Thursday, January 6, 2022

यादां फौजा दियां



फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदे
तिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती हैदूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा 
पंदह्रुआं मणका।


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सहीदाँ दियाँ समाधियाँ दे प्रदेसे च 

 तवाँग दे उपरले हिस्से यानी कि चूजे जीजी च अपणी पळटण दे  पिछले हिस्से च पुज्जी नै तित्थू दे रोजकणे टैम टेबल दे मुताबिक दूजे दिन भ्यागा 6 बजे असाँ जो जिस्मानी कसरत ताँईं कट्ठे होणा था।  जेह्ड़े जुआन पहलैं ही तित्थू रिहा दे थे तिन्हाँ जो हौळी कि खिट्ट लगाणे दा हुक्म होया कनै मिंजो साँह्ईं नौंएं आह्याँ जो चाळी-पंजताळी मिंट टहलणे जो बोल्या गिया।  अति ऊंचाई वाळे ठंडे  लाकेयाँ च जाणे ते पैह्लैं बदन जो तित्थु दे तापमान कनै माहौल दे मुताबिक ढाळना जरूरी हौंदा है। इक मुकर्रर्र समै तिक्कर जिस्मानी हरकत दा प्रोग्राम  पूरा करने ते परंत डॉक्टर फौजियाँ दा डॉक्टरी मुआयना करदे हन्न। पूरी तरहाँ फिट पाए जाणे पर ही अग्गैं जाणे दी जाज्त मिलदी है।

असाँ दूंहीं जो खाणा लैणे ताँईं लंगर च जाणा पोंदा था।  चाह् समै-समै पर कोई जुआन आई नै देई जाँदा थाभ्यागा पंज कि बजे तिस ते परंत ग्यारह बजे कनै फिरी दोपहराँ बाद तिन्न कि बजे।  जित्थु असाँ ठैह्रेयो थे तित्थु ते थोड़ी दूर थल्लैं सज्जे पासैं तवाँग दा मसहूर बौद्ध मठ  सुज्झदा था कनै खब्बे पासैं हिंदोस्तानी फौज दे पंजमें पहाड़ी डिवीजन दा हैडकुआटर था। डिवीजन हैडकुआटर दे उपरले पासैं इक हैलीपैड था। 

भ्यागा जाह्लू असाँ चूजे जीजी दे उपरले पासैं घुमणा गै ताँ तित्थू बोफ़ोर तोपाँ दी इक बैटरी नज़र आई। इक बैटरी यानी कि छे तोपाँ।  मास्टर होराँ दस्सेया था कि सैह् तोपाँ चीनी फौज जिसदा नाँ पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.) है, दियाँ हाखीं च रड़कदियाँ थियाँ।  चीनी फौज वूमला च हौणे वाळी हर फ्लैग मीटिंग च तिन्हाँ तोपाँ जो पिच्छैं टाह्णे  दी गल्ल करदी थी। इक तोपखाना रेजिमेंट च 4 बैटरियाँ हौंदियाँ हन्न।  जिन्हाँ च इक प्रशासनिक बैटरी हौंदी है जिस जो हैडकुआटर बैटरी ग्लाँदे हन्न।  बाकी तिन्न लड़ाकू बैटरियाँ हौदियाँ हन्न जिन्हाँ दे नाँपी’ (पापा) ‘क्यू’ (क्यूबेक) कनैआर’ (रोमियो) हौंदे हन्न। इन्फैंट्री बटालियन च तिन्हाँ दे बरोबर कंपणियाँ हौदियाँ हन्न जिन्हाँ दे नाँ ए, बी, सी, डी (अल्फा, ब्रावो, चार्ली, डेल्टा) बगैरा हौंदे हन्न।  तोपखाना रेजिमेंट दी हरेक लड़ाकू बैटरी च छे तोपाँ हौंदियाँ हन्न।  भारत-चीन सरहद पर, आम हालाताँ च, समै-समै पर दूंहीं मुल्काँ दे फौजी अफसर नुमाँइदेयाँ दियाँ फ्लैग मीटिंगाँ हौंदियाँ रैंह्दियाँ हन्न जिन्हाँ च छोटे-मोटे मुद्देयाँ कनै मतभेदाँ पर चर्चा करी नै तिन्हाँ दा हल निकाळेया जाँदा है। 

वापस आई नै असाँ ब्रेक-फ़ास्ट कित्ता कनै गपशप मारी। मैं मास्टर होराँ जो दस्सेया कि मिंजो तवाँग बाजार जाई करी इक रंगीन कैमरा खरीदणा है।  तिन्हाँ दिनाँ च फौज च कैमरा रखने वाळेयाँ कनै डायरी लिक्खणे वाळेयाँ दा रिकॉर्ड रक्खेया जाँदा  था। 

मिंजो फौजी एरिये ते बाहर जाणा था तिस ताँईं मिंजो ऑउट पास दी जरूरत पोणी थी। अपर तित्थु असाँ दोह्यो जणे सीनियर हौळदार थे इस ताँईं मैं मास्टर होराँ जो दस्सी करी तवाँग बाजार गिया कनै सौ रुपइए दे आसपासप्रीमियरब्राँड दा इक आम रंगीन कैमरा खरीदी नै लई आया।  ये मेरा दूजा कैमरा था पहला कैमरा अगफा क्लिक III (थर्ड) था।  सैह् दोह्यो कैमरे मेरे घरैं अज्ज भी कुत्हकी पैह्यो मिली जाणे। तिस बग्त डिजिटल कैमरे नीं हौंदे थे। तिस कैमरे कन्नै औत्थू खिंजिंह्याँ तस्वीराँ हुण धुंधळियाँ होई गइह्याँ हन्न। थल्लैं तिस कैमरे कन्नै लइह्यो इक तस्वीर दस्सणे ताँईं पाइह्यो। एह् है तद्कणे तवाँग दे उपरले हिस्से च पोणे वाळे चूजे जीजी दा इक नजारा। मेरे सज्जे पासैं पिच्छैं इक बंकर सुज्झा दा। इस पुराणे बंकर दे अंदर जाई नै मिंजो एह् सोची करी झणुणू ओआ दे थे कि 1962 दे भारत-चीन च म्हारे सूरमे इस बंकर ते लड़ेह्यो होंगे। 

तवाँग च पंज-छे दिन तिक्कर अपणे जिस्म जो अति ठंड कनै ऊंचाई दे माहौल च ढाळणे कनै डॉक्टरी जाँच च फिट पाए जाणे ते परंत ही मिंजो अपणी रेजिमेंट दे मेन हिस्से कन्नै मिलणे ताँईं लुम्पो तिक्कर दा अगला सफर सुरू करना था।  रोज भ्यागा असाँ घुमणे कनै हल्का दौड़ने ताँईं निकळदे थे। तिस बग्त तिक्कर   बोफ़ोर तोपाँ, खरीद च होई धांधळी दे झमेले च, घिरी चुक्किह्याँ थियाँ। दरअसल सैह् 155 मिलीमीटर तोपाँ फौज दे मध्यम तोपखाने दी ताकत जो बद्धाणे ताँईं खरीदियाँ गइयाँ थियाँ।  झमेले च घिरने ते परंत तिन्हाँ दे  कल पुर्जे नीं मिली सके। तिस वजह ते तिन्हाँ तोपाँ कनै लैस हर रेजिमेंट जो इक-दो तोपाँ खोली करी तिन्हाँ दे पुर्जेयाँ कन्नै दूजियाँ तोपाँ जो कम्म करने लायक बणाई नै रक्खणा पिया। बाद च कारगिल दी जंग दे टैमे म्हारे तोपचियाँ  तिन्हाँ तोपाँ दा इस्तेमाल बड़े कारगर ढंगे नै कित्ता कनै बड़े बद्धिया नतीजे हासल कित्ते। सोळा-स्तारा हजार फुट ते ज्यादा उच्चे कारगिल दे पहाड़ां पर गोले सट्टी करी पाकिस्तानी फौज जो लुकी बैह्णे ताँईं मजबूर करने वाळियाँ इन्हाँ तोपाँ म्हारे इन्फैंट्री दे जुआनाँ दी बड़ी मदत कित्ती थी। जेकर तिस बग्त बोफोर तोपाँ नीं हौंदियाँ ताँ कारगिल दी जंग जो जित्तणा म्हारी फौज ताँईं होर मुस्कल होई जाणा था।  अपणे समै च म्हारे तोपखाने दी सब्भते ज्यादा ऊंचाई तिक्कर  गोळे दागणे वाळी एह् इक मात्र तोप रहिओ है।  इसदे बैरल दा उठाण सह्त्तर डिग्री तिक्कर मुमकिन है कनै इसदी गोळा दागणे दी ताकत  चौबी किलोमीटर तिक्कर है। कई दसकाँ ते चली आइयाँ कनै  खरियाँ कि आजमाइह्याँ सोवियत यूनियन ते खरीदियाँ 130 मिलीमीटर एम-46 तोपाँ दियाँ अपणियाँ हदाँ हन्न।  इन्हाँ दे बैरल दा उठाण सिर्फ पंजताळी डिग्री है अपर इन्हाँ दी गोळा सटणे दी ताकत सताई किलोमीटर तिक्कर है। 

फौजाँ ताँईं  हथियार खरीदणे च म्हेसा धाँधली हौंदी रही है।  रफाल लड़ाकू होआई जहाज दी ख़रीद भी झमेलेयाँ च घिरी गई थी।  भारतीय सत्ता दे गलियारेयाँ च  भ्रष्टाचार एड्स साँह्ईं फैली गिह्या है। फिलहाल इसदा कोई इलाज नजर नीं ओंदा किंञा कि सत्ता दे ठेकेदार ही इस च लमोह्यो हौदे हन्न।  एह् म्हारे देस दी एयर फोर्स दी खुसकिस्मती है कि रफाल दा हाल बोफ़ोर तोपाँ साँह्ईं नीं होया। 

अगले दिन भ्यागा जाह्लू असाँ घुमणा गै ताँ मिंजो इक दूजी तोपखाना रेजिमेंट दे जुआन मिली गै जिन्हाँ ते मिंजो वीरपुर च तिन्हाँ दे मराठा कमाँडिंग अफसर दी अरुणाचल प्रदेश च सड़क हादसे च मौत होणे दी खबर मिल्ली थी।  मिंजो अपणे बाकम कर्नल अनिल दामोदर धरप होराँ दी बे टैमी मौत दी खबर सुणी करी बड़ा दुःख होया था।  तिस बजह ते मैं तैह्ड़ी तिन्हाँ जुआनाँ कन्नै ज्यादा गल्लबात नीं करी पाया था।  तवाँग च गल्लाँ ही गल्लाँ च मैं तिन्हाँ ते पुच्छेया कि तिन्हाँ दा नौआं सीओ कुण है ताँ पता चल्लेया कि तिन्हाँ दे उप कमाण अफसर  प्रमोट होई नै कमाण अफसर बणी गैह्यो थे।  कर्नल तीर्थ सिंह, वीर चक्र जो मैं जाणदा था। सैह् पठानकोट दे पासे दे रैह्णे वाळे इक डोगरा अफसर थे।  तिन्हाँ जो वीर चक्र सन् 1971 दे भारत पाकिस्तान जंग च बहादुरी कनै दुस्मण दा मुकाबला करने ताँईं मिल्लेह्या था।  तिस बग्त सैह् कैप्टन थे।  तिन्हाँ कन्नै जुड़िह्यो इक गल्ल याद आई गई। (.....सैह् अगली कड़िया च)

 

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शहीदों की समाधियों के प्रदेश में (पन्द्रहवीं कड़ी)

 तवाँग के ऊपरी भाग अर्थात् चूजे जीजी में स्थित अपनी पलटन के पिछले भाग में पहुंच कर वहाँ की रोजमर्रा की समय सारणी के अनुसार दूसरे दिन प्रातःकाल 6 बजे हमें शारीरिक प्रशिक्षण हेतु एकत्रित होना था। जो लोग पहले से वहाँ पर रह रहे थे उन्हें हल्की दौड़ लगाने के आदेश मिले जबकि मुझ जैसे नवागंतुकों को 40-45 मिनट टहलने के लिए कहा गया। अति ऊंचाई वाले ठंडे क्षेत्रों में जाने से पहले शरीर को वहाँ के तापमान व माहौल के अनुरूप ढालना आवश्यक होता है। एक निर्धारित अवधि तक शारीरिक गतिविधि कार्यक्रम  पूरा करने के उपराँत डॉक्टर द्वारा सैनिकों का शारीरिक परीक्षण किया जाता है। पूर्णतः फिट पाए जाने पर ही आगे जाने की अनुमति प्राप्त होती है। 

हम दोनों को अपना खाना लेने के लिए भोजन-पाकशाला में जाना पड़ता था। चाय समय-समय पर कोई सैनिक आकर दे जाता थाप्रातः लगभग पाँच बजे तदोपराँत ग्यारह बजे और फिर दोपहर बाद लगभग तीन बजे।  जहाँ हम ठहरे थे वहाँ से थोड़ी दूर नीचे दाईं ओर तवाँग का प्रसिद्ध बौद्ध मठ दिखाई देता था और बाईं ओर भारतीय सेना के 5वें पर्वतीय डिवीजन का मुख्यालय था। डिवीजन मुख्यालय के ऊपर की ओर एक हैलीपैड था।

सुबह जब हम चूजे जीजी के ऊपर की ओर चहलकदमी करने गए तो वहाँ बोफ़ोर तोपों की एक बैटरी नज़र आई। एक बैटरी अर्थात् 6 तोपें। मास्टर जी ने बताया था कि वो तोपें चीनी सेना, जिसका नाम पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.) है, की आखों में खटकती थीं। चीनी सेना वूमला में होने वाली हर फ्लैग मीटिंग में उन तोपों को पीछे हटाने की बात करती थी। एक तोपखाना रेजिमेंट में 4 बैटरियाँ होती हैं। जिनमें एक प्रशासनिक बैटरी होती है जिसे हैडक्वाटर बैटरी कहा जाता है। शेष तीन लड़ाकू बैटरियाँ होतीं हैं जिनके नामपी’ (पापा) ‘क्यू’ (क्यूबेक) औरआर’ (रोमियो) होते हैं। इन्फैंट्री बटालियन में इनकी समकक्ष कम्पनियाँ होती हैं जिनके नाम ए, बी, सी, डी (अल्फा, ब्रावो, चार्ली, डेल्टा) इत्यादि होते हैं। तोपखाना रेजिमेंट की प्रत्येक लड़ाकू बैटरी में 6 तोपें होती हैं। भारत-चीन सीमा पर सामान्य परिस्थितियों में समय-समय पर दोनों देशों की सेनाओं के प्रतिनिधि अफसरों की फ्लैग मीटिंग होती रहती हैं जिनमें छोटे-मोटे मुद्दों व मतभेदों पर चर्चा करके समाधान खोजा जाता है। 

वापस आकर हमने ब्रेक-फ़ास्ट किया और गपशप मारी। मैंने मास्टर जी को बताया कि मुझे तवाँग बाजार जाकर एक रंगीन कैमरा खरीदना है। सेना में उन दिनों कैमरा रखने वालों और डायरी लिखने वालों का रिकॉर्ड रखा जाता था। 

मुझे सैन्य क्षेत्र से बाहर जाना था। उस के लिए मुझे ऑउट पास की आवश्यकता पड़नी थी। परंतु हम दोनों वहाँ वरिष्ठ हवलदार थे अतः मैं मास्टर जी को सूचित कर नीचे तवाँग बाजार गया और 100 रुपए के आसपासप्रीमियरब्राँड का साधारण रंगीन कैमरा खरीद लाया। वो मेरा दूसरा कैमरा था पहला कैमरा अगफा क्लिक III था।  ये दोनों कैमरे मेरे घर के किसी कोने में आज भी पड़े मिल जाएंगे। उस समय डिजिटल कैमरों का प्रचलन शुरू नहीं हुआ था। उस कैमरे से वहाँ खींची गई तस्वीरें अब धुंधली हो गयी हैं। नीचे उस कैमरे से ली गई तस्वीर को स्कैन करके अवलोकनार्थ डाला गया है। ये है तब के तवाँग के ऊपरी भाग में स्थित चूजे जीजी का एक दृश्य। मेरे दाईं ओर पीछे एक बंकर दिख रहा है। इस पुराने बंकर के अंदर जाकर मैं यह सोच कर रोमाँचित हो रहा था कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में हमारे योद्धा इस बंकर से लड़े होंगे। 

तवाँग में 5-6 दिन तक अपने शरीर को अति ठंड और ऊंचाई के वातावरण में ढालने और डॉक्टरी परीक्षण में सही पाए जाने के बाद ही मुझे, अपनी रेजिमेंट के मुख्य भाग जो लुम्पो में स्थित था, में शामिल होने के लिए आगे की यात्रा आरम्भ करनी थी। हर सुबह हम घूमने और हल्का दौड़ने के लिए निकलते थे। उस समय तक बोफ़ोर तोपें खरीद में हुई धांधली के विवाद में घिर चुकीं थी। दरअसल ये 155 मिलीमीटर तोपें सेना के मध्यम तोपखाने की क्षमता को बढ़ाने के लिए खरीदी गईं थीं। विवाद में घिरने के बाद इनके कल-पुर्जे उपलब्ध नहीं हो पाए अतः इन तोपों से लैस हर रेजिमेंट में एक दो तोपों को खोल कर उनके कल-पुर्जों से  दूसरी तोपों को काम करने के लिए दुरुस्त रखा गया। बाद में कारगिल युद्ध के दौरान हमारे तोपचियों ने इन तोपों का संचालन बड़ी कुशलता के साथ किया और सराहनीय परिणाम प्राप्त किए। सोलह-सत्रह हजार फुट से अधिक ऊंचे कारगिल के पहाड़ों पर गोले गिरा कर पाकिस्तानी सैनिकों को रक्षात्मक स्थिति में रहने के लिए बाध्य करने वाली इन तोपों ने हमारे इन्फैंट्री के जवानों की महत्वपूर्ण सहायता की थी। अगर उस समय बोफोर तोपें न होतीं तो कारगिल की जंग को जीतना हमारी सेनाओं के लिए और अधिक कठिन हो जाता। अपने समय में हमारे तोपखाने में अधिक ऊंचाई तक गोले दागने वाली ये एक मात्र तोप रही है।  इसके बैरल का उठान सत्तर डिग्री तक संभव है और इसकी गोला दागने की क्षमता चौबीस किलोमीटर तक है। कई दशकों से चली आ रही बेहतरीन ढंग से आजमाई हुईं सोवियत यूनियन से खरीदी गई 130 मिलीमीटर एम-46 तोपों की अपनी सीमायें हैं। इनके बैरल का उठान मात्र पैंतालीस डिग्री है पर इनकी गोला फेंकने की क्षमता 27 कि. मी. तक है। 

सेनाओं के लिए हथियार खरीदने में हमेशा धांधली होती रही है।  रफाल लड़ाकू विमान की ख़रीद भी विवादों में घिर गई थी। भारतीय सत्ता के गलियारों में भ्रष्टाचार एड्स की तरह फैल गया है। फिलहाल इसका कोई उपचार संभव नहीं दिखता क्योंकि अक्सर सत्ता के ठेकेदार ही इसमें संलिप्त पाए जाते हैं। ये हमारे देश की वायुसेना का सौभाग्य है कि रफाल का हश्र बोफ़ोर तोपों जैसा नहीं हुआ। 

अगले दिन सुबह जब हम घूमने गए तो मुझे एक दूसरी तोपखाना यूनिट के वही जवान मिल गए जिनसे मुझे वीरपुर में उनके मराठा कमान अधिकारी की उस क्षेत्र में सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाने की खबर मिली थी।  मुझे अपने परिचित कर्नल अनिल दामोदर धरप की असमय मृत्यु की सूचना से बहुत दुःख हुआ था अतः मैं उस दिन उन जवानों से अधिक बात नहीं कर पाया था। तवाँग में बातों ही बातों में जब मैंने उनसे पूछा कि अब उनके नए सीओ कौन हैं तो उन्होंने बताया कि उनके उप-कमान अधिकारी पदोन्नत हो कर कर्नल रैंक में कमान अधिकारी बन गए थे। कर्नल तीर्थ सिंह, वीर चक्र को मैं जानता था। वह पठानकोट की तरफ के  रहने वाले एक डोगरा अफसर थे। उन्हें वीरचक्र 1971 के भारत-पाक युद्ध में बहादुरी के साथ दुश्मन का मुकाबला करने के लिए मिला था। उस समय वह कैप्टन थे।  उनके साथ जुड़ी हुई एक घटना की याद ताजा हो गई। (....अगली कड़ी में)

    भगत राम मंडोत्रा हिमाचल प्रदेश दे जिला कांगड़ा दी तहसील जयसिंहपुर दे गरां चंबी दे रैहणे वाल़े फौज दे तोपखाने दे रटैर तोपची हन।  फौज च रही नैं बत्ती साल देश दी सियोआ करी सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंट) दे औद्धे ते घरे जो आए। फौजी सर्विस दे दौरान तकरीबन तरताल़ी साल दिया उम्रा च एम.. (अंग्रेजी साहित्य) दी डिग्री हासिल कित्ती। इस ते परंत सठ साल दी उम्र होणे तिकर तकरीबन पंज साल आई.बी. , 'असिस्टेन्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस अफसर' दी जिम्मेबारी निभाई।

      लिखणे दी सणक कालेज दे टैमें ते ही थी। फौज च ये लौ दबोई रही पर अंदरें-अंदरें अग्ग सिंजरदी रही।  आखिर च घरें आई सोशल मीडिया दे थ्रू ये लावा बाहर निकल़ेया।

     हाली तिकर हिमाचली पहाड़ी च चार कवता संग्रह- जुड़दे पुल, रिहड़ू खोळू, चिह्ड़ू-मिह्ड़ू, फुल्ल खटनाळुये दे, छपी चुक्केयो। इक्क हिंदी काव्य कथा "परमवीर गाथा सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल - परमवीर चक्र विजेता" जो सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली ते 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहित्य सम्मान 2018' मिली चुकेया।

    हुण फेस बुक दे ज़रिये 'ज़रा सुनिए तो' करी नैं कदी-कदी किछ न किछ सुणादे रैंहदे हन।

Sunday, December 19, 2021

गल सुणा

 

असां दोस्तां दियां कताबां खरीदी नै पढ़दे

कुसी भी समाजे दी भाषा सिर्फ गलबात करने ताईं ई नीं हुंदी; सिर्फ सूचनां दा भंडार ई नीं हुंदी; भाषा सभ्यता-संस्कृति दियां परतां भी खोलदी। साहित्य कनै दूइयां कलां, दर्शन, इतिहास असां जो अपणे होणे दी पछाण करांदे। इसा पछाणा दा जरिया बणदियां कताबां। कताबां दी जरूरत सदा ते रही है। इस बारे च अनूप सेठी होरां बोला दे मेरी गल सुणा। एह गल दस दिसंबर जो नव भारत टाइम्स च छपियो है। उपरली फोटो नीलमणि पोद्दार होरां दी है।   


हिन्दी प्रदेशां दियां नाटक मंडलियां जो आम शिकायत रैंह्दी भई लोक टिकट खरीदी नै नाटक दिखणा नीं औंदे। हर कोई मुफ्ते दे सादेयां निहाळदा। एही स्हाब कताबां दा है। इक ता सैह्रां च कताबां दियां दुकानां नीं हुंदियां, जेह्ड़ियां हुंदियां भी तिन्हां च  सिर्फ सलेबसां दियां कताबां ई मिलदियां। साहित्य दियां कताबां ताईं कोई जगह नीं हुंदी। बड-बडेयां सैह्रां च जेह्ड़ियां दुकानां हन तिन्हां जो उंगळियां पर गिणी सकदे। तिन्हां व्हाल अंगरेजी पुथन्ने ढेरां-ढेर हुंदे, हिंदुस्तानी भाषां दियां कताबां सिर्फ दस्णौकिया जो रखियां हुंदियां। दुकानदारां भी क्या करना? तिन्हां सैही चीज रखणी जेह्ड़ी बिकै। असां लोकां जो कताबां खरीदणे दी आदत नीं है। जिन्हां जो लिखणे-पढ़णे च दिलचस्पी हुंदी, सैह् तोपदे पोथियां। तिन्हां चा ते भी जदातर इसा ताका च रैंह्दे भई भेंट-पुरस्कार मिली जाऐ, जेब ढिल्ली न करना पौऐ। पर एह् गल भी पूरी सच नीं है। पुस्तक मेल्यां दी भीड़ दसदी भई साहित्य दे पाठक हन।        

इक जमाना था धर्मयुग पत्रिका तकरीबन हर पढ़ेयो लिखयो घरैं औंदी थी। लोक घरां च अपणी लाइब्रेरी भी बणांदे थे। हिंदी पॉकेट बुक्स कनै राजकमल प्रकाशन दी घरेलू लाइब्रेरी योजना हुंदी थी। मैं जदूं पढ़दा था, मतलब 1978-80 च, तां यूएसएसआर दे प्रगति प्रकाशन दियां बड़ियां जरूरी बताबां मिली जांदियां थियां। कनै सस्तियां। दुनिया दा श्रेष्ठ साहित्य। सैह् भी हिन्दिया च। भारत भवन भोपाल आळेयां कई मैग्जीनां चलाइयां। बिहार अकादमी नै बड़ी बधिया कताबां छापियां। राजर्षि टंडन अकादमी लखनऊ व्हाल भी बड़ा खजाना हुंदा था। इक बरी असां जो मुंबई पुस्तक मेले च इन्हां दियां कताबां मिली गइयां। दूए बक्खें इक बंदा देह्या भी टकरेया जेह्ड़ा पंजांह् दी कताब पंजां सौआं च बेचा दा था।

कताबां ता हिमाचल कला भाषा अकादमी नै भी छापियां हन। केंद्रीय साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट कनै प्रकाशन विभाग दे बारे च ता सारे ई जाणदे। एह् बड्डे इदारे अपणियां कताबां बेची लैंदे। पर राज्य  सरकारां दियां अकादमियां सरकारी सोतड़पणे दियां शिकार होई जांदियां। मार्केटिंग करने दे बारे च कोई जादा नीं सोचदा। मार्केटिंग दे बारे च ता प्राइवेट सेक्टर दे प्रकाशक भी नीं सोचदे। सैह् कताबां लाइब्रेरियां च ही थपदे। हुण तकनीक सस्ती होई गई ता लेखक अप्पू ही छापणा लगी पेह्यो। पर तिन्हां दे साम्हणें भी यक्ष प्रश्न है भई कताबां कुस जो कनै कुनी बेचणियां। मैं इक बरी मक्लोडगंज दिक्खया इक तिबती नौजुआन सड़का कंढै अपणिया कवतां दिया कताबा बेचा दा था। असां देह्ई हिम्मत कदूं करनी है?          

हिमाचली पहाड़िया दे हाल ता होर भी मंदे हन। मेरा नीं ख्याल कोई ऐसा प्रकाशक है जेह्ड़ा हिमाचलिया दियां कताबां छापदा कनै बेचदा होऐ। मतलब सरकारी मैह्कमेयां ते अलावा। लेखकां अपणे ई प्रकाशन खोल्यो। या तिन्हां जो खोलना पइ गेयो। उपरा ते पता नीं असां दे कितणे-क लोक खरीदी नै कताबां पढ़दे। पाठक ता छड्डा, लेखक भी। किछ कताबां अकादमी खरीददी हुंगी। सुणेया राजा राम मोहन राय पुस्तकालय योजना च भी सुरंग कढोइयो। हसाब-कताबे च माहिर लेखक इस रस्तैं अपणा खर्चा-पाणी कड्ढी लैंदे हुंगे। पर सैह् कताबां जांदियां कुतांह्। स्कूलां, कालजां कनैं जिला लाइब्रेरियां च। तिन्हां जो पढ़दा कुण हुंगा। नौजवान पीढ़ी पहाड़ी बोली नै राजी नीं, कताबां किञा पढ़णियां। सैह् भी पहाड़िया दियां।

इसा कमिया ताईं सारा दोस मोबाइलां कनै कंप्यूटरां जो नीं दयी सकदे। असां अपणे अंदर झाकी नै दिखिए, असां दिया जिंदगिया च कताबां दी कितणी क जगह है। कनैं अपणा कितणा बजट कताबां-मैग्जीनां ताईं रखदे। जे होर खर्चे करी सकदे ता कताबां पर भी करना चाहिदा। घरैं कताबां रखोइयां होन ता याणेयां जो भी चा होई सकदा। असां जो मुफ्ते च कताबां लैणे- देणे दे बारे च भी संजीदगिया नै सोचणा चाहिदा। लेखकां जो इक्की दुए दी मदद करनी चाहिदी। मेरा कविता संग्रह छपया ता मैं इक मराठी दोस्ते जो गलाया भई मैं कताब भेजदा। तिन्हां गलाया, ‘‘असां दोस्तां दियां कताबां खरीदी नै पढ़दे। फिकर मत करा, मैं मंगुआई लैंह्गा।’’ मैं सोच्या देह्-देह्ई सद्बुद्धि हिन्दिया कनै हिमाचलिया दे पाठकां जो भी आई जाऐ ता नजारा बदलोई जाऐ।


असां दोस्ता दियां कताबां खरीदी नै पढ़दे : अखबारा दा लिंक 


Monday, December 6, 2021

यादां फौजा दियां

 

नूरानॉंग झरना

फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदेतिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती हैदूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा चौदुह्आं मणका।

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सहीदाँ दियाँ समाधियाँ दे परदेसे च 

 

जसवंत गढ़ दे निचलैं पासैं जंग नाँएं दी इक जगह पोंदी है।  जंग तवाँग-चू दे किनारे पर बस्सेह्या इक ग्राँ है। इत्थू तवाँग-चू बहोत डुग्घिया खाइया च बग्दी नजर ओंदी है।  इसा जगहा च तित्थू दे मूल वासियाँ दी आबादी है। जंग, से-ला ते तवाँग दे पासैं तकरीबन चौताळी किलोमीटर दूर उतराइया च पोंदा है। 

जंग दे बक्खैं-बक्खैं गुजरदिया सड़का ते तकरीबन अद्धा किलोमीटर उपरले पासैं  नूरानाँग झरना है। इत्थू नूरानाँग नदी, से-ला (दर्रे) दी उत्तरी ढलाण ते निकळी नै, नूरानाँग होंदी होई, तकरीबन सौ मीटर उपरा ते पई करी, तवाँग-चू (नदी) च मिलदी है। एह् बहोत बड्डा झरना दिखणे जो बड़ा छैळ लगदा है।  अरुणाचल प्रदेश च नूरानाँग वॉटरफॉल जो बोंग बोंग भी बोल्या जाँदा है। एह् भारत दे सब्भते खूबसूरत झरनेयाँ च इक है। हुण ताँ सुणेह्या, तित्थू इक छोटा हाइड्रो पावर प्लाँट भी बणी गिह्या है। राकेश रोशन दी सन् 1997 च बणाइह्यो शाहरुख खान कनै माधुरी दीक्षित दी फिल्म  'कोयला' दे इक सीन च इस झरने दी इक झलक दिखणे जो मिलदी है। इस्सेयो जंग दा झरना भी ग्लाँदे हन्न। जंग ते तवाँग जाणे ताँईं, जरा कि दरेडैं, तवाँग-चू पर एक छोटा पुळ पार करना पोंदा है। तिस बग्त सैह् पुळ संगड़ा जेहा था।  सन् 1962 दी भारत-चीन जंग दे दौरान, चीनी फौज दा रस्ता रोकणे ताँईं, इस पुळ जो भारत दिऐं फौजैं तोड़ी दित्ता था। 

तवाँग जंग ते तकरीबन उणत्ती किलोमीटर दूर दूजे पासैं उचाइया पर पोंदा है। तवाँग-चू दा पुळ पार करने ते किछ देरा परंत आबादी सुरू होई जाँदी है तवाँग ते किछ दूर पहलैं बोमड़ीर ओंदा है। तिस बग्त तवाँग जाणे वाळी फौजी गडियाँ दे काफले बोमड़ीर च ही रुकदे थे कनै तित्थू ते ही वापिस असम दे तेजपुर कनै गुहाटी मुड़ने वाळी फौजी गडियाँ चला करदियाँ थियाँ। 

असाँ दियाँ गडियाँ तवाँग बाजारे ते बाहरैं-बाहरैं होंदियाँ होइयाँ तकरीबन दो किलोमीटर उप्पर चढ़ाइया पर पोंणे वाळी चूजे जीजी' नाँएं दिया ठाहरी जाई खड़ोतियाँ।   नायक याद राम यादव नै मिंजो दस्सेया कि असाँ अपणिया मंजिला पर पोंह्ची गैह्यो थे। तिसा ठाहरी पर मेरी नोंईं रेजिमेंट दा रियर' (पिछला हेस्सा) तैनात था। रेजिमेंट दियाँ गडियाँ दे बेड़े कन्नै सारे डरैवर तिसा जगह च ही रैंह्दे थे। रेजिमेंट दा मेन अगला हेस्सा, अग्गैं लुम्पो नाँएं दिया जगहा च था कनै इक बैटरी लुम्पो ते भी अग्गैं  नीलिया'  नाँएं दिया ठाह्री तैनात थी। 

मेरी नोंईं यूनिट दी मेन जिम्मेदारी, फौज दे पंजमें माउंटेन डिवीज़न दे अंडर पोंणे वाळे 77 माउंटेन ब्रिगेड (चिंडिट) दियाँ, भारत-चीन सरहदा पर तैनात, तिन्न इन्फेंट्री बटालियनाँ जो, ज़रूरत पोंणे पर, आर्टिलरी फायर स्पोर्ट देणा थी।  तिस बग्त लुम्पो सड़क दे रस्तें तवाँग कन्नै  जुड़ेह्या नीं था।  तवाँग ते संगड़ी देही इक सड़क लुम्पो ते तिन्न-चार किलोमीटर पिच्छैं घुरसम नाँएं दिया इक जगह तिकर ही जांदी थी। तिसा सड़का च मात्र जीप/जोंगा कनै छोटे ट्रक वन टन ही मुस्कला नै ओंद-जाँद करी सकदे थे किंञा कि सैह् सड़क कच्ची कनै उबड़-खाबड़ भी थी। इसा बजह ते यूनिट दियाँ गडियाँ दा बेड़ा तवाँग दे उपरले हेस्से चूजे जीजी च रखणा पोंदा था। 

अरुणाचल प्रदेश च मतियाँ जगहाँ दे नाँए कन्नै जीजी जुड़ेह्या होंदा है जिंञा कि चूजे जीजी। जीजी अंग्रेजी भासा दे अखराँ ग्रेजिंग ग्राउंड' दा निक्का रूप है जिन्हाँ दा मतलब हैचारांद यानि कि सैह् जगहाँ याकाँ दे चाराँद होंदे हन्न। 

फौज दी हर टुकड़ी (यूनिट) जो लीड करने कनै बंदोबस्त करने ताँईं पिरामिड नुमा ढाँचे च कठेरेया जाँदा है। आमतौर पर सब्भ किसमाँ दियाँ टुकड़ियाँ दा सब्भते छोटा हेस्सा सेक्शन होंदा है। तिसदे उप्परले हेस्से जो  अलग-अलग किसमाँ दियाँ फौजी टुकड़ियाँ च अलग-अलग नाँ ते जाणेया जाँदा है जिंञा कि टैंकाँ वाळी फौज (आर्म्ड कोर) च कनै  बड्डियाँ तोपाँ वाळी फौज (आर्टिलरी) च सेक्शन ते उप्पर ट्रूप होंदा है जिस च इक ते ज्यादा सेक्शन होंदे हन्न। पैदल फौज (इन्फेंट्री) च इस्सेयो प्ळटून (प्लाटून) दे नाँ ते जाणेया जाँदा है।  ट्रूप जाँ प्ळटून ते उप्पर आर्म्ड कोर चस्क्वाड्रनहोंदा है, आर्टिलरी चबैटरीहोंदी है कनै इन्फेंट्री चकंपणीहोंदी है। इस ते उप्पर रेजिमेंट जाँ बटालियन होंदी है। 

उप-कमाण अफसर होराँ, सड़का दे उपरले पासैं यूनिट दे अफसराँ ताँईं बणिह्यो बंकरनुमा रिहाइशा बक्खी चली गै।  मिंजो सड़का दे निचले पासैं इक झोंपड़े दे पिछले हेस्से च अपणा सामान लई जाणे ताँईं बोल्या गिया।  मैं दिक्खेया कि तिस झोंपड़े जो टिन दियाँ चादराँ लगाई करी दो हेस्सेयाँ च बंडेया गिह्या था। झोंपड़े दा पिछला हेस्सा तकरीबन तिसदा इक चौथाई हेस्सा था जिसदा दरवाजा सड़का पासैं खुलदा था। अगला तिन्न चौथाई हेस्सा तवाँग बाजार कनै तवाँग दे मसहूर बौद्ध मठ दे पासैं खुलदा था कनै तिस च तिरपाल बिछेह्या था। मैं दिक्खी करी एह् अंदाजा लगाया कि सैह् फौजियाँ ताँईं समै-समै पर चलणे वाळियाँ कलासाँ दे कम्में ओंदा होंगा। 

मैं अपणे ठहरने दिया जगहा पर नजर मारा दा ही था कि तिसा रेजिमेंटा च कम्म करने वाळे  सेना शिक्षा कोर दे इक हौळदार भी अपणा सामान लई करी तित्थू मिंजो व्ह्ली आई गै। तिन्हाँ मिंजो दस्सेया कि तिन्हाँ जो मिंजो कन्नै रैह्णे ताँईं भेज्या गिह्या था।  तिसा जगह च कुसी दा किह्ले रैह्णा, खास करी नै राती जो, सेफ नीं मन्नेयाँ जाँदा था। इस ताँईं तिन्हाँ जो मिंजो सोगी रैह्णे जो भेज्या गिह्या था। उहिंञा भी फौज च साथी व्यवस्था' (Buddy system) होंदी है। हर फौजी दा इक जोड़ीदार होंदा है जेह्ड़ा सुख-दुख च, खास करी नै जंग च हेस्सा लैंदे बग्त, तिसदा साथ दिंदा है।  

इक दूजे कन्नै बाकमी करी नै असाँ किछ ही देरा च मित्र बणी गै। मैं तिन्हाँ जो 'मास्टर जी' करी नै बुलाँदा कनै सैह् मिंजो 'बाबू जी' बोली करी पुकारदे। मास्टर जी हरियाणा दे रैह्णे वाळे थे।  तिस बग्त तवाँग च बिजली नीं आइह्यो थी।  असाँ रम दी खाली बोतला दे ढक्कण च छींडा करी नै तिस च फटेह्यो कपड़े दी बत्ती बणाई करी पाई दित्ती। इंञा बोतला च मिट्टिया दा तेल भरी करी जरूरत पोंणे पर राती  लो करने दा इंतजाम होई गिया। 


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शहीदों की समाधियों के प्रदेश में (चौहदवीं कड़ी)

 जसवंत गढ़ से नीचे की ओर जंग नामक स्थान आता है। जंग तवाँग-चू के किनारे पर बसा एक गाँव है। यहाँ पर तवाँग-चू बहुत नीचे खाई में बहती नज़र आती है। इस स्थान में वहाँ के मूल वासियों की आबादी है। जंग, से-ला से तवाँग की ओर लगभग 44 किलोमीटर दूर उतराई में नीचे की तरफ पड़ता है। 

जंग के नजदीक गुजरती हुई सड़क से लगभग आधा किलोमीटर ऊपर की ओर नूरानाँग झरना है। यहाँ पर नूरानाँग नदी, से-ला (दर्रे) की उत्तरी ढलान से निकल कर नूरानाँग होती हुई, लगभग 100 मीटर की ऊंचाई से गिर कर, तवाँग-चू (नदी) में मिलती है। यह बहुत बड़ा झरना देखते ही बनता है।  अरुणाचल प्रदेश में नूरानाँग वॉटरफॉल को बोंग बोंग भी कहा जाता है। यह भारत के सबसे खूबसूरत झरनों में से एक है। सुना है अब वहाँ एक छोटा हाइड्रो पावर प्लाँट भी बन गया है। राकेश रोशन द्वारा सन् 1997 में निर्मित शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित द्वारा अभिनीत कोयला' फिल्म के एक दृश्य में भी इस झरने की एक झलक देखने को मिलती है। इसे जंग का झरना भी कहते हैं। जंग से तवाँग जाने के लिए थोड़ी दूरी पर तवाँग-चू पर एक छोटा पुल पार करना पड़ता है। उस समय वह पुल संकरा सा था। सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, चीनी सेना का मार्ग अवरुद्ध करने के लिए, इस पुल को भारतीय सेना द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था।  

तवाँग जंग से लगभग 29 किलोमीटर की दूरी पर दूसरी ओर ऊंचाई पर स्थित है। तवाँग-चू का पुल पार करने के कुछ देर बाद आबादी शुरू हो जाती है। तवाँग से कुछ दूर पहले बोमड़ीर आता है। उस समय तवाँग जाने वाले सेना की गाड़ियों के काफले बोमड़ीर में ही रुकते थे और वहीं से ही वापिस असम के तेजपुर और गुहाटी लौटने वाली सैनिक गाड़ियाँ चला करतीं थीं। 

हमारी गाड़ियाँ तवाँग बाजार के बाहर-बाहर से होती हुईं लगभग 2 किलोमीटर ऊपर चढ़ाई पर स्थित चूजे जीजी' नामक स्थान पर जा  कर खड़ी हो गईं।  नायक यादव ने मुझे बताया कि हम मंजिल पर पहुंच चुके थे। यहाँ पर मेरी नई रेजिमेंट का रियर' (पिछला भाग) स्थित था। रेजिमेंट की गाड़ियों के बेड़े के साथ चालक दल उसी स्थान पर रहता था। रेजिमेंट का मुख्य अग्रिम भाग आगे लुम्पो नामक स्थान में था और एक बैटरी लुम्पो से भी आगे नीलिया में तैनात थी। 

मेरी नई यूनिट का मुख्य कार्य सेना के पाँचवें माउंटेन डिवीज़न के अधीन 77 माउंटेन ब्रिगेड (चिंडिट) की  भारत-चीन सीमा पर स्थित तीन इन्फेंट्री बटालियनों को, ज़रूरत पड़ने पर, आर्टिलरी फायर स्पोर्ट देना था।  उस समय लुम्पो सड़क मार्ग से तवाँग से जुड़ा हुआ नहीं था।  तवाँग से संकरी सी एक सड़क लुम्पो से तीन-चार किलोमीटर पीछे घुरसम नामक स्थान तक ही जा पाती थी। उस सड़क पर मात्र जीप/जोंगा और छोटे ट्रक वन टन ही मुश्किल से आवाजाही कर पाते थे क्योंकि वह सड़क कच्ची और उबड़-खाबड़ भी थी। इसी बजह से यूनिट की गाड़ियों का मुख्य बेड़ा तवाँग के ऊपरी भाग चूजे जीजी में रखना पड़ता था। 

अरुणाचल प्रदेश में बहुत से स्थानों के नामों के साथ जीजी जुड़ा हुआ मिलता है जैसे कि चूजे जीजी। जीजी अंग्रेजी भाषा के शब्दों ग्रेजिंग ग्राउंड' का छोटा रूप है जिनका अर्थ हैचारागाह अर्थात ये स्थान याकों की चारागाह होते हैं। 

सेना की हर टुकड़ी (यूनिट) को नेतृत्व और प्रबंधन के लिए पिरामिड नुमा ढाँचे में संगठित किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की टुकड़ियों की सबसे छोटी इकाई अनुभाग (सेक्शन) होती है। उसके ऊपर की इकाई को  विभिन्न प्रकार की सैनिक टुकड़ियों में विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे टैंकों से सज्जित सेना (आर्म्ड कोर) में और बड़ी तोपों से सज्जित सेना (आर्टिलरी) में सेक्शन के ऊपर ट्रूप होता है जिसमें एक से अधिक अनुभाग (सेक्शन) होते हैं। पैदल सेना (इन्फेंट्री) में इस इकाई को प्लाटून के नाम से सम्बोधित किया जाता है। ट्रूप अथवा प्लाटून के ऊपर आर्म्ड कोर मेंस्क्वाड्रनहोता है, आर्टिलरी मेंबैटरीहोती है और इन्फेंट्री मेंकंपनीहोती है। इसके ऊपर रेजिमेंट अथवा बटालियन होती है। 

उप-कमान अधिकारी महोदय सड़क के ऊपर की तरफ यूनिट के अफसरों के लिए बने बंकरनुमा आवास में चले गए।  मुझे सड़क के नीचे की ओर एक झोंपड़े के पिछले भाग के अंदर अपना सामान ले जाने के लिए कहा गया। मैंने देखा उस झोंपड़े को टिन की चादरें लगा कर दो भागों में बांटा गया था। झोंपड़े का पिछला भाग लगभग उसका एक चौथाई भाग था जिसका दरवाज़ा सड़क की ओर खुलता था। अगला तीन चौथाई भाग तवाँग बाजार और तवाँग के प्रसिद्ध बौद्ध मठ की दिशा में खुला था और उसमें तिरपाल बिछा था। मैंने देख कर अंदाजा लगाया कि यह सैनिकों के लिए समय-समय पर चलने वाली कक्षाओं के लिए काम आता होगा। 

मैं अपने ठहरने के स्थान का निरीक्षण कर ही रहा था कि उसी रेजिमेंट में सेवारत सेना शिक्षा कोर के एक हवलदार भी अपना सामान लेकर वहाँ मेरे पास आ गए। उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें मेरे साथ ठहरने के लिए भेजा गया है।  वहाँ पर किसी का अकेले रहना, बिशेषकर रात को, सुरक्षित नहीं माना जाता था।  इसीलिए उन्हें मेरे साथ रहने के लिए भेजा गया था।  बैसे भी सेना में साथी व्यवस्था' (Buddy system) होती है। हर सैनिक का एक जोड़ीदार होता है जो सुख-दुख में, खास करके युद्ध में भाग लेते समय, उसका साथ देता है।  

एक दूसरे का परिचय पाकर हम कुछ ही देर में मित्र बन गए। मैं उनकोमास्टर जीकरके संबोधित करता और वो मुझेबाबू जीकह कर पुकारते। मास्टर जी हरियाणा के रहने वाले थे।  उस समय तवाँग में बिजली की व्यवस्था नहीं थी। हमने रम की खाली बोतल के ढक्कन में छेद करके उसमें फटे कपड़े की बत्ती बना कर डाल दी। इस तरह बोतल में मिट्टी का तेल भर कर ज़रूरत पड़ने पर रात में  रोशनी करने का इंतज़ाम हो गया। 

     भगत राम मंडोत्रा हिमाचल प्रदेश दे जिला कांगड़ा दी तहसील जयसिंहपुर दे गरां चंबी दे रैहणे वाल़े फौज दे तोपखाने दे रटैर तोपची हन।  फौज च रही नैं बत्ती साल देश दी सियोआ करी सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंट) दे औद्धे ते घरे जो आए। फौजी सर्विस दे दौरान तकरीबन तरताल़ी साल दिया उम्रा च एम.. (अंग्रेजी साहित्य) दी डिग्री हासिल कित्ती। इस ते परंत सठ साल दी उम्र होणे तिकर तकरीबन पंज साल आई.बी. , 'असिस्टेन्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस अफसर' दी जिम्मेबारी निभाई।

      लिखणे दी सणक कालेज दे टैमें ते ही थी। फौज च ये लौ दबोई रही पर अंदरें-अंदरें अग्ग सिंजरदी रही।  आखिर च घरें आई सोशल मीडिया दे थ्रू ये लावा बाहर निकल़ेया।

     हाली तिकर हिमाचली पहाड़ी च चार कवता संग्रह- जुड़दे पुल, रिहड़ू खोळू, चिह्ड़ू-मिह्ड़ू, फुल्ल खटनाळुये दे, छपी चुक्केयो। इक्क हिंदी काव्य कथा "परमवीर गाथा सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल - परमवीर चक्र विजेता" जो सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली ते 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहित्य सम्मान 2018' मिली चुकेया।

    हुण फेस बुक दे ज़रिये 'ज़रा सुनिए तो' करी नैं कदी-कदी किछ न किछ सुणादे रैंहदे हन।