबरी इसा विराट कल्पना च चंद्रमे च धब्बेयां साह्यी सुझदी। एह् भेदभाव असां दिया पृथ्विया पर मौजूद है। 

वरयाम होरां दियां कवतां च तिन्हां दी दृष्टि तिन्हां दे विषय कनै कवता दे ताणे-बाणे च सुझी जांदी। इसते अलावा तिन्हां दियां कवतां दे आखिर च इक युक्ति हुंदी है। मतलब इक्की किस्मा दा नचोड़ हुंदा है। कुछ उदाहरण दिक्खा। 

ढोर कवता डंगरेयां पर है। तिसा दे आखिर च इक विडंबना है,

डागै हूंदा डागै

ऐसा गौला कि तीया डागै।

पर कीबै हुंदा होळे

कोई मंणश

डागै?

 

डाबू कुत्ते पर लिखी कविता –

पिंझै ल्हाऊणै रै मकाबलै मंज़े

कूत्ते का मूकै मंणश निखली जोंहै।

....

हां आसा आपू, डाबुआ, मंणशा री ईज़त कौरनै आलौ

पर केह् कौरनी कूत्ते का भी कूत्ते मंणशा री ईज़त ! 


गाड़ा (नदी) री हाका कवता दा अंत दिक्खा –

आज़ ज़ेहे लागै हूंदै चैणदे बूण

शई हूर्ण चैणदे मंणश। 

वरयाम होरां दी कवता अपणे लोक जो सहज-संवेदन तरीके नै दिखदी है। भावुकता नीं है। सुक्के विचार भी नीं प्रीतेह्यो। बिंबां प्रतीकां कनै भाषा दा मता वजन नीं है। सहज-संवेदन दी डोरी पकड़ी नै मद्धम सुरे च सैह् अपणे लोक-संसारे जो साकार करदे। माता होऐ, याणा होऐ, रुक्ख होऐ, पशु होऐ, सैह् तिन्हां दे सुखे-दुखे दा ताणा-बाणा हौळैं-हौळें बुणी कढदे। कुती कुती व्यंजना-विडंबना दे स्हारैं दुख-तकलीफ उजागर होई जांदी है। 

बकरे पर लिखियो कवता पढ़ने परंत पाठके दे मने पर गुम जेह्यी चोट लगदी है। बकरे दी बचारगी कनै आदमिये दा लालच कवता खत्म होणे परंत भी गूंजदा रैंह्दा। इसा च व्यंग्य दी हौळी मार भी है।

दाच लागौ मूछ़ा च़कौऊंदौ...

चेह्ल-मरेह्ळी मची मसाले-हौल्जा ज़ंदर...

काआ-कूते बी पूजी बास 

जिन्हां लोकां बकरे जो बढणे, पकाणे, खाणे दी रीत बणाइयो है, तिन्हां दा जिक्र इसा कवता च नीं है। कवि बाकी सबनां दिया बेसबरिया दा जिक्र करदा कनै बकरे जो गलांदा भई तेरी जिंदगी हुण जादा नीं है बचियो। आदमिये दा जिक्र कीते बगैर बचारे बकरे नै होणे आळी हिंसा जो बिना भावुकता ते पेश कीतेया है। 

इन्हां कवतां दा अनुवाद वरयाम होरां अप्पू ही कीतेया है। शायद एह् इक्की तरीके दी पुनर्रचना है। तिन्नों संग्रह इन्हां दिल्ली रैह्ंदेयां लिखयो हन।     



वरयाम सिंह की सराजी कविताएं
 

वरयाम सिंह के कविता संग्रह ‘अपने आलोक में’ को पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव था। वरयाम सिंह जेएनयू में रूसी भाषा के प्रोफेसर रहे हैं। मूलत: कुल्लू के बंजार इलाके यानी सिराज घाटी के बाशिंदे हैं। आप मुख्यतः रूसी भाषा से अनुवाद, विशेषकर काव्य अनुवाद के लिए विख्यात हैं। हिंदी में आपके दो कविता संग्रह हैं और हिमाचली सराजी में तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं। ‘अपने आलोक में’ पुस्तक में वरयाम जी ने अपने तीनों सराजी काव्य संग्रहों की कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है। इनका पहला संग्रह है - उछ़टी मारनी डिया (1983) हिमाचल अकादमी द्वारा पुरस्कृत। दूसरा संकलन है प्रियाशे आपणे (1988) और तीसरा एहड़ौ हांह पेड़ (1997)।

‘अपने आलोक में’ संग्रह द्विभाषी है, एक तरफ सराजी कविता और दूसरी तरफ इसका हिंदी रूपांतर। इस तरह सराजी कविता हिन्दी पाठक तक पहुंचती है।   

हिमाचल में कई भाषाएं हैं। अधिकांश भाषाएं मुझे समझ आ जाती हैं। कुछ हद तक कुल्लुवी भी आ जाती है, लेकिन सराजी भाषा किंचित और भिन्न है, इसलिए उतनी आसानी से समझ में नहीं आती। इसलिए पुस्तक में मैंने पहले हिंदी रूपांतर पढ़ा बाद में सराजी। फिर दूसरे पाठ में सराजी और हिंदी दोनों साथ-साथ पढ़े। ताकि दोनों रूपों में कविताओं के सौंदर्य का भान हो जाए।  

इससे पहले मुंबई निवासी हिमाचली कवि लेखक अनुवादक कुशल कुमार का संग्रह ‘मुठ भर अंबर’ आया था। उसमें भी कवि ने स्वयं पहाड़ी कविता का हिंदी में अनुवाद किया था और दोनों रूप आमने-सामने थे। कुशल की भाषा मेरी भाषा से मिलती है इसलिए उसे मैं सहजता से पढ़ सका था। कुशल के अनुवाद का डिक्शन भी पहाड़ी से मिलता जुलता है यानी उनके हिंदी अनुवाद में पहाड़ी या कांगड़ी या हिमाचली की सुगंध व्याप्त रहती है।  


वारयाम सिंह की कविता का डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषाओं के करीब है। यह रेखांकनीय बात है कि सराजी भाषा में आधुनिक भारतीय कविता के डिक्शन की छटा देखने को मिले। अब तक जो हिमाचली कविता मैंने पढ़ी है, उसका डिक्शन, उसकी बुनावट और बनावट, उसका कथ्य लोक और पारंपरिक कविता के करीब दिखता है। हिमाचली कविता वाच्य कविता के अधिक करीब रहती है।  

वरयाम सिंह की कविता अपने घर, परिवार, गांव, खेत-खलिहान, पेड़, जंगल, प्रदेश, लोक आदि से आत्मीय और गहन संवाद की कविता है। कवि अपने घर के सदस्यों के साथ-साथ लोक देवताओं, गांव के लोगों के जीवन और मन:स्थितियों को निरखता-परखता है। पशुओं, पक्षियों, पेड़ों, जंगलों की खोज-खबर लेता है। यह बात कुछ कविताओं के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाएगी। जैसे रोटी, (बात) रास्ता, (डागे) ढोर, डाब्बू कुत्ते के लिए, (शोह्रू री खरी) बच्चे का दुख, हमारे इलाके की औरतें, नदी की आवाजें, (देओ रै खरै) दुख देवता के, मनुष्य और ढोर, देओ नारायण, संक्रांति का दिन, बकरे से, मोनाल, गुच्छी, (हमें च़ेलू) पक्षी हम, पूलें, (टोहल) चट्टान, (थकी खील) थक गए हैं फूल, बूढ़े हो गए जो, आदि। कोष्ठकों में सराजी भाषा के शीर्षक हैं। 

अपने आसपास की दुनिया के सुख-दुख, दुख-तकलीफ, सपनों-मूल्यों की खोज-खबर वे अपने इन पात्रों के जरिए लेते हैं। इन कविताओं से पता चलता है कि कवि किस तरह अपने संसार में स्थित है। वह उस दुनिया का हिस्सा भी है और उससे बाहर आकर इसका साक्षी भी है। यह लिप्तता और निर्लिप्तता तथा साक्षी भाव केवल प्राणी जगत तक ही सीमित नहीं है। उसकी नजर अपने देवता पर भी है, पेड़ और चट्टान पर भी है। यानी कवि के आगोश में सब कुछ है। कवि को इस सारे ब्रह्मांड में अपने यानी मनुष्य की स्थिति का भी पता है। संग्रह की अंतिम कविता है ‘मंणशू पृथ्वी रै’ यानी ‘मनुष्य पृथ्वी के’। इस कविता में हमारी पहचान या अस्मिता के स्तर खुलते चले जाते हैं। जैसे कवि के अपने इलाके में उसकी ‘बुहाल’ नाम से पहचान है, जिले में वह ‘सराजी’ के नाम से जाना जाता है, राज्य के स्तर पर वह ‘कुल्लुवी’ है, देश की राजधानी में ‘हिमाचली’ और विदेश में वह ‘हिंदूस्तानी’ है। इसके बाद कवि पृथ्वी ग्रह पर देखता है तो उसे सभी देशों के नागरिक अपने परिजन लगते हैं। आगे वह पृथ्वी में बसी सभ्यता को मंगल और शुक्र ग्रह से देखता है। अंत में कवि की दृष्टि का परिचय हमें मिलता है, जब वह देखता है कि कौमों के भेदभाव के कारण कुछ मनुष्य दिखते हैं, कुछ मनुष्य नहीं दिखते हैं। यानी हमारी इस तरह की कंडीशनिंग हो गई है कि हम कुछ मनुष्यों को कमतर मनुष्य के रूप में देखते हैं। जातियों के भेदभाव का दंश या असमानता उसकी इस विराट कल्पना में चांद पर धब्बों की तरह दिखती है। और यह भेद हमारी पृथ्वी पर विद्यमान है। 

वरयाम सिंह की कविताओं में उनकी दृष्टि का पता उनके विषय चयन और कविता के ताने-बाने से चल जाता है। साथ ही कविताओं के अंत में उनकी एक अपनी युक्ति भी रहती है। एक तरह से उनका एक निष्कर्ष होता है। कुछ उदाहरण देखें। 

ढोर कविता पशुओं पर है। इसके अंत में एक विडंबना है, 

क्यों होते हैं मनुष्य 

मनुष्य होते हुए भी ढोर 

 

कुत्ते पर लिखी कविता की पंक्तियां हैं- 

पूंछ हिलाने की प्रतियोगिता में 

मनुष्य निकले हैं कुत्तों से आगे

कैसे इज्जत करें कुत्ते से भी कुत्ते आदमी की 

 

नदी की आवाज़ कविता का अंत इस तरह होता है- 

कराह रहे हैं जैसे आज जंगल 

कराह रहे होंगे मनुष्य कल  

वरयाम सिंह की कविता अपने लोक को सहज संवेदन के ढंग से देखती है। कहीं भी भावुकता या भाव विह्वलता नहीं है; शुष्क विचार प्रधानता भी नहीं है; बिंबों प्रतीकों और भाषा का अतिरिक्त भार नहीं है। सहज संवेदन की डोर पकड़ कर धीमे सुर में वे अपने लोक संसार को साकार करते हैं। माता हो, बच्चा हो, पेड़ हो, पशु हो, वे उसके सुख-दुख का ताना-बाना धीमे धीमे बुन देते हैं। कहीं-कहीं व्यंजना और विडंबना के माध्यम से दुख-तकलीफ उजागर होती है।  

बकरे पर लिखी कविता पढ़ने के बाद पाठक के मन पर गुम सी चोट लगती है। बकरे की बेचारगी और मनुष्य का लालच कविता के बाद गूंजता रहता है। व्यंग्य की धीमी मार भी वहां है। 

अपनी मूंछें हिला रहा है द्राट

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पागल हुए जा रहे हैं मिर्च मसाले

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कव्वों-कुत्तों तक पहुंच गई है

पक रहे बकरे की महक 

जिन लोगों ने बकरे को काटने, पकाने, खाने की परंपरा बनाई है उनका जिक्र इस कविता में नहीं है। कवि बाकी सब की बेसब्री का जिक्र करता है और बकरे को बताता है कि अब तेरा जीवन ज्यादा नहीं बचा है। मनुष्य के जिक्र के बिना बकरे जैसे निरीह प्राणी के प्रति हिंसा को भावुकता के बिना पेश किया गया है।  

इन कविताओं का सराजी से हिंदी में रूपांतरण वरयाम सिंह जी ने खुद किया है। शायद एक तरह से यह पुनर्रचना ही है। पंक्ति दर पंक्ति अनुवाद नहीं है। हो सकता है यहां तीनों संग्रहों में से चुनी हुई कविताएं ली गई हों। कहीं-कहीं कवि ने सराजी की कुछ पंक्तियों को हिंदी पाठ के लिए जरूरी नहीं समझा है। पर इससे कविता के कविता होने में कोई कमी नहीं आती है। चूंकि कवि खुद अनुवाद कर रहा है इसलिए वह इस तरह की छूट लेने के लिए स्वतंत्र है। कोई अन्य व्यक्ति अनुवाद करता तो शायद वह ऐसी छूट नहीं ले पाता।  

बहरहाल ! सराजी कविताओं का यह आस्वाद हिंदी पाठक के लिए सुखदाई है। इससे दूर दराज के समाज, वहां की भाषा की सामर्थ्य का अंदाजा हमें हो जाता है।  

सराजी भाषा में तीनों संग्रह वरयाम सिंह ने दिल्ली में रहते हुए लिखे हैं। इस बात का खास महत्व है। यह उनके अपने लोक, अपने मूल प्रदेश और अपनी भाषा के प्रति लगाव को तो प्रकट करता ही है, दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए अपनी मूल भाषा में कविता लिखने के लिए समर्पित रहना उनके बहुआमामी कवि व्यक्तित्व से हमारा परिचय कराता है। यह भी गौरतलब बात है कि ये सभी कविताएं अपने मूल प्रदेश से नालबद्ध हैं। दिल्ली जैसे महानगर का जीवन इनकी सराजी कविता में दिखाई नहीं देता। कविता और स्थानिकता की पड़ताल करने के लिए शायद वरयाम जी की हिन्दी और सराजी कविता का तुलनात्मक अध्ययन किए जाने की जरूरत है।   


वरयाम सिंह

जन्म : 1948। बाहू (बंजार), कुल्लू (हि. प्र.) में। आरंभिक शिक्षा बंजार में तथा बाद में रूसी अध्ययन संस्थान, जे.एन.यू., नयी दिल्ली से 1969 में बी.ए. (आनर्स)। 1969-71 में मास्को राज्य विश्वविद्यालय के रूसी साहित्य विभाग में विशेष पाठ्यक्रम। 1979 में यहीं से पी-एच.डी.। 1972 से जे. एन. यू, नयी दिल्ली में अध्यापन। 2013 से सेवानिवृत्त के बाद अपने गांव में।

हिन्दी में 'हिमाचल समाचार व अन्य कविताएँ' और 'दयालु की दुनिया' कविता-संग्रह। तीन कविता-संग्रह हिमाल प्रदेश के सिराज जनपद की बोली में। मुख्य काम कविता-अनुवाद के क्षेत्र में। बाहरवीं शताब्दी की कृति 'गाथा ईगर अभियान' से लेकर समकालीन रचनाकारों के अनुवाद।

मायकोव्स्की की क्रान्तिपूर्व की कविताएँ (1983), 'आधुनिक ब्येलोरूसी कविताएँ' (1986), मारीना त्स्वेतायेवा की कविताएँ 'आयेंगे दिन कविताओं के' (1988), 'कविता विषयक रूसी कविताएँ' (1989), बीसवीं सदी की रूसी कविताओं का संचयन 'तनी हुई प्रत्यंचा' (1994), किर्गीज महाकाव्य 'मनास' (1997), 'बेलारूसी कवि याँका सिपाकोव की कविताएँ 'काला ईश्वर व अन्य कविताएँ' (2002), अलेक्सांद्र ब्लोक की कविताएँ 'दूर की आवाज़' (2005) मारीना त्स्वेतायेवा की कविताएँ इस बेसहारा वक्त में (2013), निकोलाय जबोलोत्स्की की कविताएँ 'नियति की अज्ञात इच्छाएँ (2016), अफ़ानासी फ्येत की कविताएँ 'सृजन के सपने' (2020)। रूसी साहित्य पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख। कविता और कविता-अनुवाद के लिए हिमाचल अकादमी द्वारा दो बार पुरस्कृत, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् के आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार, रूसी संस्कृति मंत्रालय द्वारा पूश्किन पदक और किर्गीज राष्ट्रपति द्वारा 'मनास-1000' पदक, और भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, वानीप्रिया फाउण्डेशन, कलकत्ता से सम्मानित।