Friday, June 18, 2021

तकनीकी परिवर्तन और हमारी भाषा



हिमाचली पहाड़ी भासा दे प्रेमी अपणिया भासा ताईं बड़े फिक्रमंद रैंह्दे। सारेयां जो ई लगदा भई असां दी भासा दिन-ब-दिन मरदी जादी। एह् गल काफी हद तक सही है। पर भासा पर कम भी होआ दा। तकनीकी सहूलियत मिल्ला दी। सूबे दी भासा अकादमी कनै ऐनआईटी हमीरपुर अनुवाद दा इक ऐप बणा दे। गूगल आळेयां कांगड़ी, मंडियाळी कनै महासुवी बोलियां दे कीबोर्ड बणाई ते। अज असां हिमाचली साहित्यकार भूपी जमवाल होरां नै इस बारे च ही गल करा दे। शायद तस्वीर थोड़ी साफ होऐ। गल तकनीका दे बारे च है इस करी असां एह् सवाल जवाब हिंदिया च करा दे, तां जे समझणे जो असानी रैह्।     

 

तकनीकी परिवर्तन और हमारी भाषा      

पहाड़ी दयार: गूगल जीबोर्ड पर हिमाचल की कांगड़ी, मंडियाली और महासुवी बोली को शामिल किया गया है। सिर्फ इन बोलियों के चुनाव के पीछे क्या कारण रहे होंगे? और इस काम में किन लोगों का योगदान रहा है

भूपी जमवाल:  गूगल कीबोर्ड पर कांगड़ी, मण्डियाली  और  महासुवी को शामिल करने के पीछे हिमाचल प्रदेश के किसी व्यक्तिविशेष की भूमिका नहीं है । छानबीन करने पर पता चला है कि गूगल के अपने ऑटोमेटेड सिस्टम से ही यह तय होता है कि किस किस भाषा का प्रयोग लोग आम तौर पर अधिक करते हैं। उसके बाद क्षेत्र विशेष की उन भाषाओं के बारे में गूगल टीम निर्णय लेती है। हिमाचल की इन भाषाओं के सम्बंध में यही हुआ है। इनके साथ विश्व भर की कई अन्य भाषाएं भी गूगल कीबोर्ड पर आईं थीं। 

 

पहाड़ी दयार: इन कीबोर्डों की उपयोगिता क्या है? उपयोगकर्ता हिंदी के कीबोर्ड की जगह इनका इस्तेमाल क्यों करेगा? क्या इस परियोजना और एनआईटी द्वारा विकसित किए जा रहे अनुवाद ऐप का परस्पर कोई संबंध है? अगर नहीं है तो भी उस प्रोजेक्ट के बारे में भी बताएं। 

भूपी जमवाल:  जहाँ तक इन कीबोर्ड्स की उपयोगिता का प्रश्न है , यह तीनों अभी शुरुआती दौर में हैं। कहीं कहीं तो केवल नाम और वर्णों के क्रम को ही बदला गया है। इन तीन भाषाओं के सम्बंध में यह ज्ञातव्य है कि महासुवी कीबोर्ड में शब्द भंडार अत्यंत सीमित है। मण्डियाली में कुछ बेहतर है जबकि कांगड़ी कीबोर्ड इन सबमें बेहतरीन बन पड़ा है। कांगड़ी कीबोर्ड में कई शब्दों को वॉइस कमांड से भी अच्छे से टाइप किया जा सकता है। हालांकि एक सबसे बड़ी कमी इन कीबोर्ड्स में यह है कि '' के लिए इनमें स्थान ही नहीं है। जबकि '' इंडिक कीबोर्ड में पहले से उपलब्ध था।

अब, क्योंकि इन  कीबोर्ड्स का अभी अपडेटेड वर्ज़न नहीं आया है, उपयोगकर्ता को इंडिक कीबोर्ड (मेरे मतानुसार) अधिक सुविधाजनक लगेगा। 

एनआईटी द्वारा विकसित किए जा रहे कांगड़ी हिंदी अनुवाद डिवाइस का इन कीबोर्ड्स के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। एनआईटी का प्रोजेक्ट एक ऐसा डिवाइस तैयार करने का था जो कांगड़ी का हिंदी और हिंदी का कांगड़ी भाषा में अनुवाद कर सके । इस प्रोजेक्ट के प्रथम चरण में अनुवाद के लिए डेटासेट बनाना था जिसमें पचीस-तीस साहित्यकार सम्मिलित थे और बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनिवर्सल डिपेंडेंसी के आधार पर कांगड़ी भाषा को क्वालीफ़ाई करवाना था , जिसमें हिमाचल प्रदेश के दो साहित्यकारों ने कार्य किया । यूनिवर्सल डिपेंडेंसी के अंतरराष्ट्रीय डैशबोर्ड पर वर्तमान में भारतवर्ष की कुल दस भाषाएं ही अब तक शामिल हो पाई हैं । हिमाचल प्रदेश की कांगड़ी भाषा इनमें से एक है।  

पहाड़ी दयार: इन परिवर्तनों का हिमाचली भाषा की मुहिम पर क्या असर पड़ेगा? क्या अब हिमाचल की एक नहीं अनेक भाषाएं होंगी

भूपी जमवाल:  जहाँ तक हिमाचली भाषा प्रश्न है, यह वही भाषा है जिसे हम पहाड़ी भाषा के नाम से जानते रहे हैं। लेकिन लगभग हर पहाड़ी क्षेत्र की भाषा को पहाड़ी कहा जाता है, इसलिए हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी भाषाओं को मिलाकर हिमाचली भाषा के सृजन की मुहिम छेड़ी गई। प्रदेश की कोई न कोई आधिकारिक भाषा तो होनी ही चाहिए परन्तु हिमाचल प्रदेश की एक भाषा बनाने की राह में अनेक भाषाओं का स्वतंत्र अस्तित्व एक बड़ा रोड़ा है। कांगड़ी , चम्बेयाली , मण्डियाली , कहलूरी , बघाटी आदि को कुछ हद तक मिलाकर एक बनाया जा सकता है। जनजातीय बोलियों को छोड़ भी दिया जाए तो भी सिरमौरी, महासुवी, कुल्लुवी

 
सिराजी आदि जिनका व्याकरण बिल्कुल अलग है उन्हें निचले हिमाचल की बोलियों के साथ मिलाना अत्यंत कठिन है। व्यावहारिक तौर पर पूरे प्रदेश के लिए एक भाषा की कल्पना करना मुश्किल है। किसी एक भाषा को उसे जानने, बोलने वालों की अधिक संख्या के आधार पर आधिकारिक भाषा ज़रूर बनाया जा सकता है।  

पहाड़ी दयार: तकनीक भाषा के प्रयोग की सुविधा बढ़ा रही है। इसके बरअक्स जीवन में हम अपनी भाषा बोली का कितना प्रयोग कर रहे हैं? आगे भाषा का किस प्रकार का भविष्य आप देखते हैं?

भूपी जमवाल  
भूपी जमवाल:  तकनीक निस्संदेह भाषा के प्रयोग में सुविधाएं बढ़ा रही  है। एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि अब बहुत से लोग अपनी  मातृभाषा का प्रयोग करते समय हीन भावना से ग्रसित नहीं होते।  सोशल  मीडिया की भूमिका भी इसमें बहुत अच्छी रही है। लोग अपनी  भाषा में  अपनी बात रखने लगे हैं। जहाँ तक भाषा के भविष्य का प्रश्न  हैनिश्चय ही  हमारी भाषा उन्नति के पथ पर अग्रसर होती रहेगी।  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर  पहचान होने से अब तकनीकी और भाषा विज्ञान के  आधार पर भी  विकास की पूर्ण सम्भावना है। शीघ्र ही वर्तनी और उच्चारण  सम्बन्धी  मानकीकरण होने की भी आशा है।  

Monday, June 7, 2021

यादां फौजा दियां

फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदेतिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती हैदूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा अठमा मणका।

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सहीदां दियां समाधियां दे परदेसे   

म्हारियां गड्डियां बोमड़िला दी चढ़ाइया हौळें-हौळें गोहा दियां थियां। मैं अपणिया सीटा पर संभळी करी बैठी गिया था कनै  चौकन्ना होई नै सहीदां दियां समाधियां जो सळूट करा दा था ता कि नायक यादव जो मेरे दिल-दमाके च चलदे तुफानें दा पता नीं लगे। 

बोमड़िला दी उचाई तकरीबन 7920 फुट है।  जुलाई महीनें तित्थू ठंड थी। बद्दळ रुक्खां दियां चूंडियां जो छुआ दे थे। बड़ा सांत महोल था। हालांकि बोमड़िला अरुणाचल प्रदेशे दे वेस्ट कामेंग जिले दा हैडकुआटर है पर तिस जमाने च  तित्थू सड़का च  या सड़का दे अक्खें-बक्खें कोई खास हळचळ नीं थी। सड़का दे कनारेयां च कुत्थी-कुत्थी झोपड़ियां सांहीं होटल थे जिन्हां जो देसी पहनावे च तित्थू दियां जणासां चलांदियां सुझदियां थियां। नायक यादवें मिंजो दस्सेया था कि तिन्हां ढाबेयां च खाणे जो दाळ-चोळ, मीट-मच्छी  कनै पीणे जो अपणी मरज़ी मुताबक चाह् कनै सराब मिली जांद थी। 

ग्लांदे हन् कि मध्यकाले च बोमड़िला तिब्बत दे साम्राज्य दा इक हेस्सा होंदा था।  किछ सबूत इसा गल्ला दे भी मिलदे कि तित्थू भूटान दियां जनजातियां दा राज होंदा था।   कुसी जमानें बोमड़िला दर्रे ते तिब्बत दे ल्हासा तिकर सिद्धा रस्ता जांदा था।  तिब्बत पर चीन दा कब्जा होणे दे परंत मते सारे बौद्ध भिक्षु एत्थू आई करी बस्सी गै थे।  तिस बजह ते बोमड़िला दे अक्खें-बक्खें बौद्ध संस्कृति दा बड़ा असर है। चीन कनै भारत दे बिच एह इलाका इक लम्मे समै ते झगड़े दी बजह रैंह्दा रिहा है।  सन् 1962 दी भारत-चीन जंग च चीनी फौजें बोमड़िला पर कब्जा करी लिया था पर बाद च चीनी फौज अपणे आप बापस चली गई थी। 

किछ देरा परंत असां बोमड़िला पार करी नै दूजे पासे दिया ढळाना च थल्ले जो उतरा दे थे।  ताह्लू दिक्खदेयां-दिक्खदेयां ही असां ते  थोड़ा कि दरेड्डें सड़का गास उपरा ते इक बड्डा ल्हा आई पिआ था, जिसदिया बजह ते म्हारियां दोयो गड्डियां रुकी गइयां थियां।  तिन्हां वक्तां च तिस पासें प्राइवेट गड्डियां नीं सुझदियां थियां।  

मै अपणिया गड्डिया ते उतरी करी नै टूआइसी साहब होरां व्ह्ली  गिया था।  सैह् भी अपणिया जोंगा ते सड़का पर उतरी आयो थे।  तिन्हां ल्हाए बक्खी नजर देई करी अंदाजा लगादेयां बोलया था कि शैद ही तैह्डी सड़क खुली सके।  तिन्हां मिंजो दोपहरां दा खाणा खाई लैणे तांईं ग्लाया था।  तिन्हां दिया गड्डिया च तिन्हां दा खाणा था पर मैं तां अपणा खाणा कन्नै लई करी चल्लेह्या नीं था।  मैं चुपचाप अपणियां गड्डिया व्ह्ली मुड़ी आया था कनै नायक यादव जो दपैहरां दा खाणा खाई लैणे दा ऑर्डर पास कित्ता था।  

मैं मनै-मनै च सोचा दा ही था कि यादवें अप्पू सोगी खाणा लियांदेया होंगा कि नीं, ताह्ली नायक यादवें पिच्छें बैठेयो जुआने जो गड्डिया च रक्खेयो खाणे जो नकाळणे तांईं उआज लगाई थी। सैह् जुआन गड्डिया ते इक बड्डा सारा पतीला, जिस च पूरियां कनै सब्जी भरियो थी, कड्ढी करी लई आया था। टूआइसी होरां दा डरैवर कनै सहायक भी अपणा खाणा लई करी असां व्ह्ली आई गै थे।  तिन्हां व्ह्ली भी सब्जी कनै पूरियां थियां। 

सफर दे वक्त फौजियां जो अक्सर पूरियां जां प्यूळे चौळ कनै सुक्की सब्जी दित्ते जांदे हन्।  खाणे नै भरोया पतीला गड्डिया दे बोनट पर रक्खी करी असां सारेयां मिली-बंडी करी खाणे दा मजा लिया था।  सारेयां अपणा-अपणा खाणा हत्थां च रक्खी करी खाह्दा था।  खाई करी घुल्लेया खाणा नायक यादवें ढक्की-संभाळी करी रक्खी लिया था। 

थोड़ी कि देरा परंत ग्रेफ (GREF) दे आदमी कनै मसीनां सड़का जो साफ करने तांईं आई गै थे।  तिन्हां फुर्तिया नै कम्म करी नै तकरीबन दो-ढाई घंटेयां च जीप नकाळणे लायक सड़क साफ करी दित्ती थी। बहोत बड्डे-बड्डे सपड़ां कनै पत्थरां जो टाह्णे तांईं तिन्हां बारूद दा बखूबी इस्तेमाल कित्तेया था। तिन्हां दा कम्म दिक्खी मैं हैराण रही गिया था। 

उप-कमान अफसर होरां मिंजो ताह्लू दस्सेया था कि तिन्हां दिया जोंगा तां निकळी जाणा था अपर वन टन गड्डिया जो नकाळनें जितणी सड़क खोलणे तांईं देर लगी जाणी थी।  तिन्हां मिंजो सड़क खुलणे तिकर तित्थू ही निहाळ करनें तांईं ग्लाया था कनै रस्ता साफ होंदेयां ही सैंगे (Senge) नांएं दिया जगह चले ओणे दी हिदायत दित्ती थी।  तिन्हां बोलेया था कि राती दे गर्म खाणे कनै सोणे दा इन्तजाम तित्थू ही था।  एह् दस्सी करी सैह् चली पै थे।  तिस इलाके च किह्ली गड्डी लई जाणे दे ऑर्डर नीं थे।  उप-कमान अफसर होरां दिया जोंगा कन्नै तित्थू रुकियां दो जीपां होर भी मिली गइयां थियां। 

तकरीबन इक घंटे परंत असां दिया गड्डिया जो भी अग्गे बद्धणे दा इसारा होई गिया था।  असां कन्नै गड्डियां दा इक काफला चला दा था।  मेरे पुच्छणे पर नायक यादवें दस्सेया था कि असां जो सैंगे पोंह्चणे जो नेह्रा होई जाणा था। 

तित्थू मैं दिक्खेया था कि मतियां ठाह्रीं सड़का दे कनारेयां पर बोर्ड लगेह्यो थे जिन्हां च लिक्खेया था, 'सावधान आगे पदमा नाच रही है'  तिन्हां दिनां च  देवानंद दी फिल्म 'जानी मेरा नाम' च एक्ट्रेस पदमा खन्ना दा इक नसीला नाच लोकां दियां यादां च ताजा था।  बोर्डे पर लिक्खोया होणे दे बावजूद पदमा मिंजो कुत्थी भी नचदी नजर नीं आई थी।  जाह्लू मैं तिसदे बारे च  नायक यादव ते पुच्छेया तां तिन्हां इक जोरे दी ठाठी मारी थी कनै ग्लाणा लग्गे थे, 'बाबू जी कृष्ण भगुआन दिया मेहरा ते भला होया कि असां जो पदमा दा नाच नजर नीं आया।'  मैं हैराण होई नै तिन्हां दे चेहरे बक्खी दिक्खदेयां बोलेया था, 'यादव, मैं समझेया नीं।'  'सर, जित्थू-जित्थू ग्रेफ वाळेयां एह् बोर्ड लगाह्यो हन तिन्हां ठाहरीं पर पहाड़ां ते पत्थर पोंदे हन।  इतणिया उपरा ते थल्ले बक्खी ओंदा इक निक्का देहा गिट्टा भी प्राण लई सकदा है।' 

मैं चुपचाप संभळी नै अपणिया सीटा पर बैठी करी, अग्गे बक्खी दिक्खदा होया, मनै ही मनै भगुआने नें बिनती करना लगेया था कि तैह्ड़ी पदमा दा नाच नीं होए। 


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शहीदों की समाधियों के प्रदेश में 

 हमारी गाड़ियां बोमडिला की चढ़ाई हौले-हौले तय करती जा रही थीं। मैं अब अपनी सीट पर संभल कर बैठ गया था और चौकन्ना हो कर शहीदों की समाधियों को सेल्यूट कर रहा था ताकि नायक यादव को मेरे हृदय में चल रही झंझानिल का अहसास न हो। 

बोमडिला की ऊँचाई लगभग 7920 फुट है। जुलाई महीने में वहां ठंड थी। बादल पेड़ों के शिखरों को छू रहे थे। हर तरफ शांत माहौल था।  यद्यपि बोमडिला अरुणाचल प्रदेश के वेस्ट कामेंग जिले का मुख्यालय है,  पर  उस जमाने में वहां सड़क पर या सड़क के आसपास कोई खास हलचल नहीं थी। सड़क के किनारे कहीं-कहीं झोपड़ीनुमा होटल थे जिनको पारंपरिक वेषभूषा में सज्जित वहां की औरतें  चलाती नज़र आईं थीं।  नायक यादव ने मुझे बताया था कि उन होटलों में खाने को दाल-चावल, मीट मछली और पीने को  अपनी रुचि के मुताबिक चाय अथवा मदिरा मिल जाती थी। 

कहते हैं कि मध्यकाल में बोमडिला तिब्बत के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। कुछ साक्ष्य इस बात के भी पाए जाते हैं कि यहां पर भूटान की जनजातियों का शासन रहा है। किसी जमाने मे बोमडिला दर्रे से तिब्बत के ल्हासा तक सीधा रास्ता जाता था| चीन के तिब्बत पर कब्जे के बाद काफी संख्या में तिब्बती  बौद्ध भिक्षु यहां आकर बस गए थे।  इसलिए  बोमडिला के आस पास बौद्ध संस्कृति का व्यापक प्रभाव है।  चीन और भारत के बीच यह इलाका लम्बे समय से विवाद का विषय बना रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीन  की सेना ने बोमडिला पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन बाद में चीनी सेना अपने आप वापस लौट गई थी। 

कुछ देर के बाद हम बोमडिला को पार कर दूसरी ओर की ढलान से नीचे उतर रहे थे।  तभी देखते ही देखते हम से थोड़ी सी दूरी पर आगे ऊपर से बड़ी-बड़ी चट्टानें और मिट्टी खिसक कर सड़क पर आ गई थी जिसकी बजह से हमारी दोनों गाड़ियां रुक गईं थी। उस समय उस सड़क पर प्राइवेट वाहन नहीं दिखते थे। 

मैं अपनी गाड़ी से उतर कर उप-कमान अधिकारी के पास गया था वह भी अपनी जोंगा से नीचे उतर आए थे। उन्होंने स्थिति का जायजा ले कर अंदेशा जताया था कि शायद ही उस दिन सड़क खुल पाए।  उन्होंने दोपहर का भोजन कर लेने के लिए कहा था।  उनकी गाड़ी में उनका खाना था पर मैं तो अपना खाना साथ ले कर आया ही नहीं  था। मैं चुपचाप अपनी गाड़ी की ओर लौट गया था। मैंने नायक यादव को दोपहर का भोजन कर लेने के लिए कहा था।  

मैं मन ही मन सोच रहा था कि  यादव अपने साथ खाना लाए होगें या नहीं तभी नायक यादव ने पीछे बैठे जवान को गाड़ी में रखा खाना निकालने के लिए आवाज दी थी।  वह जवान गाड़ी से एक बड़ा सा पतीला, जिसमें पूरियां और सब्ज़ी भरी थी, निकाल कर ले आया था। उप-कमान अधिकारी के ड्राइवर और सहायक भी अपना खाना लेकर हमारे पास ही आ गये थे। उनके पास भी पूरियां और सब्ज़ी थी। 

सफर के दौरान सैनिकों को अक्सर पूरियां अथवा पीला चावल और सूखी सब्जी दी जाती है। खाने से भरा पतीला गाड़ी के बोनट पर रख कर हम सभी ने मिल बांट कर भोजन का आनंद लिया था।  सभी ने खाना अपने हाथों पर रख कर खाया था। नायक यादव ने बचा  हुआ भोजन ढक-संभाल कर रख लिया था। 

कुछ ही देर में ग्रेफ (GREF) के आदमी और मशीनें सड़क को साफ करने के लिये पहुंच गये थे।  उन्होंने तेजी से काम करके लगभग दो-अढ़ाई घंटों में जीप निकालने लायक सड़क साफ कर दी थी। उन्होंने बड़ी-बड़ी चट्टानों को नीचे धकेलने के लिए विस्फोटकों का प्रयोग बड़ी कुशलता के साथ किया था। उनकी कार्य-कुशलता देख कर मैं दंग रह गया था। 

उप-कमान अधिकारी महोदय ने मुझे बताया कि उनकी जोंगा तो निकल जाएगी पर वन टन गाड़ी को निकालने जितना रोड साफ करने में देरी लगेगी। उन्होंने मुझे सड़क खुलने तक इंतज़ार करने को कहा था और उसके साफ होते ही सैंगे (Senge) नामक जगह पर आ जाने के निर्देश दिये थे जहां उन्होंने हमारा इंतज़ार करना था। उन्होंने बताया कि रात के गर्म खाने और सोने का प्रबंध वहीं होगा। यह कह कर वह चल दिए थे। उस क्षेत्र में अकेली गाड़ी ले जाने के आदेश नहीं थे। उप-कमान अधिकारी महोदय की जोंगा के साथ वहां रुकी हुई दो जीपें और मिल गईं थीं। 

लगभग एक घंटे के बाद हमारी गाड़ी को भी आगे बढ़ने का संकेत मिल गया था। हमारे साथ सैनिक गाड़ियों का एक काफिला चल रहा था। मेरे पूछने पर नायक यादव ने बताया था कि हमें सैंगे तक पहुचने तक अंधेरा हो जाना था। 

वहां मैंने देखा था कि कई जगह पर सड़क  के किनारे सूचना पट ( बोर्ड)  लगे हुए थे जिनमें लिखा था "सावधान आगे पदमा नाच रही है"। उन दिनों देवानंद की फ़िल्म 'जानी मेरा नाम' में अभिनेत्री पदमा खन्ना के एक मादक नृत्य की यादें लोगों की याददाश्त में ताजी थीं।  बोर्ड पर लिखा हुआ होने के बावज़ूद मुझे पदमा कहीं नाचती नज़र नहीं आई।  जब मैंने अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए उसके बारे में नायक यादव से पूछा तो उन्होंने जोर से एक ठहाका लगाया और कहने लगे, ' बाबू जी, कृष्ण भगवान की दया से अच्छा हुआ हमें अभी तक पदमा का नाच नज़र नहीं आया।'  मैंने हैरानी से उनके चेहरे की ओर देखते  हुए कहा, 'यादव, मैं समझा नहीं।' 'सर, जहां-जहां ग्रेफ वालों ने ये बोर्ड लगाए हैं उन जगहों पर पहाड़ों से पत्थर गिरते हैं। इतनी ऊंचाई  से नीचे आता एक छोटा सा पत्थर भी जानलेवा हो सकता है।' 

मैं  सहम कर चुपचाप अपनी सीट पर बैठे, आगे की ओर देखता हुआ, मन ही मन भगवान से  प्रार्थना करने लगा था कि उस दिन पदमा का नाच न दिखाई दे। (ऊपर दिया गया चित्र सांकेतिक है और इंटरनेट से लिया गया है।)


    भगत राम मंडोत्रा हिमाचल प्रदेश दे जिला कांगड़ा दी तहसील जयसिंहपुर दे गरां चंबी दे रैहणे वाल़े फौज दे तोपखाने दे रटैर तोपची हन।  फौज च रही नैं बत्ती साल देश दी सियोआ करी सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंट) दे औद्धे ते घरे जो आए। फौजी सर्विस दे दौरान तकरीबन तरताल़ी साल दिया उम्रा च एम.. (अंग्रेजी साहित्य) दी डिग्री हासिल कित्ती। इस ते परंत सठ साल दी उम्र होणे तिकर तकरीबन पंज साल आई.बी. , 'असिस्टेन्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस अफसर' दी जिम्मेबारी निभाई।

      लिखणे दी सणक कालेज दे टैमें ते ही थी। फौज च ये लौ दबोई रही पर अंदरें-अंदरें अग्ग सिंजरदी रही।  आखिर च घरें आई सोशल मीडिया दे थ्रू ये लावा बाहर निकल़ेया।

     हाली तिकर हिमाचली पहाड़ी च चार कवता संग्रह- जुड़दे पुल, रिहड़ू खोळू, चिह्ड़ू-मिह्ड़ू, फुल्ल खटनाळुये दे, छपी चुक्केयो। इक्क हिंदी काव्य कथा "परमवीर गाथा सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल - परमवीर चक्र विजेता" जो सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली ते 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहित्य सम्मान 2018' मिली चुकेया।

       हुण फेस बुक दे ज़रिये 'ज़रा सुनिए तो' करी नैं कदी-कदी किछ न किछ सुणादे रैंहदे हन।

Sunday, May 23, 2021

आम आदमी

 


मसहूर कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण दे आम आदमिए जो कुण नी जाणदा। तिह्दी महिमा अपरंपार है। 

इह्दिया महिमा दा रति'क गुणगान कुशल कुमार होरां भी कीता है। 


असां सारे आम आदमी हन। एह् होणा कोई माड़ी-मोटी गल नीं है। तुसां गलाणा जे सारे ही आम आदमी हन ता इस च होणे वाळी क्‍या गल है। बड़का जी गल एह है कि सारिया दुनिया च जितणे भी राजे, मंत्री, प्रधानमंत्री, नेते, अभिनेते, हाकम, कोतवाल, थाणेदार, डाक्‍टर, जज, वकील, लखारी, कविए, जे भी हन सब इस आम आदमी दी ही सेवा च हन। सबनां जो इस दी ही चिंता है, एह् जे किछ भी करदे इस दा नां लेई, इस ताईं, इस दिया तरफा ते ही करदे। इस दे नाएं दिया गंगा च एह् सब नौही गोरे होंदे रैंह्दे। सब इस आम आदमिए दिया लोई नें अपण्‍या दियां वाळा दे।

जिञा अंबरे च इक सूरज है तिञा ही इसा धरतु पर एह् आम आदमी है। सूरजे दा इक घेरा है, सैह तिस तोड़ी नीं सकदा, जिम्‍मेवारी है तिसा ते सैह् नठी नीं सकदा। इस आम आदमिए दा कोई घेरा ना जिम्‍मेवारी है। इस ताईं सारी दुनिया इक भंडारा है कनै इस जो इस दा पररीह्या मिलणा चाही दा। जे उन्नी-इक्की होऐ तिस ताईं बणाणे, खुआणे, पतळुआं देणे कनै चुकणे वाळे जिम्‍मेवार हन। एह् बचारा कुत्‍थी टूंडू ल्हांदा ही नीं, पतळुए च परीह्ता इन्‍नी खाई लिया। जूठा रही गिया या पतळू रस्‍ते च सटी ता। एह् भंडारे वाळयां दी गलती, तिन्‍हां दस्या नीं पिपळीं जादा पाई तियां। जूठा रही ईया। गलाणे दी गल एह है भई किछ भी होई जाऐ पर इस दी गलती नी होई सकदी। फिह्री भी चौंही पासें इस दी ही बळी चढ़दी।

हुण करोने जो ही लेई लेया। ऐह् कोई वुहान था गिया, जे मतलब नीं होऐ ता पुत्तर, बुढ़े ब्हाल नीं जांदा। सरकार पारिवारिक दूरियां दे माहिर आम आदमिए जो सामाजिक दूरी समझाई जा दी कनै एह् छिकड़े बराबर नीं ला दा। एह गलाई जा दी। इत इस जो गरीबी, बेरोजगारी, मंह्गाइया दे छिकड़े ता जनमां दे ही लगेयो। करोना दा इक होर लगी गिया। हुण छिकड़ा दर्जीएं ठीक नीं सीतया। टिरी जादां। दम घुट्टा दा ता ऐह् जरा की नक्‍के कड्डी लैंदा। इनीं बीड़ी-सीड़ी भी पीणी होंदी। आदत नीं है इस ताईं याद भी नीं रैह् दी। घेलर पुलसां वाळें पकड़ी लेया तैं छिकड़ा नीं लाह्या। घेलरें गलाया, लाह्या महाराज पक्‍का लाह्या। लाह्या ता मिंजों कैंह् नीं सुझा दा। मैं अन्‍हा है। नहीं महाराज तुसां ठीक हन मैं छिकड़ा घरें मेखा नैं लाह्या। तुसां जो किञा सुझणा।

पुलसां वाळें फिह्री भी चलान कटी ता। आम आदमी घेलरे जो समझा ही नीं आया एह कैस दा चलान पुळसिएं कटी ता। घेलर बचारा भी क्‍या करै। जितणियां भी बमारियां, समारियां, बद्दळ, बरखां, धुप्‍पे, सणाट, हाकम, सरकार, थाणेदार, चोर, लटेर सब इस आम आदमिए दे मुंडे पौंदे।  जेह्ड़े बमार हो दे सैह् हस्‍पताल जा दे ता बिस्‍तरा नीं, दुआईं नीं, ऑक्‍सीजन नीं। घेलर हौलदारे नें घुळी पिया। जे मेरे मुंहें ते करोना अंदर गिया ता मिंजो होणा। मैं बमार होणा। मरना ता मैं मरना। उपरे ते तू चलान मिंजो साही घेलरां दा ही कटी जा दा। एह् कदेह्या कनून है।

दशा दी गल है कि चौंही ध्‍याड़यां बाद घेलरे जो करोना होई गिया। हुण घेलर, हाई वो मेरिये माए एह क्‍या होई गिया। मैं मरी गिया ता कोपां दा क्‍या होंगा। सारी दुनिया बगैर मासकां घुम्मा दी, बजारां च लोग भंडोरे साही भुण-भुण करा दे। कोई नीं पुच्छा दा। कोई किछ नीं करा दा। घेलरे साही आम आदमी मरा दे कुसी दा क्‍या जा दा। हाई वो मिंजो हस्‍पताल लेई चल्ला।                                                              


Friday, May 7, 2021

यादां फौजा दियां

 

फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदेतिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती हैदूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा सतमा मणका।

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सहीदां दियां समाधियां दे परदेसे च 

ट्रक वन टन 4×4 निसान गड्डिया जो नायक याद राम यादव चला दे थे।  मैं तिन्हां बक्खें बैठेया था।असां दूंही दी सरासर बाक्मी गड्डिया दिया सीटा पर बैठेयां-बैठेयां ही होई थी।  नायक (ड्राइवर मैकेनिकल ट्रांसपोर्ट डी.एम.टी) याद राम यादव मद्धरे कद दे गोरे-चिट्टे तेजतर्रार जुआन थे। गड्डिया दे पिछले पासें भी इक जुआन बैठेया था। तिसदा ट्रेड टेलर (दर्जी) था।

फ़ौज च भर्ती होणे वाळे हर शख्स जो, चाहे सैह् कुसी भी ट्रेड दा होए, डरैवर होए, क्लर्क होए या फिरी कुक होए, बेसिक मिलिट्री सखळाई दे दौरान, छोटे हथियार चलाणा सखाए जांदे हन।  रैफळ, कार्बाइन मशीन, लाइट मशीन गन कनै ग्रेनेड छोटे हथियारां च गिणे जांदे हन।  इसते इलावा सारेयां जो हथियारे कन्नै कनै हथियारे बगैर ड्रिल, फील्ड क्राफ्ट (रणभूमि चतराई), जिस्म दी सखलाई बगैरा ते गुजरना पोंदा है। एह् मुढ़ली सखलाई तकरीबन पंज महीनेंयां दी होंदी है। इसा सखलाईया जो पास करने दे परंत अपणे-अपणे ट्रेड दी एडवांस सखलाई दित्ती जांदी है जिसा दी मियाद ट्रेड दे साह्बे नै लग-लग होंदी है।  वर्दी पहनणे वाला हर फौजी, चाहे कुसी भी ट्रेडे दा होए, इक लड़ाकू फौजी होंदा है।  हर फ़ौजिये दा अपणा इक हथियार होंदा है जेह्ड़ा फहाजता कन्नै यूनिट दे कोत च रक्खेया रैंह्दा है कनै ज़रूरत पोणे पर दित्तेया जांदा है। हर फ़ौजी अपणे हथियारे दिया साफ-सफाइया तांईं जवाबदेह होंदा है। हर फैरिंग भ्यासे दे पैह्लें कनै बाद च इलेक्ट्रिकल मेकैनिकल इंजीनियरज (.एम.) कोर दे आरमौररां ते हथियारां दी जांच-परख करुआणा लाजमी होंदी है। तिसते इलावा हर साल इक बरी हथियारां समेत गड्डियां, तोपां, रेडियो सेटां कनै होर मशीनां दी बरीकिया कनै जांच होंदी है जिस तांईं जुआनां जो कड़ी मेहणत करनी पोंदी है।

थोड़ी कि देरा परंत गड्डी तिसा ठाहरी जाई पूज्जी जित्थू रेजिमेंट दे उपकमाण अफसर होरां दिया गड्डिया कन्नै असां दिया गड्डिया दा मलाप होणा था।  ट्रक वन टन 4×4 निसान फौजा दी इक ताकतवर कनै भरोसेमंद मंझोली छोटी गड्डी होंदी थी।  राजस्थान दे रेतीले टिल्ले होंण जां फिरी बर्फीले पहाड़ां दियां सड़कां, तिसा गड्डिया सोगी सानिया कन्नै सट्टोसट्टियें गाहे जाई सकदे थे पर तिसा गड्डिया च पट्रोले दी खपत जादा थी। इक लीटर पेट्रोले कन्नै सैह् मातर दो-तिन्न किलोमीटर ही चली पांदी थी। तांहीं तां अज्ज सैह् गुजरे जमाने दी चीज बणी गइयो। डरैवरें गड्डी सड़का दे कनारें खड़ेरी दित्ती थी। असां थल्लें उतरी करी उपकमान अफसर होरां जो निहागणा लगे थे।

इक छैळ नजारा असां दे साह्मणे था।  असां दे हेठलें पासें कळ-कळ बगदिया टेंगा चू नदिया दे परले पासे दे पहाड़े गास भ्यागा दिया धुप्पा दा नजारा बड़ा लुभावणा था।  थोड़िया कि देरा परंत रूपा दे पासे ते इक जोंगा सरपे सांहीं सुझदिया सड़का पर उपरा पासें असां व्ह्ली ओंदी दुसह्णा लगी पई थी। कुसी जमाने च भारत दिया फौज़ा दा 'वार हॉर्स' कहाणे वाळी जोंगा च भी निसान दा सैही इंजन लगेया होंदा था जेह्ड़ा ट्रक वन टन गड्डिया च होंदा था। सैह् गड्डी ट्रक वन टन दे मुकाबले च इक निक्की गड्डी थी। जाहिर है कि सैह् गड्डी भी इक ताकतवर गड्डी होंदी थी पर इक लीटर पेट्रोले च सिरफ़ चार-पंज किलोमीटर ही चलदी थी। हुण एह् गड्डी भी तिहास बणी गइयो। किछ ही पलां च सैह् जोंगा आई करी असां दिया गड्डिया गांह् खड़ोई गई थी। लेफ्टिनेंट कर्नल साहब होरां गड्डिया ते उतरी करी असां दे सलूटे दा जवाब देणे ते परंत असां दा हाल-चाल पुच्छणा लगी पै थे।

गल्ल-बात करने दे टैमे मैं अपणे उपकमाण अफसर होरां ते पुच्छेया था कि मिंजो तित्थू अपणा नां गुप्त रखणे दी हिदायत देणे  दे पिच्छें क्या बजह थी।  तिन्हां  दस्सेया था कि रूपा बिच पहाड़ी तोपखाना ब्रिगेड दे हैडकुआटरे च कम्म करने तांईं म्हारिया युनिटा ते मेरे ट्रेड दा इक हवलदार टेम्पररी डियूटी पर ओणा था।  यूनिटें ब्रिगेड हैडकुआटर जो वायदा दित्तेया था कि जाह्लू हवलदार भगत राम आई जांह्गा तां तिसजो तिन्हां व्ह्ली भेजी दिंह्गे। इंञा यूनिटें इक तीरे कन्नै दो नसाणे लगाह्यो थेइक तां ब्रिगेड़ हैडकुआटरे जो अपणा जुआन तौळा भेजणे दिया गल्ला जो टाळणा कनै दूजा मेरे ओणे च होआ दी देरिया जो दूर करने तांईं ब्रिगेड हैडकुआटरे दा दखल हासल करना था। हुण हलात बदळी गैह्यो थे। मिसामारी बिच तिन्हां कन्नै मेरिया पैह्लिया मुलाकाता दा जिकर तिन्हां कमान अफसर होरां कन्नै कित्तेया था। मेरे इक छोटे जेहे कम्मे दा असर एह् होया था कि यूनिट मिंजो हुण हर कीमता पर अप्पु सोगी रखणा चांहदी थी। मेरे ओणे च देरी होणे दी बजह ते मती सारी खतो-किताबत होई थी कनै रूपा बिच तिस पहाड़ी तोपखाना ब्रिगेड हैडकुआटरे च कम्म करने वाले मते सारे लोकां जो  मेरे नां  दी जाणकारी थी।  इस तांईं मेरे तित्थू पोंह्चणे जो छपाया जाह्दा था। जेकर ब्रिगेड हैडकुआटर च कुसी जो मेरे ओणे दी भणक लगी जांदी तां मिंजो तिन्हां तित्थू ही रोकी लैणा था। इक युनिट तांईं अपणे ब्रिगेड हैडकुआटर दे हुक्मा पर अमल करना ज़रूरी होंदा है।

दोह्यो गड्डियां हौळें-हौळें बोमडिला दी टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाइया जो चढ़ाह् दियां थियां।  पहाड़ी सड़क संगड़ी थी। थोड़ी की दूर चलणे परंत सड़का दे दूंहीं पासें पत्थरां दियां पट्टियां दा इक सिलसिला शुरू होई गिया जिन्हां च 1962 च चीन कन्नै होइया लड़ाइया च बोमडिला दियां ढलानां च शहीद होए असां देयां फौजियां दे नाँ खुदेह्यो थे। कुत्थी-कुत्थी सड़क हादसेयां दे सिकार बणेयो जुआनां दियां यादगारां भी थियां।  सन् 1962 दे भारत-चीन जुद्ध दे महाजोद्धा ब्रिगेडियर होशियार सिंह दे ब्रिगेड जो खीरी वनासकारी चोट इस बोमडिला च ही लग्गी थी। सहीदां दियां समाधियां ते होई नै गुज़रदे वक़्त मिंजो किछ होर देया बझोआ दा था। मैं हर इक समाधिया जो सलूट करदा जाह्दा था। तिन्हां सहीदां दे बारे च सोची करी मेरे मनें च भांत-भांत दे ख्याल ओआ दे थे।  मेरे दिल-दमाक कनै हाखीं साह्मणे तिन्हां जगहां च 1962 दे जुद्ध दे सीन ओआ दे थे। जिस्म च रोंगटे खड़ोआ दे थे कनै झुरमुरी बझोआ दी थी।  मैं, तिस वक़्त दे खतरनाक हलातां च देस तांईं अपनी जान देणे वाळेयां दियां यादां च, गुमसुम होई गिया था।  ताह्लू चाणचक नायक याद राम यादव दिएं वाजें मिंजो बचकाई दित्ता, 'बाबू जी, आप की तबीयत तो ठीक है न? मैं देख रहा हूँ आप मील पत्थरों को भी सेल्यूट करते जा रहे हैं (बाबू जी, तुसां दी तबीत तां ठीक है नमैं दिक्खा दा तुसां मील पत्थरां जो भी सलूट करदे जाह्दे हन)' नायक यादव दे एह् बोल सुणी नै मैं अपणियां सीटा गास संभली करी बैठी गिया था। 'हां यादव, मैं बिल्कुल ठीक हूँ' मेरा छोटा देहा जवाब था।

असां दी गड्डी किछ दूर अग्गें चलदिया जोंगा दे पिच्छें-पिच्छें तुरदी बोमडिला दिया चढ़ाइया चढ़दी जाह्दी थी।

 

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शहीदों की समाधियों के प्रदेश में 

ट्रक वन टन 4×4 निसान गाड़ी को नायक याद राम यादव चला रहे थे।  मैं उनकी बगल में बैठा था। हम दोनों का पहला संक्षिप्त सा परिचय गाड़ी की सीट पर बैठे-बैठे ही हुआ था। नायक (डी.एम.टी) याद राम यादव मंझोले कद के गौरवर्णीय तेजतर्रार नवयुवक थे। गाड़ी के पिछले भाग में भी एक  जवान बैठा था। उसका ट्रेड टेलर (दर्जी) था।

सेना में भर्ती होने वाले हर व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी ट्रेड का हो, ड्राइवर हो, क्लर्क हो या कुक हो, आधारभूत सैनिक प्रशिक्षण के दौरान, छोटे हथियार चलाना सिखाया जाता है।  छोटे हथियारों में राइफल, कार्बाइन मशीन, लाइट मशीन गन और ग्रनेड शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त हथियार के साथ व बिना हथियार कवायद, फील्ड क्राफ्ट (रणभूमि कौशल), शारीरिक प्रशिक्षण इत्यादि से गुजरना पड़ता है। यह आधार भूत प्रशिक्षण लगभग पांच माह का होता है। इस प्रशिक्षण से गुजरने के उपरांत  सैनिक को उसके ट्रेड का उन्नत प्रशिक्षण दिया जाता है जिसकी अवधि ट्रेड के हिसाब से अलग अलग होती है। हर वर्दी-धारी सैनिक, चाहे उसका ट्रेड कुछ भी हो, एक लड़ाकू सैनिक होता है। हर सैनिक का अपना एक हथियार होता है जो यूनिट के शस्त्रागार में सुरक्षित रखा रहता है और ज़रूरत पड़ने पर उसे जारी किया जाता है। हर सैनिक अपने हथियार की साफ-सफाई के लिए उत्तरदायी होता है। प्रत्येक फायरिंग अभ्यास से पहले और बाद में इलेक्ट्रिकल मेकैनिकल इंजीनियरज (.एम.) कोर के आरमौरर द्वारा हथियारों का निरीक्षण किया जाना अनिवार्य होता है। इसके अतिरिक्त वर्ष में एक बार हथियारों समेत गाड़ियों, तोपों, रेडियो सेटों व अन्य यंत्रों का सघन निरीक्षण होता है जिसके लिए जवानों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता है।

कुछ ही देर में गाड़ी उस जगह पर पहुंच गयी जहां यूनिट के उप कमान अधिकारी की गाड़ी से हमारी गाड़ी का मिलाप होना था।  ट्रक वन टन 4×4 निसान सेना की एक शक्तिशाली और भरोसेमंद मध्यम छोटी गाड़ी हुआ करती थी। राजस्थान के रेतीले टीले हों या हिमाच्छादित पर्वतों की सड़कें, उस गाड़ी के साथ आसानी से तय किये जा सकते थे पर उस गाड़ी में पेट्रोल की खपत की मात्रा अधिक थी। एक लीटर पेट्रोल से मात्र दो-तीन किलो मीटर ही चल पाती थी। तभी तो वह गाड़ी अब बीते जमाने की चीज बन गयी है। ड्राईवर ने गाड़ी  सड़क के किनारे खड़ी कर दी थी। हम गाड़ी से नीचे उतर कर  उप कमान अधिकारी महोदय की गाड़ी का इंतज़ार करने लगे थे।

एक खूबसूरत नज़ारा हमारे सामने था। हमारे नीचे की ओर कल-कल करती बहती  टेंगा चू (नदी) के उस पार के पहाड़ पर सुबह की धूप का दृश्य अद्भत था। कुछ ही देर में रूपा की तरफ से एक जोंगा सर्पाकार सड़क पर मोड़ काटती हुई ऊपर की ओर हमारी तरफ आती दिखाई देने लगी थी। किसी ज़माने में भारतीय सेना का 'वॉर हॉर्स' कहलाने वाली जोंगा में भी निसान का वही इंजन था जो ट्रक वन टन गाड़ी में था। अपेक्षाकृत यह एक छोटी गाड़ी थी। जाहिर है कि यह भी एक शक्तिशाली गाड़ी थी पर एक लीटर पेट्रोल से मात्र चार-पांच किलो मीटर ही चलती थी। अब यह गाड़ी भी इतिहास बन गयी है। कुछ ही पलों में वह जोंगा आकर हमारी गाड़ी से आगे खड़ी हो गई थी। लेफ्टिनेंट कर्नल महोदय गाड़ी से उतरे थे और हमारे सैल्यूट का  जवाब दे कर  हमारा हाल चाल पूछने लगे थे।

बातचीत के दौरान मैंने अपने उप कमान अफसर महोदय से पूछा था कि मुझे  वहां अपने आप को गुप्त रखने की हिदायतें देने के पीछे क्या प्रयोजन था। उन्होंने बताया था कि रूपा स्थित पर्वतीय तोपखाना ब्रिगेड के मुख्यालय  में हमारी यूनिट से  मेरे ट्रेड के एक हवलदार को अस्थाई तौर पर काम करने के लिए आना था। यूनिट ने ब्रिगेड मुख्यालय को बताया था कि जब हवलदार भगत राम आयेगा तो उसको उनके पास भेज दिया जायगा। इस तरह यूनिट ने एक तीर से दो निशाने साधे थेएक तो ब्रिगेड मुख्यालय को अपना जवान तुरंत भेजने की बात को टालना और दूसरा मेरे आने में हो रही देरी को दूर करने में ब्रिगेड मुख्यालय का हस्तक्षेप हासिल करना था। अब स्थिति बदल गई थी।  मिसामारी में मेरी उनसे पहली मुलाकात का जिक्र उन्होंने यूनिट के कमान अफ़सर महोदय से किया था। मेरे एक छोटे से काम से प्रभावित हो कर अब यूनिट मुझे अपने साथ रखना चाहती थी और मेरी जगह किसी और को भेजना चाहती थी। मेरे आने में देरी के कारण बहुत सा पत्राचार हुआ था और रूपा में स्थित उस पर्वतीय तोपखाना ब्रिगेड मुख्यालय में कार्यरत बहुत से लोग मेरे नाम से परिचित थे। इस लिए मेरे वहां आ जाने को छुपाया जा रहा था। अगर ब्रिगेड मुख्यालय में किसी को मेरे वहां आने की भनक लग गई होती तो मुझे वहीं रोक लिया जाना था। यूनिट को अपने ब्रिगेड मुख्यालय के आदेशों का पालन करना होता है।

दोनों गाड़ियां मंथर गति से बोमडीला की टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाई चढ़ रही थीं। पहाड़ी सड़क संकरी थी। कुछ दूर चलने के बाद सड़क के दोनों ओर पाषाण पट्टिकाओं  का एक सिलसिला शुरू हो गया जिनमें 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में बोमडीला की ढलानों में शहीद हुए हमारे सैनिकों के नाम खुदे हुए थे। कहीं-कहीं सड़क दुर्घटनाओं के शिकार बने सैनिकों की यादगारें भी थीं। सन् 1962  के भारत-चीन युद्ध के महायोद्धा ब्रिगेडियर होशियार सिंह के ब्रिगेड को अंतिम विध्वंसकारी आघात इसी बोमडीला में लगा था। शहीदों की समाधियों के बीच में से गुजरते हुए मुझे अजब सी अनुभूति हो रही थी। मैं हर समाधि को सेल्यूट करता जा रहा था। उन शहीदों के बारे में सोच कर मन में तरह-तरह के भाव उमड़ रहे थे। मेरे मन मस्तिष्क में उस स्थान पर 1962 के युद्ध के परिकल्पित दृश्य उमड़ रहे थे। शरीर में एक सिहरन सी अनुभव हो रही थी।  मैं विषम परिस्थितियों में देश रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सैनिकों की स्मृति में खो गया था। तभी नायक याद राम यादव की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया, 'बाबू जी, आप की तबीयत तो ठीक है न? मैं देख रहा हूँ आप मील पत्थरों को भी सेल्यूट करते जा रहे हैं।' नायक यादव के यह बोल सुनते ही मेरी तन्द्रा टूटी थी। मैं अच्छी तरह से संभल कर सीट पर बैठ गया था।  'हां यादव, मैं बिल्कुल ठीक हूँ' मेरा संक्षिप्त सा उत्तर था।

हमारी गाड़ी कुछ दूरी पर आगे चल रही जोंगा का अनुसरण करते बोमडीला की चढ़ाई चढ़ती जा रही थी।

        भगत राम मंडोत्रा हिमाचल प्रदेश दे जिला कांगड़ा दी तहसील जयसिंहपुर दे गरां चंबी दे रैहणे वाल़े फौज दे तोपखाने दे रटैर तोपची हन।  फौज च रही नैं बत्ती साल देश दी सियोआ करी सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंटदे औद्धे ते घरे जो आए। फौजी सर्विस दे दौरान तकरीबन तरताल़ी साल दिया उम्रा च एम.. (अंग्रेजी साहित्यदी डिग्री हासिल कित्ती। इस ते परंत सठ साल दी उम्र होणे तिकर तकरीबन पंज साल आई.बी, 'असिस्टेन्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस अफसरदी जिम्मेबारी निभाई।

      लिखणे दी सणक कालेज दे टैमें ते ही थी। फौज च ये लौ दबोई रही पर अंदरें-अंदरें अग्ग सिंजरदी रही।  आखिर च घरें आई सोशल मीडिया दे थ्रू ये लावा बाहर निकल़ेया।

     हाली तिकर हिमाचली पहाड़ी च चार कवता संग्रहजुड़दे पुलरिहड़ू खोळूचिह्ड़ू-मिह्ड़ूफुल्ल खटनाळुये देछपी चुक्केयो। इक्क हिंदी काव्य कथा "परमवीर गाथा सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल - परमवीर चक्र विजेताजो सर्वभाषा ट्रस्टनई दिल्ली ते 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहित्य सम्मान 2018' मिली चुकेया।

    हुण फेस बुक दे ज़रिये 'ज़रा सुनिए तोकरी नैं कदी-कदी किछ न किछ सुणादे रैंहदे हन।