पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Wednesday, July 29, 2026

शब्दकोश : पुस्तक चर्चा

 


अज पेश है मंडयाली शब्दकोश पर अशोक दर्द दी समीक्षा। पैह्लें पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च 


लोकभाषा बचाणे दी दिशा च प्रशंसा दे काबिल कोशिश -मंडियाली शब्दकोश

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मेरेयां हत्थां च पकड़ी कताब मंडयाली शब्दकोश जो पढ़दे होए सारेयां छा पैह्ले मां बोली मंडियाली खातर लेखिका वास्ते कृष्ण चंद्र महादेविया दे शुभकामना संदेश दियां एह् पंक्तियां दिक्खा -"जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

उसदे बाद डॉक्टर गंगाराम राजी देयां शब्दां च - "शब्दकोश शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को यह मददगार भी साबित होता है ।अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।

अग्गे लिक्खदे ने - "आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं । आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

 इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

 शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथी कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं ।"

मंडियाली शब्दकोश कताबा दे पैहले हिस्से च 'आंग' शब्द यानी एक संख्या जो लेई करी इकानवें पृष्ठ दे आखरी शब्द 'त्रेखड़ा' यानी त्रैं लोकां दा समूह तक लगभग तिन्न छा साढ़े तिन्न हजार शब्द हिंदी अर्थ समेत दर्ज हन्न।

इनां संकलित शब्दां दी खूबसूरती या विशेषता गलाई लियो के एह् शब्द लोकजीवने दे केईयां पहलुआं ई दर्शांदे लोकभाषा दे एह् शब्द जेहड़े या ता विलुप्त होई गे या विलुप्त हौणे दे कगार पुर हन्न। उदाहरण वास्ते एह् शब्द दिक्खे जाई सकदे हन्न, जियां- कन्वाला यानी लकड़िया दी ओ बड्डी परात जिसा च आट्टा गुन्नेया जांदा था।

अज्ज धातु दियां परातां आई जाणे कन्ने एह् लकड़िया दे बर्तन रसोई घरां छा गायब होई गे हन्न अते कन्ने ई शब्द बी लोकभाषा छा गायब होई गे। नौइयां पीढ़िया वास्ते एह् शब्द अबूझ हन्न।

उदाहरण वास्ते दुआ शब्द ऐ 'आगल' यानी पालकी जो लग्गे दे डंडे जिनां ई कहार चुकदे हन्न। आज्ज मोटरां दे युगे च पालकी लोकजीवन छा गायब होई जा दी अते कन्ने ई लोकभाषा दा एह् शब्द बी।

ईयां ई लोकजीवने छा विलुप्त हुंदे संस्कारां दे शब्द हौन्न या औजारां दे, बर्तनां दे हौन्न या व्यवहार दे, प्रकृति दे उपादानां दे हौन्न या के बदलोंदे मौसमां दे, मानव- स्वभाव, बोली -वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक उपयोग, कपड़े लत्ते, गैहणे वंदे इत्यादि ताईं उपयोग च आणे आल़े शब्द जेहड़े - जेहड़े बी लेखिका दे ज़हन छा गुजरे हन्न या जिनां शब्दां कन्ने लोकजीवन दी पारखी लेखिका दा अपणे बचपन छा लेई करी हूणे तक परिचय रिया ऐ उनां ई लेखिका ने बड़ी संजीदगी अते सलीके ने इस शब्दकोश दी कताबा च संचित करी लिया ऐ।

कताबा दे अगले हिस्से च पृष्ठ संख्या 92 छा लेई करी 143 तक 1045 मंडियाली मुहावरे अते लोकोक्तियां हिंदी अर्थ कन्ने दर्ज हन्न।

किच्छ उदाहरण दिक्खा -"अंधेयां ते खूह लंघाणे" -यानी कोई जेहड़ा काम्म नी करी सकदा ओ करवाणा।

"अणजाण विद्या खायै पराण " -यानी जेहड़ा काम्म नी आंदा ओ नी करणा चैच्दा।

"किच्छ गाई रा किच्छ बाई रा " -यानी मिल्या जुल्या।

"घींघे घोल़े " -यानी लड़ाई झगड़ा।

"गल़ा गुट्ठा दैणा" -यानी अति करणी।

ईयां मते सारे मुहावरे ते लोकोक्तियां जेहड़े लोकजीवन च बरते जांदे हन्न लेखिका ने इकट्ठे करणे दा इक्क ऐतिहासिक प्रयास कित्ता ऐ।

कताबा दे आखरी हिस्से च पृष्ठ संख्या 144 छा 170 तक "मंडी दे सांस्कृतिक परिवेश च शब्दां दी भूमिका"  दे तहत लगभग 448 शब्दां ई इकट्ठा कित्ता ऐ।

उदाहरण दिक्खा - "पंजणी देणी" यानी बेटी दी विदाई।

"चोगा" यानी दूल्हे ई पुआई जाणे आल़ी पोशाक (शेरवानी साई)

शेरवानी दे युग च हूण चोगा भी नी रिया ते चोगा शब्द बी।

"बिंदु" -यानी जन्मदिन पुर हलवा या मिठाई बगैरह रिश्तदारां ई दैणे ई बिंदु गलांदे।

लोकजीवन च लोकभाषा दा अपणा महत्व हुंदा ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक-संस्कृति, लोक-सभ्यता, अते सदियां छा चला करदे लोकाचारां अते लोक विश्वासां दी पुच्छैण करांदी ऐ।

लोकभाषा लोकजीवन दी धरोहर अते पूंजी हुंदी ऐ। 170 पृष्ठां दे कलेवर च सजी दी एह् कताब लोकजीवन दे केइयां शब्दां ई सहेजदी लोक वास्ते इक्क खूबसूरत उपहार ऐ।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जेहड़ा इस शब्द धरोहर ई कताबा दे रूपे च सहेजणे - संभाल़णे दा ऐतिहासिक अते प्रशंसा जोग काम्म कित्ता ऐ इनी आणे आल़ियां पीढ़ियां वास्ते प्रकाश स्तंभ दा काम्म करणा, मेरा ऐसा मन्नणा ऐ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका दे मुताबिक - "यह बोली (मंडयाली ) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की और अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है ।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं । यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है । व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था । अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।"

आखिर च इस खूबसूरत कताबा वास्ते लेखिका जो मतियां मतियां शुभकामनां अते बधाईयां।

निसंदेह एह् कताब भावी पीढ़ियां दी धरोहर ऐ अते लोकभाषा अते लोकजीवन दे शोधार्थियां ते पाठकां वास्ते प्रकाश स्तंभ।

आशावादी हां, इसा कताबा च पाठकां अते शोधार्थियां च अपणी जगह अप्पू बणाणे दा सामर्थ्य ऐ।



लोकभाषा को बचाने की दिशा में श्लाघ्य प्रयास: मंड्याली शब्दकोश

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हस्तगत पुस्तक मंडयाली शब्दकोश को पढ़ते हुए सबसे पहले मां भाषा मंड्याली से लेखिका के लिए शुभकामना संदेश की ये पंक्तियां -बकौल आदरणीय कृष्ण चंद्र महादेविया- "जैसे माता का दूध बच्चों के तन और मन का सुंदर पालन पोषण करता है वैसे ही भाषा भी बच्चों के मन का मस्तिष्क का भावना व संवेदना का पालन पोषण करती है। यह भी कह सकते हैं कि मां अपनी मां भाषा अपने दूध में मिलाकर अपने बच्चों को पिलाती है।"

तत्पश्चात डॉ गंगाराम राजी के शब्दों में- शब्दकोष तो शब्दों का एटीएम होता है जिसमें एक भाषा भाषी समुदाय में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को संचित किया गया होता है ताकि पाठक किसी भी समय शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर सके। शब्दकोश में शब्दों और उनके अर्थों की वर्णन अनुक्रमांक सूची रहती है जिससे पाठक को शब्द को समझने की सुविधा तो रहती ही है शब्दों की बेहतर समझ प्राप्त करने के लिए उपयोगकर्ताओं को मददगार भी साबित होता है। अतः कह सकते हैं एक संदर्भ पुस्तक जिसमें शब्दों की वर्णमाला सूची रहती है शब्दों की जानकारी होती है।"

आगे लिखते हैं आधुनिक युग में ग्लोबल संचार व्यवस्था के चलते सभी प्रांतों की स्थानीय बोली के शब्द विलुप्त होते जा रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी अपने आसपास की बोली जाने वाली भाषा को छोड़ती जा रही है।

इस प्रक्रिया में बच्चों के माता-पिता भी भागीदारी निभा रहे हैं। एक समय यह भी आ सकता है कि स्थानीय बोली के बोले जाने वाले शब्दों की पहचान करना भी मुश्किल हो जाएगा। इस शब्दकोश में लेखिका ने शब्दों का अर्थ हिंदी भाषा में लिखकर लुप्त होते शब्दों को स्थान देकर पाठकों व शोधकर्ताओं का रास्ता सुगम कर दिया है।

शब्दों को संजीवनी का संचार देकर एक भागीरथ कार्य किया है, इसके लिए लेखिका बधाई की पात्र हैं । 

इस मांड्याली शब्दकोश पुस्तक के प्रथम भाग में  "आंग" यानी एक संख्या लेकर इकानवे पृष्ठ के अंतिम शब्द "त्रेखड़ा" यानी तीन लोगों का समूह तक लगभग तीन से साढ़े तीन हजार शब्द हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

इन संकलित शब्दों की खूबसूरती या विशेषता कह लीजिए कि ये शब्द जीवन के विविध आयामों को इंगित करते स्थानीय बोली के वे शब्द हैं जो या तो विलुप्त हो गए हैं या लोकजीवन से विलुप्त होने के कगार पर हैं।

उदाहरण के लिए ये शब्द देखे जा सकते हैं जैसे- कन्वाला अर्थात लकड़ी की वह बड़ी परात जिसमें आटा गूंथा जाता था।

आज धातु की परातें आ जाने के बाद ये लकड़ी के बर्तन रसोई घरों से गायब हो गए हैं साथ ही शब्द भी विलुप्त हो गए हैं। नई पीढ़ी के लिए यह शब्द अबूझ है।

उदाहरण के लिए दूसरा शब्द "आगल" अर्थात पालकी को लगे डंडे जिन्हें कहार उठाते हैं, आज गाड़ियों के युग में पालकी लोग जीवन से गायब होती जा रही है और साथ ही शब्द भी।

इस तरह लोकजीवन से विलुप्त होते संस्कारों के शब्द हों या औजारों केबर्तनों के हों या व्यवहार के, प्रकृति के विभिन्न उपादानों के शब्द हों या मौसमों के बदलने के, मानव स्वभाव, बोली-वाणी, कार्य-व्यापार, दैनिक-प्रयोग, वस्त्रों-आभूषणों के लिए प्रयुक्त शब्द, जो जो शब्द लेखिका के जहन से गुजरे हैं या जिन शब्दों के साथ लोक जीवन की पारखी लेखिका का अपने बचपन से लेकर अब तक परिचय रहा है उन्हें लेखिका ने बड़ी संजीदगी व सलीके से इस शब्दकोश की पुस्तक में संचित कर लिया है।

पुस्तक के अगले भाग में पृष्ठ संख्या 92 से लेकर 143 पृष्ठ तक लगभग 52 पृष्ठों में 1045  मंडियाली मुहावरों व लोकोक्तियों (कहावतों) का संचयन किया है। ये मुहावरे व लोकोक्तियां भी हिंदी अर्थ के साथ दर्ज हैं।

कुछ उदाहरण देखिए- "अन्धेया थे खूह लंघाणे" अर्थात् जो सक्षम न हो उससे काम करवाना।

"अणजाण विद्या खाए पराण" अर्थात् जो काम नहीं आता वह नहीं करना चाहिए।

"कुछ गाई रा कुछ बाई रा" अर्थात् मिला जुला।

"घींघे घोल़े" अर्थात् लड़ाई झगड़ा ।

"गल़ा गुट्ठा देणा" अर्थात् अति करना।

इस तरह बहुत सी लोकोक्तियां व मुहावरे जो लोक जीवन में प्रयुक्त होते हैं, लेखिका ने उन्हें संचित करने का श्लाघ्य प्रयास किया है।

अंतिम भाग में पृष्ठ संख्या 144 से 170 तक "मंडी के सांस्कृतिक परिवेश में शब्दों की भूमिका" के अंतर्गत लगभग 448 शब्दों का संचयन किया है।

उदाहरण देखिए -"पंजणी देणी" अर्थात् बेटी की विदाई।

"चोगा" अर्थात यह दूल्हे को पहनाया जाता था जो शेरवानी की तरह का होता है।

शेरवानी के युग में अब चोगा शब्द विलुप्त होने के कगार पर है।

"बिंदु" अर्थात जन्मदिन पर हलवा या मिठाई आदि सबंधियों को देने को बिंदु कहते हैं।

लोक जीवन में लोकभाषा का अपना महत्व होता है ।

लोकभाषा लोकजीवन, लोक संस्कृति, लोक सभ्यता और सदियों से चले आ रहे लोकाचार लोक विश्वास की परिचायक होती है ।

लोक भाषा लोकजीवन की धरोहर होती है। 170 पृष्ठों के कलेवर में सजी यह पुस्तक लोकजीवन के विभिन्न शब्दों को सहेजती खूबसूरत धरोहर है।

लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा ने जो इस शब्द धरोहर को पुस्तक के रूप में सहेजने का ऐतिहासिक एवं श्लाघनीय कार्य किया है। यह पुस्तक भावी पीढ़ियों के लिए लोकजीवन के विविध आयामी अध्ययन के लिए प्रकाश स्तंभ का कार्य करेगी ।

स्वयं मंड्याली शब्दकोश लेखिका के अनुसार - यह बोली (मंडयाली) मिठास लिए हुए असंख्य शब्दों से समृद्ध है। जो शब्द इसमें हैं उनका पर्याय हमें हिंदी में भी नहीं मिलता।

समय परिवर्तन के साथ यह भाषा (बोली) विलुप्त होने की ओर अग्रसर है जो एक चिंता का विषय है।

इसी कारण इसे समझने के लिए शब्दों का संचयन अत्यंत आवश्यक था। इसी से प्रेरित होकर मैंने कई वर्षों से शब्द संचयन का यह प्रयास शुरू किया जो आज शब्दकोश के रूप में आप सबके समक्ष है, यद्यपि यह पूर्ण नहीं है किंतु मेरा प्रयत्न रहेगा कि मैं इस कार्य को अनवरत जारी रखूं। यद्यपि यह मानकों के अनुसार नहीं बना है पर मां बोली का संचयन ही इसका प्रमुख उद्देश्य है। व्याकरण के नियमों के अनुसार इसकी रचना नहीं की जा सकी है। क्योंकि यह एक दुस्तर कार्य था। अतः गौ माता के कच्चे दूध की भांति यह आपके समक्ष है आप जो चाहे वह मिष्ठान बना लें।

अंत में, इस खूबसूरत पुस्तक मांड्याली शब्दकोश के लिए लेखिका आदरणीय रूपेश्वरी शर्मा जी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई। नि:संदेह यह पुस्तक भावी पीढ़ियों की धरोहर है तथा लोकभाषा व लोकजीवन के अध्येताओं के लिए एक प्रकाश पुंज भी। आशावादी हूं  प्रबुद्ध पाठकों व शोधार्थियों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान स्वयं बना लेगी।

समीक्ष्य कृति: मंड्याली शब्दकोश

संचयन: रूपेश्वरी शर्मा पुरानी मंडी , मंडी, हिमाचल प्रदेश 

कुल पृष्ठ : 170 कुल मूल्य ₹400 प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन c- 515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी नई दिल्ली- 110012

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित 

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