पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Wednesday, May 6, 2026

मुंबई डायरी - अट्ठ

 


अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त अट्ठ।  

 

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रोजी-रोटी कनै भाषा-बोली

बड़ी पराणी गल्‍ल है। हिमाचल दे शिक्षा मंत्री  नारायण चंद पराशर होरां मुंबई च पहाड़ी गांधी दी स्‍मृति च इक पहाड़ी कवि सम्‍मेलन कराया था।  इक्‍की सभा च इस सम्‍मेलन दी गल्‍ल निकळी कनैं हिमाचल मित्र मंडल दे प्रधान गजेंद्र कटोच साहब गल्‍ला जो पहाड़ी भासा पर लई गै। हालांकि सैह् पहाड़िया च ही गल करा दे थे पर तिन्‍हां दा सुआल कनैं तंज पहाड़ी भासा पर था। तिनां दा गलाणा था कि पता नी कैंह् असां पहाड़ी भासा-पहाड़ी भासा करदे रैंह्दे। मुयो दिक्‍खा ता सही न इसा दी कोई लिपि है, न स्‍कूलां च इसा दी पढ़ाई होंदी। न कोई कताब मैं दिक्‍खी। उपरे ते दरयाए ऊआरले बोलदे मेरे को दरयाए पारले की भासा नीं ओती है। 

जितणा कि बणी पिया मैं इस सुआले दा जवाब दित्ता। मैं पुच्‍छया, कटोच साह्ब तुसां बोलदे असां राजेयां दे परुआरे ते हन। पराणे जमाने च ता राजयां दे सारे बही खाते पहाड़ी च कनैं टांकरी लिपि च लखोंदे दे थे। असां सैह् लिपि भुलाई ती कनैं हुण असां देवनागरी च पहाड़ी लिखदे। भासा कनै लिपि दो लग चीजां हन। इक भासा कइयां लिपियां च लखोंदी कनैं इक्‍की लिपिया च कई भासां लखोंदियां। जियां मतियां खड्डां दे मिलणे ते इक नदी बणदी तियां ही कइयां बोलियां ते इक भासा बणदी। निजी बैहसां कनैं सभां ते लावा इस सुआले पर मैं हिंदी-पहाड़ी च लेख भी लिखे। मिंजो साही होर भी हन  पहाड़िया दे वकील पर लगदा नीं इक्‍की भी बंदे दी सुई इस सुआले ते गांह बधी होऐ। 

भासा हौआ साही होंदी। जाह्लू  तिकर कोई नक्‍के न बूज्‍जै इसा दे होणे दा पता ही नीं लगदा। इस ताईं अपणिया सूइया जो ही गांह् बधाणे च खैर है। असल च माह्णूए दे जीणे दा सारयां ते बड्डा इक ही मुद्दा है - ढिड्ड भरना। ढिड्डे दी भासा दुइया भासां ताई जगह ही नीं छडदी। हालांकि कोई भी भासा ढिड्ड नी भरदी पर असां इस देसे दे लोग अंगरेजिया जो ढिड्डे दी भासा ही नीं बल्कि ज्ञान कनैं सत्‍ता दी भासा बी मनदे कनैं इसा नै प्‍यार करदे। अपणियां भासां जो गरांचड़ कनैं पिछड़िया समझी गलाणे च भी शर्म महसूस करदे। जिन्‍हां दा प्यार असां दियां अपणियाँ भासा हन तिन्‍हां दा बी रिश्ता कनैं ब्याह अंगरेजिया नै होया। हुण इस अवैध प्यारे जो जीणा मुस्कल है। बस कूणा बही नैं रोई ही सकदे।    

ढिड्ड ता मुनिया साही बैह्ला बदनाम है। इक बहाना है, सब मनै दी डुआरियां हन। लोग सूने साही जमीनां छड्डी बदेसां च मजदूरी करी खुश हन। हुण हिमाचली मुंडू मुंबई ढिड्ड भरना आए थे या सुपनयां पूरा करना। सुपनयां कनैं भी मुश्‍कल एह है कि ढिड्ड भरोया होअे तांही सुपने दिक्‍खी होंदे। इक सोच ऐह् बी है कि मुंबई च असां दी पैह्ली पीढ़ी कराची, लहौर-अंबरसरे दे पंजाबी बपारियां सौगी रसोइया बणी तिन्‍हां कनैं अपणे ढिड्ड भरना आई थी।     

मेरे ग्रां लाटे ते बी सारयां ते पैह्ले सुखानंद कनैं हरिभगत दो बुजुर्ग अजादिया ते पैह्लें ही बाया लहौर मुंबई च मिल मालकां दे रसोइए बणी ने पूजी चुक्‍कयो थे। इस ते बाद मेरे ताऊ अमरनाथ होरां ते प्‍चांह मेरे पिता होरां साही टैक्‍सी-डरैबरां दी लंघीर बध दी गई। मेरे पिता ब्‍हाल डरैबरां कनैं खानसामयां दुईं दे किस्‍से होंदे थे। मेरे पिता सौगी दीनानाथ जी टैक्सियां धोई डरैबरी सिक्‍खा दे थे। तिन्‍हां दे पिता कुसी सेठे दे घरें रसौइए थे कनैं सैह् इन्‍हां ताईं भी खाणा लई ओंदे थे। इक रोज मेरे पिता होंरा सैह् औंदे दिक्‍खी ले कनैं दीनाना‍थ जी जो छेड़ने ताईं पुच्‍छया। दीना नाथ खाणा खाई लिया। दीनानाथ होरां लापरवाही च जवाब दिता। मेरा खानसामा लेकर आ र‍हा है और हम खाणा खाणे के बाद केळा भी खाएगा। दीनानाथ जी दे पिता होरां एह् सुणी लिया। तिन्‍हां गुस्‍से च खाणे दे डब्‍बे दी चोट चळे च र्दई ती कनैं शुरु होई गै। खाएगा बाबा जी का। अज से खाणा लाणा बंद। 

एह् 1978 दी गल्‍ल है। दसियां ते बाद मैं टाइपिंग सिक्‍खी नौकरी तोपा दा था। मेरे इक्की पड़ेसिए दिया कंपणिया च इक नौकरी थी। तिनी मेरी एप्‍लीकेसन लाई ती। जादा नीं दो-चार ही लोक थे। मेरा टेस्‍ट, इंटरव्‍यू सब ठीक-ठाक होया। मनैजरें मिंजो अपणे केबिने च सद्दी नै बधाई दिती कनैं बैठणे जो गलाया। मेरे बैठ्यो-बैठ्यो ही कुछ लोकां आई ने मनेजर घेरी लिया। सैह् सारे अपणे ग्रांए दिआ इक्‍की कुड़िया जो एह् नौकरी दुआणा चाह्ंदे थे। आखर च मनेजरें तिसा कुड़िया जो नौकरी देई नैं मिंजो ते माफी मंगी लई। जगह मुंबई थी पर सैह् लोक मराठी नीं थे। सैह् मेरा बड़ा मुश्‍कल वग्‍त था। मैं दुखी, निराश होई नै बड़ी देरा तक सड़कां पर भटकदा रिह्या। 

कुसी जो कुत्‍थी भी बगैर भेदभाव ते रोजी-रोटी कमाणे कनै बसणे दी अजादी होणा चाई दी। एह् बड़ी बड्डी  तरक्‍की पसंद,  सोच है। क्‍या असल च एह् होई सकदा? जे दुयां प्रांता ते आई नै लोक एह् करा दे ता अपणी जगहां कनैं भासां ताईं लड़ने वाळयां महाराष्‍ट्र दे स्‍थानीय लोकां दी सोच किह्यां गलत होई सकदी। 

असल च इन्‍हां परिस्थितियां दे कारण ही बाला साह्ब ठा‍करे होरां दे आंदोलन जो मुंबई च जनसमर्थन मिल्‍ला। इस आंदोलन कनैं मिल्लियां नोकरियां दे बलबूते पर 1960 ते 1990 औणे तिकर हासिए पर रैह्णे आळे मराठी समाजे च इक नौंआ संप्‍पन्‍न, पढ़या-लिखया मध्‍य वर्ग आकार लई चुक्‍कया था। इसा सफलता दिया पूंजिया पर ही ठाकरे साह्ब दी पार्टिया दी बादशाहत अज्‍जे तिकर चल्ला दी।

जित्‍थू तिकर हिमाचलियां पर इस आदोंलन दे असर दी गल है, असां मुंबई च टैक्सियां साह्यी अपण्‍यां कम्मां कनैं बपारां च थे। नौकरियां च असां दी कोई खास हिस्‍सेदारी नी है। नां ही असां दी ऐसी कोई बड्डी संख्‍या है, जेह्ड़ी कुसी जो चुभै।  

बैसे दिक्‍खया जाए ता इक छोटी देई नौकरी कनै  मजदूरी करने ताईं अपणा घरबार, जमीन छड्डी परदेसी जगहा च आई नै बसणा सौखा कम्‍म नीं है। जितणी की कमाई होंदी तिसा च रोटी ता मिली जांदी पर छत नीं मिलदी। सेठां देआं मैह्लां कनैं कारखानयां दे अक्‍खे-बक्‍खें झु‍ग्गियां दे नरक बसदे। दो दिन पैह्लें हांगकांग दे कॉफिन घरां दा वीडियो दिक्‍खी नैं रुह कंबी गई। इन्‍हां नरकां बगैर मजदूर ता ग्रां च रोटी खाई सकदे पर सेठां कनैं सरकारां दे कम्‍म कनैं बपार-कारखाने नीं चली सकदे। इस सारे कारोबार च फायदा शोषण करने वाळयां पूंजी‍पतियां दा ही होंदा। अंगरेज कोई मूरख नीं थे। गन्नयां दी खेती कनैं खंडा देआं कारखानयां ताईं जहाजां च भरी नैं मजदूर लई जांदे थे। हुण ता असां अप्‍पू ही डंकी की डोंकी बतां च समाने साही लदोई पूजी जा दे।

 


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रोजी-रोटी और भाषा-बोली

बहुत पुरानी बात है। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन  शिक्षा मंत्री नारायण चंद्र पराशर जी ने मुंबई में पहाड़ी गांधी की स्मृति में एक पहाड़ी कवि सम्मेलन कराया था। एक सभा में उस सम्मेलन की बात निकली और हिमाचल मित्र मंडल के प्रधान श्री गजेंद्र सिंह कटोच जी बात को पहाड़ी भाषा पर लेकर चले गए। हालांकि वे पहाड़ी में ही बात कर रहे थे पर उनका सवाल और व्यंग्य दोनों पहाड़ी भाषा पर थे। उनका कहना था कि पता नहीं क्यों हम पहाड़ी-पहाड़ी करते रहते हैं। न इस भाषा की कोई लिपि है, ना स्कूल में पढ़ाई जाती है, न इसकी कोई किताब मैंने देखी है। नदी के इस पार का बंदा बोलता है कि मुझे उस पार वालों की भाषा नहीं आती है। 

जितना मुझ से बन पड़ा मैंने इस सवाल का जवाब दिया। मैंने पूछा कटोच साहब, आप लोग खुद को राज परिवार का बताते हैं। पुराने जमाने में राजाओं के सारे वही खाते पहाड़ी और टांकरी लिपि में लिखे जाते थे। अब हम लोगों ने वह लिपि भुला दी है और देवनागरी में पहाड़ी लिख रहे हैं। भाषा और लिपि दो अलग वस्तुएं हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जाती है और एक लिपि में कई भाषाएं लिखी जाती हैं। जिस तरह कई छोटी नदियों के मिलने से एक बड़ी नदी बनती है, उसी तरह कई बोलिया से एक भाषा बनती है। निजी बहसों और सभाओं के अलावा इस सवाल पर मैंने हिंदी और पहाड़ी में लेख भी लिखे हैं। मेरी तरह और भी पहाड़ी भाषा के वकील हैं पर लगता नहीं है कि एक भी बंदे की सुई इस सवाल से आगे बड़ी हो। 

भाषा हवा की तरह होती है। जब तक कोई नाक न दबाए इसके होने का पता ही नहीं चलता है। असल में इंसान के जीने का सबसे बड़ा एक ही मुद्दा है पेट भरना। पेट भरने की भाषा दूसरी सारी भाषाओं के लिए जगह ही नहीं छोड़ती है। हालांकि कोई भी भाषा पेट नहीं भर सकती है पर हमारे देश के लोग अंग्रेजी को पेट की ही नहीं बल्कि ज्ञान, ताकत और सत्‍ता की भी भाषा मानते हैं।  वे इसे प्यार करते हैं और इसकी पूजा करते हैं। अपनी भाषाओं को पिछड़ी और ग्रामीण मानते हैं। 

पेट तो मुन्नी की तरह बेवजह बदनाम है। एक बहाना है सब मन की उड़ाने हैं। लोग सोने जैसी कीमती जमीन छोड़कर विदेश में मजदूरी करके खुश हैं। अब हिमाचली युवा मुंबई में पेट भरने आए थे या सपने पूरे करने? सपनों के साथ एक मुश्किल होती है कि पेट भरा हो तभी सपने देखे जा सकते हैं। एक सोच यह भी है कि मुंबई में हमारी पहली पीढ़ी कराची, लाहौर और अमृतसर  के व्यापारियों के साथ रसोईया बनकर उनके और अपने पेट भरने आई थी।  

मेरे गांव लाहट से भी सबसे पहले सुखानंद और हरी भक्त दो बुजुर्ग आजादी के पहले ही वाया लाहौर मुंबई में मिल मालिकों के रसोइये बनकर पहुंच चुके थे। इसके बाद मेरे ताया अमरनाथ जी के पीछे मेरे पिताजी जैसे टैक्सी ड्राइवरों की कतार सी लग गई। मेरे पिताजी के पास टैक्सी-ड्राइवरों के साथ-साथ रसोइयों के भी किस्‍से होते थे। मेरे पिता के साथ दीनानाथ जी भी ड्राइविंग सीख रहे थे। उनके पिता किसी सेठ के घर खाना बनाने का काम करते थे और वह इनके लिए भी खाना लेकर आते थे। एक रोज मेरे पिताजी ने उन्हें आते हुए देख लिया और दीनानाथ जी को छेड़ते हुए पूछा भाई दीनानाथ खाना खा लिया? दीनानाथ जी ने लापरवाही में जवाब दिया। मेरा खानसामा लेकर आ रहा है और हम खाना खाने के बाद केला भी खाएगा। दीनानाथ जी के पिताजी ने यह सब सुन लिया। उन्होंने गुस्से में खाने के डब्बे को जोर से पटका और शुरू हो गए। खाएगा बाबा जी का। आज से तेरा खाना बंद। 

यह 1978 की बात है। दसवीं के बाद में टाइपिंग सीख कर नौकरी ढूंढ़ रहा था। मेरे एक पड़ोसी की कंपनी में एक नौकरी निकली थी। उसने उस पद के लिए मेरा आवेदन कंपनी में लगा दिया। ज्यादा नहीं दो-चार ही लोग थे। मेरा टेस्ट इंटरव्यू सब ठीक-ठाक हो गया। मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुलाकर बधाई दी और बैठने के लिए कहा। मेरे बैठे-बैठे ही कुछ लोगों ने आकर मैनेजर को घेर लिया। वे अपने गांव की एक लड़की को यह नौकरी दिलाना चाहते थे। आखिर में मैनेजर ने उस लड़की को नौकरी देकर मुझसे माफी मांग ली। जगह मुंबई थी पर वे लोग मराठी नहीं थे। वह मेरा बड़ा मुश्किल वक्त था। मैं दुखी निराश होकर बड़ी देर तक सड़कों पर भटकता रहा। 

किसी को कहीं भी बिना किसी भेदभाव से रोजी-रोटी कमाने और बसने की आजादी होनी चाहिए। यह एक बड़ी ही तरक्की पसंद सोच है। क्या असल में यह हो सकता है? यदि दूसरे प्रांत से आए लोग यह सब कर रहे हैं तो अपनी जगह और अपनी भाषा के लिए लड़ने वाले स्थानीय महाराष्ट्र के लोगों की सोच कैसे गलत हो सकती है।

असल में इन परिस्थितियों के कारण ही बाला साहेब ठाकरे के आंदोलन को मुंबई में इतना भारी  जनसमर्थन मिल सका। इस आंदोलन के कारण मिली नौकरियों के बलबूते पर 1960 से 1990 आने तक हाशिए पर रहने वाले मराठी समाज में एक नया संपन्न पढ़ा लिखा मध्य वर्ग आकार ले चुका था। इस सफलता की पूंजी पर ही ठाकरे साहब की पार्टी की बादशाहत आज तक चल रही है। 

जहां तक हिमाचलियों पर इस आंदोलन के असर की बात है, हम मुंबई में टैक्सी जैसे अपने कामों और व्यापारों में थे। नौकरियों में हमारी कोई खास हिस्सेदारी नहीं थी। न हमारी ऐसी कोई बड़ी संख्या है जो किसी को चुभ सके। 

वैसे देखा जाए तो एक छोटी सी नौकरी और मजदूरी करने के लिए अपना घर-बार जमीन छोड़कर परदेसी जगह में जाकर बसना कोई आसान काम नहीं है। जितनी कमाई होती है, उसमें रोटी तो मिल जाती है पर छत नहीं मिल पाती है। हमारे सभी शहरों में सेठों के महलों और कारखानों के अगल-बगल में झुग्गियों के नर्क बसते हैं। दो दिन पहले हांगकांग के कॉफिन घरों का वीडियो देखकर रूह कांप गई। इन नरकों के बिना मजदूर तो गांव में रोटी खा सकते हैं पर मालिकों और सरकारों के काम और व्यापार कारखाने नहीं चल सकते हैं। इस सारे कारोबार का फायदा शोषण करने वाले पूंजीपति व्यापारियों को ही होता है। अंग्रेज कोई मूर्ख नहीं थे, जो गन्नों की खेती और शक्कर के कारखाने के लिए जहाज में भरकर मजदूर ले जाते थे। अब तो हम अपने आप ही डंकी या डोंकी मार्ग से सामान लेकर खुद ही पहुंच जा रहे हैं।

ऊपर दिए गए चित्र जानी मानी चित्रकार निर्मला सिंह के हैं। पहली कृृृति का शीर्षक है होप और दूसरी का कन्ट्रास्ट। 28 अप्रैल से 4 मई तक निर्मला जी के चित्रों की प्रदर्शनी मुंबई स्थित जहांगीर आर्ट गैलरी में लगी थी और खूूब सराही गई थी। हमें भी इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। यहां ये चित्र उनके कैटलॉग से साभार लिए गए हैं। बगल के चित्र में खड़े हैं बाएं से - जुवी सिंह, जयशंकर, ओमा शर्मा, निर्मला सिंह, सुमनिका सेठी और अनूप सेठी। 


मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।


Monday, April 6, 2026

पुस्तक चर्चा

 


वरयाम सिंह होरां पिछलेयां पंजांह्'क सालां ते अपणी माबोली सराजी च कवता लिखा दे हन। तिन्हां दे तिन कवता संग्रह छपेयो हन। हिंदी समाज च वरयाम सिंह रूसी भाषा दे ज्ञाता कनै अनुवादक दे रूप च मशहूर हन। अनवाद दियां कोई दो दर्जन कताबां हन। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय च रूसी भाषा दे प्रोफैसर रिटैर होणे परंत अपणे घरैं बंजार रैंह्दे। कनै लोक संस्कृति, लोक भाषा पर चिंतन मनन लेखन करा दे। पिछले साल इन्हां दी कताब आई 'अपने आलोक में'। इस च इन्हां दियां सराजी कवतां कनैं तिन्हां दे हिन्दी अनुवाद हन। अज असां इसा कताबा पर गल करनी है। पैह्लैं पहाड़िया च फिरी हिन्दिया च। एह् समीक्षा अनूप सेठी नै लिखियो है। पर सारेयां ते पैह्लैं कुछ सुआल जुआब - असां सुआल भेजे कनै वरयाम होरां जुआब दित्ते। सुआल जुआब हिन्दिया च हन।   

वरयाम सिंह

प्रश्न 1:               ‘अपने आलोक मेंसंग्रह में आपके तीन सराजी कविता संग्रहों की मूल और हिन्दी कविताएं हैं। इन संग्रहों के नाम क्या हैं, ये कब कब कब छपे हैं?

वरयाम सिंह:     उछ़टी मारनी डिया संकलन 1983 में प्रकाशित हुआ था। 1986 में हिमाचल अकादमी द्वारा पुरस्कृत किया गया था। दूसरा संकलन प्रियाशे आपणे1988 में और तीसरा एहड़ौ हांह पेड़1997 में छपा था।

प्रश्न 2:              आपका दिल्ली और विदेशों में लंबा प्रवास रहा है। क्या ये कविताएं घर से दूर परदेस में रहते हुए लिखी गई हैं? इनका रचनाकाल क्या है?

वरयाम सिंह:     अधिकांश बंजार से बाहर दिल्ली और मास्को में रहते हुए। रचनाकाल: 1980-83, 84-86, 87-96

प्रश्न 3            अपनी बोली में लिखने की प्रेरणा कहां से मिली? क्या आपका सराजी लेखन हिमाचली भाषा के पचास साल पुराने आंदोलन से भी प्रेरित रहा है?

वरयाम सिंह:     प्रोत्साहन ठाकुर मौलू राम और चंद्रशेखर पुरोहित जी से। अपनी बोली में लालचंद प्रार्थी और महेश्वर सिंह जी के भाषण सुनना अच्छा लगता था। प्रेरणा मिली रूस के अवार भाषा के कवि रसुल हमजातोव से, विशेषकर मेरा दागिस्तान पुस्तक से। किसी हिमाचली आंदोलन से नहीं।

प्रश्न 4            आप हिन्दी में भी कविता लिखते रहे हैं। आप यह कैसे तय करते हैं कि कौन सी रचना किस भाषा में लिखी जाए?

वरयाम सिंह:     हिंदी कविता का पाठक अमूर्त-सा लगता रहा है। सराजी कविता का पाठक जैसे अपने साथ, अपने पास बैठा-खड़ा दिखाई देता है। विषय तय करता है कि हिंदी में लिखूं या सराजी में।

प्रश्न 5            आपने टेलिफोन पर भाषा और कविता के संबंध में कुछ कहा था। अगर मुझे गलत याद नहीं रहा है तो यह कि भाषा से तय होता है कि कैसी कविता लिखी जाएगी। कृपया इस प्रक्रिया को विस्तार से बताएं। क्या एक ही समय में लिखी जा रही हिन्दी और सराजी कविता पूरी तरह अलग होगी? यह मैं इसलिए भी पूछ रहा हूं क्योंकि एक तो मैं आपकी रचना प्रक्रिया में भाषा की भूमिका जानना चाहता हूं, दूसरे यह जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि आपकी सराजी कविता का कथ्य और डिक्शन प्रचलित हिमाचली कविता से अलग और आधुनिक भारतीय कविता के करीब है।

वरयाम सिंह:     कविता का मुहावरा और किसे संबोधित है रचना- यही तय करते हैं डिक्शन। हिंदी में मेरी आधी कविताएं सराजी जनपद के समाज और जीवन से जुड़ी हुई हैं।

प्रश्न 6            क्या आप अब भी सराजी में लिख रहे हैं? हिमाचली भाषा या भाषाओं के बारे में अब आप क्या सोचते हैं? पहले एक हिमाचली भाषा का आंदोलन था, अब अपनी अपनी भाषा का परचम है। हमें अपनी भाषाओं के बारे में क्या करना चाहिए?

वरयाम सिंह:     आजकल कविताओं से अधिक सराजी की शब्द-संपदा पर सोच और लिख रहा हूं। सामान्य जीवन से जुड़े शब्द हिंदी की अपेक्षा संस्कृत के समीप हैं, अर्थात तद्भव और तत्सम हैं- ऐसा क्यों? वाक्य रचना (syntax) हिंदी से अलग क्यों ? लोक रामकथा और कृष्णकथा तुलसीदास और व्यास कृत कथाओं से अलग क्यों ? आजकल ऐसे ही विषयों पर विचार चल रहा है।

प्रश्न 7            अपनी स्थानीय भाषा की कविता को हिन्दी में अनुवाद करने का अनुभव कैसा रहा? क्या दिक्कतें आईं और क्या आसानी रही?

वरयाम सिंह:     सबसे बड़ी दिक्कत वर्तनी की है। बहुत-सी ध्वनियां हैं जिनके लिए देवनागरी में वर्ण (अक्षर) नहीं। हम दोनों मैं और पत्नी तारा नेगी इस समस्या का हल ढूंढने में लगे हैं। तारा नेगी कहानियां रचते हुए और मैं कविताएं...।

प्रश्न 8            आपकी पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर चारों कोनों में चार मोटिफ हैं। क्या इनका कुछ विशेष आशय है?

वरयाम सिंह:     मोटिफ मुझे भी समझ नहीं आये। इन्हें हर पृष्ठ पर डाला है मेरे प्रकाशक ने जो कभी जे.एन.यू में अध्ययनरत थे। उन्होंने गंगा प्रसाद विमल के निर्देशन में बहुत वर्ष पूर्व पी.एच.डी. की थी।


सराजी कविता संग्रह : प्रियाशे आपणे 
                           

वरयाम सिंह दियां सराजी कवतां

वरयाम सिंह होरां दे कवता संग्रह अपने आलोक मेंजो पढ़ना इक जुदा जेह्या अनुभव था। वरयाम जेएनयू च रूसी पढ़ान्दे थे। रूस जाई नै पढ़ाई कीत्तियो कनै यूरोप भी घुम्मेया। रैह्णे आळे हन हन बंजार दे सराजी भाई। इन्हां दी मशहूरी रूसी दे अनुवादक दे तौर पर जादा है। हिंदिया च कवतां दियां दो कताबां हन कनै सराजी भाषा च तिन्न। अपने आलोक मेंकताबा च वरयाम होरां सराजी दियां तिन्नों ही कताबां दियां कवतां दे हिंदिया च अनुवाद कीतेयो हन। पैह्ली कताब 1983 च छपी थी - उछ़टी मारनी डिया। इसा जो हिमाचल अकादमिया दा इनाम मिल्लेया है। दूई कताब 1988 च आई - प्रियाशे आपणे। कनै त्री कताब 1997 च आई - एहड़ौ हांह पेड़। अपने आलोक मेंकताबा च इक्की पासैं सराजी है, दूए पासैं हिन्दी। मतलब असां दी सराजी कवता हिन्दी पाठके वह्ल भी पूजी गई। 

मैं अपणियां जादातर बोलियां समझी लैंदा पर कुछ नीं औंदियां। कुलुवी थोड़ी बौह्त समझा आई जांदी पर सराजी भाषा फर्क है। करड़ी लगदी। इस करी मैं पैह्लें इसा कताबा दियां कवतां हिंदिया च पढ़ियां, तिसते परंत सराजी च। बाद च एह् सोची नै हिंदी सराजी कठियां पढ़ियां भई दूईं भाषां च कवतां दा साादर्यबोध अक्खैं बक्खैं बझोई जाऐ। 

इसते पैह्लें मुंबइया दे अपणे कुशल कुमार होरां दी कताब मुठ भर अंबरआई थी। तिन् भी अपणियां पहाड़ी कवतां दा हिंदी अनुवाद अप्पू ही कीतेया है। तित्थी भी दोयो भाषां आह्मणो-साह्म्णै थियां। कुशले दी जुबान मेरियां जुबाना नै मिलदी है। ता पढ़ना सौखा रेह्या। कुशले दे अनुवाद दा डिक्शन भी पहाड़िया दे नेड़ैं है। मतलब तिन्हां दिया हिंदी अनुवादे आळी कवतां च कांगड़ी या पहाड़ी या हिमाचली भाषा दी खुशबू मिलियो हुंदी है। 

वरयाम सिंह दी कविता दा डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषां दे डिक्शन दे नेड़े है। गौर करने आळी गल है भई सराजी भाषा दिया कवता च आधुनिक भारतीय कविता दा डिक्शन मिल्लै। हुणे तक मैं जितणी हिमाचली कवता पढ़ियो, तिसा दा डिक्शन, तिसा दी बुनावट कनै बनावट, तिसा दा कथ्य लोक कनै पारंपरिक कवता दे नेड़ैं है। अपवाद छड्डी नै। हिमाचली कवता वाच्य कवता दे नेड़ैं है। 

वरयाम होरां दी कवता अपणे घर, परिवार, ग्रां, खेह्तर, बूटे, जंगल, सूबा, लोक वगैरह नै डुग्घा कनै आत्मीय संवाद करदी है। कवि अपणे परिवारे सौगी-सौगी लोक देवतेयां, ग्रां देयां लोकां दी जिंदगी कनै मने जो निरखदा-परखदा रैंह्दा है। पशु-पक्षियां, बूटेयां- बणां दी खोज-खबर लैंदा रैंह्दा है। इसा गल्ला दी तस्दीक कुछ कवतां दे नां ते होई जाणी है। जिंञा रोटी, बात (रास्ता), डागे (ढोर), डाब्बू कुत्ते ताईं, शोह्रू री खरी (बच्चे दा दुख), म्हारे लोके री बेटड़ी, गाड़ा री हाका (नदी दियां अवाजां), देओ रै खरै (दुख देवते दे), मंणश होर डागे (म्हाणू कनै पशु), देओ नारायण, साजे री धियाड़ (संगरांदी दा दिन), बाकरे बै (बकरे नै), मनुआळ (मोनाल), गुच्छी, हमें च़ेलू (पक्षी असां), पूळा (पूलें), टोहल (चट्टान), थकी खील (थकी गेयो फुल्ल), जुणा छ़ेके बुढ़ळे होई (बुड्ढे होई गेयो जेह्ड़े), वगैरा। 

अपणे आळे-दुआळे दे संसारे दे सुखां-दुखां, पीड़ां-तकलीफां, सुपनेयां-मुल्लां दी खोज-खबर सैह् अपणेयां इन्हां किरदारां दी मार्फत लई लैंदे।। इन्हां कवतां ते असां जो पता लगदा भई कवि अपणिया दुनिया च किंञा खड़ोतेया है। सैह् इसा दुनिया दा हिस्सा भी है कनै इसा ते बाह्र इसा दा गुआह भी है। एह् लिप्तता- निर्लिप्तता कनै साक्षी भाव सिर्फ प्राणी जगत तक ही नीं है। तिह्दी नजर अपणे देवते पर भी है, रुक्खे कनै टोह्ला पर भी है। मतलब कविए दिया पळोह्डा च सब किछ है। कविये जो इस सारे ब्रह्मांडे च अपणे यानी इंसाने दिया जगह दी भी खबर है। इसा कताबा दी अखीरली कवता है - मंणशू पृथ्वी रै यानी माह्णू पूथ्विया दे। इसा कवता च असां दिया पछाणा या अस्मिता दे स्तर खुलदे जांदे। जिंञा कविये तो अपणे इलाके च बुहालगलांदे। कुल्लू जिले च सैह् सराजीहै। सूबे च कुल्लुवी। मुल्के दिया राजधानिया च हिमाचलीकनै विदेसां च हिंदूस्तानी। कविये दी नजर ऐत्थी ही नीं रुकी। इसते बाद सैह् पृथ्वी ग्रह पर दिखदा। तिह्जो सारे लोक अपणे सक्के लगदे। फिरी सैह् इसा पृथ्विया च बसियो सभ्यता जो मंगल कनै शुक्र ग्रहे ते दिखदा। आखर च कविये दी दृष्टि असां जो सुझदी। सैह् बोलदा भई कौमां च भेदभाव है, इसी करी नै कुछ म्हाणू हन, कुछ म्हाणू नीं लगदे। मतलब असां दी सोच देह्यी होई गइयो है भई असां कुछ म्हाणुआं जो छोटे म्हाणू समझदे। जातीं दा भेदभाव कनै गैर बराबरी इसा विराट कल्पना च चंद्रमे च धब्बेयां साह्यी सुझदी। एह् भेदभाव असां दिया पृथ्विया पर मौजूद है। 

वरयाम होरां दियां कवतां च तिन्हां दी दृष्टि तिन्हां दे विषय कनै कवता दे ताणे-बाणे च सुझी जांदी। इसते अलावा तिन्हां दियां कवतां दे आखिर च इक युक्ति हुंदी है। मतलब इक्की किस्मा दा नचोड़ हुंदा है। कुछ उदाहरण दिक्खा। 

ढोर कवता डंगरेयां पर है। तिसा दे आखिर च इक विडंबना है,

डागै हूंदा डागै

ऐसा गौला कि तीया डागै।

पर कीबै हुंदा होळे

कोई मंणश

डागै?

 

डाबू कुत्ते पर लिखी कविता –

पिंझै ल्हाऊणै रै मकाबलै मंज़े

कूत्ते का मूकै मंणश निखली जोंहै।

....

हां आसा आपू, डाबुआ, मंणशा री ईज़त कौरनै आलौ

पर केह् कौरनी कूत्ते का भी कूत्ते मंणशा री ईज़त ! 


गाड़ा (नदी) री हाका कवता दा अंत दिक्खा –

आज़ ज़ेहे लागै हूंदै चैणदे बूण

शई हूर्ण चैणदे मंणश। 

वरयाम होरां दी कवता अपणे लोक जो सहज-संवेदन तरीके नै दिखदी है। भावुकता नीं है। सुक्के विचार भी नीं प्रीतेह्यो। बिंबां प्रतीकां कनै भाषा दा मता वजन नीं है। सहज-संवेदन दी डोरी पकड़ी नै मद्धम सुरे च सैह् अपणे लोक-संसारे जो साकार करदे। माता होऐ, याणा होऐ, रुक्ख होऐ, पशु होऐ, सैह् तिन्हां दे सुखे-दुखे दा ताणा-बाणा हौळैं-हौळें बुणी कढदे। कुती कुती व्यंजना-विडंबना दे स्हारैं दुख-तकलीफ उजागर होई जांदी है। 

बकरे पर लिखियो कवता पढ़ने परंत पाठके दे मने पर गुम जेह्यी चोट लगदी है। बकरे दी बचारगी कनै आदमिये दा लालच कवता खत्म होणे परंत भी गूंजदा रैंह्दा। इसा च व्यंग्य दी हौळी मार भी है।

दाच लागौ मूछ़ा च़कौऊंदौ...

चेह्ल-मरेह्ळी मची मसाले-हौल्जा ज़ंदर...

काआ-कूते बी पूजी बास 

जिन्हां लोकां बकरे जो बढणे, पकाणे, खाणे दी रीत बणाइयो है, तिन्हां दा जिक्र इसा कवता च नीं है। कवि बाकी सबनां दिया बेसबरिया दा जिक्र करदा कनै बकरे जो गलांदा भई तेरी जिंदगी हुण जादा नीं है बचियो। आदमिये दा जिक्र कीते बगैर बचारे बकरे नै होणे आळी हिंसा जो बिना भावुकता ते पेश कीतेया है। 

इन्हां कवतां दा अनुवाद वरयाम होरां अप्पू ही कीतेया है। शायद एह् इक्की तरीके दी पुनर्रचना है। तिन्नों संग्रह इन्हां दिल्ली रैह्ंदेयां लिखयो हन।     



वरयाम सिंह की सराजी कविताएं
 

वरयाम सिंह के कविता संग्रहअपने आलोक मेंको पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव था। वरयाम सिंह जेएनयू में रूसी भाषा के प्रोफेसर रहे हैं। मूलत: कुल्लू के बंजार इलाके यानी सिराज घाटी के बाशिंदे हैं। आप मुख्यतः रूसी भाषा से अनुवाद, विशेषकर काव्य अनुवाद के लिए विख्यात हैं। हिंदी में आपके दो कविता संग्रह हैं और हिमाचली सराजी में तीन कविता संग्रह प्रकाशित हैं।अपने आलोक मेंपुस्तक में वरयाम जी ने अपने तीनों सराजी काव्य संग्रहों की कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है। इनका पहला संग्रह है - उछ़टी मारनी डिया (1983) हिमाचल अकादमी द्वारा पुरस्कृत। दूसरा संकलन है प्रियाशे आपणे (1988) और तीसरा एहड़ौ हांह पेड़ (1997)

अपने आलोक मेंसंग्रह द्विभाषी है, एक तरफ सराजी कविता और दूसरी तरफ इसका हिंदी रूपांतर। इस तरह सराजी कविता हिन्दी पाठक तक पहुंचती है।   

हिमाचल में कई भाषाएं हैं। अधिकांश भाषाएं मुझे समझ आ जाती हैं। कुछ हद तक कुल्लुवी भी आ जाती है, लेकिन सराजी भाषा किंचित और भिन्न है, इसलिए उतनी आसानी से समझ में नहीं आती। इसलिए पुस्तक में मैंने पहले हिंदी रूपांतर पढ़ा बाद में सराजी। फिर दूसरे पाठ में सराजी और हिंदी दोनों साथ-साथ पढ़े। ताकि दोनों रूपों में कविताओं के सौंदर्य का भान हो जाए।  

इससे पहले मुंबई निवासी हिमाचली कवि लेखक अनुवादक कुशल कुमार का संग्रहमुठ भर अंबरआया था। उसमें भी कवि ने स्वयं पहाड़ी कविता का हिंदी में अनुवाद किया था और दोनों रूप आमने-सामने थे। कुशल की भाषा मेरी भाषा से मिलती है इसलिए उसे मैं सहजता से पढ़ सका था। कुशल के अनुवाद का डिक्शन भी पहाड़ी से मिलता जुलता है यानी उनके हिंदी अनुवाद में पहाड़ी या कांगड़ी या हिमाचली की सुगंध व्याप्त रहती है।  


वारयाम सिंह की कविता का डिक्शन आधुनिक भारतीय भाषाओं के करीब है। यह रेखांकनीय बात है कि सराजी भाषा में आधुनिक भारतीय कविता के डिक्शन की छटा देखने को मिले। अब तक जो हिमाचली कविता मैंने पढ़ी है, उसका डिक्शन, उसकी बुनावट और बनावट, उसका कथ्य लोक और पारंपरिक कविता के करीब दिखता है। हिमाचली कविता वाच्य कविता के अधिक करीब रहती है।  

वरयाम सिंह की कविता अपने घर, परिवार, गांव, खेत-खलिहान, पेड़, जंगल, प्रदेश, लोक आदि से आत्मीय और गहन संवाद की कविता है। कवि अपने घर के सदस्यों के साथ-साथ लोक देवताओं, गांव के लोगों के जीवन और मन:स्थितियों को निरखता-परखता है। पशुओं, पक्षियों, पेड़ों, जंगलों की खोज-खबर लेता है। यह बात कुछ कविताओं के शीर्षक से ही स्पष्ट हो जाएगी। जैसे रोटी, (बात) रास्ता, (डागे) ढोर, डाब्बू कुत्ते के लिए, (शोह्रू री खरी) बच्चे का दुख, हमारे इलाके की औरतें, नदी की आवाजें, (देओ रै खरै) दुख देवता के, मनुष्य और ढोर, देओ नारायण, संक्रांति का दिन, बकरे से, मोनाल, गुच्छी, (हमें च़ेलू) पक्षी हम, पूलें, (टोहल) चट्टान, (थकी खील) थक गए हैं फूल, बूढ़े हो गए जो, आदि। कोष्ठकों में सराजी भाषा के शीर्षक हैं। 

अपने आसपास की दुनिया के सुख-दुख, दुख-तकलीफ, सपनों-मूल्यों की खोज-खबर वे अपने इन पात्रों के जरिए लेते हैं। इन कविताओं से पता चलता है कि कवि किस तरह अपने संसार में स्थित है। वह उस दुनिया का हिस्सा भी है और उससे बाहर आकर इसका साक्षी भी है। यह लिप्तता और निर्लिप्तता तथा साक्षी भाव केवल प्राणी जगत तक ही सीमित नहीं है। उसकी नजर अपने देवता पर भी है, पेड़ और चट्टान पर भी है। यानी कवि के आगोश में सब कुछ है। कवि को इस सारे ब्रह्मांड में अपने यानी मनुष्य की स्थिति का भी पता है। संग्रह की अंतिम कविता हैमंणशू पृथ्वी रैयानीमनुष्य पृथ्वी के। इस कविता में हमारी पहचान या अस्मिता के स्तर खुलते चले जाते हैं। जैसे कवि के अपने इलाके में उसकीबुहालनाम से पहचान है, जिले में वहसराजीके नाम से जाना जाता है, राज्य के स्तर पर वहकुल्लुवीहै, देश की राजधानी मेंहिमाचलीऔर विदेश में वहहिंदूस्तानीहै। इसके बाद कवि पृथ्वी ग्रह पर देखता है तो उसे सभी देशों के नागरिक अपने परिजन लगते हैं। आगे वह पृथ्वी में बसी सभ्यता को मंगल और शुक्र ग्रह से देखता है। अंत में कवि की दृष्टि का परिचय हमें मिलता है, जब वह देखता है कि कौमों के भेदभाव के कारण कुछ मनुष्य दिखते हैं, कुछ मनुष्य नहीं दिखते हैं। यानी हमारी इस तरह की कंडीशनिंग हो गई है कि हम कुछ मनुष्यों को कमतर मनुष्य के रूप में देखते हैं। जातियों के भेदभाव का दंश या असमानता उसकी इस विराट कल्पना में चांद पर धब्बों की तरह दिखती है। और यह भेद हमारी पृथ्वी पर विद्यमान है। 

वरयाम सिंह की कविताओं में उनकी दृष्टि का पता उनके विषय चयन और कविता के ताने-बाने से चल जाता है। साथ ही कविताओं के अंत में उनकी एक अपनी युक्ति भी रहती है। एक तरह से उनका एक निष्कर्ष होता है। कुछ उदाहरण देखें। 

ढोर कविता पशुओं पर है। इसके अंत में एक विडंबना है, 

क्यों होते हैं मनुष्य 

मनुष्य होते हुए भी ढोर 

 

कुत्ते पर लिखी कविता की पंक्तियां हैं- 

पूंछ हिलाने की प्रतियोगिता में 

मनुष्य निकले हैं कुत्तों से आगे

कैसे इज्जत करें कुत्ते से भी कुत्ते आदमी की 

 

नदी की आवाज़ कविता का अंत इस तरह होता है- 

कराह रहे हैं जैसे आज जंगल 

कराह रहे होंगे मनुष्य कल  

वरयाम सिंह की कविता अपने लोक को सहज संवेदन के ढंग से देखती है। कहीं भी भावुकता या भाव विह्वलता नहीं है; शुष्क विचार प्रधानता भी नहीं है; बिंबों प्रतीकों और भाषा का अतिरिक्त भार नहीं है। सहज संवेदन की डोर पकड़ कर धीमे सुर में वे अपने लोक संसार को साकार करते हैं। माता हो, बच्चा हो, पेड़ हो, पशु हो, वे उसके सुख-दुख का ताना-बाना धीमे धीमे बुन देते हैं। कहीं-कहीं व्यंजना और विडंबना के माध्यम से दुख-तकलीफ उजागर होती है।  

बकरे पर लिखी कविता पढ़ने के बाद पाठक के मन पर गुम सी चोट लगती है। बकरे की बेचारगी और मनुष्य का लालच कविता के बाद गूंजता रहता है। व्यंग्य की धीमी मार भी वहां है। 

अपनी मूंछें हिला रहा है द्राट

...

पागल हुए जा रहे हैं मिर्च मसाले

...

कव्वों-कुत्तों तक पहुंच गई है

पक रहे बकरे की महक 

जिन लोगों ने बकरे को काटने, पकाने, खाने की परंपरा बनाई है उनका जिक्र इस कविता में नहीं है। कवि बाकी सब की बेसब्री का जिक्र करता है और बकरे को बताता है कि अब तेरा जीवन ज्यादा नहीं बचा है। मनुष्य के जिक्र के बिना बकरे जैसे निरीह प्राणी के प्रति हिंसा को भावुकता के बिना पेश किया गया है।  

इन कविताओं का सराजी से हिंदी में रूपांतरण वरयाम सिंह जी ने खुद किया है। शायद एक तरह से यह पुनर्रचना ही है। पंक्ति दर पंक्ति अनुवाद नहीं है। हो सकता है यहां तीनों संग्रहों में से चुनी हुई कविताएं ली गई हों। कहीं-कहीं कवि ने सराजी की कुछ पंक्तियों को हिंदी पाठ के लिए जरूरी नहीं समझा है। पर इससे कविता के कविता होने में कोई कमी नहीं आती है। चूंकि कवि खुद अनुवाद कर रहा है इसलिए वह इस तरह की छूट लेने के लिए स्वतंत्र है। कोई अन्य व्यक्ति अनुवाद करता तो शायद वह ऐसी छूट नहीं ले पाता।  

बहरहाल ! सराजी कविताओं का यह आस्वाद हिंदी पाठक के लिए सुखदाई है। इससे दूर दराज के समाज, वहां की भाषा की सामर्थ्य का अंदाजा हमें हो जाता है।  

सराजी भाषा में तीनों संग्रह वरयाम सिंह ने दिल्ली में रहते हुए लिखे हैं। इस बात का खास महत्व है। यह उनके अपने लोक, अपने मूल प्रदेश और अपनी भाषा के प्रति लगाव को तो प्रकट करता ही है, दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए अपनी मूल भाषा में कविता लिखने के लिए समर्पित रहना उनके बहुआमामी कवि व्यक्तित्व से हमारा परिचय कराता है। यह भी गौरतलब बात है कि ये सभी कविताएं अपने मूल प्रदेश से नालबद्ध हैं। दिल्ली जैसे महानगर का जीवन इनकी सराजी कविता में दिखाई नहीं देता। कविता और स्थानिकता की पड़ताल करने के लिए शायद वरयाम जी की हिन्दी और सराजी कविता का तुलनात्मक अध्ययन किए जाने की जरूरत है।   


वरयाम सिंह

जन्म : 1948। बाहू (बंजार), कुल्लू (हि. प्र.) में। आरंभिक शिक्षा बंजार में तथा बाद में रूसी अध्ययन संस्थान, जे.एन.यू., नयी दिल्ली से 1969 में बी.ए. (आनर्स)। 1969-71 में मास्को राज्य विश्वविद्यालय के रूसी साहित्य विभाग में विशेष पाठ्यक्रम। 1979 में यहीं से पी-एच.डी.। 1972 से जे. एन. यू, नयी दिल्ली में अध्यापन। 2013 से सेवानिवृत्त के बाद अपने गांव में।

हिन्दी में 'हिमाचल समाचार व अन्य कविताएँ' और 'दयालु की दुनिया' कविता-संग्रह। तीन कविता-संग्रह हिमाल प्रदेश के सिराज जनपद की बोली में। मुख्य काम कविता-अनुवाद के क्षेत्र में। बाहरवीं शताब्दी की कृति 'गाथा ईगर अभियान' से लेकर समकालीन रचनाकारों के अनुवाद।

मायकोव्स्की की क्रान्तिपूर्व की कविताएँ (1983), 'आधुनिक ब्येलोरूसी कविताएँ' (1986), मारीना त्स्वेतायेवा की कविताएँ 'आयेंगे दिन कविताओं के' (1988), 'कविता विषयक रूसी कविताएँ' (1989), बीसवीं सदी की रूसी कविताओं का संचयन 'तनी हुई प्रत्यंचा' (1994), किर्गीज महाकाव्य 'मनास' (1997), 'बेलारूसी कवि याँका सिपाकोव की कविताएँ 'काला ईश्वर व अन्य कविताएँ' (2002), अलेक्सांद्र ब्लोक की कविताएँ 'दूर की आवाज़' (2005) मारीना त्स्वेतायेवा की कविताएँ इस बेसहारा वक्त में (2013), निकोलाय जबोलोत्स्की की कविताएँ 'नियति की अज्ञात इच्छाएँ (2016), अफ़ानासी फ्येत की कविताएँ 'सृजन के सपने' (2020)। रूसी साहित्य पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख। कविता और कविता-अनुवाद के लिए हिमाचल अकादमी द्वारा दो बार पुरस्कृत, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् के आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार, रूसी संस्कृति मंत्रालय द्वारा पूश्किन पदक और किर्गीज राष्ट्रपति द्वारा 'मनास-1000' पदक, और भारतीय अनुवाद परिषद, नयी दिल्ली, वानीप्रिया फाउण्डेशन, कलकत्ता से सम्मानित।