पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

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Wednesday, July 29, 2026

शब्दकोश : पुस्तक चर्चा

 


अज पेश है मंडयाली शब्दकोश पर अशोक दर्द दी समीक्षा। पैह्लें पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च 


लोकभाषा बचाणे दी दिशा च प्रशंसा दे काबिल कोशिश -मंडियाली शब्दकोश

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मेरेयां हत्थां च पकड़ी कताब मंडयाली शब्दकोश जो पढ़दे होए सारेयां छा पैह्ले मां बोली मंडियाली खातर लेखिका वास्ते कृष्ण चंद्र महादेविया दे शुभकामना संदेश दियां एह् पंक्तियां दिक्खा -"जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

उसदे बाद डॉक्टर गंगाराम राजी देयां शब्दां च - "शब्दकोश शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को यह मददगार भी साबित होता है ।अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।

अग्गे लिक्खदे ने - "आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं । आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

 इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

 शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथी कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं ।"

मंडियाली शब्दकोश कताबा दे पैहले हिस्से च 'आंग' शब्द यानी एक संख्या जो लेई करी इकानवें पृष्ठ दे आखरी शब्द 'त्रेखड़ा' यानी त्रैं लोकां दा समूह तक लगभग तिन्न छा साढ़े तिन्न हजार शब्द हिंदी अर्थ समेत दर्ज हन्न।

इनां संकलित शब्दां दी खूबसूरती या विशेषता गलाई लियो के एह् शब्द लोकजीवने दे केईयां पहलुआं ई दर्शांदे लोकभाषा दे एह् शब्द जेहड़े या ता विलुप्त होई गे या विलुप्त हौणे दे कगार पुर हन्न। उदाहरण वास्ते एह् शब्द दिक्खे जाई सकदे हन्न, जियां- कन्वाला यानी लकड़िया दी ओ बड्डी परात जिसा च आट्टा गुन्नेया जांदा था।

अज्ज धातु दियां परातां आई जाणे कन्ने एह् लकड़िया दे बर्तन रसोई घरां छा गायब होई गे हन्न अते कन्ने ई शब्द बी लोकभाषा छा गायब होई गे। नौइयां पीढ़िया वास्ते एह् शब्द अबूझ हन्न।

उदाहरण वास्ते दुआ शब्द ऐ 'आगल' यानी पालकी जो लग्गे दे डंडे जिनां ई कहार चुकदे हन्न। आज्ज मोटरां दे युगे च पालकी लोकजीवन छा गायब होई जा दी अते कन्ने ई लोकभाषा दा एह् शब्द बी।

ईयां ई लोकजीवने छा विलुप्त हुंदे संस्कारां दे शब्द हौन्न या औजारां दे, बर्तनां दे हौन्न या व्यवहार दे, प्रकृति दे उपादानां दे हौन्न या के बदलोंदे मौसमां दे, मानव- स्वभाव, बोली -वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक उपयोग, कपड़े लत्ते, गैहणे वंदे इत्यादि ताईं उपयोग च आणे आल़े शब्द जेहड़े - जेहड़े बी लेखिका दे ज़हन छा गुजरे हन्न या जिनां शब्दां कन्ने लोकजीवन दी पारखी लेखिका दा अपणे बचपन छा लेई करी हूणे तक परिचय रिया ऐ उनां ई लेखिका ने बड़ी संजीदगी अते सलीके ने इस शब्दकोश दी कताबा च संचित करी लिया ऐ।

कताबा दे अगले हिस्से च पृष्ठ संख्या 92 छा लेई करी 143 तक 1045 मंडियाली मुहावरे अते लोकोक्तियां हिंदी अर्थ कन्ने दर्ज हन्न।

किच्छ उदाहरण दिक्खा -"अंधेयां ते खूह लंघाणे" -यानी कोई जेहड़ा काम्म नी करी सकदा ओ करवाणा।

"अणजाण विद्या खायै पराण " -यानी जेहड़ा काम्म नी आंदा ओ नी करणा चैच्दा।

"किच्छ गाई रा किच्छ बाई रा " -यानी मिल्या जुल्या।

"घींघे घोल़े " -यानी लड़ाई झगड़ा।

"गल़ा गुट्ठा दैणा" -यानी अति करणी।

ईयां मते सारे मुहावरे ते लोकोक्तियां जेहड़े लोकजीवन च बरते जांदे हन्न लेखिका ने इकट्ठे करणे दा इक्क ऐतिहासिक प्रयास कित्ता ऐ।

कताबा दे आखरी हिस्से च पृष्ठ संख्या 144 छा 170 तक "मंडी दे सांस्कृतिक परिवेश च शब्दां दी भूमिका"  दे तहत लगभग 448 शब्दां ई इकट्ठा कित्ता ऐ।

उदाहरण दिक्खा - "पंजणी देणी" यानी बेटी दी विदाई।

"चोगा" यानी दूल्हे ई पुआई जाणे आल़ी पोशाक (शेरवानी साई)

शेरवानी दे युग च हूण चोगा भी नी रिया ते चोगा शब्द बी।

"बिंदु" -यानी जन्मदिन पुर हलवा या मिठाई बगैरह रिश्तदारां ई दैणे ई बिंदु गलांदे।

लोकजीवन च लोकभाषा दा अपणा महत्व हुंदा ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक-संस्कृति, लोक-सभ्यता, अते सदियां छा चला करदे लोकाचारां अते लोक विश्वासां दी पुच्छैण करांदी ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन दी धरोहर अते पूंजी हुंदी ऐ। 170 पृष्ठां दे कलेवर च सजी दी एह् कताब लोकजीवन दे केइयां शब्दां ई सहेजदी लोक वास्ते इक्क खूबसूरत उपहार ऐ।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जेहड़ा इस शब्द धरोहर ई कताबा दे रूपे च सहेजणे - संभाल़णे दा ऐतिहासिक अते प्रशंसा जोग काम्म कित्ता ऐ इनी आणे आल़ियां पीढ़ियां वास्ते प्रकाश स्तंभ दा काम्म करणा, मेरा ऐसा मन्नणा ऐ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका दे मुताबिक - "यह बोली (मंडयाली ) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की और अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है ।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं । यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है । व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था । अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।"

आखिर च इस खूबसूरत कताबा वास्ते लेखिका जो मतियां मतियां शुभकामनां अते बधाईयां।

निसंदेह एह् कताब भावी पीढ़ियां दी धरोहर ऐ अते लोकभाषा अते लोकजीवन दे शोधार्थियां ते पाठकां वास्ते प्रकाश स्तंभ।

आशावादी हां, इसा कताबा च पाठकां अते शोधार्थियां च अपणी जगह अप्पू बणाणे दा सामर्थ्य ऐ।



लोकभाषा को बचाने की दिशा में श्लाघ्य प्रयास: मंड्याली शब्दकोश

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हस्तगत पुस्तक मंडयाली शब्दकोश को पढ़ते हुए सबसे पहले मां भाषा मंड्याली से लेखिका के लिए शुभकामना संदेश की ये पंक्तियां -बकौल आदरणीय कृष्ण चंद्र महादेविया- "जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

तत्पश्चात डॉ गंगाराम राजी के शब्दों में- शब्दकोष तो शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को मददगार भी साबित होता है। अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।"

आगे लिखते हैं आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथ कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं । 

इस मांड्याली शब्दकोश पुस्तक के प्रथम भाग में  "आंग" यानी एक संख्या लेकर इकानवे पृष्ठ के अंतिम शब्द "त्रेखड़ा" यानी तीन लोगों का समूह तक लगभग तीन से साढ़े तीन हजार शब्द हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

इन संकलित शब्दों की खूबसूरती या विशेषता कह लीजिए कि ये शब्द जीवन के विविध आयामों को इंगित करते स्थानीय बोली के वे शब्द हैं जो या तो विलुप्त हो गए हैं या लोकजीवन से विलुप्त होने के कगार पर हैं।

उदाहरण के लिए ये शब्द देखे जा सकते हैं जैसे- कन्वाला अर्थात लकड़ी की वह बड़ी परात जिसमें आटा गूंथा जाता था।

आज धातु की परातें आ जाने के बाद ये लकड़ी के बर्तन रसोई घरों से गायब हो गए हैं साथ ही शब्द भी विलुप्त हो गए हैं। नई पीढ़ी के लिए यह शब्द अबूझ है।

उदाहरण के लिए दूसरा शब्द "आगल" अर्थात पालकी को लगे डंडे जिन्हें कहार उठाते हैं, आज गाड़ियों के युग में पालकी लोग जीवन से गायब होती जा रही है और साथ ही शब्द भी।

इस तरह लोकजीवन से विलुप्त होते संस्कारों के शब्द हों या औजारों केबर्तनों के हों या व्यवहार के, प्रकृति के विभिन्न उपादानों के शब्द हों या मौसमों के बदलने के, मानव स्वभाव, बोली-वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक-प्रयोग, वस्त्रों-आभूषणों के लिए प्रयुक्त शब्द, जो जो शब्द लेखिका के जहन से गुजरे हैं या जिन शब्दों के साथ लोक जीवन की पारखी लेखिका का अपने बचपन से लेकर अब तक परिचय रहा है उन्हें लेखिका ने बड़ी संजीदगी व सलीके से इस शब्दकोश की पुस्तक में संचित कर लिया है।

पुस्तक के अगले भाग में पृष्ठ संख्या 92 से लेकर 143 पृष्ठ तक लगभग 52 पृष्ठों में 1045  मंडियाली मुहावरों व लोकोक्तियों (कहावतों) का संचयन किया है। ये मुहावरे व लोकोक्तियां भी हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

कुछ उदाहरण देखिए- "अन्धेया थे खूह लंघाणे" अर्थात् जो सक्षम न हो उससे काम करवाना।

"अणजाण विद्या खाए पराण" अर्थात् जो काम नहीं आता वह नहीं करना चाहिए।

"कुछ गाई रा कुछ बाई रा" अर्थात् मिला जुला।

"घींघे घोल़े" अर्थात् लड़ाई झगड़ा ।

"गल़ा गुट्ठा देणा" अर्थात् अति करना।

इस तरह बहुत सी लोकोक्तियां व मुहावरे जो लोक जीवन में प्रयुक्त होते हैं, लेखिका ने उन्हें संचित करने का श्लाघ्य प्रयास किया है।

अंतिम भाग में पृष्ठ संख्या 144 से 170 तक "मंडी के सांस्कृतिक परिवेश में शब्दों की भूमिका" के अंतर्गत लगभग 448 शब्दों का संचयन किया है।

उदाहरण देखिए -"पंजणी देणी" अर्थात् बेटी की विदाई।

"चोगा" अर्थात यह दूल्हे को पहनाया जाता था जो शेरवानी की तरह का होता है।

शेरवानी के युग में अब चोगा शब्द विलुप्त होने के कगार पर है।

"बिंदु" अर्थात जन्मदिन पर हलवा या मिठाई आदि सबंधियों को देने को बिंदु कहते हैं।

लोक जीवन में लोकभाषा का अपना महत्व होता है ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक संस्कृति, लोक सभ्यता और सदियों से चले आ रहे लोकाचार लोक विश्वास की परिचायक होती है ।

लोक भाषा लोकजीवन की धरोहर होती है। 170 पृष्ठों के कलेवर में सजी यह पुस्तक लोकजीवन के विभिन्न शब्दों को सहेजती खूबसूरत धरोहर है।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जो इस शब्द धरोहर को पुस्तक के रूप में सहेजने का ऐतिहासिक एवं श्लाघनीय कार्य किया है। यह पुस्तक भावी पीढ़ियों के लिए लोकजीवन के विविध आयामी अध्ययन के लिए प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका के अनुसार - यह बोली (मंडयाली) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की ओर अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं। यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है। व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था। अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।

अंत में, इस खूबसूरत पुस्तक मांड्याली शब्दकोश के लिए लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई। नि:संदेह यह पुस्तक भावी पीढ़ियों की धरोहर है तथा लोकभाषा व लोकजीवन के अध्येताओं के लिए एक प्रकाश पुंज भी। आशावादी हूं  प्रबुद्ध पाठकों व शोधार्थियों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान स्वयं बना लेगी।

समीक्ष्य कृति: मंड्याली शब्दकोश

संचयन: रूपेश्वरी शर्मा पुरानी मंडी , मंडी, हिमाचल प्रदेश 

कुल पृष्ठ : 170 कुल मूल्य ₹400 प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन c- 515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी नई दिल्ली- 110012

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित 

Friday, September 26, 2025

अशोक दर्द दियां कवतां

चित्रकृति:सुमनिका 

 
पेश हन अशोक दर्द होरां दियां कवतां। 


   

धुप्प छां

पहाड़ां साई धुप्प छां ढौंह्दा रिया।

रोज तिल तिल करी छलौंदा रिया।।

 

 रक्खियां पल्याई छुरियां जिन्हां।

जाई अंगणे उन्हां दे बौंह्दा रिया ।।

 

केई लग्गे मगर मेरे हत्थां धोई।

फिरी बी बेफिक्र होई सौंदा रिया।।

 

केई ढकियां थियां  ख्वाबां दियां।

कदी लूंह्दा रिया कदी गौंह्दा रिया ।।

 

बिच्च रस्ते च जेह्ड़े  छड्डदे रेह् ।

उन्हां लोकां ने रस्ते कठौंदा रिया।।

 

बुणे - पट्टु कंबल मैं बुह्तेरे अपर।

भर हीयूंदे मैं नंगा ठह्णौदा रिया।।

 

इत्थे मिल्या नी मैहरम दिले दा कोई।

अंदरो अंदर मैं उम्रां घटौंदा रिया।।

 

लोकां थप्पी ने दाह् लाई झूठी ।

मिठिया गल्लां मैं रोज ठगौंदा रिया।।

 

जाह्लु कित्ती मती मैं भलमाणसी।

ताह्लु हट्टियां घराटां लटौंदा रिया।।

 

नी अपणे होए नी पराए लग्गे।

इदेह् रिश्ते मैं उम्रां हंडांदा रिया।।

 

कन्ने सूरजे दे मैं चलदा रिया ।

कदी चढ़दा रिया कदी घ्रोंदा रिया।।

 

दिक्खी नौंएं तमासे दुनिया दे ।

कदी हसदा रिया कदी रौंदा रिया।।

 

लेई दर्दे दिले दे अल्फ़ाज़ नित।

गीतां-  नज्मां दी मालां परौंदा रिया ।।


  2  

दिक्खी ने चुप रेई गिया...

उपजाऊ खेतर होई गे बंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।

वारे पारे खूनी मंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया ।।

 

कुते राम बणादा बड्डा कुत्ते अल्लाह ताला ए।

रोज लड़ादे मस्जिद मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

टुकड़े खातर लड़ियां बिल्लियां खूब तमासे कित्ते ।

बिल्लियां दे जज बणी गे बंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

भाईयां भाईयां बिच्च झमेले जोरू जोर जमीनां दे।

उट्ठदे नौंएं रोज बवंडर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

नैतिकता ईमानदारी ते कन्ने देस प्यारे दे।

खुन्ने होई गे सारे संदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पैसे सुट्टो करो पढ़ाई आज्ज जमाना पैसे दा ।

बणे दुकानां विद्या मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

जिन्हां हत्थां उपकार हुंदे थे ओ बी इक्क जमाना था।

उन्हां हत्थां आज्ज पैने खंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

खूब कमाईयां कित्तियां लोकां काले धंधे करी करी।

बैट्ठे केई बणी सिकंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

बुक्कल़ी बिच्च छुपाई छुरियां मुक्खे राम उच्चारा दे।

बाहरे चिट्टे काले अंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पापां धरती गेई भरोई खूब सुणाया रोई ने।

किच्छ नी बोल्ले पीर पैगंबर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।


  3  

कबता के लिखणी

दिले नी जेकर प्यार ता कबता के लिखणी ।

धोखे च रक्खै यार ता कबता के लिखणी ।।

 

हौन्न बूट्टे सब  ठुंडे ठुंडे  ते पौंग्र सुकी  सुकी ।

होए बदली सब नुहार ता कबता के लिखणी ।।

 

जे दूर बसेरे हौन्न दिल रुचेयां दिलदारां दे ।

अते हवै नी रुत बहार ता कबता के लिखणी ।।

 

दूर जाणी हवै जानी ते बिखड़े रस्ते हौन 

कने हौन सराबी कहार ता कबता के लिखणी ।

 

अपणा आप जलाणा  दुनिया दियां दर्दां ने ।

जे नी समझै संसार ता कबता के लिखणी । ।

 

एहसास नी समझै कोई डुल्ले बरकेयां पुर ।

अते नी मिलै दरकार ता कबता के लिखणी ।।

 

  4  

साह्ड़े हिमाचले दी नी रीस कोई...

अजेह् बी साह्ड़ेयां पहाड़ां च प्रेम प्यार जिंदा ऐ।

निक्केयां बड्डेयां दा आदर - सत्कार जिंदा ऐ ।।

 

अणछूयां रस्तेयां पर जित्थे विचरते देवते ।

चिट्टी चांदिया भरोई साह्ड़ी धार जिंदा ऐ ।।

 

इत्थे झूरिया गंगिया दी मिट्ठड़ी तान जिंदा ऐ ।

ढोल नगारेयां मिट्ठड़ी झंणकार जिंदा ऐ ।।

 

नौआं जमाना आया लोक लाक्ख बोल़ण ।

साह्ड़ा सुनार जिंदा ऐ साह्ड़ा लोहार जिंदा ऐ ।।

 

रैह्न्दे भाईयां साई हिंदू मुस्लिम ते सिक्ख ईसाई।

साह्ड़ेयां पहाड़ां च मोहब्बता दी नुहार जिंदा ऐ ।।

 

करी सकेया नी कोई पहाड़ां दा बाल़ बांका ।

साह्ड़ी संस्कृति जिंदा ऐ साह्ड़ा संस्कार जिंदा ऐ ।।

 

हरणातरां जातरां नुआल़ेयां दे इत्थे नाच जींदे ।

हास्सेयां ठट्ठेयां दी मिट्ठड़ी फुहार जिंदा ऐ ।।

 

पिज्जां ककड़ां दी बणां च हुंकार जिंदा ऐ ।

मोरां मोनाल़ां दी उच्चड़ी उडार जिंदा ऐ  ।।

 

पच्छिमी सभ्यता भवें कितणें ई रंग लाए ।

लोहड़ी सैंरी ते रल़ियां  दा साह्ड़ा हर त्योहार जिंदा ऐ ।।

 

पच्छिमी हवा नी साह्ड़ा किच्छ बिगाड़ी सकदी ।

साह्ड़ेयां पहाड़ां दी ठंडड़ी बयार जिंदा ऐ ।।

 

बेईमानिया ठग्गिया इ नी इत्थे पुच्छदा कोई ।

साह्ड़ा ईमान जिंदा ऐ साह्ड़ा ऐतवार जिंदा ऐ ।।

 

रक्खदा बुक्कतां  प्यासेयां दी प्यास बुझाणे दियां।

साह्ड़ा नौण जिंदा ऐ साह्ड़ा पणिहार जिंदा ऐ ।।

 

गिटपिट अंग्रेजिया च दुनिया लाक्ख लायै ।

साह्ड़िया हिमाचलिया दा अपणा मयार जिंदा ऐ ।।

 

साह्ड़े हिमाचले दी नी कोई रीस दर्द ।

जालु तक एह् चन्न सूरज ते संसार जिंदा ऐ ।।

 

  5  

मुश्कलां के करगियां

मुश्कलां के करगियां उसदा जनाब ।

परां च जिसदे हौसला है बेहिसाब ।।

 

नित नी भरोइयां रैंदियाँ नदियां कदी ।

रक्खयो सम्हाली दोस्तों चढ़दा शबाब ।।

 

धुप्प छां सब वक्त दे ई खेल ने ।

गरीबियाँ नी रैंदियाँ नित नी नबाब ।।

 

अपणे पसीने पुर जिसजो विश्वास है ।

अध्धे अधूरे रैंहदे नी उसदे ख्वाब ।।

 

पढ़ी नी सकेया ओ बी चाला वक्त दा ।

उंगलियां प करदा रिया जेहड़ा हिसाब ।।

 

खरा नी हुन्दा अंहकरियां ने उलझणा ।

खरा नी दैणा हरेक गल्ला दा जबाब ।।

 

कुत्ते दी जात अप्पू पुच्छैणी जांदी ऐ ।

उसदे अग्गे सुट्टी ने दिक्खो कबाब ।।

 

माहणुए दे बिच्च माहणु पढ़णे दी ।

दर्द नी दुनिया च मिल्दी कोई किताब ।।

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित 
 

Wednesday, May 13, 2020

अनुवाद कार्यशाला : प्हाड़िया च काज़ी नज़रुल इस्लाम




काज़ी नज़रुल इस्लाम दिया कविता पर बहुभाषी अनुवाद दी राष्ट्रीय कार्यशाला

कवता दे अनुवाद पर होई इस कार्यशाला च हिमाचली भासा दे दो अनुवादक राजीव त्रिगर्ती कनै अशोक दर्द सामल होए। एह रपोट राजीव त्रिगर्ती होरां ई लिखी है। इन्हां नजरूल इस्लाम दिया विद्रोही कवता दे कुछ हिस्से अनुवाद भी कीत्यो। रपोटा कनै पहाड़िया च नजरूल इस्लाम जो भी पढ़ा।   


5 कने 6 मार्च 2020 जो काज़ी नज़रुल इस्लाम दिया कविता दे बहुभाषी अनुवाद जो लई ने इक्क राष्ट्रीय कार्यशाला दा आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालये दे आधुनिक भारतीय भाषा कने साहित्यिक अध्ययन विभागें कित्ता। इस कार्यशाला दा सौग्गी दा आयोजक था काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल दा सामाजिक कने साँस्कृतिक अध्ययन दा नज़रुल केन्द्र। इसा कार्यशाला दे व्यवस्थापक थे डा स्वाति गुहा (निदेशक, सामाजिक कने साँस्कृतिक अध्ययन दा नज़रुल केन्द्र, काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल), आधुनिक भारतीय भाषा कने साहित्यिक अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालये दे एसोसिएट प्रोफेसर डा अमिताव चक्रवर्ती कने इस विभागे दे ही सहायक आचार्य डा अग्निव घोष। बंगला भाषा दे क्रान्तिकारी कने कविता दे शीर्षके जो दिखदेआँ गलाया जाए ता इक्क विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम होरां दिआ इसा कविता दे अनुवादे ताएँ भारते दिआँ मतिआँ अठवीं अनुसूची दिञा ता अठवीं अनुसूची ते बाह्रलिआँ भाषां देञा अनुवादकाँ हेस्सा लेआ कने अनुवादे दे कम्मे जो अग्गे बधाणे ताएँ मतिआँ म्हीन गल्लाँ दी जानकारी अप्पु चिएंं बंडी। 

असाँ दे देशे च बोल्ली जाणे वाळिआँ असमी, अवधी, बघेली, भोजपुरी, बिष्णुप्रिया, चम्बयाली, डोगरी, हरयाणवी, काँगड़ी, करबी, कन्नड़, कश्मीरी, मैथिली, मराठी, मलयाळम, मणिपुरी, उड़िया, पंजाबी, राजबंशी, सान्ताली, संस्कृत, सिंधी, सिरैकी, तमिल, तेलुगु कने उर्दू दे अनुवादक इसा कार्यशाला च उपस्थित थे। 

काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल दा सामाजिक कने साँस्कृतिक अध्ययन दा नज़रुल केन्द्र नज़रुल इस्लाम देआँ सिद्धान्ताँ जो सामणे रखदेआँ होंया तिह्ना दे दार्शनिक पक्षे कने सामाजिक न्याय दे पक्षे जो तिह्ना दे साहित्यिक, कलात्मक कने सांस्कृतिक समझा दे माध्यमे ने सारेआँ दे सामणे रखणा है। इह्ना उद्देश्याँ जो ही अग्गें बधाणें ताएँ तिह्ना दिञा कविताँ दा पैह्लें देशे दिञा लाई-पाई सारिआँ भाषा च कने फिरी विदेशां दिञा मतिआँ सारिआँ भाषां च अनुवाद करी ने संसारे दिआ कूणा-कूणा बिच्च पजाणे दा इक्क तरीका है।

इस कार्यक्रमे दा उद्घाटन 5 मार्च, 2020 ध्याड़ी प्रो. साधन चक्रवर्ती, कुलपति, काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल होराँ दे हत्थें होया। कने अपणे प्रेरणरदायी उद्बोधने ने तिह्ना सारेआँ जो अपणिआँ योजनां दे बारे च दस्सेआ कने अनुवादे दे इस कम्मे दे बदिया होणे दी म्मीद कित्ती। डा जी राजगोपाल, अध्यक्ष, आधुनिक भारतीय भाषा कने साहित्यिक अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ने स्वागत भाषण दिंदेंआँ कवि नजरुल दे रूपे च कित्ती जाणे वाळिआ इसा पैह्ला जो होरनी भाषां ने जोड़ने दी भी गल्ल कित्ती जिसने भारते दी साहित्यिक विरासता जो भाषां दिआँ कंधां ते बाह्र कह्डेआ जाई सके। डा स्वाति गुहा कने डा अमिताव चक्रवर्ती होराँ इसा कार्यशाला दी रूपरेखा रक्खी। इस विभागे दे ही प्रो पी सी पटनायक दे धन्यवाद ज्ञापन ते परन्त एह् कार्यशाला शुरु होई।

पैह्ले सत्रे दी मुख्यातिथि थी प्रो जयन्ती चट्टोपाध्याय। अमिटी युनीवर्सिटी हरयाणा दे कला संकाय दे डीन प्रो उदय नारायण सिंह होरां बहुभाषी अनुवाद दी विषयवस्तु कने ओणे वाळिआँ मुश्कलाँ दे बारे च अपणे विचार कने सुझाव रक्खे। अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली दी प्रो राधा चक्रवर्ती विद्रोही कवि नज़रुल पर अपणे विचार रक्खे कने अनुवादे ताइएं सामणे रखिओ कविए दी कविता ‘‘विद्रोही’’ दा अनुवाद करदिआ बेल्ला ओणे वाळिआँ सामाजिक, सांस्कृतिक मुश्कलां दे बारे च दसदेआँ तिह्ना कविए दे समय दे सामाजिक कने भौगोलिक परिवेशे जो समझणे पर जोर दित्ता। बंगला ते अंग्रेेजिआ च अनुवाद करने वाळे कलकत्तें रैह्णे वाळे तमिलभाषी अनुवादक वी रामास्वामी होराँ अपणे अनुवाद दे अनुभव सारेआँ कने बंडे कने भरतीय परिवेश दा अंगेजिआ च अनुवाद करने पर ओणे वाळिआँ दिक्कताँ अनुवादकाँ ने बंडियां कने अपणे अनुवाद दे अनुभवां ने सारेआँ जो प्रेरित कित्ता।

भोजने परन्त चलणे वाळे दुए सत्रे च दिल्ली विश्वविद्यालये दे हिन्दी  विभाग ते डा सुधा सिंह ने हिन्दी अनुवादे दी समीक्षा करदेआँ भावानुवाद, शब्दानुवाद कने सन्दर्भानुवाद दे बारे द दसदेआँ सन्दर्भानुवाद जो अपनाणे पर जोर दित्ता। तिह्ना अपणे हिन्दी अनुवादे दे नमूने भी सामणे रक्खे। प्रो जयन्ती चट्टोपाध्याय अंग्रेजी अनुवाद दा विश्लेषण सामणे रक्खेआ। इस सत्र दी अध्यक्षता इस विभागे दे ही सेवानिवृत्त प्रो. टी एस सत्यनाथ होराँ कित्ती।

अशोक दर्द कनै राजीव त्रिगर्ती 
कार्यशाला दे दुएंं ध्याड़ें 6 मार्च, 2020 जो प्रो. पी सी पटनायक दिआ अध्यक्षता च इस विभागे दी ही सहायक प्राध्यापक डा रत्नोत्तमा दासें जेह्ड़ी इसा कविता दी असमिया अनुवादक भी हन, तिह्ना असमिया बंगला साम्य कने इह्ना दूंं भाषा पर संस्कृत दे प्रभावे जो प्रस्तुत करदिएंं अपणे अनुवादे दे नमूने भी कार्यशाला च रक्खे। बृजेश यादव (अवधी अनुवादक), स्रीपति तुडु (सान्ताली अनुवादक) कने डा जी राजगोपाल (तमिल अनुवादक) इह्ना भी अपणे विखर रखदेआँ अपणे अनुवादे दे नमूने भी सामणे रक्खे। दुए सत्रे च डोगरी अनुवादक मोहम्मद आरिफ़ कने कन्नड़ अनुवादक प्रो टी एस सत्यनाथ होराँ अपणे विचाराँ कने अनुवादे दे नमूने सारेआँ सामणे रक्खे।

भोजने ते परन्त चलणे वाळे त्रिए सत्रे च डा जी राजगोपाल होराँ दी अध्यक्षता च मलयालम अनुवादक प्रो ए जे थामस (अतिथि संपादक, भारतीय साहित्य, साहित्य अकादमी) होराँ भारतीय अनुवादां च संस्कृत भाषा दी महत्ता जो मनदेआँ संस्कृत दी भूमिका पर खरी चर्चा प्रस्तुत कित्ती कने अपणे मलयाळी अनुवाद दे नमूने भी प्रस्तुत कित्ते। इस सत्रे च ही गौरव पाण्डेय, जेह्ड़े बघेली अनुवादक थे, तिह्ना लुप्त होन्दिआ बघेलिआ जो बचाणे दी चिन्ता व्यक्त करदेआँ गलाया जे भारते च भाषा जो सैह् ही छड्डा दे जेह्ड़े पढ़ी-लिखी करी अपणे आप्पे जो आम माह्णुए ते लाह्दा समझणे दिआ गलत धारणा जो अपणें पल्लें बह्नी लेआ दे। मातृभाषा दा मूल रूप अज्ज भी किसानां-मजूराँ वाह्ली ही बचेआ जिस जो सम्हाळने दी जरूरत है। उड़िया अनुवादक प्रो. पी स पटनायक होराँ भी अपणा अनुवाद पढ़ेआ कने पश्चिमी बंगाल दे दार्जलिंग क्षेत्रे च नेपालिआ ते परन्त बोल्ली जाणे वाळी राजवंशी भाषा ने नृपेन बर्मन होरां अपने अनुवाद दे जरूरी पख सांझे कित्ते। उर्दू अनुवाद करने वाळी प्रो अंजुमन्द आरा अपणिआँ मुश्कलाँ दस्सिआँ कने अनुवादे जो मजेदार गलाया।

संझकणे कने अखीरले सत्रे च विभागे दे ही प्रोफेसर डा रवि प्रकाश टेकचंदानी होराँ अध्यक्षता कित्ती कने अपणे सिंधी अनुवाद दे नमूने कने अनुभव कार्यशाला च कठरोएआँ कने बंडे। दिल्ली दे रैहणे वाळे वरिष्ठ कवि श्री राजकुमार मल्लिक होराँ अपणी मातृभाषा सिरैकी च कित्तेओ अनुवाद दे नमूने प्रस्तुत कित्ते जेह्ड़ी अजकणे वेलें पाकिस्तान च बोल्ली जांदी है। बी एस राव होरां तेलुगु अनुवाद दे नमूने प्रस्तुत कित्ते।

समापन समारोह च अनुवादे पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाळे एच बालासुभ्रमण्यन होराँ अपणे अनुवाद लम्मे अनुवाद दे कम्मे दे अनुभव बंडे। मलयालम ते हिल्दिआ च कित्तेओ अनुवाद सारेआँ सामणे रक्खे कने प्रमाणपत्र देई अनुवादकाँ दा उत्साह बधाया। डा अमिताव चक्रवर्ती होरां सारेआँ विद्वान परोणेआँ कने अनुवादकाँ दा धन्यवाद ज्ञापन कित्ता।

दो दिन चलिआ इसा कार्यशाला च जिह्ना अनुवादकाँ अपणी हाजरी लगाई सैह् हन् असमिया अनुवादक डा रत्नोत्तमा दास, अवधी अनुवादक बृजेश यादव कने आशुतोष तिवारी,  बघेली दे गौरव पाण्डेय, भोजपुरी दे अतुल सिंह, बिष्णुप्रिया दे समरजीत सिन्हा, चम्बयाळी दे अशोक दर्द, डोगरी दे मोहम्मद आरिफ़, हरियाणवी दी पवित्रा कुमारी, काँगड़ी दे राजीव कुमार त्रिगर्ती, करबी दे लोंगबीर तेरंगा, कन्नड़ दे प्रो. टी एस सत्यनाथ, कश्मीरी दे आमिर क़यूम, मलयालम दे प्रो. ए जे थामस, मणिपुरी दे डा होमेन अहन्थम सिंह, उड़िया दे प्रो. पी सी पटनायक, पंजाबी दी अनुरूप कौर संधू, राजबंशी दे नृपेन बर्मन, सान्ताली दे स्रीपति तुड़ु, सिंधी दे डा. रवि प्रकाश टेकचंदानी, सिराइकी दे डा राजकुमार मलिक, तमिल दे प्रो. जी राजगोपाल, उर्द दी डा अंजुमन्द आरा, तेलुगु दे बी एस राव। इह्ना सारेआँ कार्यशाला च होणे वाळिआ चर्चा च हेस्सा लेआ कने अपणेआँ विचाराँ ने अपणा सहयोग भी दित्ता। कुल मलाई की दिक्खेआ जाए ता एह् कार्यशाला अपणेआँ मूल उद्देश्याँ जो पूरा करने च सफल होई।



विद्रोही 

बोल वीर
बोल उच्चा मेरा सिर !
मेरे सिरे दिक्खी हिमालये दी चूंड़ी होन्दी निह्ट्ठी
बोल वीर !
बोल महाविश्वे दा बड्ड़ा अम्बर फाड़ी
चन्द्रमे सूरजे ग्रह तारेआँ छड्ड़ी
भूलोक, द्युलोक दे गोलेआँ जो टप्पी,
रब्ब दे आसने आरसेच भोक्का पाई,
मैं उठी खड़ोता विश्व जणदिआ जो करी मता हैरान !
मेरे मत्थें चमकन रुद्र भगवान
जिह्ञा जित्ता दे टिक्के ने लिसके मेरा सिर !

बोल वीर
सदा उच्चा मेरा सिर!
मैं नी ओंदा कुसी दे काबू, हम्बेआ, डरौणा
महाप्रलय दा मैं नटराज, मैं झख-झाझां मैं नाश
मैं बड़ा डरौणा, मैं धरतिआ दा कलंक
मैं जकरिंड़ बड़ा
मैं भन्नी करां सब चूरा-भूरा
मैं तोड़ा नियमाँ अड़मन
मैं दरड़ा पैराँ हेठ सारे बह्नण सारेआँ नियमाँ-कनूनाँ दिआँ पालि़आँ
मैं नी मन्नाँ कुसी कनूने जो
मैं भरोइआँ किश्तिआँ पूरिआँ ड मैं तारपीड़ो, मैं बड्डी चमकदी पनडुब्बी 
मैं धूडू(धूर्जटि), मैं बेरित्ता बैशाख महीने दा झड़ है !
मैं विद्रोही, मैं विद्रोही पुत्तर जगजननिआ दा

बोल वीर !
सदा उच्चा मेरा सिर 
मैं झखराट, मैं घूमदी होआ
मेरिआ बत्ता जे भी ओए तिस्सेओ भन्ना-तोड़ां
मैं नचदा बेताल्ला छंद
मैं अपणिआ ताल्ला नचदा जान्दा, मैं मुक्त जीवने दा आनन्द !
मैं हम्वीर’, मैं छायानट, मैं झटारा
मैं चलायमान चंचल नचदा-कुददा 
बत्ता जांदा-जांदा अपणिआ चमका ने करदा हैरान
पीह्ंगा तिन्न झटारे दिंदा !
बिजलिआ दे लसाके साही झूटदा।
मैं सैह् ही करदा जेह्ड़ा चाह्न्दा मेरा मन
मैं अपणे विरोधिआँ जो पांदा झफ्फिआँ मौता ने मैं घळांदा पंजा
मैं उन्माद, मैं झखराट !
मैं महामारी मैं इसा धरतिआ दा डर 
मैं शासने जो कम्बान्दा, मैं खात्मा मैं तत्ता मैं सदा बकलोया 

बोल वीर
सदा उच्चा मेरा सिर !
मैं सदा लाह्दा, मैं अहंकारी 
मैं मैं नी दबोन्दा कुसी ते मेरे प्राणां दी प्याली हमेशा ही नशें भरोइओ
मैं होमे दी अग्नि, मैं अग्गी सोहेता जमदग्नि,
मैं यज्ञ, मैं परोह्त, मैं अग्ग,
मैं विधाता, मैं नाश, मैं बसदा घर, मैं समशान
मैं ही घरोणा, मैं ही सीरना
मैं इन्द्राणिआ दा पुत्तर चन्द्रमा हत्थें सूरज मत्थें
बांकी बैह्न्जे दी बंसरी मेरें इक्की हत्थें दुए हत्थें नरसिंगा
मैं नीलकंठ, मंथने दा विष पीत्तेआ, समुद्रे दी पीड़
मैं व्योमकेश, गंगोत्रिआ दिआ छुट्टिआ धारा जो धारण करदा

बोल वीर
सदा उच्चा मेरा सिर !
मैं संन्यासी, मैं वीर सिपाही
मैं टिक्का, हल्का गेरुआँ मेरा राजवेश
मैं वेदूइन, मैं चंगेज़,
मैं अप्पू जो छड्डी नी टेकदा कुसी जो मत्था
मैं बज्जर, मैं सर्वव्यापी ओंकार,
मैं इस्राफिले दे नरसिंगे दा जोरे दा गर्नत्त
मैं डमरू-त्रिशूल पिनाकपाणिए दा, मैं दण्ड धर्मराजे दा
मैं चक्कर कने महाशंख मैं प्रणवनाद प्रचण्ड
मैं पगलायां दुर्वासे विश्वामित्रे दा शिष्य
मैं बणे दिआ अग्गी दा सेक, फूकणा मैं जगत
मैं प्राणां परचेती हसदा, मस्तदा मैं जगबैरी महाखतरनाक
मैं महाप्रलये देआँ बाराँ आदित्ययां जो ग्रसणे वाला राहु
मैं कदी मता ही शान्त, कदी अशान्त पूरा आपमुहारा
मैं पक्के लाल खूने वाला गबरु मैं विधाता दे अहंकारे जो मकाणे वाला
मैं प्रभंजने दा सोआह्रा, मैं समुद्रे दी जोरे दी छेड़
मैं उज्जळ, मैं पवित्तर
मैं उछळदा पाणी छळ-छळ, मैं चलदिआँ लहराँ दे ढोह्लणे च झूटदा
मैं खुल्लेओ पराँदुए वाळी कोआरिआ दी गुत्त, बांकड़ियां हाक्खीं दी अग्ग
मैं सोह्ळुएं चढदिआ दे मने दे कमले साही सुच्चा प्यार, मैं धन्य 
मैं उदासिआ दा बेगोंआँ मन
मैं विधवा दे कलेजे दा डाडां मारदा साह् , मैं निराश, मैं निराशा भरेआ
मैं रस्ते च रुळेआँ बेघर राहिआँ दी पीड़
मैं बेइज्जते दे कळेजे दी चीह्क मैं भखेआ विष
मैं प्रेमिए दे लांछणां ने छातिआ दा बधेआ धड़का
मैं अभिमानी सदा रुस्सिओ दिले दी कातरता
मैं व्याकुल पीड़ चितचुम्बन चोरदे दी कम्बणी
मैं थर-थर कंबदिआ कोआरिआ दा पैह्ला दर्शन
मैं गुप्त प्यारिआ दी बचतक चाहना लुक्की की दिखदी लगातार
मैं अल्हड़ छोकरिआ दा प्यार मैं तिसा देआँ बंगा-कड़ेआँ दी छणकौण
मैं सदा ही निकाछुका, मैं सदा ही जुआनड़ू
मैं जोआन होइआ ग्रांएं दिआ बिट्टिआ दिआ चोलिआ दी पचलोइओ कनारी
मैं उत्तरे दी पौण, मलये दी होआ पूरबे दी उदास होआ
मैं रस्ते जांदे कविए दी डूह्गी रागिनी, मैं बंसरिआ ते निकलिओ तान
मैं तप्पणे दी व्याकल त्र्याह्, मैं अग्ग बह्रदा सूरज
मैं मरुस्थली छरूड़ुए दी छण-छण, मैं सैल्ली छाऊॅं छैळ
मैं परमानन्दे च नचदा-कुददा, जे एह् पागलपन ता मैं पगलाया !
मैं चाणचक्क अप्पु जो ही पछैणा दा, मेरे खुली गेओ सारे डक्क !

मैं गोह्न्दा, मैं लोह्न्दा, मैं अचेतन मने च चेतन
मैं दुनिया दे दरोआज्जे दी जित्ता दा सम्मानचिह्न, मैं माह्णुए दिआ जित्ता दा झंड़ा
मैं जान्दे पतझड़े साही स्वर्गे-धरतिआ दिआँ थ्याळियां ने चाटियां बजदा
बोरवाक् कने उच्चैश्रवा साही
अपणिआँ सवारिआँ जो छड़दा हिम्मता कन्ने नट्ठदा
मैं धरतिआ दिआ हिक्का पर अग्गी दा पहाड़
मैं बणे दी अग्ग, परलै मचांदी अग्ग
मैं पताळे दिआ अणबुझ अग्गी दे भळैंबे दी छेड़
मैं बिज्जा पर चढ़ी चलदा जोर ने चुटकियां बजान्दा
मैं संसारे दे दुखां बधान्दा चाणचक्क करांदा हिल्लण
नपदा वासुकिनागे दे फणे जो पाई ने झफ्फा
स्वर्गे दे जिव्राइले दे अग्ग बुळकदे सर्पे जो पकड़दा
मैं देवपुत्तर, मैं गाजळा
मैं डींगर, मैं दंदा ने फाड़दा धरती माता दी बुक्कळ
मैं ओर्फिउसे दी बंसरी
महासागरे दी परतोंदी ओंदी डोळ
निन्दरा च पुक्कु लई दिंदा पूरी दुनिया जो शान्ति
मेरिआ बंसरिआ दी तान जांदी दूरे तिकर
मैं श्यामे दे हत्थे दी बंसरी
मैं क्रोधे च उठदा जाह्लु नह्ठदा महा-अम्बरे ते परे
डरोणेआँ सत्तां अम्बरां जो छड्ड़ी ताह्लु नरक भी जान्दे कम्बी
मैं सत्तां बक्खां पजान्दा विद्रोह
मैं सौण म्हीने दी ढै-डोळ रढाह्न्दा वणा
कदी धरती जो करदा रंग-बरंगी कदी पूरिआँ ही मकान्दा फसलां
मैं खोई अणदा विष्णुए दिआ हिक्का उपरे ते दूंह् कन्यां
मैं अन्याय, मैं उल्का, मैं शनिच्चर
मैं धूमकेतुए दी ज्वाला, खड़पे दा काळा फण
मैं छिन्नमस्तका चण्डी, मैं युद्धे च करदी सर्वनाश
मैं नरके दिआ अग्गी पर बैट्ठी हसदा फुल्लां साही !
मैं मृत्युरूप, मैं चित्तरूप
मैं अजर-अमर अविनाशी, मैं नी घटदा
मैं माह्णुआँ दानवां देवतेआँ दा भय,
दुनिया च मैं नी जतोआँ कुसी ते,
मैं जगदीश्वर ईश्वर, मैं पुरूषोत्तमे दा सच्च
मैं ता-थैया ता-थैया नचदा फिरदा स्वर्ग नरक मत्र्यलोक
मैं उन्माद, हांं मैं उन्माद
मैं पछैणदा अप्पु जो, अज्ज खुली गेओ मेरे सारे कस्स
मैं परशुरामे दा निग्गर कोहाडू
संसार करदा क्षत्रिआँ ते खाल्ली, शान्ति अणनी संठुंई
मैं बलरामे दे मुह्न्ड़े पर रखेआ हळ
मैं घोआरी सटणा गुलामिआ दा संसार नोइआँ सृष्टिआ दिआ अतिखुशिआ च ।
महाविद्रोही, लड़ाइआ दा थकेआ
मैं होणा शान्त तधैड़ी ही,
जाह्लु दब्बेओ-चिह्ल्लेओ दी डाड़ अम्बरे च होआ च नी सुमगी
निर्दयिये दी खड्ग-करपाणा दी छेड़ रणभूमिआ च नी होंगी
विद्रोही लड़ाइआ च थकेआ
मैं होणा शान्त तधैड़ी ही
मैं विद्रोही भृगु भगवाने दिआ हिक्का पर पैरां दे नशाण बणान्दा
मैं स्रष्टे जो मकाणे वाला दुख तकलीफ मकाई , बैह्मे दे परमात्मे दिआ हिक्का भनदा
मैं विद्रोही भृगु भगवाने दिआ हिक्का पर पैरां दे नशाण बणान्दा
मैं बैह्मे दे परमात्मे दिआ हिक्का भनदा !

मैं सदा ते ही विद्रोही वीर
पूरे संसारे जो थल्लें छड्ड़ी किह्ला ही चुकदा सदा उच्चा सिर!