Friday, January 27, 2023

इक ब्राजीली कविता

 


पकिया उमरा दा कीमती वक्त

मारियो इ अंदरेदे ब्राजील दे कविउपन्यासकारआलोचककला इतिहासकारसंगीतशास्त्री कनै छायाचित्रकार हन । 1922 च छपया  Hallucinated City इन्हां दा बड़ा जरूरी कविता संग्रह है ।  मारियो दा ब्राजील दे आधुनिक साहित्य पर गैह्री छाप है। संगीत च इन्हां दे योगदान ताईं भी इन्हां जो याद कीता जांदा है । नवंबर म्हीनैं असां एह्थी इन्हां दी इक कविता दे अंग्रेजी अनुवाद सौगी पहाड़ीपंजाबी कनै हिंदी अनुवाद पेश कीते थे । कविता दा नां है Valuable time of Maturity । पहाड़ी अनुवाद तेज कुमार सेठीपंजाबी अनुवाद अमरजीत कोंके कनै हिन्दी अनुवाद अनूप सेठी नै कीतेया है। हुण इसा कवता दे दो अनुवाद पेश हन। कुमाउनी भाषा च हिंदी दे कवि-कहानीकार हरि मृदुल होरां कीतेया। हरि मृदुल कुमाउनी च भी लिखदे हन। दूआ अनुवाद वागड़ी भाषा च हिंदी सेवी कनै कवि हेमंत भट्ट होरां कीतेया है। एह् दोयो अनुवाद अनूप सेठी दे हिंदी अनुवाद ते कीतेयो हन। इसा कवता दे पहाड़ी, पंजाबी, हिंंदी अनुवाद पढ़ने एत्थी क्लिक करा। (फोटो:हरबीर) 


कुमाउंनी

बुढ्यां काल क कीमती बखत

 मैंले गिन्यान आपणि उमर का बरस

त पत लाग छ कि

भौत बिति गौ

आब बखत कमि बचि रौ

 

खूब खर्च है गै जिंदगी

कमि बचि रै आब  

 

एस लाग छ हो महराज कि

जस्यां कै लौंड क हाथ डाल्लि भरि हिसालू पड़ि ग्यान

त खपाखप खानै गौ उ

जब मुट्ठि भरि बचि ग्यान हिसालु

तब वीलै रस ली-ली बैर एक-एक टोप्पो टिपि बैर खान शुरू करछ

 

आब मी थें बखत नै छन कि छोटि-मोटि बातों क पच्छा पड़ूं

 

मि आब उन जागा कभै नै जान चायूं

जां 'मि ठुल-मि ठुलहो

इन डाहा क पुड़ा है भगवान बचौ

इनौ क बस चलौ त सब है होशियार आदमि कै लै इन बदनाम करि द्यौन

वीकि जागा में बैठि जौन

वीकि कुर्सि, अक्कल और भाग्ग देखि जलि बैर क्वेल है जौन

 

फाल्तु बातों खन बखत नै छन मी थें महराज

जिनौं क दगड़ कै मतलबै नै

उनूं क बार में किलै बात करी जौ

 

एस लोगों के मन्यून क बखत ना छन मी थैं

जिन उमर क हिसाब लै त सज्यान छन

परंतु उनूं में समझदारी ना छन

मि उनूं क मुख लै नै देखन चानूं

जु हर बात में पधान बनन चानान

जिनौक मुख बठे कभै लै सज्यानो क्वीड़ ना सुन्यो

किलै करूं उनूं कि याद

बखत कमि छ हो

मैंके त आब चैंछ सांचि-सांचि बात  

 

झट्ट कर हो

मैंके हैरोछ आब तौलाट

 

मेरि डाल्लि में आब हिसालु भौत कमि छन

 

मि उन मान्सों क दगड़ रौन चांछु, जो मयालु छन

जो आपनि गल्ति कै समझनान

जिनूं कै दुसरा कि पीड़े कि छ पच्यान

 

मि उनूं है भौत दूर रौं

जिनूंक दिमाग पुजि रौंछ आसमान

जो बाकरा क न्याति 'मि मिकरनान

 

मि कै तौलाट है रौछ आब

उमर बढ़न क साथ जु अक्कल आ रैछ

आब वीक साथ जिंदगी बितौन छ

 

मैंले डाल्लि में बच्या क हिसालु बर्बाद नै करंछन

 

मैंके पत्त छ कि डाल्लि में बच्या क जो हिसालु छन

उन हिसालू है लै

भौत मिठ होला

जु खै हाल्यान

मि आखिरी सांस आनंद लै लिन चांछु

आपन हित-मित्रों का दगड़

उनूं क सामनि

 

एक चीन देश क विद्वान छ्यो नै – कन्फ्यूशियस

वीक कून छ्यो कि हमूं थें छन द्वी जिंदगी

दोसरि जिंदगी तब शुरू हुंछि

जब फाम ऊंछि कि एक्कै छ यो जीवन

हरि मृदुल 







 
      


वागड़ी

पाकी उम्मर नौ मोंघो वकत

गणवा बैठो ज़िंदगी ना साल

अंतरात्मा बोली थई बेहाल

घणु वीती  ग्यु

थोडु बच्यु,

जे ग्यु ए लांबु,भावी हे टुंकु घणु।

लाग्यु एवू के एक सोरा ने

दोंदो भरी मली चेरी,

शरुआत मीं तो ग्यो गटकतो

पण लाग्यु के बची हे थुड़ी

हवाद लई चुसवा लाग्यो एक एक करी।

मारे पाईं  अवे नती समय

के ऊं नानी नानी सीज़ हंकेलतो फरुं?

एवी सभाओं मीं

के ज़े दंभी मनक दस माता लई फरता होय

रकड़तो फरूं?

हैरान हूं दंभी पाखंडी थकी,

गुणी मनक ने करवा बदनाम

आम तेम फरें फांफा मारता;

नती आवडत इक पैसा नी,

पण ऊंसा पद ना लोभ ने लीदे

बेरुपा बणी फरता फरें लाज शरम विना,

लालसु हीं पद, लायकात ने किस्मत ना!

 

सुडो, समय नती मारे पाईं,

नवरी आवी वात बल्ले

बेकार है ईनणी ज़िंदगी पर वात करवी,

ज़े नती मारी ज़िंदगी नो भाग

आवभगत एवा मनक नी करवानो समय नती मारे पाईं,

थ्या डोकरा पर अक्कल ना मीड़ा,

नफरत हे मने वात करवानी हाते एणने ,

ज़े हणे बीज़ा ने खुद ना स्वार्थ बल्ले

काम नी वात सुडी ने

वात करे बिल्ला बस बिल्ला पर।

भाई नती समय मारे पाईं

बिल्ला पर वात करवानो ;

बस ज़ुवे मारे, ज़ुवे इक हंसती गाती जिंदगी।

आत्मा  मारी अवे उतावरी

थुड़ी बची हे दोंदा मीं मीठी मीठी चेरी,

खावा दो बस जीववा दो थुडी बची हे जिंदगी।

मने रेवा दो एवा मारा ज़ेवा मनक पाईं

ज़े नती बेरुपा,

के नती कदरूपा,

ज़े ठोकर खाई उठे, कारये न टूटे, अगाड़ी वदे मेहनत नी हाते,

खुद नी ताकतन चडे बीज़ा ने रवाड़े,

पर दूर रऊं एवा थकी

ज़ेणने घमंडी बणावया एणनी कपटी जीते,

एवा थकी दूर हूं

बस हूं हूं, कइं नती तू।

हाँ भाई हूं उतावर मीं हूं,

उतावरियों हूं  जिंदगी बची हे खुशी खुशी जीववा मीं,

 नती करवी बर्बाद मारे बचेली चेरी,

स्वादिष्ट हीं आ

अवे हुदी जे खादी एणनी थकी भी,

ध्येय मारो एटलो  अंत हुदी जवानों

संतुष्ट थई मज़ा मीं,

पोताना मारा प्यार ने हाते हूं रवानो।

केतो हतो कोंफ्यूशियस

बे जिंदगी लइ ने आवे हे मनक,

तारे आवे बीजी जिंदगी

जारे अंतरात्मा राड पाडे

बस तारे पाहें बस हे एक जिंदगी।

हेमंत भट्ट 

 


 


Friday, January 13, 2023

हिमाचली पहाड़ी चर्चा

 


असां दिया भाषा दे बारे च चर्चा मतेयां सालां ते चलियो है। कदी जरा तेज होई जांदी कदी मंदी। इलैक्शनां परंत दिव्य हिमाचल आळेयां इक दिन चर्चा कराई। तिसते परंत दूंह् लेखकां आशुतोष गुलेरी कनै यतिन होरां अलग-अलग लेख भी लिखे। तिसते परंत भूनेंद्र होरां अपणे वचार रखे। एह् सारे ई लेख कनै अखबारा दी चर्चा दयारे पर है। तुसां एह्थी पढ़ी सकदे।  हुण कुशल कुमार होरां होरां इस बारे च अपणे वचार रखे हन। गल गांह् बधैइस ताईं एह् लेख भी एत्थी पेश है। एह् लेख भी हिंदिया च है।

हिमाचली पहाड़ी भाषा एक विवशता

देश में भाषाओं के आधार पर प्रदेशों के गठन के दौर में पहाड़ी प्रदेश और पहाड़ी भाषाओं के आधार पर ही हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया था। प्रदेश के गठन के पहले हिमाचल में पहाड़ी रियासतें थीं और शायद ही उनमें से किसी का नाम हिमाचल रहा होगा। यह हिमालयी पहाड़ भोगौलिक, संस्कृतिक दृष्टि से  भिन्न-भिन्न होने के बावजूद यहां की पहाड़ी भाषाएं ही हिमाचल प्रदेश को साकार करती हैं और सारे देश के प्रांतों में अपनी एक अलग पहचान को पुख्ता भी करती हैं। 

जहां तक हिमाचली पहाड़ी भाषा की बात है, मेरी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में शायद सातवीं-आठवीं में एक निबंध था। लेखक का नाम भूल रहा हूं। इस निबंध में दो लोग एक वन में से यात्रा कर रहे थे। उनमें से एक कहता है। देखो कितना घना वन है। यह सुनकर वहां के सभी पेड़ चिंता में पड़ जाते हैं कि हमारी तो सारी उम्र यहां बीत गई पर हमने वन नाम का कोई प्राणी या पेड़-पौधा देखा ही नहीं। इस निबंध के पेड़ तो नहीं जानते थे कि वन उनका सामूहिक नाम है। 

परंतु हम हिमाचली जानते हैं कि हिमाचली पहाड़ी भाषा एक अवधारणा, योजना और सोच है, जो प्रदेश को एक प्रतिनिधि भाषा देने और हिमाचली पहाड़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के आंदोलन से उपजी है। इसके पीछे सोच यही थी कि भाषा के नाम को लेकर कोई विवाद न हो और सभी भाषाएं सम्मिलित हो कर एक साथ आ सकें। यह बीच का रास्ता इसलिए निकाला गया था ताकि एक नाम से ही सही हिमाचल की सभी भाषाओं को मान्यता तो मिल जाए।   

अब सोच और योजना से तो कोई भाषा बनाई नहीं जा सकती है। कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। हिमाचल ही नहीं हमारा सारा देश बहुभाषी और भाषा वैविध्य से संपन्न है।  भाषा समाज का विषय है और समाज के अलावा सत्‍ता, धर्म, और बाजार का इसमें दखल रहता है। जब अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाले लोग अपनी-अपनी भाषाओं में संवाद करते हैं तो इस संवाद से एक तीसरी भाषा बनकर उभरती है। जो सबको साथ लेकर चलती है और शेष भाषाएं भी उसमें शामिल होती हैं और अपना वजूद एक उपभाषा के तौर पर बनाए रखती हैं। 

दुर्भाग्य से हिमाचल में कोई एक संवाहक भाषा बनकर नहीं उभर सकी। जो थोड़ा बहुत मेल-मिलाप हुआ भी, वह नामों के स्‍यापे में स्वाहा हो गया है।  हम अपनी हिमाचली पहाड़ी की देश की जिन बड़ी भाषाओं से तुलना करते हैं। उन सभी के साथ उनकी उपभाषाओं की एक लंबी सूची मिलती है। एक कहावत है कि हाथी के पांव में सबका पांव। यह पांव राजनीतिक भी हो सकता है, बाजार, समाज और धर्म का भी हो सकता है। इसी के चलते भाषाएं फलती, फूलती भी हैं और सिमटती, सिकुड़ती और मिटती भी रहती हैं।   

जहां तक किसी एक बड़ी भाषा को प्रदेश की प्रतिनिधि भाषा मानने का प्रश्न है, मुझे नहीं लगता कि अब किसी भी एक भाषा के नाम पर राजनीतिक और सामाजिक तौर पर यह आम सहमति संभव है, जिस नाम के पीछे सारा प्रदेश इकट्ठा हो कर एक साथ चल सके। यदि ऐसा हो सकता तो हिमाचली पहाड़ी नाम ही अस्तित्‍व में ना आता।  

वैसे दुनिया में दो भाषाएं ही चलती हैं - एक जनता की और एक राजा की।  यदि हिमाचल के जो इलाके पंजाब में थे पंजाब में ही रहते तो वे पंजाबी हो जाते। स्कूल और प्रशासन की भाषा पंजाबी होने के बाद इन भाषाओं के लिए पंजाबी की उपभाषा के रूप में भी खुद को बचा पाना बहुत कठिन था। कर्नाटक में शामिल मराठी भाषी  इलाकों की स्थिति को देखकर इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। 

अब हिमाचली पहाड़ी भाषा मंजूर नहीं है और किसी एक लोकप्रिय और स्थापित भाषा पर सहमति बनने की संभावना भी नहीं है। इसलिए पहाड़ी भाषाओं को प्रेम करने वाले लेखक, कवि व नेता अपनी-अपनी भाषाओं के साथ अपने भाषाई समाज में काम करें, मेहनत करें और उन्हें संपन्न बनायें। हमारी भाषाओं के लिए किसी सूची-अनुसूची में जगह मिलने से ज्‍यादा जरूरी है, हमारे घर, समाज और बाजार में उनकी जगह का बने रहना। जरूरी है हमारी जुबानों का हमारी जुबान पर बने रहना।  (मूह्रला चित्र : यदु मेहरा, कैनवस पर तैलरंग) 

कुशल कुमार
कवि, व्यंग्यकार, अनुवादक। 'मुठ भर अंबर' चर्चित कविता संग्रह 

Friday, January 6, 2023

यादां फौजा दियां


 फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदेतिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती हैदूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा सताउआं मणका।

.....................................................................

समाधियाँ दे परदेस च

मैं जुलाई सन् 1989 ते लुम्पो च था।  लुम्पो कनै तिसते अग्गैं पोणे वाळा सरहद दे पासे दा इलाका तिस बग्त एयर मैन्टेंड सेक्टर था मतलव कि तित्थू तैनात फौजियाँ जो रसद होआई रस्ते ते पोंह्चाई जाँदी थी।  असम दे तेजपुर दे होआई अड्डे ते डकोटा जहाज उड़दे थे कनै लुम्पो ड्रॉपिंग ज़ोन च रसद गिराँदे थे जिस च ‌आटा, चौळ, डिब्बाबंद राशन बगैरा शामिल होंदे थे। तिस इलाके देयाँ हलाताँ जो दिक्खी नै डकोटा जहाज दे पायलट ताँईं तित्थू रसद गिराणा कोई सोखा कम्म नीं था। इक ताँ लुम्पो ड्रॉपिंग ज़ोन बनिस्बतन छोटी थी कनै दू्जा जहाज दे पायलट जो भारत-चीन सरहद दा ध्यान भी रखणा होंदा था जेह्ड़ी तित्थू ते जादा दूर नीं थी।  जहाज दे पायलट जो सरहद दी लकीर ते पहलैं जहाज जो मोड़ना होंदा था। जहाज दा स्टाफ किछ रसद ओंदी बरी गिराँदा कनै बाकी बचिह्यो रसद वापस जाँदी बरी गिराँदा था।   बहोत सारी रसद डुग्घे नाळां च पयी करी तवाह होयी जाँदी थी। किछ रसद तित्थू दे मूळ वाशिंदेयाँ दे हत्थ भी लगी जाँदी थी। 

चीन वाळेयाँ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल तिकर सड़काँ बणाई रखिह्याँ थियाँ अपर भारत दियाँ सड़काँ तवाँग तिकर आयी करी रुकी जाँदियाँ थियाँ। तिसदे पिच्छैं तदकणी भारत सरकार दा सैह् डर था कि कुत्थी चीन, जंग दे बग्त, तिन्हाँ सड़काँ दा इस्तेमाल नीं करी लै। कनै भारत सरकार सरहद तिकर सड़काँ बणाई करी चीन जो नाराज भी नीं करना चाँह्दी थी। 

सड़काँ नीं होणे दिया बजह से म्हारी फौज तित्थू चीनियाँ जो जादा देर तिकर नीं रोकी सकदी थी किंञा कि तित्थू कुमक कनै रसद पोंह्चाणा इतणा सान कम्म नीं था जदकि चीनी फौज (पीएलए) व्ह्ली तित्थू सारियाँ सहुलताँ मौजूद थियाँ। हाँ, भारत दी फौज तवाँग दे अक्खैं-बक्खैं चीनी फौज जो भरपूर टक्कर देणे जोगी थी। तदकणी जंगी प्लान दे मुताबिक हमला होणे दी हालत च भारत दी फौज जो चीनी फौज जो रोकदे होयाँ हौळैं-हौळैं तवाँग तिकर पिच्छैं हटणा था कनै तवाँग दे आसैंपासैं तिन्हाँ जो भरपूर टक्कर देणी थी। 

भारत दी थलसेना दे इक जोशीले, चतुर कनै रणनीति च माहिर जनरल, तदकणे आर्मी चीफ जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी होराँ दिल्ली दे लीडराँ कनै डिफेंस मिनिस्ट्री दे बाबुआँ दे कन्नै-कन्नै चीनी फौज जो तिस बग्त हैराकरी दित्ता था जाह्लू तिन्हाँ सन् 1986 च भारत दी फौज दे इक माउंटेन ब्रिगेड जो ज़िमीथांग यानि कि लुम्पो ते इक किलोमीटर पिच्छे, तिकर लायी करी तिन्हाँ सारियाँ जगहाँ पर कब्जा करी लिया था जेह्ड़ियाँ सन् 1962 दे भारत-चीन जंग ते पैह्लैं भारत दे कब्जे च थियाँ। 

मैं तित्थू चट्टानाँ पर लिक्खह्यो नारे पढ़े थे — "चिंडिट बदला लेगा", "यह मर्दों की जगह है" बगैरा बगैरा।  तित्थू होर भी बहोत सारे जोशीले नारे लिक्खह्यो थे अपर हुण मिंजो तिन्हाँ च दो नारे ही याद ओंदे हन्न।  एत्थू 'चिंडिट' दा मतलब  '77 माउंटेन ब्रिगेड चिंडिट' ते है जिस्सेयो सन् 1986 च ज़िमीथांग च उतारेया गिया था। कनै जिस तोपखाना रेजीमेंट च मैं पोस्टेड था सैह् तिस ब्रिगेड जो आर्टिलरी स्पोर्ट देणे ताँईं तित्थू  तैनात थी। ब्रिगेड हैडकुआटर असाँ ते तक़रीबन इक किलोमीटर पिच्छैं ज़िमीथांग च था अपर तिसदियाँ पलटनाँ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर चीनी फौज (पी.एल.ए) दियाँ हाखीं च हाखीं पाई करी चौकन्नियाँ खड़ोतियाँ थियाँ। 

जाह्लू तित्थू ते छुट्टी जाँ दूजे कम्म ताँईं तबाँग दे पासैं ओणा-जाणा होंदा था ताँ असाँ जो 'गोरसम' तिकर पैदल उतरना-चढ़ना पोंदा था। सिद्धी चढ़ाई चढ़ते बग्त,  तकरीबन हर दस कदम पर लिक्खह्यो नारे जुआनाँ दा जोश ठंडा नीं होणा दिंदे थे।  मिंजो चढ़ाई ते कोई परेशानी नीं होंदी थी अपर उतरदे बग्त जाह्नुआँ च बड़ी भारी पीड़ होणे दिया बजह ते मिंजो रोणा आई जाँदा था।  मैं सब्भते पिच्छैं रही जाँदा था कनै होरनाँ जो बार-बार किछ दूरी पर रुकी करी मिंजो निहागणा पोंदा था। जाह्नुआँ च  पीड़ शायद अति तेज बर्फीली ठंड दिया वजह ते होंदी होंगी। तित्थू ते जाह्लू मेरी यूनिट इलाहाबाद आई ताँ मेरियाँ जंघां नार्मल होई गइयाँ थियाँ। हाँ, हुण सैह् पीड़ कदी-कदाएं उठी खडोंदी है एह् शायद बुढ़ापे दी गिफ्ट है।  

1986-87 च तित्थू क्या घटेया था?  ओआ तिस पर इक नजर पाँदे चलदे।  सन् 1962 च बेशक  तित्थू असाँ दी करारी हार होयी थी अपर सन् 1967 कनै 1986-87 दियाँ मुठभेड़ां च भारत दिएं फौजें तित्थू चीनी फौज जो झंझोड़ी करी रखी दित्ता था।  भारत दी फौज दी करारी चोट ते चीन इतणा तिलमिलाई गिया था कि तिन्हाँ अपणे तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट कमाँडर कनै चेंगडू दे मिलिट्री रीजन चीफ जो बर्खास्त करी दित्ता था।  सन् 1986 च तवाँग दे उत्तर च सुमदोरोंग चू इलाके च भारत-चीन दे बिच इक मामला उठी खड़ोता था, जिस च जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी दी कमाण च भारत दिएं फौजें 'ऑपेरशन फाल्कन' दे तहत अग्गैं बद्धी करी सन् 1962 दी जंग च हारेह्यो इलाके जो मुड़ी अपणे कब्जे च लई लिया था। 

सन् 1983 च भारत सरकारें फैसला कित्ता था कि भारत जो इक बरी फिरी ते तवाँग दे खास मठ शहर दी फ्हाजत ताँईं तिस इलाके च इक मजबूत कनै भरोसेमंद  रुख अपनाणा चाहिदा।  भारत दी फौज नामका चू (नदी) दे दक्खण च रही, लेकिन आईबी दी इक टीम  सुमदोरोंग चू (नदी) इलाके च ओणा-जाना लगी पई, जेह्ड़ा सन् 1962 दे भारत-चीन जंग दी पहली झड़प दिया जगह ते किछ किलोमीटर दूर न्यामजंग चू (नदी) दे दूर पूर्व च पोंदा है। उत्तर से दक्खण दे पासैं बहणे वाळे न्यामजंग चू कन्नै, सुमदोरोंग चू कनै नामका चू, दोह्यो सिलसिलेवार पूर्व कनै पच्छम दे पासे ते आई नै मिलदे हन्न।  आईबी दी टीम तित्थू गर्मियाँ दे मौसम च रैंह्दी कनै सर्दियाँ च वापस आई जाँदी थी।  तिन्हाँ एह् सिलसिला सन् 1984 कनै 1985 च भी जारी रक्खेया अपर जाह्लू सैह् सन् 1986 च तित्थू गै ताँ तिन्हाँ जो चीनी तित्थू पहले ते ही बैठह्यो मिल्ले थे।  भारत नै जून सन् 1986 च चीन दी तिस हरकत पर अपणा विरोध जताया ताँ चीनियाँ तिस्सेयो एह् बोली करी नकारी दित्ता कि सैह् इलाका नाँ मात्र दी मैकमोहन लाइन दे उत्तर च तिन्हाँ दे पासैं पोंदा है। एह् सब्भ किछ चीन सरकार दे समै-समै पर अपणी विदेश नीति च कित्ते जाणे वाळे उलटफेर करने दे फैसले दे मद्देनजर घटेया था। 

1980 दी दहाई दी शुरुआत तिकर चीन, दावेयाँ दी अदळा-बदळी करी नै भारत-चीन सरहद दे मसले जो हल करने दी इच्छा जताँदा रिहा था, मतलभारत अक्साई चिन पर अपणा दावा छड्डी दे ताँ चीन तिसदे बदले नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा बाद च अरुणाचल प्रदेश) पर अपणा दावा छड्डने ताँईं तैयार था।  भारत सरकारें तिन्हाँ तजवीजाँ जो नामंजूर करी दित्ता जाह्लू सैह् बुनियादी तौर पर सन् 1960 च झोउ एनलाई नै तदकणे प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू दे साह्म्णे कनै फिरी सन् 1979 च डेंग शियाओपिंग दे जरिए  तदकणे विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दे साह्म्णे रखियाँ गइयाँ थियाँ। 

तिस बग्त एह् साफ सुज्हा था कि चीनी पूर्व च अपणी ताकत बद्धा दे थे। इस ताँईं तिस इलाके च भारत दी हिफाजत जो पुख्ता करने ताँईं फैसला कित्ता गिया था। तिस पॉलिसी दे तहत फौज नै 'ऑपरेशन फाल्कन' चलाया ताकि सैह् अमन दे टैमे दियाँ पोजीशनाँ ते तौळी ते तौळी सरहद तिकर पोंहची सके। 

किंञा कि तवाँग ते अग्गैं कोई सड़क नीं थी, इस ताँईं जनरल सुंदरजी होराँ तदकणे सोवियत यूनियन ते खरीदे गै भारत दी होआई फौज दे नोंयें भारी लिफ्ट एमआई-26 हेलीकॉप्टराँ दा इस्तेमाल करने दा फैसला कित्ता कनै इक माउंटेन ब्रिगेड जो होआई रस्ते ते भारत-चीन सरहद दे दक्खण च पोणे वाळे ज़िमीथांग च तुआरी दित्ता।  सड़का दे रस्तें सैह जगह तवाँग ते 90 किलोमीटर दूर है।  सैह्  एयरलिफ्ट 18 कनै 20 अक्तूबर सन् 1986 दे बिच होई थी।  इस तरहाँ भारत दी फौज तिन्न दूजे जंगी नजरिये ते अहम पहाड़ी चोटियाँ दे कन्नै-कन्नै सुमदोरोंग चू दे पासैं मुंह कित्ते हाथुंग-ला रिज पर काबिज होयी गयी थी। सन् 1962 च तिसा उच्चिया धरती पर चीनी फौज बैठिह्यो थी अपर इसा बारिया तित्थू भारत दी फौज थी।  (तित्थू तैनात इन्फैंट्री दी टुकड़ियाँ दे कन्नै-कन्नै म्हारी तोपखाना युनिट दे फॉरवर्ड ऑब्जरवेशन ऑफिसर भी चीनियाँ दी हर हरकता पर नजरां ड्डी हुशियार होई बैठेयो रैंह्दे थे।  कनै 'नीलिया' च म्हारी फॉरवर्ड तोपखाना बैट्री दियाँ तोपाँ दे मुंह चीन दे पासैं खुले रैह्दे थे।  तित्थू असाँ दे पोंह्चणे ते पहलैं ही तवाँग च बोफोर्स तोपाँ दी इक बैट्री दी तैनाती होई चुकिह्यो थी।) 

चीन दिया तरफा ते छटपटाहट कन्नै, तिस इलाके च फौज भेजणे दिया बजह ते दूंहीं पासेयाँ ते पूरी सरहद पर इक आम लामबंदी शुरू होणा लगी पई थी। एत्थू इक बरी फिरी जनरल सुंदरजी होराँ सारेयाँ जो हैरान करी दित्ता था। चीनी जवाबी कार्रवाई करदे बग्त लड़खड़ाए कनै तिसते परंत 15 नवंबर सन् 1986 दी इक फ्लैग मीटिंग नै हालात जो थोड़ा शाँत कित्ता। अपर हुण भारत सरकारें अरुणाचल प्रदेश जो इक पूरे राज्य च बदळने दा फैसला करी लिया जेह्ड़ा तिस बग्त तिकर केंद्र प्रशासित इलाका था। 

तदकणे सब्भ ते ऊंचे ओहदे वाळे चीनी नेता डेंग शियाओपिंग नै भारत जो "एक होर सबक" सिखाणे दी धमकी देई दित्ती थी लेकिन भारत दी फौज डटी रही हालांकि सरकारी पासा थोड़ा जेहा डगमगायी गिया था।  4 दिसंबर सन् 1986 जो भारत दे नेवी चीफ दे घरें नेवी डे दे फंक्शन दे मौके पर दित्ती गयी पार्टी च तदकणे प्रधानमंत्री राजीव गांधी जो सरहद पर घटियाँ घटनाँ दा पता लग्गेया ताँ तिन्हाँ जो फिक्र होया। तिन्हाँ जनरल सुंदरजी कनै सिविलियन डिफेंस अफसराँ जो पार्टी खत्म होणे ते तुरंत बाद साउथ ब्लॉक दे ऑपरेशन्स रूम च कठरोणे दा ऑर्डर दित्ता था। 

पुच्छे जाणे पर जनरल सुंदरजी होराँ प्रधानमंत्री जो दस्सेया था कि तिन्हा दी कित्ती गई कार्रवाई, सुरक्षा ने तालुक रखणे वाळी कैबिनेट कमेटी दे सन् 1983 दे फैसले दा नतीजा थी जिस च फौज जो अजेही जगहाँ पर पोजीशन लैणे दा ऑर्डर दित्ता गया था जिस ते तवाँग दी फ्हाजत जो मजबूती मिल्ले। फौज पिछले सालाँ च केबिनेट समिति दे तिस फैसले पर तरतीब बार अमल करने च लगिह्यो थी जद कि राजनेताँ कनै बाबुआँ  तिस पर बिल्कुल ध्यान नीं दित्तेह्या था। 

इस पॉइंट पर इक गरमागरम बहस होयी थी। किछ अफसराँ दा मनणा था कि तिस मामले च फौज नै  अपणियाँ हदाँ पार करी लइह्याँ थियाँ।  एह् सुआल पुच्छे जाणे पर कि क्या हाथुंग-ला कनै आसेपासे दे इलाकेयाँ पर कब्जा करना सचमुच जरूरी था, जनरल सुंदरजी होराँ दस्सेया था कि फौज दे पेशेवर फैसले दे मुताबिक तदेहा करना बहोत लाजमी था। कनै अपणे हत्थ च पकड़ेह्यो पॉइंटर जो दस्सदे होयाँ तिन्हाँ गलाया था कि अगर सैह् तिस मामले च दूजी सलाह लैणा चाँहदे हन्न ताँ तिन्हाँ दा सुआगत है। अफसराँ जो एह् याद दिलाणे च मता टैम नीं लग्गा था कि फौज दे ऑपेरशन ने तालुक रखणे वाळे मामलेयाँ च सिविलियन दखल सन् 1962 दी हार दियाँ खास बजहाँ च इक थी — सिविलियन अफसर पिच्छैं हटी गै थे। 

सन् 1987 दे मुढ़ले महीनेयाँ च दोह्यो फौजाँ सरहद पर इक-दूजे दे आमणे-साह्म्णे थियाँ। हाथुंग-ला दे इलाके च, सैह् हकीकत च हाखीं च हाखीं पाई तैनात थियाँ। जनरल सुंदरजी होराँ ताह्लू पूरे हिमालयी इलाके च भारत दी फौज दी पकड़ जो मजबूत करने ताँईं इक होर एक्सरसाइज 'चेकरबोर्ड' लॉन्च करी दित्ती थी, जिस च 1970 दी दहाई ते अधर च लटकियाँ परियोजनाँ जो पूरा करने ताँईं सरकार जो क्रैश रोड-बिल्डिंग स्कीम शुरू करने ताँईं प्रेरित करना भी शामिल था।   

सैह् संकट मई सन् 1987 तिकर बणी रिहा, जद तदकणे विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी प्योंगयाँग जाँदे बग्त रस्ते च बीजिंग च रुकी गै।  अपणी बरोबरी दे चीनी नेतेयाँ कन्नै तिन्हाँ दी गल्लबात ते परंत, अगले इलाकेयाँ दा टेम्परेचर घट होणा शुरू होई गिया।  तिस मुद्दे नै मजबूती कनै निपटणे दे भारत दे फैसले दे फायदेमंद नतीजे होए। तिसते दिसंबर सन् 1988 च तदकणे प्रधानमंत्री राजीव गांधी दी बीजिंग यात्रा दा रस्ता खुली गिया। नतीजन चीनियाँ जो आपसी विश्वास-निर्माण दे उपायाँ (सीबीएम—कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मैसर्स) ताँईं इक बरोबर माहौल तैयार करने ताँईं रजामंद करी लिया गिया था जेह्ड़ा आखिर च सन् 1993 च सरहद पर शांति बणाई रखणे ताँईं इक समझौते च दर्ज कित्ते गै थे। तिसते परंत सन् 1996 च दूंहीं मुल्खां दे बिच इक समझौता होया था जिसदे मुताबिक लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल ते दो किलोमीटर दे अंदर कोई भी पासा गोळाबारी नी करह्गा, जैव-क्षरण नीं करह्गा, खतरनाक रसायनाँ दा इस्तेमाल नीं करह्गा, धमाके नीं करह्गा जाँ बंदूकाँ जाँ विस्फोटकाँ कन्नै शिकार नीं करह्गा।  तिस समझौते पर अमल करदे होए दूंहीं देशां दे फौजी अज्ज भी भिड़ंत दे बग्त बंदूकाँ दा इस्तेमाल नीं करदे हन्न। 

'ऑपेरशन फाल्कन' दे दौरान भारत दी फौज दी अगले मोर्चेयाँ पर तैनाती चीनियाँ जो अज्ज भी खळदी है। 9 कनै 12 दिसंबर सन् 2022 जो तित्थू याँगस्ते च होइयाँ झड़पाँ तिसदा नतीजा थियाँ। 

('ऑपेरशन फाल्कन' दा ब्योरा thequint.com च 14 मार्च 2018 जो अपडेट कित्ते गै मनोज जोशी दे लेख Operation Falcon: When Gen Sundarji Took the Chinese By Surprise ते साभार) 

 

.....................................................................

समाधियों के प्रदेश में (सताईसवीं कड़ी) 

मैं जुलाई सन् 1989 से लुम्पो में था।  लुम्पो और उससे आगे पड़ने वाला सीमा की ओर का क्षेत्र उस समय वायु अनुरक्षित क्षेत्र था अर्थात्  वहाँ तैनात सैनिकों को रसद वायु मार्ग से पहुंचाई जाती थी।  असम के तेजपुर स्थित हवाई अड्डे से डकोटा विमान उड़ते थे और लुम्पो ड्रॉपिंग ज़ोन में रसद गिराते थे जिसमें ‌आटा, चावल, डिब्बाबंद राशन इत्यादि शामिल होते थे। उस क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनजर डकोटा विमान चालक दल के लिए वहाँ रसद गिराना कोई सुगम कार्य  नहीं था। एक तो लुम्पो ड्रॉपिंग ज़ोन अपेक्षाकृत छोटा था और दूसरे विमान के पायलट को भारत-चीन सीमा रेखा का ध्यान भी रखना होता था जो वहाँ से अधिक दूर नहीं था। विमान के पायलट को सीमा रेखा से पहले विमान को मोड़ना होता था।  विमान चालक दल कुछ रसद आती बार गिराता और शेष रसद वापस लौटती बार गिराता था।  बहुत सी रसद गहरे नालों में गिर कर नष्ट हो जाती थी।  कुछ रसद वहाँ के मूल निवासियों के हाथ भी लग जाती थी। 

चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा तक सड़कें बना रखी थीं पर भारत की सड़कें तवाँग तक आकर रुक जाती थीं। उसके पीछे तत्कालीन भारत सरकार का वह डर था कि कहीं चीन, युद्ध के समय, उन सड़कों का इस्तेमाल न कर ले। और भारत सरकार सीमा तक सड़कें बना कर चीन को नाराज भी नहीं करना चाहती थी। 

सड़कें न होने की बजह से हमारी सेना वहाँ चीनियों को अधिक देर तक नहीं रोक सकती थी क्योंकि वहाँ कुमक और रसद पहुंचा पाना इतना आसान काम नहीं था जबकि चीनी सेना (पीएलए) के पास वहाँ सभी सुविधाएं उपलब्ध थीं। हाँ, भारतीय सेना तवाँग के आसपास चीनी सेना से भरपूर लोहा लेने में सक्षम थी। तब की युद्ध योजना के अनुसार आक्रमण होने की स्थिति में भारतीय सेना को चीनी सेना का प्रतिरोध करते हुए धीरे-धीरे तवाँग तक पीछे हटना था और तवाँग के आसपास उन्हें भरपूर टक्कर देनी थी। 

भारतीय थलसेना के एक जोशीले, चतुर और रणनीति में माहिर जनरल, तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल कृष्णास्वामी सुंदरजी ने दिल्ली के नेताओं और डिफेंस मिनिस्ट्री के बाबुओं के साथ-साथ चीनी सेना को उस समय अचंभित कर दिया था जब उन्होंने सन् 1986 में भारतीय सेना के एक माउंटेन ब्रिगेड को ज़िमीथांग अर्थात लुम्पो से एक किलोमीटर पीछे, तक लाकर उन सभी जगहों पर कब्जा कर लिया था जो सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले भारत के कब्जे में थीं।  

मैंने वहाँ चट्टानों पर लिखे हुए नारे पढ़े थे — "चिंडिट बदला लेगा", "यह मर्दों की जगह है" इत्यादि। वहाँ और भी बहुत से जोशीले नारे लिखे थे परंतु अब मुझे उनमें से दो नारे ही याद आते हैं। यहाँ 'चिंडिट' से अभिप्राय '77 माउंटेन ब्रिगेड चिंडिट' से है जिसे सन् 1986 में ज़िमीथांग में उतारा गया था। और जिस तोपखाना रेजीमेंट में मैं पोस्टेड था वह उसी ब्रिगेड को आर्टिलरी स्पोर्ट देने के लिए वहाँ तैनात थी। ब्रिगेड मुख्यालय हमसे लगभग एक किलोमीटर पीछे ज़िमीथांग में था परंतु उसकी पलटनें वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना (पी.एल.ए) की आँखों में आँखें डाल कर मुस्तैद खड़ी थीं। 

जब वहाँ से छुट्टी अथवा अन्य कार्य से तबांग की तरफ जाना-आना होता था तो हमें 'गोरसम' तक पैदल उतरना-चढ़ना पड़ता था।  सीधी चढ़ाई चढ़ते समय,  तकरीबन हर दस कदम पर लिखे गये नारे जवानों का जोश ठंडा नहीं होने देते थे।  मुझे चढ़ाई से कोई परेशानी नहीं होती थी परंतु उतरते समय घुटनों में तीव्र पीड़ा होने के कारण मुझे रोना आ जाता था। मैं सबसे पीछे रह जाता था और दूसरों को बार-बार कुछ दूरी पर रुक कर मेरा इन्तज़ार करना पड़ता था। घुटनों में दर्द संभवतः अति तीव्र बर्फीली ठंड के कारण होता होगा।  वहाँ से जब मेरी यूनिट इलाहाबाद आई तो मेरी टाँगें सामान्य दशा में आ गयी थीं।  हाँ, अब वह दर्द कभी-कभी उभर आता है जो संभवतः बुढ़ापे की भेंट है।  

1986-87 में वहाँ क्या घटा था?  आइए उस पर एक नज़र डालते चलें।  सन् 1962 में निःसंदेह  वहाँ हमारी करारी हार हुई थी परंतु सन् 1967 और 1986-87 की मुठभेड़ों में भारतीय सेना ने वहाँ चीनी सेना को झकझोर कर रख दिया था।  भारतीय सेना की करारी चोट से चीन इतना तिलमिला उठा था कि उन्होंने अपने तिब्बत मिलिट्री डिस्ट्रिक्ट कमाँडर और चेंगडू के मिलिट्री रीजन चीफ को बर्खास्त कर दिया था।  सन् 1986 में तवाँग के उत्तर में सुमदोरोंग चू क्षेत्र में भारत-चीन के बीच एक संघर्ष पनपा था, जिसमें जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने 'ऑपेरशन फाल्कन' के तहत आगे बढ़ कर सन् 1962 के युद्ध में हारे हुए क्षेत्रों को फिर से अपने कब्जे में ले लिया था। 

सन् 1983 में भारत सरकार ने फैसला किया था कि भारत को एक बार फिर से तवाँग के प्रमुख मठ शहर की रक्षा के लिए उस क्षेत्र में एक दृढ़ और भरोसेमंद मुद्रा अपनानी चाहिए।  भारतीय सेना नामका चू (नदी) के दक्षिण में रही, लेकिन आईबी की एक टीम ने सुमदोरोंग चू (नदी) में आना-जाना प्रारंभ कर किया, जो सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध की पहली झड़प के स्थल के कुछ किलोमीटर दूर न्यामजंग चू (नदी) के सुदूर पूर्व में स्थित है। उत्तर से दक्षिण की ओर बहने वाले न्यामजंग चू में, सुमदोरोंग चू और नामका चू, दोनों क्रमशः पूर्व और पश्चिम की ओर से आकर मिलते हैं। आईबी की टीम वहाँ गर्मियों के मौसम में रहती और सर्दियों में लौट आती थी।  उन्होंने यह क्रम सन् 1984 और 1985 में भी जारी रखा परंतु जब वे सन् 1986 में वहाँ गये तो उन्होंने चीनियों को वहाँ पहले से ही बैठे पाया था।  भारतीयों ने जून सन् 1986 में चीन की उस हरकत पर अपना विरोध जताया तो चीनियों ने उसे यह कह कर नकार दिया कि वह क्षेत्र तथाकथित मैकमोहन लाइन के उत्तर की ओर उनकी तरफ पड़ता है।  यह सब कुछ चीन द्वारा समय-समय पर अपनी विदेश नीति में किये जाने वाले उलटफेर करने के फैसले के मद्देनजर घटित हुआ था। 

1980 के दशक की शुरुआत तक चीन, दावों की अदला-बदली करके भारत-चीन सीमा विवाद को हल करने की इच्छा व्यक्त करता रहा था अर्थात् भारत अक्साई चिन पर अपना दावा छोड़ दे तो चीन उसके बदले नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा बाद में अरुणाचल प्रदेश) पर अपना दावा छोड़ने के लिए तत्पर था।  भारत सरकार ने उन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया था जब वे मूल रूप से सन् 1960 में झोउ एनलाई ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने और फिर सन् 1979 में डेंग शियाओपिंग द्वारा तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सामने रखे थे। 

उस समय यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि चीनी पूर्व में अपनी ताकत बढ़ा रहे थे। इसलिए उस क्षेत्र में भारतीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए निर्णय लिया गया था। उस नीति के तहत सेना ने 'ऑपरेशन फाल्कन'  चलाया ताकि वह शांतिकाल की स्थिति से त्वरित समय में सीमा तक पहुंच सके। 

चूंकि तवाँग से आगे कोई सड़क नहीं थी, इसलिए जनरल सुंदरजी ने तत्कालीन सोवियत यूनियन से खरीदे गए भारतीय वायुसेना के नए भारी लिफ्ट एमआई-26 हेलीकॉप्टरों का उपयोग करने का फैसला किया और एक माउंटेन ब्रिगेड को हवाई मार्ग से भारत-चीन सीमा के दक्षिण में स्थित ज़िमीथांग में उतार दिया।  सड़क मार्ग से वह जगह तवाँग से 90 किलोमीटर दूर है।  वह  एयरलिफ्ट 18 और 20 अक्टूबर सन् 1986 के बीच हुई थी।  इस तरह भारतीय सेना तीन अन्य सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्वत शिखरों के साथ सुमदोरोंग चू की ओर मुख किये हाथुंग-ला रिज पर काबिज़ हो गई थी। सन् 1962 में उस उच्च भूमि पर चीनी सेना स्थापित थी परंतु इस बार वहाँ भारतीय सेना थी।  (वहाँ तैनात इन्फैंट्री की टुकड़ियों के साथ-साथ हमारी तोपखाना यूनिट के फॉरवर्ड ऑब्जरवेशन ऑफिसर भी चीनियों की हर हरकत पर नज़र गड़ाए चौकस बैठे रहते थे।  और 'नीलिया' में हमारी अग्रिम तोपखाना बैट्री की तोपों के मुहाने चीन की तरफ खुले रहते थे।  हमारे वहाँ पहुंचने से पहले तक तवाँग में बोफोर्स तोपों की एक बैट्री की तैनाती हो चुकी थी।) 

चीन द्वारा छटपटाहट के साथ, उस क्षेत्र में सेना भेजने के साथ दोनों पक्षों ने पूरी सीमा पर एक सामान्य लामबंदी शुरू कर दी थी। यहाँ फिर से जनरल सुंदरजी ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। चीनी प्रतिक्रिया करते समय लड़खड़ाए और बाद में 15 नवंबर सन् 1986 की एक फ्लैग मीटिंग ने स्थिति को थोड़ा शांत किया। लेकिन अब भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश को एक पूर्ण राज्य में परिवर्तित करने का फैसला किया जो उस समय तक केंद्र प्रशासित क्षेत्र था। 

तत्कालीन सर्वोच्च चीनी नेता डेंग शियाओपिंग ने  भारत को "एक और सबक" सिखाने की धमकी जारी कर दी थी लेकिन भारतीय सेना अडिग रही हालांकि सरकारी पक्ष थोड़ा डगमगा गया था।  4 दिसंबर सन् 1986 को भारतीय नौसेना प्रमुख के घर पर नौ सेना दिवस समारोह के अवसर पर आयोजित पार्टी में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सीमा पर घटे घटनाक्रम का पता चला तो वह चिंतित हो उठे।  उन्होंने जनरल सुंदरजी और सिविलियन डिफेंस अफसरों को पार्टी समाप्त होने के तुरंत बाद साउथ ब्लॉक के ऑपरेशन्स रूम में इकट्ठा होने के आदेश दिये। 

पूछे जाने पर जनरल सुंदरजी ने प्रधानमंत्री को बताया था कि उनके द्वारा की गयी कार्रवाई, सुरक्षा से संबंधित कैबिनेट कमेटी के सन् 1983 के निर्णय का परिणाम थी जिसमें सेना को ऐसे स्थानों में पोजीशन लेने का आदेश दिया गया था जिससे तवाँग की सुरक्षा को मज़बूती मिले।  सेना पिछले वर्षों में केबिनेट समिति के उस निर्णय पर व्यवस्थित रूप से अमल करने में लगी हुई थी जब कि राजनेताओं और बाबुओं ने उस पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया था। 

इस बिंदु पर एक गरमागरम बहस हुई थी। कुछ अधिकारियों का मानना था कि उस विषय में सेना ने  अपनी हदें पार कर ली थीं।  यह प्रश्न पूछे जाने पर कि क्या हाथुंग-ला और आसपास के इलाकों पर कब्जा करना वास्तव में आवश्यक था, जनरल सुंदरजी ने बताया था कि सेना के पेशेवर फैसले के अनुसार वैसा करना अत्यावश्यक था। और अपने हाथ में पकड़े हुए पॉइंटर को दिखाते हुए उन्होंने कहा था कि अगर वे इस विषय में अन्य सलाह चाहते हैं तो उनका स्वागत है।  अधिकारियों को यह याद दिलाने में जादा समय नहीं लगा था कि सेना के ऑपेरशन संबंधी मामलों में नागरिक हस्तक्षेप सन् 1962 की हार के मुख्य कारणों में से एक था — सिविलियन अधिकारी पीछे हट गये थे। 

सन् 1987 के शुरुआती महीनों में दोनों सेनाएं सीमा पर एक-दूसरे के आमने-सामने थीं।  हाथुंग-ला क्षेत्र में, वे व्यावहारिक रूप से आँखों में आँखें डाल कर तैनात थीं।  जनरल  सुंदरजी ने तब पूरे हिमालयी क्षेत्र में भारतीय सेना की स्थिति को और मजबूत करने के लिए एक और एक्सरसाइज 'चेकरबोर्ड' लॉन्च कर दी थी, जिसमें 1970 के दशक से अधर में लटकी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सरकार को क्रैश रोड-बिल्डिंग स्कीम शुरू करने के लिए प्रेरित करना भी शामिल था।  

वह संकट मई 1987 तक बना रहा, जब तत्कालीन विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी प्योंगयाँग जाते समय रास्ते में बीजिंग में रुक गए।  अपने चीनी समकक्षों के साथ उनकी बातचीत के बाद, अग्रिम क्षेत्रों में तापमान कम होना शुरू हो गया।  उस मुद्दे से मजबूती से निपटने के भारत के फैसले के लाभकारी परिणाम हुए।  उसने दिसंबर सन् 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बीजिंग यात्रा का रास्ता खोल दिया।  परिणाम स्वरूप चीनियों को आपसी विश्वास-निर्माण के उपायों (सीबीएम—कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मैसर्स) के लिए एक समान माहौल तैयार करने के लिए सहमत कर लिया गया था जो अंततः सन् 1993 में सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए एक समझौते में दर्ज किये गए थे। तदोपराँत सन् 1996 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ था जिसके अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा से दो किलोमीटर के भीतर कोई भी पक्ष गोलाबारी नहीं करेगा, जैव-क्षरण नहीं करेगा, खतरनाक रसायनों का उपयोग नहीं करेगा, विस्फोट संचालन नहीं करेगा या बंदूकों या विस्फोटकों से शिकार नहीं करेगा।  उसी समझौते का पालन करते हुए दोनों देशों के सैनिक आज भी भिड़ंत के समय बंदूकों का प्रयोग नहीं करते हैं। 

'ऑपेरशन फाल्कन' के दौरान भारतीय सेना की अग्रिम मोर्चों पर तैनाती चीनियों को आज भी खलती है। 9 और 12 दिसंबर सन् 2022 को वहाँ याँगस्ते में हुईं झड़पें उसी का परिणाम हैं। 

('ऑपेरशन फाल्कन' का विवरण thequint.com में 14 मार्च 2018 को अपडेट किये गये मनोज जोशी के लेख  Operation Falcon: When Gen Sundarji Took the Chinese By Surprise से साभार)

        भगत राम मंडोत्रा हिमाचल प्रदेश दे जिला कांगड़ा दी तहसील जयसिंहपुर दे गरां चंबी दे रैहणे वाल़े फौज दे तोपखाने दे रटैर तोपची हन।  फौज च रही नैं बत्ती साल देश दी सियोआ करी सूबेदार मेजर (ऑनरेरी लेफ्टिनेंटदे औद्धे ते घरे जो आए। फौजी सर्विस दे दौरान तकरीबन तरताल़ी साल दिया उम्रा च एम.. (अंग्रेजी साहित्यदी डिग्री हासिल कित्ती। इस ते परंत सठ साल दी उम्र होणे तिकर तकरीबन पंज साल आई.बी, 'असिस्टेन्ट सेंट्रल इंटेलिजेंस अफसरदी जिम्मेबारी निभाई।

      लिखणे दी सणक कालेज दे टैमें ते ही थी। फौज च ये लौ दबोई रही पर अंदरें-अंदरें अग्ग सिंजरदी रही।  आखिर च घरें आई सोशल मीडिया दे थ्रू ये लावा बाहर निकल़ेया।

     हाली तिकर हिमाचली पहाड़ी च चार कवता संग्रहजुड़दे पुलरिहड़ू खोळूचिह्ड़ू-मिह्ड़ूफुल्ल खटनाळुये देछपी चुक्केयो। इक्क हिंदी काव्य कथा "परमवीर गाथा सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल - परमवीर चक्र विजेताजो सर्वभाषा ट्रस्टनई दिल्ली ते 'सूर्यकांत त्रिपाठी निराला साहित्य सम्मान 2018' मिली चुकेया।

    हुण फेस बुक दे ज़रिये 'ज़रा सुनिए तोकरी नैं कदी-कदी किछ न किछ सुणादे रैंहदे हन।