पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Sunday, July 12, 2026

पुस्तक चर्चा कनै बिलासपुर लेखक संघ

 


बिलासपुर लेखक संघ 1996 च बणया। तिसते परंत एह् लगातार लेखकां जो जोड़ने कनै पढ़ने लिखणे दी संस्कृति बणाणे दे कम्मे च लगेया है। इस साल इन्हां इक पहाड़ी कविता संकलन हिम वाग्धारा प्रकाशित कीती है। इसा कताबा दे संकलनकर्ता रवींद्र कुमार शर्मा हन। अज पढ़ा इसा कताबा पर अनूप सेठी दी समीक्षा पहाड़ी हिन्दी दूंई भाषां च। कन्नै ही रवींद्र कुमार शर्मा दी संघ दे कम्मां पर इक टिप्पणी भी है। 


                                                       

सोचणे वचारणे दी प्रेरणा देणे आळी कताब 

हिम वाग्धारा पहाड़ी कवता दा इक साझा संकलन है। एह् बिलासपुर लेखक संघें छापेया है। इस च पैंती कवियां दियां तकरीबन डेढ़सौ कवतां हन। एह् सारे ही कवि बिलासपुर लेखक संघ नै जुड़ेयो हन।

इसा कताबा च असां जो पहाड़ी कवता दे सौगी कवता, लोक, संस्कृति वगैरा दे बारे च सोच-वचार करने दे कई मुद्दे मिलदे हन। एह् इसा कताबा दी इक खूबी है।

अजकणे बग्तैं लेखक संघ औह्लैं होई गेयो हन। सैह् कदी-कदाएं गोष्ठियां संगोष्ठियां ता कराई लैंदे हन, कताबां छापणे दी जिम्मेदारी लेखक संघ नीं लैंदे। हिन्दिया च सहकारी प्रकाशन दी कोसस होई थी पर कामयाब नीं रही। बिलासुपर लेखक संघे दी एह् बड़ी खरी पैह्ल है। एह् कम्म पहाड़ी भाषा ताईं होया है, एह् होर भी महत्वपूर्ण है।पहाड़ी भाषा दा साहित्य हाली संगरोआ दा है। इसयो बाल लाणे दी जरूरत है। कवता छापणे दा मंच प्रदान करना अपणे आप च ही इक बड्डा सहयोग है। अजकला लेखक अपणियां कताबां अप्पू ही छापदे या प्रकाशके जो पैसे दयी नै छपांदे। देह् देह् महौले च लेखक संघे दा एह् कदम सराहणेजोग है।

इस संकलने दे कवि लग-लग पेशयां नै जुड़ेयो हन। इन्हां च मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अफसर, शिक्षाविद्, बैंकर, फौजी, फौजी अफसर, लग-लग विषयां दे अध्यापक-प्राध्यापक शामल हन। हिन्दी भाषा साहित्य पढ़ाणे आळे तां हन ही हन। लग-लग पेशयां च कम्म करने आळे कवियां दे जीवन अनुभव भी लग-लग होणे। तिन्हां दे एह् अनुभव तिन्हां दिया कवतां च कुस तरीके नै औआ दे, इह्दी पड़ताळ मजेदार होणी है। क्या इन्हां दी कवता पहाड़िया दी मौजूदा कवता च कुछ नौंए आयाम जोड़ा दी है या बणिया बणाइया लीका पर ही चल्ला दी है।   

संरूकृत दे विद्वान डाक्टर लेखराम शर्मा होरां अपणे श्रद्धा सुमनच कविता दियां कुछ कसौटियां दस्सियां हन कनै रचनां जो परखणे दी जिम्मेदारी समझदार पाठकां दे जिम्मै लाह्इयो है। तिन्हां दे वक्तव्य ते कुछ गल्लां ध्यान खिंजणे आळियां हन-

साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:

भर्तृहरि दे नीतिशतक दे इस श्लोके दा मतलब है-

जिस माह्णुए गैं साहित्य, संगीत कनै कला नीं हुंदी, सैह् साछात ऐसा जनौर हुंदा है जिसयो न पूछ लगियो हुंदी न सिंग।

 

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥

एह् श्लोक आचार्य मम्मट दे मशहूर ग्रंथ काव्यप्रकाशचा ते है। 

इह्दा मतलब है भई कविता लिखणे ताईं एह् चीजां चाहिदियां-  शक्ति, निपुणता, लोक व्योहार, शास्त्र, काव्यां दा अध्ययन, काव्य जाणने आळेयां ते शिक्षा लैणा कने काव्य रचना करने दा अभ्यास करना। 

डॉ. शर्मा होरां कालिदासे दे हवाले नै एह् भी गलाया है भई इन्हां रचना दा मूल्यांकन समझदार पाठक ही करी सकदे। एह् त्रैहो बिंदु बड़े जरूरी हन। समाज च कला साहित्य दी जरूरत सदा ही रैह्णी है। समाज दे बिच्च भावक या सहृदय होणा इ चाहिदे। इसी तरीके नै काव्य रचना करने दे जेह्ड़े कारक या शर्तां तिन्हां काव्यप्रकाशते गणाइयां, तिन्हां दा भी बड़ा महत्व है। कविये जो निपुण होणा ही पौणा है, तिह्जो लोक कनै शास्त्र दा ज्ञान भी होणा चाहिदा, सैह् काव्य दी पढ़ाई करदा होऐ मतलब तिह्जो अपणी काव्य परंपरा दा ज्ञान होऐ, तिनी कविता लिखणा सिक्खेया होए कनै सैह् कविता लिखणे दा अभ्यास भी करदा होऐ। कविता लिखणे दियां एह् कसौटियां या शर्तां असान नीं हन। असां चा ते मते सारे कवि शौकिया कवता लिखदे। इस करी नै शायद एह् कसौटियां पचौह्लैं रही जांदियां होण। असां मंझ ऐसे भी रचनाकार हन, जेह्ड़े पूरिया गंभीरता नै रचनाकर्म च रुज्झयो रैंह्दे। बग्ते दिया छाणनिया ही इन्हां सारेयां दे योगदान नै न्याय करना है। 

फिलहाल असां ताईं एह् जरूरी है भई असां दिया भाषा च लोक लिखा दे हन। कनै तिसयो प्रकाश च ल्यौणे दे सामूहिक प्रयास होआ दे। एह् सब किछ ऐसे समय च होआ दा है, जिस समय च भाषा-विमर्श कनै कला कर्म कई किस्मां दे बोझां हेठ दबोया है। भाषा अपणिया अस्मिता दी लड़ाई लड़ा दी है। तिसा दा एकीकरण नीं, विखंडन होआ दा है। जिंदगिया च कला संस्कृति दे नायें पर बड़ी भारी चकाचौंध नै लशकारयां मारदी होड़ लगियो है। तिस बिच असां दा लोक अपणी पछाण बचाणे कनै दसणे दिया होड़ा च हफ्फी-हफ्फी जा दा है। असां दिया भाषा दी कविता पचांह् छुटदे जा दे कनै इह्दे बदलोंदे जा दे इस लोकजो पकड़ने दी कोशश करदी बझोआ दी है। इसा शिनाख्ता च सैह् सारे साझे अतीत जो थम्मी रखणा चाह् दी है, कनै वर्तमान जो नकारदी चलदी है। कनै एह् सब कुछ कविता दे स्टीरियो टाइप साह्यी हुंदा है। असां जो कविता च जीवन अनुभव ते निकळयो महीन काव्य संसार दी निहाळप है। 

सुरु च मैं जिकर कीता था भई इस संकलने च शामिल कवियां चा ते कइयां हिंदिया च पीएचडी कीतियो है। हुण एह् गल मैं तां छेड़ी कैंह् कि पहाड़ी भाषा दी वर्तनी दा मानकीकरण करना बड़ा जरूरी है। दूई गल एह् भई असां दिया भाषा दे कई लफ्जां दी ध्वनि देवनागरी लिपि च सटीक तरीके नैं नीं लखोंदी। इस करी नै ऐसियां ध्वनियां ताईं कुछ खास चिह्न या नशाण बणाणा चाहिदे। कुछ दिन पैह्लें कुल्लुवी भाषा ताईं यतिन पंडित होरां चर्चा छेड़ी थी। लफ्जां दी वर्तनी दे मानकीकरण ताईं असां दे एह् विद्वान कवि बड़ा योगदान देयी सकदे। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे च योजना बणाई नै कम्म शुरु कराई सकदा। असां अपणिया भाषा दे लफ्जां जो अपणी जानकारी, समझ कनै अपणे इलाके दे उच्चारण दे स्हाबे नै लिखदे। इस करी नै वर्तनी बखरी-बखरी होई जांदी। इसा जो इक्को जेह्या बणाणे ताईं विद्वानां जो मेहनत करना पौणी है। 

इस संकलने दी भूमिका कनै कवि परिचय हिन्दिया च दित्तेया है। खबरै इस दे पिच्छैं एह् सोच होणी भई हिन्दिया दिया वजह नै पहाड़ी कवियां जो बड्डे फलक पर पेश कीता जाई सकै। पहाड़ी भाषा दे प्रेमी चांह्गे भई कवियां जो पहाड़ी भाषा च ही पेश कीता जाऐ। कवि परिचय बारे इक गल होर नी समझ आई भई कुछ कवियां दा परिचय बड़े विस्तार नै दित्तेया कनै कुछ कवियां दे सिर्फ नां ही हन। हालांकि इस संकलन दे जादातर कवि काफी टैमे ते लिखा दे हन कनै तिन्हां दियां कई कताबां भी छपियां हन।   


                                                      

 सोचने विचारने की प्रेरणा देने वाली किताब

हिम वाग्धारा पहाड़ी कविता का एक साझा काव्य संकलन है। इसे बिलासपुर लेखक संघ ने प्रकाशित किया है। इसमें पैंतीस कवियों की करीब डेढ़ सौ कविताएं हैं। ये सभी कवि बिलासपुर लेखक संघ से जुड़े हैं।

इस संकलन से हमें पहाड़ी कविता के साथ साथ कविता, लोक, संस्कृति आदि के बारे में सोच-विचार करने के कई मुद्दे मिलते हैं। यह पुस्तक की एक खूबी है।

आज के दौर में लेखक संघ ओझल से हो गए हैं। उनके परचम तले गाहे-बगाहे गोष्ठियां संगोष्ठियां हो जाती हैं। पुस्तक प्रकाशन की जिम्मेदारी लेखक संघ नहीं उठाते। एक जमाने में हिन्दी में सहकारी प्रकाशन की कोशिश हुई पर सफल नहीं रही। बिलासपुर लेखक संघ की यह एक स्वागतयोग्य पहल है। और यह काम पहाड़ी भाषा के लिए हुआ है, यह और भी महत्वपूर्ण है। पहाड़ी भाषा का साहित्य अभी विकास के रास्ते पर है। इसे तरह-तरह के समर्थन-सहयोग की जरूरत है। कविता के प्रकाशन का मंच प्रदान करना अपने आप में बड़ा सहयोग है। आजकल लेखक प्राय: खुद ही अपनी पुस्तकें प्रकाशित करते हैं या प्रकाशक को पैसा देकर छपवाते हैं। ऐसे माहौल में लेखक संघ का यह कदम सराहनीय है।

इस संकलन में शामिल कवि अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े हैं। इसमें मानव विज्ञानी, प्रशासनिक अधिकारी, शिक्षाविद्, बैंकर, सेनानी, विज्ञान गणित विषयों के अध्यापक-प्राध्यापक शामिल हैं ; हिन्दी भाषा साहित्य के अध्यापक-प्राध्यापक तो हैं ही। विविध क्षेत्रों के कवियों के जीवन अनुभव में भी विविधता होगी। यह जानना दिलचस्प होगा कि जीवन अनुभवों की यह विविधता उनकी कविता में कितनी और किस तरह से आई है। क्या यह कविता पहाड़ी कविता के मौजूदा ढांचे में कुछ नए आयाम जोड़ रही है या बनी बनाई लीक का अनुसरण कर रही है। 

संस्कृत के विद्वान डॉक्टर लेखराम शर्मा ने अपने श्रद्धासुमनमें काव्य के कुछ निकष प्रस्तुत किए हैं और रचनाओं के आकलन की जिम्मेदारी सुधी पाठकों को सौंपी है। उनके वक्तव्य में से कुछ बातों को रेखांकित किया जाना चाहिए –

साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ-विषाणहीन:

भर्तृहरि के नीतिशतक के इस उद्धरण का अर्थ है-

जो मनुष्य साहित्य, संगीत और कला से रहित होता है, वह साक्षात् एक ऐसे पशु के समान है जिसके न तो पूँछ है और न ही सींग।

 

शक्तिर्निपुणता लोकशास्त्रकाव्याद्यवेक्षणात् ।
काव्यज्ञशिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुद्भवे ॥

यह श्लोक आचार्य मम्मट के प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यप्रकाश' का है। इसका अर्थ है शक्ति, निपुणता, लोक व्यवहार, शास्त्र, और काव्यों का अध्ययन, काव्यज्ञों से शिक्षा व अभ्यास काव्य रचना के कारण हैं।

डॉ. शर्मा ने कालिदास के हवाले से यह भी कहा है कि इन रचनाओं का मूल्यांकन सुधी पाठक ही कर सकते हैं। ये तीनों ही बिंदु महत्वपूर्ण हैं। समाज में कला साहित्य की आवश्यकता हमेशा रहेगी। समाज में भावक या सहृदय होने ही चाहिए। इसी तरह काव्य रचना के कारकों का भी अत्यंत महत्व है। कवि को निपुण होना होगा, उसे लोक और शास्त्र का ज्ञान हो, वह काव्य का अध्ययन करता हो यानी उसे अपनी भाषा की काव्य परंपरा का ज्ञान हो, उसने काव्य रचना की शिक्षा ली हो और काव्य लिखने का पर्याप्त अभ्यास उसे हो। काव्य रचना के ये निकष कठिन हैं।

हम में से बहुत से कवि शौकिया कविता लिखते हैं। इसलिए ये निकष शायद नजरअंदाज भी हो जाते होंगे। हमारे बीच ऐसे भी रचनाकार हैं जो निश्चित ही गंभीरता से रचनाकर्म में निबद्ध हैं। समय की छलनी ही इन सबके योगदान के साथ न्याय करेगी। फिलहाल हमारे लिए यह मूहत्वपूर्ण है कि हमारी भाषा में लिखा जा रहा है। और उसे प्रकाश में लाने के सामूहिक प्रयास हो रहे हैं। यह सब ऐसे समय में घटित हो रहा है जब भाषा-विमर्श और कला-कर्म कई तरह के दबाव झेल रहा है। भाषा अपनी अस्मिताओं की लड़ाई लड़ रही है। उसका एकीकरण नहीं, विखंडन हो रहा है। जीवन में कला और संस्कृति के नाम पर बेहद तेज चकाचौंध भरी होड़ है। उसके बीच हमारा लोकअपनी पहचान बचाने और दिखाने की दौड़ में हांफ रहा है। हमारी भाषा की कविता इस लोक के पीछे छूटते जाते और बदलते हुए रूप-स्वरूप को पकड़ने की कोशिश कर रही प्रतीत होती है। इस शिनाख्त में वह सारे साझे अतीत को थामे रहना चाहती है, वर्तमान को नकारती चलती है। और यह सब काव्य के स्टीरियो टाइप की तरह होता है। हमें कविता में जीवन अनुभवों पर आधारित महीन काव्य संसार का इंतजार है। 

शुरू में मैंने जिक्र किया है कि इस संकलन में शामिल कवियों में से कई हिंदी में पी एचडी प्राप्त हैं। यहां इस बात का जिक्र इस संदर्भ में किया जा रहा है क्योंकि पहाड़ी भाषा की वर्तनी का मानकीकरण किया जाना जरूरी है। दूसरे यह कि हमारी भाषा के बहुत से शब्द या उनकी ध्वनियां देवनागरी लिपि में पूरी तरह से व्यक्त नहीं हो पाती हैं। इसलिए उनके लिए कुछ खास चिह्न तय किए जाने चाहिए। पिछले दिनों कुल्लुवी के संदर्भ में यतिन पंडित ने इस बारे में चर्चा भी की थी। शब्दों की वर्तनी के मानकीकरण में हिंदी भाषा के हमारे ये विद्वान महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं। बिलासपुर लेखक संघ इस बारे में योजना बनाकर काम कर सकता है। अभी तक भाषा या शब्दों का प्रयोग हर कोई अपनी जानकारी और समझ तथा इलाकाई उच्चारण के आधार पर करता है। इसलिए वर्तनी में भिन्नता मिलती है। इसे स्थिर करने के लिए विद्वानों को मेहनत करनी होगी। 

संकलन की भूमिका और कवि परिचय हिन्दी भाषा में दिया गया है। शायद इसके पीछे यह विचार रहा हो कि इस तरह पहाड़ी कवियों को बेहतर या व्यापक फलक पर प्रस्तुत किया जा सकेगा। पहाड़ी भाषा के प्रेमी चाहेंगे कि उन्हें प्रस्तुत भी पहाड़ी भाषा में किया जाए। कवि परिचय के संबंध में भी यह समझ नहीं आता है कि कुछ कवियों का परिचय तो अति विस्तार से दिया गया है और कुछ एक का केवल नाम ही है। हालांकि इस संकलन के अधिकांश कवि लंबे समय से रचनारत हैं और उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं।    

                                                      

बिलासपुर लेखक संघ का परिचय

 

बिलासपुर लेखक संघ की स्थापना 3 अगस्त 1996 को तथा इसका पंजीकरण 19 सितंबर 1996 को पंजी. करण संख्या 287/96 के अंतर्गत हुआ। तब से लेकर आज तक संघ लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है। इसकी स्थापना का उद्देश्य था कि साहित्यकारों व लेखकों को एक मंच प्रदान किया जा सके, रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा देकर आपसी सहयोग से उनको आगे बढ़ाया जा सके तथा लोक संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में काम किया जा सके। हमारी मां बोली पहाड़ी के अस्तित्व को बचाये रखना बहुत आवश्यक है जिसके लिए हम सभी को प्रयास करने होंगे। पश्चमी पहाड़ी की कहलूरी बोली के संवर्धन और संरक्षण के लिए बिलासपुर लेखक संघ सदैव प्रयत्नरत है। लेखक संघ का यह भी प्रयत्न रहेगा कि शोध करके कहलूरी बोली की प्राचीनता, विश्वभाषाओं से साम्य और संस्कृत भाषा का कहलूरी बोली पर प्रभाव स्थापित किया जा सके। इस समय बिलासपुर लेखक संघ के लगभग एक सौ सदस्य हैं जो विभिन्न विधाओं में लिख कर अपने साहित्य का प्रकाश चारो दिशाओं में फैला रहे है तथा अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में फैली बुराईयों से आमजन को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं। संघ के सदस्यों द्वारा व्यक्तिगत रूप में भी कई किताबें लिखी गई हैं जबकि सांझा संग्रह भी प्रकाशित किये गए है। बिलासपुर लेखक संघ द्वारा अपने सदस्यों के सहयोग से "कहलूरा री कलम", "कहलूर की विभूतियां'""" कहलूर की कलम "श्री श्री 1008 बाबा कल्याण दास उर्फ काले बाबा'", "कल्याण गीता", कहलूर की कलम भाग 2' कहलूर की कहानी" के अलावा और भी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं। बिलासपुर लेखक संघ रचनात्मक कार्यों को बढ़ावा दे रहा है। मासिक बैठकों, कवि गोष्ठियों व सेमिनारों के माध्यम से निरंतर साहित्य की सेवा में लगा है तथा युवा लेखकों को अपने साथ जोड़ने के लिए प्रयासरत है। संघ की कोशिश है कि उसके लेखकों द्वारा रचित अधिक से अधिक साहित्य प्रकाशित होकर लोगों के सामने आए। 







Monday, June 1, 2026

इक गुजराती कवता

 


हिन्दिया दा इक रसाला है साखी । तिसे दे अंक 39 बिच गुजरातिया दे मशहूर कवि नाटककार सितांशु यशश्चंद्र होरां दा इक लेख कनै इक कविता छपियो है। अनुवाद भी तिन्हां अप्पू ही कीतेयो। असां जो लग्गा भई कवता अज के बग्ते जो बड़े सम्पूर्ण कनै छैळ ढंगे नै पेश करा दी है। तुसां ताईं पेश है पैह्लैं पहाड़ी कनै तिसते बाद हिन्दी च एह् गुजराती कवता। गुजराती ते हिन्दी अनुवाद : सितांशु यशश्चंद्र । पहाड़ी अनुवाद : अनूप सेठी। पहाड़ी अनुवादे पर सलाह-सूतर तेज सेठी होरां दितेया।  


कुमार गंधर्वे गैं इक गूंगे बग्ते दी मंग

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो 

दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

तिज्जो बोली दित्था था कल जिन्हां, अज तिन्हां असां जो भी साफ गलाई ता 

हुण जे नीं छड्डी अजाद संघे नै गाणे दी ख्वाइश

तां जींदे नीं बचणा है जादा हुण इसा दुनिया च 

सैह्मयो जेह् 

कुछ बेबस, कुछ मर्जिया नै चुप देह् इस बग्तें भी किछ गलाणा है

तू ता समझी लैंह्गा इसा गल्ला, कोमकली । 

 

असां भी गाणा है दुबारा, जिञा तैं गाई नै दस्सेया, दुबारा 

भौएं असां न होन पंडित भीमसेने साह्यी लम्मे सुरे दे काबल

निक्के निक्के पगां नै करह्गे पार असां, एह् लम्मा जेह्या फासला, जिञा तैं कीता 

भौएं न रही सकिए राजनगरे च, टोळी लैंह्गे असां अपणा देवास। 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो दुबारा अपणे देवासे च रैह्णा सखाअ,

राजनगरां ते दूर 

क्या हुंदा देवासे च, कोमकली किञा मरी जांदा कुमार,

फिरी भी  किञा जींदा रैंह्दा गंधर्व

अपणे बणायो रागां च गाई नै दस्सा असां जो

दस्सा, कैंह् कम्मै नीं औंदा कोई इक्को ई घराना

तैं बणाया किञा हर इक घराने च अपणा घर

गाई नै सुणाह् संगीत समारोहे च नीं, अपणे निर्दयी किह्लपणे 

ओह्थी ते असां सारे सुणा दे हन अज, सारियां ठाह्रीं अज देवास 

हर आम आदमिये दी अमरता दा गुप्त राज़ दुबारा गाई नै दस्स असां जो,

नौंए मिल्लयो संघे नै, शिवपुत्र 

 

सुणया है जदूं बमार था तू, गाई नीं सकदा था,

तू सुणदा था तदूं पंछियां जो, हौआ जो

बूटेयां जो कनै देवासे दी दयावान रुखियाईया जो 

असां जो भी सखाह् किञा एह् सुणना

पता है असां जो हुण मुस्कल है, सोशल मीडिया दे बग्ते च, मनचाह्या सुणना भी

असां दिया हौआ ते गुआची गइयो हुण पंछियां दी चैह्क 

अपणे ही चार चफेरे घुमदी है असां दी हौआ,

अपणे ही जैकारे दी गर्जना करदी

हौआ दी भंवीरी बणी नै रुक्खां पुटदी चलियो है 

हर इक देवासे जो फटेयो बदळे दिया बौछारा च समेटी लैंदी है, हुण एह् भतोइयो हौआ  

सुलताने दे राज-हाथिये जेह्यी, कबीरे बखा जो बधदी जांदी

सैह्मयो जेह् हन असां   

चुप्पिया दा बग्त सुरु  होई गेया सारिया सृष्टिया च ।

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’, सुआल पुच्छा फटेयां फेफड़यां दा 

फुफकार भरोयो आरोह च, कोमकली कुमार ।

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्तें सिखणा है होर भी किछ, तेह्ते,

सिखणा है तेरे ते धीरज, शिवपुत्र

छींह सालां दा सैह् तेरा देवासी धीरज ।

गिणती करना सखाअ असां जो, इन्सानी सुरां दी बक्ख बक्खरियाँ लय दी,

जिञा सखाया होणा पंडित देवधरें तिज्जो

दस्स असां जो तां छींह सालां च कितणे हुंदे म्हीने

इक्की म्हीने च तां कितणे हुंदे दिन? इक्की दिने च घंटे, घंटेयां दे पल

किञा बिताइए सैह् इक पल

हलाहल कनै अमृत, दूह्ईं नै घुळेया पल

कदूं आया तिस सठयाउंए-कपड़े दिया बुणाइया च इक्की कुमार गंधर्वे दिया मौता दा पल

कदूं आया, देरा ते, दूए कुमार गंधर्वे दे जमणे दा पल

किञा हुंदी सैह् कबीरी बुणाई

सखाह् मेरे काह्ळे पेयो बग्ते जो अपणे तिन्हां छीं: सालां दा ध्रेठ 

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो क्षय ते अक्षय तक जाणे दा रास्ता दस, चिर कुमार

अकाल ग्रसया है अज एह् धरयाया धरयाया थल्ले-यो लौंह्दा बग्त,

भोगेखा जो दौड़-भज्जा दा तेज नाच बहु-ताला है ।

इसच ई सुणाअ अपणी रस-भरिया उआजा च 

विलंबित इकताला च तेरा अप्पू बणाया राग गांधी मल्हार,

 

तेरे राग गांधी मल्हारे च, विलंबित इकताला च, करुणा नै

सुणाह् सारयां जो, ‘तुम हो धीर

अपणैं घरैं गाई नैं अज सुणाह् असां जो, घरानेयां ते दूर,  ‘तुम हो धीर...’,

कबीरे दी रसभरी वाणी सुणाह् असां जो गांधी मल्हारे च,

विलंबित, इकताला च, ‘धीर’ 

फटाफट सब किछ लई लैणा सखाया जांदा है मेरे बग्ते जो अज

कई घराने डटयो बहु-ताले चार चफेरें अपणे अपणे रागे दा समूहगान कराणे ताईं असां ते,

 

देह् देह् इस गूंगे बग्ते जो गुणगुणना सखाह्, सिर्फ अपणे देवासे च

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो भी

निकेयां पगां नै ही भौंए, पर लम्मे रस्ते पर, अपणिया ही ऊर्जा नै, अपणे ही तरीके नै 

अपणा राग गाणा है दुबारा,

क्या हे साधना, क्या है रियाज़, दवा क्या है कनै इलाज,

दस्सा कोमकली कुमार, अमर गंधर्व



सितांशु यशश्चंद्र
प्रसिद्ध गुजराती कवि, नाटककार,
अनुवादक और शिक्षाविद

कुमार गंधर्व के पास एक गूंगे समय की मांग 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले, चुप्पी साधे, मेरे समय को 

फिर से गाना सिखाओ, कुमार गंधर्व 

तुम्हें कह दिया था कल जिन्होंने, आज उन्होंने हमें भी साफ कहा है 

अब अगर छोड़ न दी मुक्त कंठ से गाने की ख्वाहिश

तो जिन्दा नहीं बचोगे ज्यादा अब इस दुनिया में 

सहमे से

कुछ अवश, कुछ स्वेच्छया चुप से इस समय को भी कुछ कहना है

तुम तो जान पाओगे इसे, कोमकली.

 

हमें भी फिर से गाना है, जैसे तुमने गा दिखाया, फिर से 

भले ही पंडित भीमसेन की लंबी सुरावट के हम काबिल न हो 

छोटे छोटे कदमों में पार करेंगे हम, यह लंबा सा फासला, जैसे तुमने किया 

भले ही राजनगर में नहीं रह पाएं, ढूंढ़ लेंगे हम अपना अपना देवास. 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले चुप्पी साधे मेरे समय को फिर से गाना सिखाओ

कुमार गंधर्व.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को फिर से अपने देवास में रहना सिखाओ

राजनगरों से दूर 

क्या होता है देवास में, कोमकली; कैसे मर जाता है कुमार,

 

फिर भी कैसे जीवित रहेता है गंधर्व

अपने बनाये रागों में गा कर हमें दिखाओ.

कहो, कैसे काम नहीं आता कोई एक ही घराना

कैसे तुमने बनाया हर घराने में अपना खुदका घर

गा कर सुनाओ, संगीत समारोह में नहीं, अपने निष्ठुर एकांत में

वहीं से हम सब सुनते हैं आज, सभी जगह आज देवास 

हर आम आदमी की अमरता का गुप्त रहस्य फिर से गा कर बतलाओ हमें

नवप्राप्त कंठ से, शिवपुत्र

 

कहते हैं जब बीमार थे तुम, गा नहीं सकते थे

तुम सुना करते थे तब पंछीयों को, हवा को

पेड़ों को और देवास के सदय सूखेपन को 

हमें भी सिखाओ कैसे यूँ सुनना 

जानते हैं हम अब मुश्किल है, समूह संचार के समय में, मनचाहा सुनना भी 

अब पंछीयों की चहचहाट खो चुकी है हमारी हवा

अपनी ही चारों और घूमती है हमारी हवा

अपने ही जयघोष की गर्जना करती 

चक्रवात बन पेड़ों को उखाड़ती चली है 

हर देवास को फटे बादल की बौछार में सिमट लेती है, अब यह प्रमत्त हवा

सुलतान के राजगज जैसी, कबीर की ओर आगे बढ़ती जाती है

सहमे से हैं हम.

 

चुप्पी का समय शुरु हो गया है सारी सृष्टि में. 

'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो', प्रश्न पूछो फटे हुए फेफड़ों का

फुत्कार भरे आरोह में, कोमकली कुमार.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को सीखना है और भी कुछ, तुमसे

सीखना है तुम से धैर्य, शिवपुत्र,

छह साल का वह तुम्हारा देवासी धैर्य. 

गिनती करना सिखाओ हमें, मानव स्वर के विविध लयों की

जैसे सिखाया होगा पंडित देवधर ने तुम्हें. 

कहो हमें छह साल के कितने होते हैं, तब, माह?

एक माह के कितने होते है दिन, तब ? एक दिन के घंटे, घंटो के पल ?

कैसे बितायें वो एक पल, हालाहल और अमृत, दोनों से घुली पल ?

कब आया उस धैर्यपट की बुनाई में एक कुमार गंधर्व के मृत्यु का पल ?

कब आया, देर से, दूजे कुमार गंधर्व के जन्म का पल ?

कैसे होती है वो कबीरी बुनाई ?

सिखाओ मेरे अधीर समय को तुम्हारे उन छह वर्षों का धैर्य

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को क्षय से अक्षय तक जाने का मार्ग बताओ, चिर कुमार

 

अकाल ग्रस्त है आज यह प्यासा प्यासा हासोन्मुख समय

भोगोन्मुख भागदौड़ का द्रुत नृत्य बहुताल है.

इसी में सुनाओ अपनी जलभरी आवाज में

विलंबित एक ताल में तुम्हारा खुद का बनाया राग गांधी मल्हार,

 

तुम्हारे राग गांधी मल्हार में, विलंबित एकताल में, करुणा से

सुनाओ सभी को, 'तुम हो धीर'.

अपने घर में गा कर आज हमें सुनाओ, घरानों से दूर, 'तुम हो धीर...

कबीर की जलभरी बानी सुनाओ हमें राग गांधी मल्हार में

विलंबित, एकताल से, 'धीर'

अविलंब सब कुछ पाने का सिखाया जाता है मेरे समय को आज

अनेक घराने तुले पड़े हैं बहुताल चहुँदिश अपने अपने राग का समूहगान हमसे करवाने में,

ऐसे इस गूंगे समय को गुनगुनाना सिखाओ सिर्फ, अपने अपने देवास में

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को भी

 

नन्हें कदमों से सही, पर लंबे रास्ते पर, अपनी ही ऊर्जा से, अपनी ही तरह 

अपना खुद का राग फिर से गाना है

क्या है साधना, क्या है रियाज, औषध क्या है और उपचार

कहो, कोमकली कुमार, अमर गंधर्व