बिलासपुर लेखक संघ 1996 च बणया। तिसते परंत एह् लगातार लेखकां जो जोड़ने कनै पढ़ने लिखणे दी संस्कृति बणाणे दे कम्मे च लगेया है। इस साल इन्हां इक पहाड़ी कविता संकलन हिम वाग्धारा प्रकाशित कीती है। इसा कताबा दे संकलनकर्ता रवींद्र कुमार शर्मा हन। अज पढ़ा इसा कताबा पर अनूप सेठी दी समीक्षा पहाड़ी हिन्दी दूंई भाषां च। कन्नै ही रवींद्र कुमार शर्मा दी संघ दे कम्मां पर इक टिप्पणी भी है।
सोचणे वचारणे दी प्रेरणा देणे आळी कताब
हिम
वाग्धारा पहाड़ी कवता दा इक साझा संकलन है। एह् बिलासपुर लेखक संघें छापेया है। इस
च पैंती कवियां दियां तकरीबन डेढ़सौ कवतां हन। एह् सारे ही कवि बिलासपुर लेखक संघ
नै जुड़ेयो हन।
इसा कताबा
च असां जो पहाड़ी कवता दे सौगी कवता, लोक,
संस्कृति वगैरा दे बारे च सोच-वचार करने दे कई मुद्दे मिलदे हन। एह्
इसा कताबा दी इक खूबी है।
अजकणे
बग्तैं लेखक संघ औह्लैं होई गेयो हन। सैह् कदी-कदाएं गोष्ठियां संगोष्ठियां ता
कराई लैंदे हन, कताबां छापणे दी जिम्मेदारी लेखक संघ नीं लैंदे। हिन्दिया च सहकारी
प्रकाशन दी कोसस होई थी पर कामयाब नीं रही। बिलासुपर लेखक संघे दी एह् बड़ी खरी
पैह्ल है। एह् कम्म पहाड़ी भाषा ताईं होया है, एह्
होर भी महत्वपूर्ण है।पहाड़ी भाषा दा साहित्य हाली संगरोआ दा है। इसयो बाल लाणे दी
जरूरत है। कवता छापणे दा मंच प्रदान करना अपणे आप च ही इक बड्डा सहयोग है। अजकला
लेखक अपणियां कताबां अप्पू ही छापदे या प्रकाशके जो पैसे दयी नै छपांदे। देह् देह्
महौले च लेखक संघे दा एह् कदम सराहणेजोग है।
इस संकलने दे कवि लग-लग पेशयां नै जुड़ेयो हन। इन्हां च मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अफसर, शिक्षाविद्, बैंकर, फौजी, फौजी अफसर, लग-लग विषयां दे अध्यापक-प्राध्यापक शामल हन। हिन्दी भाषा साहित्य पढ़ाणे आळे तां हन ही हन। लग-लग पेशयां च कम्म करने आळे कवियां दे जीवन अनुभव भी लग-लग होणे। तिन्हां दे एह् अनुभव तिन्हां दिया कवतां च कुस तरीके नै औआ दे, इह्दी पड़ताळ मजेदार होणी है। क्या इन्हां दी कवता पहाड़िया दी मौजूदा कवता च कुछ नौंए आयाम जोड़ा दी है या बणिया बणाइया लीका पर ही चल्ला दी है।
संरूकृत दे
विद्वान डाक्टर लेखराम शर्मा होरां अपणे ‘श्रद्धा
सुमन’ च कविता दियां कुछ कसौटियां दस्सियां हन कनै रचनां जो
परखणे दी जिम्मेदारी समझदार पाठकां दे जिम्मै लाह्इयो है। तिन्हां दे वक्तव्य ते
कुछ गल्लां ध्यान खिंजणे आळियां हन-
साहित्य
संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:
भर्तृहरि
दे नीतिशतक दे इस श्लोके दा मतलब है-
जिस माह्णुए
गैं साहित्य, संगीत कनै कला नीं हुंदी,
सैह् साछात ऐसा जनौर हुंदा है जिसयो न पूछ लगियो हुंदी न सिंग।
एह् श्लोक
आचार्य मम्मट दे मशहूर ग्रंथ ‘काव्यप्रकाश’
चा ते है।
इह्दा मतलब है भई कविता लिखणे ताईं एह् चीजां चाहिदियां- शक्ति, निपुणता, लोक व्योहार, शास्त्र, काव्यां दा अध्ययन, काव्य जाणने आळेयां ते शिक्षा लैणा कने काव्य रचना करने दा अभ्यास करना।
डॉ. शर्मा होरां कालिदासे दे हवाले नै एह् भी गलाया है भई इन्हां रचना दा मूल्यांकन समझदार पाठक ही करी सकदे। एह् त्रैहो बिंदु बड़े जरूरी हन। समाज च कला साहित्य दी जरूरत सदा ही रैह्णी है। समाज दे बिच्च भावक या सहृदय होणा इ चाहिदे। इसी तरीके नै काव्य रचना करने दे जेह्ड़े कारक या शर्तां तिन्हां ‘काव्यप्रकाश’ ते गणाइयां, तिन्हां दा भी बड़ा महत्व है। कविये जो निपुण होणा ही पौणा है, तिह्जो लोक कनै शास्त्र दा ज्ञान भी होणा चाहिदा, सैह् काव्य दी पढ़ाई करदा होऐ मतलब तिह्जो अपणी काव्य परंपरा दा ज्ञान होऐ, तिनी कविता लिखणा सिक्खेया होए कनै सैह् कविता लिखणे दा अभ्यास भी करदा होऐ। कविता लिखणे दियां एह् कसौटियां या शर्तां असान नीं हन। असां चा ते मते सारे कवि शौकिया कवता लिखदे। इस करी नै शायद एह् कसौटियां पचौह्लैं रही जांदियां होण। असां मंझ ऐसे भी रचनाकार हन, जेह्ड़े पूरिया गंभीरता नै रचनाकर्म च रुज्झयो रैंह्दे। बग्ते दिया छाणनिया ही इन्हां सारेयां दे योगदान नै न्याय करना है।
फिलहाल असां ताईं एह्
जरूरी है भई असां दिया भाषा च लोक लिखा दे हन। कनै तिसयो प्रकाश च ल्यौणे दे
सामूहिक प्रयास होआ दे। एह् सब किछ ऐसे समय च होआ दा है, जिस
समय च भाषा-विमर्श कनै कला कर्म कई किस्मां दे बोझां हेठ दबोया है। भाषा अपणिया
अस्मिता दी लड़ाई लड़ा दी है। तिसा दा एकीकरण नीं, विखंडन
होआ दा है। जिंदगिया च कला संस्कृति दे नायें पर बड़ी भारी चकाचौंध नै लशकारयां मारदी होड़
लगियो है। तिस बिच असां दा ‘लोक’ अपणी
पछाण बचाणे कनै दसणे दिया होड़ा च हफ्फी-हफ्फी जा दा है। असां दिया भाषा दी कविता पचांह् छुटदे जा दे कनै इह्दे बदलोंदे जा दे इस ‘लोक’ जो पकड़ने दी कोशश करदी बझोआ दी है। इसा शिनाख्ता च सैह् सारे साझे अतीत
जो थम्मी रखणा चाह् दी है, कनै वर्तमान जो नकारदी चलदी है। कनै
एह् सब कुछ कविता दे स्टीरियो टाइप साह्यी हुंदा है। असां जो कविता च जीवन अनुभव
ते निकळयो महीन काव्य संसार दी निहाळप है। 
सुरु च मैं जिकर कीता था भई इस संकलने च शामिल कवियां चा ते कइयां हिंदिया च पीएचडी कीतियो है। हुण एह् गल मैं तां छेड़ी कैंह् कि पहाड़ी भाषा दी वर्तनी दा मानकीकरण करना बड़ा जरूरी है। दूई गल एह् भई असां दिया भाषा दे कई लफ्जां दी ध्वनि देवनागरी लिपि च सटीक तरीके नैं नीं लखोंदी। इस करी नै ऐसियां ध्वनियां ताईं कुछ खास चिह्न या नशाण बणाणा चाहिदे। कुछ दिन पैह्लें कुल्लुवी भाषा ताईं यतिन पंडित होरां चर्चा छेड़ी थी। लफ्जां दी वर्तनी दे मानकीकरण ताईं असां दे एह् विद्वान कवि बड़ा योगदान देयी सकदे। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे च योजना बणाई नै कम्म शुरु कराई सकदा। असां अपणिया भाषा दे लफ्जां जो अपणी जानकारी, समझ कनै अपणे इलाके दे उच्चारण दे स्हाबे नै लिखदे। इस करी नै वर्तनी बखरी-बखरी होई जांदी। इसा जो इक्को जेह्या बणाणे ताईं विद्वानां जो मेहनत करना पौणी है।
इस संकलने दी भूमिका कनै कवि परिचय हिन्दिया च दित्तेया है। खबरै इस दे पिच्छैं एह् सोच होणी भई हिन्दिया दिया वजह नै पहाड़ी कवियां जो बड्डे फलक पर पेश कीता जाई सकै। पहाड़ी भाषा दे प्रेमी चांह्गे भई कवियां जो पहाड़ी भाषा च ही पेश कीता जाऐ। कवि परिचय बारे इक गल होर नी समझ आई भई कुछ कवियां दा परिचय बड़े विस्तार नै दित्तेया कनै कुछ कवियां दे सिर्फ नां ही हन। हालांकि इस संकलन दे जादातर कवि काफी टैमे ते लिखा दे हन कनै तिन्हां दियां कई कताबां भी छपियां हन।
सोचने विचारने की प्रेरणा देने वाली किताब
हिम
वाग्धारा पहाड़ी कविता का एक साझा काव्य संकलन है। इसे बिलासपुर लेखक संघ ने
प्रकाशित किया है। इसमें पैंतीस कवियों की करीब डेढ़ सौ कविताएं हैं। ये सभी कवि
बिलासपुर लेखक संघ से जुड़े हैं।
इस संकलन
से हमें पहाड़ी कविता के साथ साथ कविता, लोक,
संस्कृति आदि के बारे में सोच-विचार करने के कई मुद्दे मिलते हैं।
यह पुस्तक की एक खूबी है।
आज के दौर
में लेखक संघ ओझल से हो गए हैं। उनके परचम तले गाहे-बगाहे गोष्ठियां संगोष्ठियां
हो जाती हैं। पुस्तक प्रकाशन की जिम्मेदारी लेखक संघ नहीं उठाते। एक जमाने में
हिन्दी में सहकारी प्रकाशन की कोशिश हुई पर सफल नहीं रही। बिलासपुर लेखक संघ की यह
एक स्वागतयोग्य पहल है। और यह काम पहाड़ी भाषा के लिए हुआ है, यह और भी महत्वपूर्ण है। पहाड़ी भाषा का साहित्य अभी विकास के
रास्ते पर है। इसे तरह-तरह के समर्थन-सहयोग की जरूरत है। कविता के प्रकाशन का मंच
प्रदान करना अपने आप में बड़ा सहयोग है। आजकल लेखक प्राय: खुद ही अपनी पुस्तकें
प्रकाशित करते हैं या प्रकाशक को पैसा देकर छपवाते हैं। ऐसे माहौल में लेखक संघ का
यह कदम सराहनीय है।
इस संकलन में शामिल कवि अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हैं। इसमें मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद्, बैंकर, सेनानी, विज्ञान गणित विषयों के अध्यापक-प्राध्यापक शामिल हैं ; हिन्दी भाषा साहित्य के अध्यापक-प्राध्यापक तो हैं ही। विविध क्षेत्रों के कवियों के जीवन अनुभव में भी विविधता होगी। यह जानना दिलचस्प होगा कि जीवन अनुभवों की यह विविधता उनकी कविता में कितनी और किस तरह से आई है। क्या यह कविता पहाड़ी कविता के मौजूदा ढांचे में कुछ नए आयाम जोड़ रही है या बनी बनाई लीक का अनुसरण कर रही है।
संस्कृत के
विद्वान डॉक्टर लेखराम शर्मा ने अपने ‘श्रद्धासुमन’
में काव्य के कुछ निकष प्रस्तुत किए हैं और रचनाओं के आकलन की
जिम्मेदारी सुधी पाठकों को सौंपी है। उनके वक्तव्य में से कुछ बातों को रेखांकित
किया जाना चाहिए –
साहित्य
संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:
भर्तृहरि के
नीतिशतक के इस उद्धरण का अर्थ है-
जो मनुष्य
साहित्य, संगीत और कला से रहित होता है, वह साक्षात् एक ऐसे पशु के समान है जिसके न तो पूँछ है और न ही सींग।
यह श्लोक
आचार्य मम्मट के प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यप्रकाश'
का है। इसका अर्थ है शक्ति, निपुणता, लोक व्यवहार, शास्त्र, और
काव्यों का अध्ययन, काव्यज्ञों से शिक्षा व अभ्यास काव्य
रचना के कारण हैं।
डॉ. शर्मा ने कालिदास के हवाले से यह भी कहा है कि इन
रचनाओं का मूल्यांकन सुधी पाठक ही कर सकते हैं। ये तीनों ही बिंदु महत्वपूर्ण हैं।
समाज में कला साहित्य की आवश्यकता हमेशा रहेगी। समाज में भावक या सहृदय होने ही
चाहिए। इसी तरह काव्य रचना के कारकों का भी अत्यंत महत्व है। कवि को निपुण होना
होगा, उसे लोक और शास्त्र का ज्ञान हो, वह काव्य का अध्ययन करता हो यानी उसे अपनी भाषा की
काव्य परंपरा का ज्ञान हो, उसने काव्य रचना की
शिक्षा ली हो और काव्य लिखने का पर्याप्त अभ्यास उसे हो। काव्य रचना के ये निकष
कठिन हैं।
हम में से बहुत से कवि शौकिया कविता लिखते हैं। इसलिए ये निकष शायद नजरअंदाज भी हो जाते होंगे। हमारे बीच ऐसे भी रचनाकार हैं जो निश्चित ही गंभीरता से रचनाकर्म में निबद्ध हैं। समय की छलनी ही इन सबके योगदान के साथ न्याय करेगी। फिलहाल हमारे लिए यह मूहत्वपूर्ण है कि हमारी भाषा में लिखा जा रहा है। और उसे प्रकाश में लाने के सामूहिक प्रयास हो रहे हैं। यह सब ऐसे समय में घटित हो रहा है जब भाषा-विमर्श और कला-कर्म कई तरह के दबाव झेल रहा है। भाषा अपनी अस्मिताओं की लड़ाई लड़ रही है। उसका एकीकरण नहीं, विखंडन हो रहा है। जीवन में कला और संस्कृति के नाम पर बेहद तेज चकाचौंध भरी होड़ है। उसके बीच हमारा ‘लोक’ अपनी पहचान बचाने और दिखाने की दौड़ में हांफ रहा है। हमारी भाषा की कविता इस ‘लोक’ के पीछे छूटते जाते और बदलते हुए रूप-स्वरूप को पकड़ने की कोशिश कर रही प्रतीत होती है। इस शिनाख्त में वह सारे साझे अतीत को थामे रहना चाहती है, वर्तमान को नकारती चलती है। और यह सब काव्य के स्टीरियो टाइप की तरह होता है। हमें कविता में जीवन अनुभवों पर आधारित महीन काव्य संसार का इंतजार है।
शुरू में मैंने जिक्र किया है कि इस संकलन में शामिल कवियों में से कई हिंदी में पी एचडी प्राप्त हैं। यहां इस बात का जिक्र इस संदर्भ में किया जा रहा है क्योंकि पहाड़ी भाषा की वर्तनी का मानकीकरण किया जाना जरूरी है। दूसरे यह कि हमारी भाषा के बहुत से शब्द या उनकी ध्वनियां देवनागरी लिपि में पूरी तरह से व्यक्त नहीं हो पाती हैं। इसलिए उनके लिए कुछ खास चिह्न तय किए जाने चाहिए। पिछले दिनों कुल्लुवी के संदर्भ में यतिन पंडित ने इस बारे में चर्चा भी की थी। शब्दों की वर्तनी के मानकीकरण में हिंदी भाषा के हमारे ये विद्वान महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे में योजना बनाकर काम कर सकता है। अभी तक भाषा या शब्दों का प्रयोग हर कोई अपनी जानकारी और समझ तथा इलाकाई उच्चारण के आधार पर करता है। इसलिए वर्तनी में भिन्नता मिलती है। इसे स्थिर करने के लिए विद्वानों को मेहनत करनी होगी।
संकलन की भूमिका और कवि परिचय हिन्दी भाषा में दिया गया है।
शायद इसके पीछे यह विचार रहा हो कि इस तरह पहाड़ी कवियों को बेहतर या व्यापक फलक
पर प्रस्तुत किया जा सकेगा। पहाड़ी भाषा के प्रेमी चाहेंगे कि उन्हें प्रस्तुत भी
पहाड़ी भाषा में किया जाए। कवि परिचय के संबंध में भी यह समझ नहीं आता है कि कुछ
कवियों का परिचय तो अति विस्तार से दिया गया है और कुछ एक का केवल नाम ही है। हालांकि
इस संकलन के अधिकांश कवि लंबे समय से रचनारत हैं और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित
हैं।
बिलासपुर लेखक संघ का परिचय
बिलासपुर लेखक संघ की स्थापना 3 अगस्त 1996 को तथा इसका पंजीकरण 19 सितंबर 1996 को पंजी. करण संख्या 287/96 के अंतर्गत हुआ। तब से लेकर आज तक संघ लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इसकी स्थापना का उद्देश्य था कि साहित्यकारों व लेखकों को एक मंच प्रदान किया जा सके, रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देकर आपसी सहयोग से उनको आगे बढ़ाया जा सके तथा लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में काम किया जा सके। हमारी मां बोली पहाड़ी के अस्तित्व को बचाये रखना बहुत आवश्यक है जिसके लिए हम सभी को प्रयास करने होंगे। पश्चमी पहाड़ी की कहलूरी बोली के संवर्धन और संरक्षण के लिए बिलासपुर लेखक संघ सदैव प्रयत्नरत है। लेखक संघ का यह भी प्रयत्न रहेगा कि शोध करके कहलूरी बोली की प्राचीनता, विश्वभाषाओं से साम्य और संस्कृत भाषा का कहलूरी बोली पर प्रभाव स्थापित किया जा सके। इस समय बिलासपुर लेखक संघ के लगभग एक सौ सदस्य हैं जो विभिन्न विधाओं में लिख कर अपने साहित्य का प्रकाश चारो दिशाओं में फैला रहे है तथा अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में फैली बुराईयों से आमजन को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। संघ के सदस्यों द्वारा व्यक्तिगत रूप में भी कई किताबें लिखी गई हैं जबकि सांझा संग्रह भी प्रकाशित किये गए है। बिलासपुर लेखक संघ द्वारा अपने सदस्यों के सहयोग से "कहलूरा री कलम", "कहलूर की विभूतियां'""" कहलूर की कलम "श्री श्री 1008 बाबा कल्याण दास उर्फ काले बाबा'", "कल्याण गीता", कहलूर की कलम भाग 2' कहलूर की कहानी" के अलावा और भी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं। बिलासपुर लेखक संघ रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा दे रहा है। मासिक बैठकों, कवि गोष्ठियों व सेमिनारों के माध्यम से निरंतर साहित्य की सेवा में लगा है तथा युवा लेखकों को अपने साथ जोड़ने के लिए प्रयासरत है। संघ की कोशिश है कि उसके लेखकों द्वारा रचित अधिक से अधिक साहित्य प्रकाशित होकर लोगों के सामने आए।
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