पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Wednesday, February 4, 2026

मुंबई डायरी - सत्त


 अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त सत्त। 

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका दा कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घरे बक्‍खें ही था। तैह्ड़ी सारे देसे ते रोजी रोटी ताईं लोक अपणियाँ भासां लई मुंबई औआ दे थे। इक भासा बोलणे आळे शैह्रां च इक्की टबरे साही रैह्न्दे थे। जेह्ड़ा बी नौकर ग्रांए जो जांदा था, अप्पू  कन्नै इक दो जणे होर लई औंदा था। एह् सारे लोक इक्को देह्या ही कम्म करदे थे। जिञा हिमाचल ते मुंबई औणे वाले टैक्सियां नें मिलदे जुलदे कम्मां च ही थे। इन्हां च महाराष्‍ट्र दे ग्रां ते औणे वाले लोक भी शामल थे। मुंबई इन्‍हां सारयां रंगा दा कौलाज रचा दी थी। 

इन्हां समाजा देआं निजी स्कूलां ते अलावा नगरपालिका दे सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिन्दी, उर्दू, कन्‍नड़ कनैं सिन्धी भासा दे स्कूल ता मेरे लाके च मैं दिख्यो। कांगरेस कनैं अजादिया दे आंदोलन दी धुरी होणे दे कारण महात्मा गांधी जी दे स्वदेशी कनैं हिन्दी प्रेम दा मुंबई च असर था। मोह्ल हिन्दिया दी लीडरी च देसी भासाँ दा था। इस ते अलावा मिसनरी अंग्रेजी स्कूलां दा ता लग ही रुतबा था। एह् स्कूल घट कनैं देसी फ्री स्कूलां दिआ तुलना च बड़े मैह्ंगे थे। देसे जो अंगरेजां ते अजाद होयां जो हाली दस बीह साल ही होये थे। तिहाड़ी असां जो एह् अनुमान ही नीं था कि इसा अगंरेजिया स्‍कूलां ते असां दियां सारियां भासां दा बिस्तरा गोळ करी देणा है। 

मराठी ते अलावा गुजरात, राजस्‍थान, कनैं उत्‍तर भारत दे प्रांता ते औणे वाळयाँ दिआं सारियाँ भासां हिन्दिया ते करीब थियां। जित्थू तिकर खड़ी बोली हिन्दिया दी गल्ल है, एह् हिन्दी प्रातां च स्कूले दी भासा ता थी पर घरे दी भासा नीं थी। तिस जमाने दे अनपढ़ कने घट पढ़यां उत्तर भारत दे लोकां तांई एह् हिन्दी भी कुछ मुश्‍कल ही थी। इन्हां सारयां मिली जुली हिन्दी सिक्खी लई। इस च फिल्मां कनैं रेडियो पर बजणे वाळयां गीतां दा बड़ा हथ था। 

तिस जमाने च हिन्दी लगभग सारयां लोकां जो औणे वाले कल दी भासा लग दी थी। अज कणे नूरा कुस्ती वरोधे दे बाबजूद हिंदिया दे फलणे फुलणे च मराठी भाषियां दा बड़ा जोगदान है। अज भी एह् गैर मराठियां नैं गल्ल करने दी बारिया झट हिन्दिया च आई जांदे।

जे एह् देह्या मोह्ल नी हौंदा ता होरनां शहरां साही मुंबई च बी असां ते अपणी भासा सांभी नीं होणी थी। इत सारयां जो अपणिया भासा च गल्ल करदे दिक्खी नै सामणे वाले जो भी लगदा कि मिंजो भी अपणिया भासा च गल्ल करना चाई दी। इस शैह्रे च आई नें बसणे ताईं कुसी जो भी इस तांई अपणी भासा-बोली छडणा नीं पई।

1952 च कांगड़ा मित्र मण्डल बणांदे टैमे असां दे बुजुर्गां साह्मणै मुस्कल एह् थी कि कांगड़ा पंजाब दा इक जिह्ला था। जे सैह् कांगड़े देयां लोकां जो ही सद्स्‍य बणाणे दी शर्त रखदे ता मते सारयां पहाड़ियां छुटी जाणा था। तिन्हां भासाई अधार पर प्रांतां दे बणने ते पैंह्लैं ही भासा दे अधार पर मंडळ बणाई लिया था। मुंबई च रैहणे वाळा कनै पहाड़ी डोगरी बोलणे वाला कोई भी मेम्बर बणी सकदा था। असां दे बुजुर्ग भी मुंबई च रही नैं ही एह् सोची सके। 

सारयां ते बड्डी गल्ल एह् है कि भई तिहाड़ी भासा मुद्दा ही नीं था। रोजी-रोटी, गरीबी कनैं सिरे पर छत मुद्दा था। मुंबई देसे दे गबों-गब इक बड़ा बडा औद्योगिक शैह्र था। मजबूत पूंजीपतियां, बपारियां कनैं मजबूर मजदूरां दा शैह्र था। इस शैह्रे दी बणावटा कनै सार्वजनिक संरचना च अंगरेजां ते अलावा पारसी बपारियां कनैं ट्रस्‍टां दा सबते जादा योगदान था।

मराठी भासा ता इक प्रती‍क कनैं झंडा था। मुद्दा शैह्रे दिया दौड़ा कनै नौकरियां च मराठी भासियां दा पचांह् रही जाणा था। असल च ठाकरे साह्ब मराठी भासा-संस्‍कृति दे नाएं पर नौकरियां दी लड़ाई लड़ा दे थे। 

बाळा साब ठाकरे होरां 1960 च मार्मिक नांए दी कारटून व्यंग पत्रिका शुरु किती। इसा च इन्‍हा मराठी हितां जो मुद्दा बणाई नै सरकार, समाज, राजनीति कनैं व्‍यवस्‍था पर तंज कसी नै लोकां जो जागरूक करने दी मुहिम चलाई। मार्मिक दिया कामयाबिया ते उत्‍साहित होई नै इन्‍हां 1966 च शिवसेना पार्टी बणाई। उसते बाद लोक जुड़दे गै, कारवां बधदा गया। अज भी मुंबई कनै महाराष्‍ट्र दे सारयां सरकारी कनै निजी बडेयां संस्‍थाना च स्‍थानीय लोकाधिकार समितियां कम्‍म करा दियां। 

मुंबई च हिमाचलियां तांई इक लग देह्या आदर-मान था। 1981-82 दी गल है। हिमाचले ते सरकारी सांस्‍कृतिक टीम औआ दी थी। मुंबई दे सारयां ते बड्डे हॉल षणमुखानंद च कार्यक्रम था। हॉले वाळयां जो कोई परमिशन चाही दी थी। परमिशना ताईं पुलिस कमिश्‍नर दे दफ्तर जाणे दा कम्‍म मेरे हिस्‍सें आया। हिमाचल दा नां दिक्‍खी नैं तिन्‍नी अफसरें सारयां ते पैह्लें मिंजो सद्दी लिया। सैह् हिमाचल जाई नै आया था। हिमाचल देआं लोकां कनैं वादियां दी तरीफ करी नै तिसदा मन नीं भरोआ दा था। तिस ताईं इतणी दूर हिमाचली कनै संस्‍थां होणा चरजे दी गल थी। तिन्‍नी मिंजो चाह् भी पयाई कनैं हत्‍थों-हत्‍थ परमिशन पकाड़ाई ती।

जित्थू तिकर असां दी पहाड़ी भासा दा सुआल है।  असां इक्‍की पास्‍सें हिमाचली पहाड़ी जो अठमी अनुसूची च शामल करने दी लड़ाई लड़ा दे; दुएं पास्‍सें असा ब्‍हाल अपणियां बोलियां दे बारे च ही कोई साफ नजरिया नीं है। मुस्‍कलां ता हन पर मुश्‍कलां ते जादा असां अप्‍पू च तलोंदे रैंहदे। इस दे कारण लोग कनैं समाज बी दुविधा च ही रैंह्दा।

पिछले नवंबर च मैं अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्‍था संघ दे सम्‍मेलन ताईं अंबरसर गया था। तित्‍थू मैं एह् महसूस कीता कि पहाड़िया ने तमाम सहानुभूति होणे दे बावजूद कुछ लोकां ताईं पहाड़ि‍या च गल्‍ल करना वाक़ई बड़ा मुश्‍कल होई चुक्‍या। दुए पास्‍सें समाजे दे काफी बड्डे तबके जो लगदा कि पहाड़ी भासा तिन्‍हां दी हिमाचली पच्‍छैण दा कोई हिस्‍सा नीं है। एह् ग्रांए दी ग्रांचड़ बोली है। घरां-ग्रां च सभां-मौकयां च गाणे, बजाणे, नचणे नाटी पाणे ताईं ठीक है पर इसा जो ढोणे दी जरूरत नीं है। इक भाई साह्ब अंबरसर च हिमाचलियां दे बड्डे नेता कनैं इक्‍की संस्‍था दे बड्डे पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता कनैं पंजाबी दे बड़े अच्‍छे वक्‍ता हन। सैह् असां दे पहाड़ी दे मुद्दे जो लगभग खारिज करी नें विरेंदर वीर जी, रमेश मस्‍ताना जी कनैं मिंजो साही पहाड़ी दे वकीलां दी पंजाबिया च देई क्‍लास लेंदे कि सुणने वाळयां जो मजा आई जांदा।

पंजाबी इतणे प्‍यारे कनै विश्‍वास नै पंजाबी बोलदे कि कोई तिन्‍हां ने मिली नैं  पंजा‍बिया ते बची नै निकळी ही नीं सकदा। सैह् अपणिया जबाना जो इतणे प्‍यारे नें जींदे, गांदे, नचदे कि अज हिंदोस्‍तान ही नीं सारी दुनिया पंजाबी सुरां कनैं गीतां पर नच्चा दी। कोई जबरदस्‍ती नीं है। कोई रौळा, आंदोलन नीं है। इक मस्‍ती है तिसा जो सारे गळे लगा दे। सभा ते बाद बजारे च सिंधी समाज दे अध्‍यक्ष जेह्ड़े असां दे परमुख परोह्णे थे, इक्‍की सिंधी भाउए दिया दकाना मिली गै। सैह् दोयो पंजाबिया च गल करी जान। मैं पुच्‍छया बड़ी साईं सिंधी कतांह है? तिन्‍हां दस्सया ऐत्‍थू पंजाबी ही चलदी। मुंबई च ता हिमाचलिया साही लगभग सारे सिंधी अपणिया भासा च गल करदे पर पंजाब दी गल बखरी है। 

असां अपणिया भासां दी लड़ाई लड़ने वाळयां जो पंजाबियां ते सिक्‍खणा चाही दा। कोई रौळा पाणे कनै मारपिट करने दी कोई जरूरत नीं है। र्सिफ अपणिया भासा च मस्तिया नै जीणे कनैं गलाणे दी जरूरत है। लोक अपणे-आप अपणी भुली तुसां दी गलाणा लगी पोंदे। भासां साही कुछ मामलयां च सरकारां ते जादा समाजे दी चलदी। सरकारां कनै भारतीय भासा प्रेमी रही गै नारयां लगांदे। इस देसे देआं लोकां सारियां भारतीय भासां दा स्‍कूलां ते बिस्‍तरा गोळ करी नै ही साह् लिया। जेह्ड़े सरकारी स्‍कूल बच्‍चयां जो तरसा दे थे, अंगरेजी बणदयां ही बच्‍चयां नैं भरोणा लगी पियो। 

आखर च इक मुंबईकर पहाड़ी कनैं मराठी भासा प्रेमी होणे दे कारण मिंजो बड़ा दुक्‍ख होंदा जाह्लू कोई पुच्‍छदा कि मुंबई च एह् क्‍या होआ दा। दुख ताह्लू भी होंदा जाह्लू मैं अपणे ग्रांए च पहाड़िया च सुआल पुच्‍छदा कनैं जवाब पहाड़ी हिंदिया च मिलदा।

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका का कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घर के पास ही था। उस समय सारे देश से लोग रोजी-रोटी के लिए मुंबई आ रहे थे। जो भी गांव जाता था, अपने साथ एक दो जने और लेकर आ जाता था। यह सारे लोग एक जैसा ही काम करते थे। जैसे हिमाचल से मुंबई आने वाले टैक्सियों से मिलते जुलते काम ही करते थे। मुंबई इन सभी रंगों का एक कोलाज रच रही थी।

इन समाजों के निजी स्कूलों के अलावा नगर पालिका के सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिंदी, उर्दू, कन्नड़ और सिंधी भाषा के स्कूल तो मेरे इलाके में ही थे। कांग्रेस और आजादी के आंदोलन की धुरी होने के कारण महात्मा गांधी जी के स्वदेशी और हिंदी प्रेम का मुंबई में प्रभाव था। हिंदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं का माहौल था। इसके अलावा अंग्रेजी मिशनरी स्कूलों का एक अलग ही रुतबा था। यह स्कूल कम थे और भारतीय भाषाओं के स्कूलों की तुलना में महंगे थे। उस समय हमें यह अनुमान नहीं था कि इस अंग्रेजी ने स्कूलों से हमारी सारी भाषाओं का बिस्‍तरा गोल कर देना है। 

मराठी के अलावा गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के प्रांतों से आने वालों की भाषाएं हिंदी के करीब थीं। जहां तक खड़ी हिंदी की बात है, हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी स्कूल की भाषा तो थी पर घर की भाषा नहीं थी। उस जमाने में अनपढ़ और कम पढ़े लिखे उत्तर भारतीय लोगों के लिए भी यह हिंदी कुछ मुश्किल ही थी। इन सब ने मिलजुल कर हिंदी सीख ली। इसमें फिल्मों और रेडियो पर बजने वाले गीतों का बड़ा हाथ था। 

उस जमाने में लगभग सभी लोगों को हिंदी आने वाले कल की भाषा लग रही थी। आज के नूरा कुश्ती विरोध के बावजूद हिंदी के फलने-फूलने में मराठी भाषियों का बहुत बड़ा योगदान है। आज भी यह गैर मराठियों से बात करते समय झट से हिंदी में आ जाते हैं।

यदि ऐसा माहौल न होता तो दूसरे शहरों की तरह मुंबई में भी हमसे हमारी भाषा की संभाल नहीं होनी थी। यहां सबको अपनी-अपनी भाषा में बात करते देखकर सामने वाले को भी लगता है कि मुझे भी अपनी भाषा में बात करना चाहिए। इस शहर में बसने के लिए किसी को भी अपनी भाषा बोली छोड़नी नहीं पड़ी। 

1952 में कांगड़ा मित्र मंडल बनाते समय हमारे बुजुर्गों के सामने यह मुश्किल थी कि कांगड़ा पंजाब का जिला है। यदि कांगड़ा के लोगों को ही सदस्य बनाते हैं तो बहुत सारे पहाड़ियों ने छूट जाना था। उन्होंने भाषा के आधार पर प्रांतों के बनने से पहले ही भाषा के आधार पर मंडल बना लिया। मुंबई में रहने वाला पहाड़ी और डोगरी बोलने वाला कोई भी मंडल का सदस्य बन सकता था। हमारे बुजुर्ग भी मुंबई में रहकर ही ऐसा सोच सके। 

सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय भाषा नहीं बल्कि रोजी-रोटी, गरीबी और सर पर छत का मुद्दा था। मुंबई देश के बीचों बीच एक बहुत बड़ा औद्योगिक शहर था। इस शहर की बनावट और संरचना में अंग्रेजों के अलावा पारसी व्यापारियों और ट्रस्टों का भी बहुत बड़ा हाथ है। मराठी भाषा संस्कृति तो एक प्रतीक था। असल में ठाकरे साहब का मुद्दा शहर की दौड़ और नौकरियों में मराठी भाषियों का पीछे छूट जाना था। बालासाहेब ठाकरे ने 1960 में ‘मार्मिक’ नाम से एक कार्टून व्यंग्य पत्रिका आरंभ की। इसमें उन्होंने मराठी हितों को मुद्दा बनाकर सरकार, समाज, राजनीति और व्यवस्था पर व्‍यंग्‍य कर  लोगों को जागरूक करने की मुहिम चलाई। मार्मिक की सफलता के बाद उत्साहित होकर इन्होंने 1966 में शिवसेना पार्टी बनाई। उसके बाद लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। आज भी मुंबई और महाराष्ट्र के सभी सरकारी और निजी बड़े संस्थानों में स्थानीय लोकाधिकार समितियां काम कर रही हैं। 

मुंबई में हिमाचलियों के लिए एक अलग सा सम्मान था। 1981-82 की बात है। हिमाचल से सरकारी सांस्कृतिक टीम आ रही थी। मुंबई के सबसे बड़े षणमुखानंद हॉल में कार्यक्रम था। हाल वालों को किसी परमिशन की जरूरत थी। परमिशन के लिए पुलिस कमिश्नर के दफ्तर जाने का काम मेरे हिस्से आया। हिमाचल का नाम देख कर उन अधिकारी ने सबसे पहले मुझे बुलाया। वे हिमाचल जाकर आए थे और हिमाचल के लोगों और वादियों की तारीफ करके उनका मन नहीं भर रहा था। उनके लिए इतनी दूर हिमाचली और उनकी संस्था होना आश्चर्य की बात थी। उन्होंने मुझे चाय भी पिलाई और हाथों-हाथ परमिशन दे दी। 

जहां तक पहाड़ी भाषा का सवाल है, हम एक तरफ पहाड़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे पास अपनी बोलियों भाषाओं के बारे में कोई स्‍पष्‍ट नजरिया नहीं है। मुश्किलें तो हैं पर मुश्किलों से ज्यादा हम आपस में तुलना करते रहते हैं। इस कारण लोग और समाज भी दुविधा में है। 

मैं पिछले नवंबर में अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्था संघ के सम्मेलन में अमृतसर गया थाl वहां मैंने महसूस किया कि पहाड़ी के साथ तमाम सहानुभूति होने के बावजूद हमारे कुछ लोगों के लिए पहाड़ी में बात करना वाकई बहुत मुश्किल हो चुका है। दूसरी तरफ समाज के एक काफी बड़े तबके को लगता है कि पहाड़ी भाषा उनकी पहचान का कोई बड़ा हिस्सा नहीं है। यह गांव की ग्रामीण बोली है। घर गांव और सभाओं और अवसरों में गाने-बजाने, नाचने और नाटी डालने तक ठीक है पर इसे सिर पर ढोने की जरूरत नहीं है। 

अमृतसर में एक साहब हिमाचलियों के बड़े नेता, एक संस्था के बड़े पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और पंजाबी के बड़े ही अच्छे वक्ता हैं। उन्होंने हिमाचली पहाड़ी भाषा के मुद्दे को लगभग खारिज करते हुए वीरेंद्र वीर जी, रमेश मस्ताना जी और मेरे जैसे पहाड़ी वकीलों की पंजाबी में ऐसी क्लास ली कि सुनने वालों को मजा आ गया। 

सच में पंजाबी इतने प्यार और विश्वास के साथ पंजाबी बोलते हैं कि कोई उनसे मिलकर पंजाबी से बचकर निकल ही नहीं सकता है। वह अपनी जुबान को इतने प्यार से जीते, गाते और नाचते हैं कि आज हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया पंजाबी गीत-संगीत पर नाच रही है।

कोई जबरदस्ती नहीं। कोई आंदोलन नहीं। एक मस्ती है उसको सब गले लगा रहे हैं। सभा के बाद बाजार में सिंधी समाज के अध्यक्ष जो हमारे कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे, एक सिंधी भाई की दुकान में मिल गए। वह दोनों पंजाबी में ही बात कर रहे थे। मैंने पूछा सांई सिंधी कहां ? उन्होंने बताया कि वे आपस में पंजाबी ही बोलते हैं। मुंबई में तो हिमाचलियों की तरह लगभग सारे सिंधी अपनी भाषा में ही बात करते हैं पर पंजाब की बात अलग है। 

हम अपनी भाषाओं की लड़ाई लड़ने वालों को पंजाबियों से सीखना चाहिए। कोई शोर और मारपीट करने की जरूरत नहीं है। केवल अपनी भाषा में मस्ती से जीने और उसे बोलने की जरूरत है। लोग अपने आप अपनी भूल कर तुम्हारी बोलने लगते हैं। भाषा की तरह कुछ मामलों में सरकारों से ज्यादा समाजों की चलती है। सरकारें और भारतीय भाषा प्रेमी रह गए नारे लगाते हैं। इस देश के लोगों ने सभी भारतीय भाषाओं को स्कूली शिक्षा से बेदखल करके ही सांस ली। जो सरकारी स्कूल बच्चों के लिए तरस रहे थे, अंग्रेजी बनते ही बच्चों से भरने लग पड़े हैं। 

आखिर में एक मुंबईकर पहाड़ी और मराठी भाषा प्रेमी होने के कारण मुझे बहुत दुख होता है कि जब कोई पूछता है कि मुंबई में यह क्या हो रहा है। दुख तब भी होता है जब मैं अपने गांव में पहाड़ी में सवाल पूछता हूं और जवाब पहाड़ी हिंदी में मिलता है।

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।

Friday, January 16, 2026

पुस्तक चर्चा

 


अज पेश है कुशल कटोच दे दूए कनै नौंए कवता संग्रह पहाड़ बदळां दे दे बारे च कुशल कुमार दी समीक्षा। कुशल कटोच दा पिछला कवता संग्रह बदलोंदे रिस्ते पंदरा साल पैह्लें आया था। तदूं हिमाचल मित्र पत्रिका छपा दी थी। तिसा च कुशल कुमार नै ही समीक्षा कीती थी, हिंदिया च। तिसा समीक्षा दी फोटो भी असां एह्थी दया दे हन। कुशल कटोच ते असां चार सुआल भी पुच्छे थे। तिन्हां संक्षेप च उत्तर दित्तेयो। सैह् भी पेश हन। सौगी तिन्हां दियां तिन कवतां दी सौगात भी है।  


  सुआल जवाब   

दयार:     तुसां दा पिछला कविता संग्रह 2007 च आया था। असां हिमाचल मित्र च तिसदी समीक्षा भी छापी थी। सैह् भी कुशल कुमार होरां ही लिखी थी। एह् संग्रह पंदह्रां सालां परंत आया है। इन्हां साला च जुसां क्या बदलाव महसूस कीता?

कुशल कटोच:     पंदह्रां सालां च जमाना बदल्या, लोक बदले, लिखणे पढ़ने कनै सुणने दा महोल भी बदलोई गिया।

दयार:     इन्हां  सालां च तुसां दिया कवता च क्या बदलाव आया?

कुशल कटोच:     उमरा कनै जमाने बदलने नै सोच बदली कनै कवता दा रूप भी बदलया।

दयार:     तुसां दे मुताबिक इन्हां सालां च समूची पहाड़ी कवता च क्या बदलाव आए?

कुशल कटोच:     पहाड़ी कवता दे स्तर च तां नखार आया पर लिखणे पढ़ने बाले घटी गै।

दयार:     कताबां दे छपणे कनै बिक्री दे बारे चे तुसां दे क्या अनुभव हन? कनै क्या सुझाव हन?

कुशल कटोच:     कताबां छपणे कनै बिकणे च बड़ा बदलाव आया। हुण ऑनलाइन भी कताबां छपा कनै बिका दियां। कताबां छापणे कनै बेचणे तांई साहित्यकारां कनै सरकारा जो मिली ने सोचणा चाहि्दा, तां जे पहाड़ी कनै पहाड़ी साहित्य  जो संजोई ने रक्खी सकिये।


पहाड़ां भी कितणा कि झलणा

‘पहाड़ बद्दळां दे’  कुशल कटोच जी दे हिमाचली पहाड़ी कवता संग्रह दा शीर्षक है। जेह्ड़ा पहाड़ी मन पहाड़ां पर बद्दळां दिक्खी नै खुश होई गांदा था - ‘सौण म्हीना आया आइयां बरखा बहारां।’ हुण तिस जो पहाड़ पर चढ़यां बद्दळां जो दिक्खी नै रोणा औआ दा। इस साल ता इन्हां बद्दळां अति ही करी तियो। हुण एह् माह्णुआं दिया अतिया दा बदला है या कुछ होर?

माह्णुएं भी ता दुनिया दा नक्शा ही बदली तिया। पहाड़ां भी कितणा कि झलणा। माह्णुऐं छड्डया ई किच्छ नीं। खड्डां-नदियाँ, नाळ, झुडे़-बूटे, दरख़्त सब निगळी जा दा। पहाड़ां दी ता छेक्की-छेक्की छाणनी ही बणाई तियो। जरा कि जोरे दियां बरखा नै एह् छाणनी सारयां पास्सैं चुड़ना-रुढ़ना लगी पौआ दी।

कुशल कटोच होरां भाल पहाड़ी मुहाबरयां, पखैनां, सणोणियां दा खजाना है। कवता दी भासा कनै गल्ल गलाणे दा हुनर है। जीणे दियां मुस्कलां, समस्यां कनैं रोजकणे रोणे-धोणे, खिंज-धरीड़ां दी पच्छैण है। इस संग्रह दियां कवताँ इक आम माह्णुए दी सोच कनै सरोकारां जो बड़ी छैळ लय कनै रोचक अन्दाज च बयान करा दियां।

खास करी सरकारी नौकरां दी अपणिया मिडल क्लास बरादरिया पर कविए दी पैनी नज़र है। रटैर होणे पर भी त्रै कवतां हन। तनखाह  ते अद्धी पेन्सन मिलणे दा दुःख, रुतबा कनै पुच्छ घटी जाणे दा दुःख, घर, दुनियादारी दियां ज़िम्मेदारियाँ गळें पई जाणे दा दुःख। उपरे दे अपणे मने दा कम्म करने दी अजादिया दा नीं  रैह् दा दुःख। कोई कम्म नीं होणे दा दुख।

कवि इक्की कवता च गला दा-

नुक्सां कडणे वाला कैंह् लिखदा लखारिया।

इक ता जे नुक्स नी होण ता लखारियां क्या लिखणा? हालांकि एह् लिखणा भी नुक़्स कढणा ही है। उपरे ते नुक्सां कड्ढी निंदा करने दे सुखे साही कोई सुख नीं है। अपणिया स्थितिया कनैं हाले तांई दुए च नुक़्स कढणा ही मने जो जीन्दा रखणे दा ज़रिया है। कवि कुशल कटोच भी अपणिया इसा नुक्सां नीं कढणे दिआ लकीरा कन्नैं ज्यादा दूर तक नीं चली सकेया। कविये जो ता कुदरत भी नुक्सा नैं भरोइयी लग् दी। काह्ली बह्री जांदा। काह्ली धुप्प अग बह्रना लगी पौंदी। नोइंया पीढ़ियां च ता नुक़्स ही नुक़्स हन। मा बुढ़यां कनैं सयाणयां दा कोई मुल्ल कनैं पुच्छ नी है। ब्याह निभा दे नीं, झट तलाक होआ दे। इसा दुनिया झट मुकी जाणा। इक आम माह्णुए दिआं इन्हां सारियां पीड़ां जो इस  संग्रह दिआं कवतां बखूबी बयान करा दिआं।

असल च असां जिस बग्ते च जिया दे होंदे तिसने असां दी इक लड़ाई भी चला दी होंदी। सैह् वर्तमान करड़ा लगदा। तिस पर गुस्सा भी औंदा कनैं शिकायतां, तकलीफां दी भी असां भाल इक लम्मी कनैं कदी नीं मुकणे वाळी लिस्ट होंदी। जेह्ड़ा बीती गिया सैह् सोना होई जांदा कनै ओणें वाले दिक्खी करी डर लगदा।

कुशल कुमार
माह्णू सदियां ते अपणयां संस्कारां, आदर्शां कनैं इसा सोचा नैं अपणे बगते नै घुळदा कनैं घटोई-घटोई जीन्दा औआ दा। इस जो औणे वाली हर नोंई पीढ़ी संस्कार हीन, लापरवाह, रिश्तेयां कनैं बुजुर्गों दी अणदेखी करने वाळी लगदी।

गोह्टू, पेड़ू, बिलंगा पर लटकोइयां  खिन्दां, किट्ठे टब्बर, चुल्हे दिया कूणा लकड़ुआं दा ढेर, भेंपह्ले दियां फूकां जेह्ड़ियां चीजां नी रहियां। रळियां, रीति रिवाज, त्योहार जेह्ड़े लोक भुलदे जा दे। इन्हां सबना जो कवि याद करा दा।

एह् असां दे पहाड़ी कवता कनैं समाजे दे मुख स्वर है। शायद एह् गल सारयां ही समाजां पर लागू है। इस संग्रह दी भी ऐही देही तासीर है। छोटियां-छोटियां कनैं पढ़ने च असान कवतां हन। शायद इन्हां जो पढ़ने ते ज्यादा सुणने च मजा आई सकदा। कवि कुशल कटोच जी जो बधाई कनैं शुभकामनां।


  बदलोंदे रिस्ते : हिमाचल मित्र च पंदरा साल पैह्ललें छपियो समीक्षा  



           

(जे इन्हां तस्वीरां जो पढ़ने च मुस्कल औऐ ता डाउनलोड करी नै बड्डा करी नै पढ़ी सकदे।)


कुशल कटोच दियां तिन कवतां 

 

  1   

पहाड़ बद्दळां दे

पहाड़ां दिक्खी रोणां आया

जाह्लू जाह्लू है बद्दल छाया

 

खड्ड नाले सब काबू कित्ते

रूढे़ तां सरकारां पैसे नीं दित्ते

  

किछ रुढे़ किछ गै दबोई

कइयाँ दी पछाण नी होई

 

अजदा माह्णू किछ नी दिक्खा दा

खड्डां बिका दियां समशान बिका दा

 

रुक्ख कटोआ दे खिसका दे प्हाड़

थोड़िया ही बरखा नैं औआ दी बाढ़

 

खड्ड नालुयां रोकी घरां बणां दे

घरां बड़ै पाणी फिरी घबरा दे

 

घरे पर घर जगह् नी बचा दी

तांई तां फिरी हन बद्दळ फटा दे

 

सारेयां जीवां तांई ‘कुशल’ था रचेया संसार

माहणू ही माहणूं दुसदे सैह् भी है लाचार

 

  2   

इन्सानियत

क्या माह्णुऐं दी भी सोचगा कदी माह्णू

क्या माह्णुऐ दा दुस्मण ही रैंह्गां माह्णू

 

इन्सानियत अज खत्म होआ दी

जमीर माह्णुऐ दी जिञा सौआ दी

 

घायल माह्णु सड़का पर तड़पदा रैह्ंदा

मदद दिया जगह माह्णु वीडियो बणादा

 

अज माह्णु मारना मामूली गल्ल ऐ

इह्याँ तां बड़ा मुश्किल म्हारा कल ऐ

 

बमार माह्णु लाज्जे जो तड़फा दा

मरीज अज घरे बाल्लेयां जो खुड़का दा

 

लीडरी चमकाणे तांई हद पार करा दे

इन्सानियत दा नेता ही व्योपार करा दे

 

अज कुसी जो कुसी दी नीं रहियो पीड़

जींदे माह्णुऐं जो ही अग्ग लगा दी भीड़

 

खस्म जणांसां दा हुण रिश्ता रिहा नी

जरा गल होई नीं कनैं तालक लिया नीं

 

लगदा बड़ी सताबी मुकी जाणा इसा दुनिया

बच्चेयां जो संस्कार देया जे बचाणी दुनिया

 

 3    

लखारिया

सोचें जरा तू कुस तियैं लिखदा लखारिया

लिखे दा कदी असर भी दिक्खया लखारिया

 

घरे वाले दुखी रैंह्दें, कैंह् लिखदा ही रैंह्दां

सब ख़ुश रैह्ण, देह्या कैंह्नी लिखदा लखारिया

 

तेरा लिखया नीं है कोई रदि्दया दा ढेर मितरा

जे लिखें तु खरा ता केह्नी बिकदा लखारिया

 

अप्पू जो बड़ा बड्डा लिखारी तू है समझदा

तांई ता कुथी भी नी तू टिकदा लखारिया

 

लिख देहा कुशल जेह्ड़ा सभनां दे मने दा होऐ

नुक्सां कढणे वाला ही कैंह लिखदा लखारिया
 

कुशल कटोच
बदलोंदे रिस्ते कनै पहाड़ बद्दळां दे (हिमाचली पहाड़ी कविता संग्रह) 


Thursday, January 1, 2026

गल सुणा


दयार ब्लॉगे दे पंद्रह सालां दे सफर च कोई धूम-धड़ाका नीं रेह्या। बिल्हि्या लकड़िया नै अग बाळणे दी कोशिश है। घ्याना नीं बळी सकदा। इस सफरे च इस बरी गल सुणा पिछले साले दी।  


साल 2025 भी मुकी गया। पिछले साल 9 जनवरी दे गल सुणा च मैं हिमाचल मित्र पत्रिका कनै दयार ब्लॉगे दे चौह्दां सालां दे सफर दा चेता कीता था। 

इस बरी मैं 2025 जो पचांह् मुड़ी नै दिखणे दी कोसस करा दा। बारहां म्हीनयां च असां पंद्रा पोस्टां पाइयां। हर म्हीनें घटा ते घट इक पोस्ट ता पेयी पर अक्तूबर म्हीना सुक्का ही रेह्या। 

2024 च कुशल कुमार नै मुंबई डायरी लिखणा शुरू कीती थी। एह् डायरी पहाड़ी कनै हिन्दी दूं भाषां च छपा दी है। 25 जुलाई जो पैह्ली किस्त छपी थी। हिमाचली लोक मुंबई महानगरे च सौ साल पैह्लें लगे थे औणा। हौळें हौळें इक समाज एत्थू आई बसेया। इन्हां लोकां दियां संघर्ष गाथां अणमुक हन। कुशल होरां तिन्हां ही जिंदगियां दियां कथां सुणांदे। एह् डायरी मठी-मठी इस साल भी चली रैह्यी। छपियां सिर्फ तिन किस्तां पर पढ़ियां गइयां सबते जादा। पंज सौ ते जादा पाठकां एह् डायरी खोली नै दिक्खी। 

इस साल समीक्षां भी तिन ही छपियां। आशुतोष गुलेरी नै विनोद भावुक दे गजल संग्रह पर गल कीती। सैह् करीब अस्सी पाठकां पढ़ी। रमेश मस्ताना दे पहाड़ी साहित्य इतिहास पर भगतराम मंडोत्रा कनै राम लाल पाठक दी लोकगीतों में जीवन कताबा पर कुशल कुमार नै समीक्षा लिक्खी। एह् समीक्षां सौ-सौ ते जादा पाठकां पढ़ियां। 

पूरे साले च असां छे कवि छापे। दुर्गेश नंदन, तेज सेठी, राजीव त्रिगर्ती, भूपेंद्र भूपी, अशोक दर्द कनै रवींद्र शर्मा। इन्हां कवियां  जो चार सौ ते जादा पाठक मिल्ले। इस साल असां अनंत आलोक दी इक कहाणी भी छापी। 

मैं दो बरी गल सुणा लिखी। इक्की च दयारे पर गल कीती थी। दूइया च अपणी कविता लिखणे दे बारे च विचार कीता था। मिंजो भी तकरीबन दो सौ पाठकां पढ़ेया। 

एह् भी सच है भई एह् कोई पक्का नीं गलाई सकदा भई जिनीं दयारे दी पोस्ट खोह्ली, तिनीं पोस्ट पढ़ी भी लई होऐ। 

इस बरी कुल पंदरा पोस्टां पइयां। चौदह सौ पाठक आए। हुण तिन्हां रचना पूरी पढ़ी कि अधूरी ;  सिर्फ फेरी ही पाई या झाती मारी नै हटी गै असां किछ नीं गलाई सकदे। मन्नेया जे अद्धेयां यानी सत्त सौ सजनां भी ब्लॉग पढ़ेया होऐ ;  या इक चौथाई यानी तिन्नां सौआं ही पढ़ेया होऐ, तां भी असां जो संतोष ही है। असां दिया भाषां दियां कताबां बिकदियां नीं, बंडोदियां ही हन। तिन्हां पर गल बात भी घट–घट ही हुंदी। लेखक मित्तर भी संगड़ोई नै बह्यी रैंह्ंदे।  तिस स्हाबें ता एह् ट्रैफिक ठीक ही है। 

जेह्ड़े साहित्य प्रेमी दयारे पर फेरी पांदे, सैह् चुपचाप ही निकळी जांदे। कमेंट नीं करदे। खरा-बुरा कमेंट पाह्न ता अप्पू चियें वार्तालाप शुरु होणे दे हालात बणदे। असां जो पता लगदा असां कदेह्या कम करा दे, होर क्या करना चाहिदा। लेखकां जो भी तजा-नजा लगी सकदा भई सैह् कदेह्या लिखा दे। 

जेह्ड़ियां रचना असां छापियां, तिन्हां पर असां तब्सिरा नीं करदे । एह् जिम्मेवारी सुधी लेखकां कनै पाठकां दी है।  उमीद असां हाली छड्डी नीं है। इक दिन सैह् भी अपणी गल जरूर करगे।  जिन्हां लेखक मितरां वादे कीत्तेयो सैह् इस पूरे करगे।  

पोस्टां कनै जेह्ड़ियां तस्वीरां, चित्तरकारियां या फोटो असां दिंदे, सैह् कुछ सुमनिका दियां बणाहि्यां हुंदियां, कुछ इंटरनेट ते लैंदे। पिछले कुछ टैमे ते देहरादून ते असां दे प्रेमी शशि भूषण बडोनी दे रेखांकन असां जो मिल्ला दे हन। तिन्हां दा धन्नवाद। इसा बारिया उप्पर सुमनिका दी चित्रकृति है। 

कामना है अगला साल तुसां सारयां ताईं खुशहाली ल्यौये। असां दी भाषा रचनात्मकता नै समृद्ध होऐ। असां जो खूब नौइयां-नौइयां रचनां मिल्लण। दयार भी रचनात्मकता नै घणा हुंदा जाये।

नौआं साल मुबारक।  

अनूप सेठी
हिन्दी कविता संग्रह: जगत में मेला,
चौबारे पर एकालाप, चयनित कविताएं,
अनुवाद: नोम चॉमस्की -सत्ता के सामने


Tuesday, December 16, 2025

रवींद्र कुमार शर्मा दियां कवतां

 


पेश हन घुमारवीं, बिलासपुरे ते रवींद्र कुमार शर्मा होरां दियॉं तिन कवतां। 

इन्हां दे कविता संग्रह गुलदस्ते रे फुल्ल दी समीक्षा तुसॉं पैह्लें एत्थी पढ़ी चुकेयो हन। 

मूह्रली चित्रकृति : शशिभूषण बडूनी  


  1  

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

न पजदे हुण कोल्थ मित्रो

न पजदे हुण खेतें माह

मसर मुंगी बी नज़र नी औंदे

नज़र नी औंदी हुण किती बी कपाह

 

होल़ां किता ते खाणी मित्रो

न कोई हुण बाहन्दा बेरड़ा

मेहसीं नी तांजे पाल़नी किसी बी

खाणे जो किता ते मिलणा छेरड़ा

 

धान नी तां जे बाहणे मित्रो

तां हुणा नियाँ फेरी पराल

सडकां गाँवे गाँवे पूजी गईयाँ

हुण किसी नी चढ़ने क्वाल़

 

बल़द किसी घरा नज़र नी औंदे

जमीनां उज्जड़ पांदे देखे करसाण

चौल़ खाणे जो टोल़दे सारे

बाहणा नी चाहन्दा कोई भी धान

 

पैदल नी कोई चलदा मित्रो

रखी लई सबीं बाइकां कने कार

दिखावा बौहत करयादे सारे

पावें चकणा लोकां ते तवाहर

 

चिट्ठियां हुण कुण लिखदा मित्रो

बन्द हुई गई भेजणा तार

सुखसांद पल पल मिलदा रहन्दा 

तां जे जांदा कोई घरा ते बाहर

 

पढ़ने जो स्कूल बतेहरे मित्रो

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

मुंडू नी करदे कोई बी कम्म कार

लगिरे करने हुन चिट्टे रा व्यापार

  

  2  

बधी गई हर चीजा री भुख

अज्जकल जिसजो बी देखो

बधी गई हर चीजा री भुख

दो फुट जमीन खातर भाई दित्ते मारी

बड्ढी दिते छोटे बड़े सारे रुख

 

लूण पिपल़िया कने खाई कने बी करदे थे गुज़ारा

बौहत मुश्क़िला रे टैमा ई चकदे थे पैसा तवाहरा

ब्याज बौहत देणे पौन्दा था पर मुकरदे नी थे

साहूकार ब्याज़ा च ई लेई जांदा था फसला रा नाज सारा

 

पैसे री भुख अज्जकल सबीं जो बौहत ज़्यादा

मेहनत नी करनी पवो रातों रात अमीर बणना चाहन्दे

अपनी संस्कृति भुली कने करदे पुट्ठे कम्म

कई तां पैसे खातर चिट्टे रे गुलाम बणी जांदे

 

कोई नेता बणी कने अपना नांव चमकांदा

पुलसा री वर्दी पहनी कने बी कोई रिश्वत खाँदा

घरें बी किसिरे मन्जयां बिच मिलदे नोट

सोना चांदी बेहिसाब सब लौकरां बिच छुपांदा

 

दो वक्त रिया रोटियां खातर कोई दिन रात कमान्दा

धियाड़ी मज़दूरी बी करदा कने खेतां बी बाहन्दा

पूरी उम्र करदा रहया भ्यागा ते संजा तिक कम्म ई कम्म

पल्ले कुछ नी पया रहया जिंदगी भर करलांदा

 

जे भुख ज्यादा नी हुन्दी तां नी हुंदे कम्म खराब

इसे ज्यादा भुखे करी दिति दुनियां बर्बाद

जितना जे भगवाने दितिरा जे तितने च करो गुज़ारा

तां जिंदगी सुधरी जाणी कने जियुणे रा औणा नज़ारा

  

  3  

सीर गंगा

धर्मपुरा ते चलदी सीर गंगा

घुमारवीं रे लोकां री राणी

जून मिहने छिप नी मिलदी

कने बरसाती खूब पाणी पाणी

 

बम्मा रे रोपे ते तां जे निकल्दी बल खांदी

चाल तेरी मस्तानी कल कल बगदी जांदी

दुनियां जो पाणी देइ कने तारदी

करसाणा रे बेड़े पार लगांदी

 

घुमारवीं शहरा री तां तू ई जान

इक्क दिन पाणी नी आओ तां निकलदे प्राण

धर्मपुर, सरकाघाट जाहू बम्म तू लंघदी

पर लोक गंद पाई कने तिजो करदे बौहत परेशान

 

सीर गंगा रे कंडेह बणया बड़ा मन्दिर आलीशान

बड़ा छैल बणी गया हुण इत्थी रा मोक्षधाम

सवेरे शाम हुणी पूजा बजोना शंख कने घंटियां

आरती हुणी सीर गंगा री सवेरा कने शाम

 

पँजाह स्किमां पाणिए री चलदी

आराम नी करदी रात दिन रहन्दी बगदी

बरसाती तांजे मचांदी तबाई

पितर कम्बदे सारी दुनियां डरदी

 

कोई टैम था तां जे चलदे थे सीरा बौहत घराट

तड़के जांदे थे पीहण चक्की कने नेहरे दिसदी नी थी बाट

नेहरे ई जाणे पौन्दा था पंगयाठुआं रिया लोई

कई बार तां घराटा ई बीतदी थी सारी सारी रात

 

दुनियां री तू प्यास बुझान्दी

पर करदे तू पर सब अत्याचार

खुणी खुणी कने करी दिति डुग्गी

पील़े पंजे कने करदे तेरे सीने पर वार

 

चलदी चलदी पुजदी बलघाड़ी जाई

स्वागत करने जो शुक्र कने सरयाली बी आई

बड्डा चौड़ा डयाव तेरा मांडवे

राती बेले औखा लँगणा देंदी सबीं जो डराई

 

स्याणे ग्लान्दे थे भई सीर शुक्र कने सरयाहल़ी

तीनों जाई मिलदी बलघाड़ी

मुर्दा लैंदी दिहाड़ी

ईसा गल्ला जो अज्ज बी कोई नी सकदा टाल़ी

 

लोकां री सारी गंदगी तू टोह्ंदी

जख्मी करी दित्ती पियूले पंजे पर कदी नी रोंदी

चुपचाप चलिरी रहन्दी कदी नी करलांदी

बरसात स्याला होवे या होवे पावें तौन्दी


रवींद्र कुमार शर्मा
कविता संग्रह : गुलदस्ते रे फुल्ल