पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

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Wednesday, May 6, 2026

मुंबई डायरी - अट्ठ

 


अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त अट्ठ।  

 

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रोजी-रोटी कनै भाषा-बोली

बड़ी पराणी गल्‍ल है। हिमाचल दे शिक्षा मंत्री  नारायण चंद पराशर होरां मुंबई च पहाड़ी गांधी दी स्‍मृति च इक पहाड़ी कवि सम्‍मेलन कराया था।  इक्‍की सभा च इस सम्‍मेलन दी गल्‍ल निकळी कनैं हिमाचल मित्र मंडल दे प्रधान गजेंद्र कटोच साहब गल्‍ला जो पहाड़ी भासा पर लई गै। हालांकि सैह् पहाड़िया च ही गल करा दे थे पर तिन्‍हां दा सुआल कनैं तंज पहाड़ी भासा पर था। तिनां दा गलाणा था कि पता नी कैंह् असां पहाड़ी भासा-पहाड़ी भासा करदे रैंह्दे। मुयो दिक्‍खा ता सही न इसा दी कोई लिपि है, न स्‍कूलां च इसा दी पढ़ाई होंदी। न कोई कताब मैं दिक्‍खी। उपरे ते दरयाए ऊआरले बोलदे मेरे को दरयाए पारले की भासा नीं ओती है। 

जितणा कि बणी पिया मैं इस सुआले दा जवाब दित्ता। मैं पुच्‍छया, कटोच साह्ब तुसां बोलदे असां राजेयां दे परुआरे ते हन। पराणे जमाने च ता राजयां दे सारे बही खाते पहाड़ी च कनैं टांकरी लिपि च लखोंदे दे थे। असां सैह् लिपि भुलाई ती कनैं हुण असां देवनागरी च पहाड़ी लिखदे। भासा कनै लिपि दो लग चीजां हन। इक भासा कइयां लिपियां च लखोंदी कनैं इक्‍की लिपिया च कई भासां लखोंदियां। जियां मतियां खड्डां दे मिलणे ते इक नदी बणदी तियां ही कइयां बोलियां ते इक भासा बणदी। निजी बैहसां कनैं सभां ते लावा इस सुआले पर मैं हिंदी-पहाड़ी च लेख भी लिखे। मिंजो साही होर भी हन  पहाड़िया दे वकील पर लगदा नीं इक्‍की भी बंदे दी सुई इस सुआले ते गांह बधी होऐ। 

भासा हौआ साही होंदी। जाह्लू  तिकर कोई नक्‍के न बूज्‍जै इसा दे होणे दा पता ही नीं लगदा। इस ताईं अपणिया सूइया जो ही गांह् बधाणे च खैर है। असल च माह्णूए दे जीणे दा सारयां ते बड्डा इक ही मुद्दा है - ढिड्ड भरना। ढिड्डे दी भासा दुइया भासां ताई जगह ही नीं छडदी। हालांकि कोई भी भासा ढिड्ड नी भरदी पर असां इस देसे दे लोग अंगरेजिया जो ढिड्डे दी भासा ही नीं बल्कि ज्ञान कनैं सत्‍ता दी भासा बी मनदे कनैं इसा नै प्‍यार करदे। अपणियां भासां जो गरांचड़ कनैं पिछड़िया समझी गलाणे च भी शर्म महसूस करदे। जिन्‍हां दा प्यार असां दियां अपणियाँ भासा हन तिन्‍हां दा बी रिश्ता कनैं ब्याह अंगरेजिया नै होया। हुण इस अवैध प्यारे जो जीणा मुस्कल है। बस कूणा बही नैं रोई ही सकदे।    

ढिड्ड ता मुनिया साही बैह्ला बदनाम है। इक बहाना है, सब मनै दी डुआरियां हन। लोग सूने साही जमीनां छड्डी बदेसां च मजदूरी करी खुश हन। हुण हिमाचली मुंडू मुंबई ढिड्ड भरना आए थे या सुपनयां पूरा करना। सुपनयां कनैं भी मुश्‍कल एह है कि ढिड्ड भरोया होअे तांही सुपने दिक्‍खी होंदे। इक सोच ऐह् बी है कि मुंबई च असां दी पैह्ली पीढ़ी कराची, लहौर-अंबरसरे दे पंजाबी बपारियां सौगी रसोइया बणी तिन्‍हां कनैं अपणे ढिड्ड भरना आई थी।     

मेरे ग्रां लाटे ते बी सारयां ते पैह्ले सुखानंद कनैं हरिभगत दो बुजुर्ग अजादिया ते पैह्लें ही बाया लहौर मुंबई च मिल मालकां दे रसोइए बणी ने पूजी चुक्‍कयो थे। इस ते बाद मेरे ताऊ अमरनाथ होरां ते प्‍चांह मेरे पिता होरां साही टैक्‍सी-डरैबरां दी लंघीर बध दी गई। मेरे पिता ब्‍हाल डरैबरां कनैं खानसामयां दुईं दे किस्‍से होंदे थे। मेरे पिता सौगी दीनानाथ जी टैक्सियां धोई डरैबरी सिक्‍खा दे थे। तिन्‍हां दे पिता कुसी सेठे दे घरें रसौइए थे कनैं सैह् इन्‍हां ताईं भी खाणा लई ओंदे थे। इक रोज मेरे पिता होंरा सैह् औंदे दिक्‍खी ले कनैं दीनाना‍थ जी जो छेड़ने ताईं पुच्‍छया। दीना नाथ खाणा खाई लिया। दीनानाथ होरां लापरवाही च जवाब दिता। मेरा खानसामा लेकर आ र‍हा है और हम खाणा खाणे के बाद केळा भी खाएगा। दीनानाथ जी दे पिता होरां एह् सुणी लिया। तिन्‍हां गुस्‍से च खाणे दे डब्‍बे दी चोट चळे च र्दई ती कनैं शुरु होई गै। खाएगा बाबा जी का। अज से खाणा लाणा बंद। 

एह् 1978 दी गल्‍ल है। दसियां ते बाद मैं टाइपिंग सिक्‍खी नौकरी तोपा दा था। मेरे इक्की पड़ेसिए दिया कंपणिया च इक नौकरी थी। तिनी मेरी एप्‍लीकेसन लाई ती। जादा नीं दो-चार ही लोक थे। मेरा टेस्‍ट, इंटरव्‍यू सब ठीक-ठाक होया। मनैजरें मिंजो अपणे केबिने च सद्दी नै बधाई दिती कनैं बैठणे जो गलाया। मेरे बैठ्यो-बैठ्यो ही कुछ लोकां आई ने मनेजर घेरी लिया। सैह् सारे अपणे ग्रांए दिआ इक्‍की कुड़िया जो एह् नौकरी दुआणा चाह्ंदे थे। आखर च मनेजरें तिसा कुड़िया जो नौकरी देई नैं मिंजो ते माफी मंगी लई। जगह मुंबई थी पर सैह् लोक मराठी नीं थे। सैह् मेरा बड़ा मुश्‍कल वग्‍त था। मैं दुखी, निराश होई नै बड़ी देरा तक सड़कां पर भटकदा रिह्या। 

कुसी जो कुत्‍थी भी बगैर भेदभाव ते रोजी-रोटी कमाणे कनै बसणे दी अजादी होणा चाई दी। एह् बड़ी बड्डी  तरक्‍की पसंद,  सोच है। क्‍या असल च एह् होई सकदा? जे दुयां प्रांता ते आई नै लोक एह् करा दे ता अपणी जगहां कनैं भासां ताईं लड़ने वाळयां महाराष्‍ट्र दे स्‍थानीय लोकां दी सोच किह्यां गलत होई सकदी। 

असल च इन्‍हां परिस्थितियां दे कारण ही बाला साह्ब ठा‍करे होरां दे आंदोलन जो मुंबई च जनसमर्थन मिल्‍ला। इस आंदोलन कनैं मिल्लियां नोकरियां दे बलबूते पर 1960 ते 1990 औणे तिकर हासिए पर रैह्णे आळे मराठी समाजे च इक नौंआ संप्‍पन्‍न, पढ़या-लिखया मध्‍य वर्ग आकार लई चुक्‍कया था। इसा सफलता दिया पूंजिया पर ही ठाकरे साह्ब दी पार्टिया दी बादशाहत अज्‍जे तिकर चल्ला दी।

जित्‍थू तिकर हिमाचलियां पर इस आदोंलन दे असर दी गल है, असां मुंबई च टैक्सियां साह्यी अपण्‍यां कम्मां कनैं बपारां च थे। नौकरियां च असां दी कोई खास हिस्‍सेदारी नी है। नां ही असां दी ऐसी कोई बड्डी संख्‍या है, जेह्ड़ी कुसी जो चुभै।  

बैसे दिक्‍खया जाए ता इक छोटी देई नौकरी कनै  मजदूरी करने ताईं अपणा घरबार, जमीन छड्डी परदेसी जगहा च आई नै बसणा सौखा कम्‍म नीं है। जितणी की कमाई होंदी तिसा च रोटी ता मिली जांदी पर छत नीं मिलदी। सेठां देआं मैह्लां कनैं कारखानयां दे अक्‍खे-बक्‍खें झु‍ग्गियां दे नरक बसदे। दो दिन पैह्लें हांगकांग दे कॉफिन घरां दा वीडियो दिक्‍खी नैं रुह कंबी गई। इन्‍हां नरकां बगैर मजदूर ता ग्रां च रोटी खाई सकदे पर सेठां कनैं सरकारां दे कम्‍म कनैं बपार-कारखाने नीं चली सकदे। इस सारे कारोबार च फायदा शोषण करने वाळयां पूंजी‍पतियां दा ही होंदा। अंगरेज कोई मूरख नीं थे। गन्नयां दी खेती कनैं खंडा देआं कारखानयां ताईं जहाजां च भरी नैं मजदूर लई जांदे थे। हुण ता असां अप्‍पू ही डंकी की डोंकी बतां च समाने साही लदोई पूजी जा दे।

 


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रोजी-रोटी और भाषा-बोली

बहुत पुरानी बात है। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन  शिक्षा मंत्री नारायण चंद्र पराशर जी ने मुंबई में पहाड़ी गांधी की स्मृति में एक पहाड़ी कवि सम्मेलन कराया था। एक सभा में उस सम्मेलन की बात निकली और हिमाचल मित्र मंडल के प्रधान श्री गजेंद्र सिंह कटोच जी बात को पहाड़ी भाषा पर लेकर चले गए। हालांकि वे पहाड़ी में ही बात कर रहे थे पर उनका सवाल और व्यंग्य दोनों पहाड़ी भाषा पर थे। उनका कहना था कि पता नहीं क्यों हम पहाड़ी-पहाड़ी करते रहते हैं। न इस भाषा की कोई लिपि है, ना स्कूल में पढ़ाई जाती है, न इसकी कोई किताब मैंने देखी है। नदी के इस पार का बंदा बोलता है कि मुझे उस पार वालों की भाषा नहीं आती है। 

जितना मुझ से बन पड़ा मैंने इस सवाल का जवाब दिया। मैंने पूछा कटोच साहब, आप लोग खुद को राज परिवार का बताते हैं। पुराने जमाने में राजाओं के सारे वही खाते पहाड़ी और टांकरी लिपि में लिखे जाते थे। अब हम लोगों ने वह लिपि भुला दी है और देवनागरी में पहाड़ी लिख रहे हैं। भाषा और लिपि दो अलग वस्तुएं हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जाती है और एक लिपि में कई भाषाएं लिखी जाती हैं। जिस तरह कई छोटी नदियों के मिलने से एक बड़ी नदी बनती है, उसी तरह कई बोलिया से एक भाषा बनती है। निजी बहसों और सभाओं के अलावा इस सवाल पर मैंने हिंदी और पहाड़ी में लेख भी लिखे हैं। मेरी तरह और भी पहाड़ी भाषा के वकील हैं पर लगता नहीं है कि एक भी बंदे की सुई इस सवाल से आगे बड़ी हो। 

भाषा हवा की तरह होती है। जब तक कोई नाक न दबाए इसके होने का पता ही नहीं चलता है। असल में इंसान के जीने का सबसे बड़ा एक ही मुद्दा है पेट भरना। पेट भरने की भाषा दूसरी सारी भाषाओं के लिए जगह ही नहीं छोड़ती है। हालांकि कोई भी भाषा पेट नहीं भर सकती है पर हमारे देश के लोग अंग्रेजी को पेट की ही नहीं बल्कि ज्ञान, ताकत और सत्‍ता की भी भाषा मानते हैं।  वे इसे प्यार करते हैं और इसकी पूजा करते हैं। अपनी भाषाओं को पिछड़ी और ग्रामीण मानते हैं। 

पेट तो मुन्नी की तरह बेवजह बदनाम है। एक बहाना है सब मन की उड़ाने हैं। लोग सोने जैसी कीमती जमीन छोड़कर विदेश में मजदूरी करके खुश हैं। अब हिमाचली युवा मुंबई में पेट भरने आए थे या सपने पूरे करने? सपनों के साथ एक मुश्किल होती है कि पेट भरा हो तभी सपने देखे जा सकते हैं। एक सोच यह भी है कि मुंबई में हमारी पहली पीढ़ी कराची, लाहौर और अमृतसर  के व्यापारियों के साथ रसोईया बनकर उनके और अपने पेट भरने आई थी।  

मेरे गांव लाहट से भी सबसे पहले सुखानंद और हरी भक्त दो बुजुर्ग आजादी के पहले ही वाया लाहौर मुंबई में मिल मालिकों के रसोइये बनकर पहुंच चुके थे। इसके बाद मेरे ताया अमरनाथ जी के पीछे मेरे पिताजी जैसे टैक्सी ड्राइवरों की कतार सी लग गई। मेरे पिताजी के पास टैक्सी-ड्राइवरों के साथ-साथ रसोइयों के भी किस्‍से होते थे। मेरे पिता के साथ दीनानाथ जी भी ड्राइविंग सीख रहे थे। उनके पिता किसी सेठ के घर खाना बनाने का काम करते थे और वह इनके लिए भी खाना लेकर आते थे। एक रोज मेरे पिताजी ने उन्हें आते हुए देख लिया और दीनानाथ जी को छेड़ते हुए पूछा भाई दीनानाथ खाना खा लिया? दीनानाथ जी ने लापरवाही में जवाब दिया। मेरा खानसामा लेकर आ रहा है और हम खाना खाने के बाद केला भी खाएगा। दीनानाथ जी के पिताजी ने यह सब सुन लिया। उन्होंने गुस्से में खाने के डब्बे को जोर से पटका और शुरू हो गए। खाएगा बाबा जी का। आज से तेरा खाना बंद। 

यह 1978 की बात है। दसवीं के बाद में टाइपिंग सीख कर नौकरी ढूंढ़ रहा था। मेरे एक पड़ोसी की कंपनी में एक नौकरी निकली थी। उसने उस पद के लिए मेरा आवेदन कंपनी में लगा दिया। ज्यादा नहीं दो-चार ही लोग थे। मेरा टेस्ट इंटरव्यू सब ठीक-ठाक हो गया। मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुलाकर बधाई दी और बैठने के लिए कहा। मेरे बैठे-बैठे ही कुछ लोगों ने आकर मैनेजर को घेर लिया। वे अपने गांव की एक लड़की को यह नौकरी दिलाना चाहते थे। आखिर में मैनेजर ने उस लड़की को नौकरी देकर मुझसे माफी मांग ली। जगह मुंबई थी पर वे लोग मराठी नहीं थे। वह मेरा बड़ा मुश्किल वक्त था। मैं दुखी निराश होकर बड़ी देर तक सड़कों पर भटकता रहा। 

किसी को कहीं भी बिना किसी भेदभाव से रोजी-रोटी कमाने और बसने की आजादी होनी चाहिए। यह एक बड़ी ही तरक्की पसंद सोच है। क्या असल में यह हो सकता है? यदि दूसरे प्रांत से आए लोग यह सब कर रहे हैं तो अपनी जगह और अपनी भाषा के लिए लड़ने वाले स्थानीय महाराष्ट्र के लोगों की सोच कैसे गलत हो सकती है।

असल में इन परिस्थितियों के कारण ही बाला साहेब ठाकरे के आंदोलन को मुंबई में इतना भारी  जनसमर्थन मिल सका। इस आंदोलन के कारण मिली नौकरियों के बलबूते पर 1960 से 1990 आने तक हाशिए पर रहने वाले मराठी समाज में एक नया संपन्न पढ़ा लिखा मध्य वर्ग आकार ले चुका था। इस सफलता की पूंजी पर ही ठाकरे साहब की पार्टी की बादशाहत आज तक चल रही है। 

जहां तक हिमाचलियों पर इस आंदोलन के असर की बात है, हम मुंबई में टैक्सी जैसे अपने कामों और व्यापारों में थे। नौकरियों में हमारी कोई खास हिस्सेदारी नहीं थी। न हमारी ऐसी कोई बड़ी संख्या है जो किसी को चुभ सके। 

वैसे देखा जाए तो एक छोटी सी नौकरी और मजदूरी करने के लिए अपना घर-बार जमीन छोड़कर परदेसी जगह में जाकर बसना कोई आसान काम नहीं है। जितनी कमाई होती है, उसमें रोटी तो मिल जाती है पर छत नहीं मिल पाती है। हमारे सभी शहरों में सेठों के महलों और कारखानों के अगल-बगल में झुग्गियों के नर्क बसते हैं। दो दिन पहले हांगकांग के कॉफिन घरों का वीडियो देखकर रूह कांप गई। इन नरकों के बिना मजदूर तो गांव में रोटी खा सकते हैं पर मालिकों और सरकारों के काम और व्यापार कारखाने नहीं चल सकते हैं। इस सारे कारोबार का फायदा शोषण करने वाले पूंजीपति व्यापारियों को ही होता है। अंग्रेज कोई मूर्ख नहीं थे, जो गन्नों की खेती और शक्कर के कारखाने के लिए जहाज में भरकर मजदूर ले जाते थे। अब तो हम अपने आप ही डंकी या डोंकी मार्ग से सामान लेकर खुद ही पहुंच जा रहे हैं।

ऊपर दिए गए चित्र जानी मानी चित्रकार निर्मला सिंह के हैं। पहली कृृृति का शीर्षक है होप और दूसरी का कन्ट्रास्ट। 28 अप्रैल से 4 मई तक निर्मला जी के चित्रों की प्रदर्शनी मुंबई स्थित जहांगीर आर्ट गैलरी में लगी थी और खूूब सराही गई थी। हमें भी इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। यहां ये चित्र उनके कैटलॉग से साभार लिए गए हैं। बगल के चित्र में खड़े हैं बाएं से - जुवी सिंह, जयशंकर, ओमा शर्मा, निर्मला सिंह, सुमनिका सेठी और अनूप सेठी। 


मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।


Wednesday, February 4, 2026

मुंबई डायरी - सत्त


 अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त सत्त। 

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका दा कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घरे बक्‍खें ही था। तैह्ड़ी सारे देसे ते रोजी रोटी ताईं लोक अपणियाँ भासां लई मुंबई औआ दे थे। इक भासा बोलणे आळे शैह्रां च इक्की टबरे साही रैह्न्दे थे। जेह्ड़ा बी नौकर ग्रांए जो जांदा था, अप्पू  कन्नै इक दो जणे होर लई औंदा था। एह् सारे लोक इक्को देह्या ही कम्म करदे थे। जिञा हिमाचल ते मुंबई औणे वाले टैक्सियां नें मिलदे जुलदे कम्मां च ही थे। इन्हां च महाराष्‍ट्र दे ग्रां ते औणे वाले लोक भी शामल थे। मुंबई इन्‍हां सारयां रंगा दा कौलाज रचा दी थी। 

इन्हां समाजा देआं निजी स्कूलां ते अलावा नगरपालिका दे सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिन्दी, उर्दू, कन्‍नड़ कनैं सिन्धी भासा दे स्कूल ता मेरे लाके च मैं दिख्यो। कांगरेस कनैं अजादिया दे आंदोलन दी धुरी होणे दे कारण महात्मा गांधी जी दे स्वदेशी कनैं हिन्दी प्रेम दा मुंबई च असर था। मोह्ल हिन्दिया दी लीडरी च देसी भासाँ दा था। इस ते अलावा मिसनरी अंग्रेजी स्कूलां दा ता लग ही रुतबा था। एह् स्कूल घट कनैं देसी फ्री स्कूलां दिआ तुलना च बड़े मैह्ंगे थे। देसे जो अंगरेजां ते अजाद होयां जो हाली दस बीह साल ही होये थे। तिहाड़ी असां जो एह् अनुमान ही नीं था कि इसा अगंरेजिया स्‍कूलां ते असां दियां सारियां भासां दा बिस्तरा गोळ करी देणा है। 

मराठी ते अलावा गुजरात, राजस्‍थान, कनैं उत्‍तर भारत दे प्रांता ते औणे वाळयाँ दिआं सारियाँ भासां हिन्दिया ते करीब थियां। जित्थू तिकर खड़ी बोली हिन्दिया दी गल्ल है, एह् हिन्दी प्रातां च स्कूले दी भासा ता थी पर घरे दी भासा नीं थी। तिस जमाने दे अनपढ़ कने घट पढ़यां उत्तर भारत दे लोकां तांई एह् हिन्दी भी कुछ मुश्‍कल ही थी। इन्हां सारयां मिली जुली हिन्दी सिक्खी लई। इस च फिल्मां कनैं रेडियो पर बजणे वाळयां गीतां दा बड़ा हथ था। 

तिस जमाने च हिन्दी लगभग सारयां लोकां जो औणे वाले कल दी भासा लग दी थी। अज कणे नूरा कुस्ती वरोधे दे बाबजूद हिंदिया दे फलणे फुलणे च मराठी भाषियां दा बड़ा जोगदान है। अज भी एह् गैर मराठियां नैं गल्ल करने दी बारिया झट हिन्दिया च आई जांदे।

जे एह् देह्या मोह्ल नी हौंदा ता होरनां शहरां साही मुंबई च बी असां ते अपणी भासा सांभी नीं होणी थी। इत सारयां जो अपणिया भासा च गल्ल करदे दिक्खी नै सामणे वाले जो भी लगदा कि मिंजो भी अपणिया भासा च गल्ल करना चाई दी। इस शैह्रे च आई नें बसणे ताईं कुसी जो भी इस तांई अपणी भासा-बोली छडणा नीं पई।

1952 च कांगड़ा मित्र मण्डल बणांदे टैमे असां दे बुजुर्गां साह्मणै मुस्कल एह् थी कि कांगड़ा पंजाब दा इक जिह्ला था। जे सैह् कांगड़े देयां लोकां जो ही सद्स्‍य बणाणे दी शर्त रखदे ता मते सारयां पहाड़ियां छुटी जाणा था। तिन्हां भासाई अधार पर प्रांतां दे बणने ते पैंह्लैं ही भासा दे अधार पर मंडळ बणाई लिया था। मुंबई च रैहणे वाळा कनै पहाड़ी डोगरी बोलणे वाला कोई भी मेम्बर बणी सकदा था। असां दे बुजुर्ग भी मुंबई च रही नैं ही एह् सोची सके। 

सारयां ते बड्डी गल्ल एह् है कि भई तिहाड़ी भासा मुद्दा ही नीं था। रोजी-रोटी, गरीबी कनैं सिरे पर छत मुद्दा था। मुंबई देसे दे गबों-गब इक बड़ा बडा औद्योगिक शैह्र था। मजबूत पूंजीपतियां, बपारियां कनैं मजबूर मजदूरां दा शैह्र था। इस शैह्रे दी बणावटा कनै सार्वजनिक संरचना च अंगरेजां ते अलावा पारसी बपारियां कनैं ट्रस्‍टां दा सबते जादा योगदान था।

मराठी भासा ता इक प्रती‍क कनैं झंडा था। मुद्दा शैह्रे दिया दौड़ा कनै नौकरियां च मराठी भासियां दा पचांह् रही जाणा था। असल च ठाकरे साह्ब मराठी भासा-संस्‍कृति दे नाएं पर नौकरियां दी लड़ाई लड़ा दे थे। 

बाळा साब ठाकरे होरां 1960 च मार्मिक नांए दी कारटून व्यंग पत्रिका शुरु किती। इसा च इन्‍हा मराठी हितां जो मुद्दा बणाई नै सरकार, समाज, राजनीति कनैं व्‍यवस्‍था पर तंज कसी नै लोकां जो जागरूक करने दी मुहिम चलाई। मार्मिक दिया कामयाबिया ते उत्‍साहित होई नै इन्‍हां 1966 च शिवसेना पार्टी बणाई। उसते बाद लोक जुड़दे गै, कारवां बधदा गया। अज भी मुंबई कनै महाराष्‍ट्र दे सारयां सरकारी कनै निजी बडेयां संस्‍थाना च स्‍थानीय लोकाधिकार समितियां कम्‍म करा दियां। 

मुंबई च हिमाचलियां तांई इक लग देह्या आदर-मान था। 1981-82 दी गल है। हिमाचले ते सरकारी सांस्‍कृतिक टीम औआ दी थी। मुंबई दे सारयां ते बड्डे हॉल षणमुखानंद च कार्यक्रम था। हॉले वाळयां जो कोई परमिशन चाही दी थी। परमिशना ताईं पुलिस कमिश्‍नर दे दफ्तर जाणे दा कम्‍म मेरे हिस्‍सें आया। हिमाचल दा नां दिक्‍खी नैं तिन्‍नी अफसरें सारयां ते पैह्लें मिंजो सद्दी लिया। सैह् हिमाचल जाई नै आया था। हिमाचल देआं लोकां कनैं वादियां दी तरीफ करी नै तिसदा मन नीं भरोआ दा था। तिस ताईं इतणी दूर हिमाचली कनै संस्‍थां होणा चरजे दी गल थी। तिन्‍नी मिंजो चाह् भी पयाई कनैं हत्‍थों-हत्‍थ परमिशन पकाड़ाई ती।

जित्थू तिकर असां दी पहाड़ी भासा दा सुआल है।  असां इक्‍की पास्‍सें हिमाचली पहाड़ी जो अठमी अनुसूची च शामल करने दी लड़ाई लड़ा दे; दुएं पास्‍सें असा ब्‍हाल अपणियां बोलियां दे बारे च ही कोई साफ नजरिया नीं है। मुस्‍कलां ता हन पर मुश्‍कलां ते जादा असां अप्‍पू च तलोंदे रैंहदे। इस दे कारण लोग कनैं समाज बी दुविधा च ही रैंह्दा।

पिछले नवंबर च मैं अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्‍था संघ दे सम्‍मेलन ताईं अंबरसर गया था। तित्‍थू मैं एह् महसूस कीता कि पहाड़िया ने तमाम सहानुभूति होणे दे बावजूद कुछ लोकां ताईं पहाड़ि‍या च गल्‍ल करना वाक़ई बड़ा मुश्‍कल होई चुक्‍या। दुए पास्‍सें समाजे दे काफी बड्डे तबके जो लगदा कि पहाड़ी भासा तिन्‍हां दी हिमाचली पच्‍छैण दा कोई हिस्‍सा नीं है। एह् ग्रांए दी ग्रांचड़ बोली है। घरां-ग्रां च सभां-मौकयां च गाणे, बजाणे, नचणे नाटी पाणे ताईं ठीक है पर इसा जो ढोणे दी जरूरत नीं है। इक भाई साह्ब अंबरसर च हिमाचलियां दे बड्डे नेता कनैं इक्‍की संस्‍था दे बड्डे पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता कनैं पंजाबी दे बड़े अच्‍छे वक्‍ता हन। सैह् असां दे पहाड़ी दे मुद्दे जो लगभग खारिज करी नें विरेंदर वीर जी, रमेश मस्‍ताना जी कनैं मिंजो साही पहाड़ी दे वकीलां दी पंजाबिया च देई क्‍लास लेंदे कि सुणने वाळयां जो मजा आई जांदा।

पंजाबी इतणे प्‍यारे कनै विश्‍वास नै पंजाबी बोलदे कि कोई तिन्‍हां ने मिली नैं  पंजा‍बिया ते बची नै निकळी ही नीं सकदा। सैह् अपणिया जबाना जो इतणे प्‍यारे नें जींदे, गांदे, नचदे कि अज हिंदोस्‍तान ही नीं सारी दुनिया पंजाबी सुरां कनैं गीतां पर नच्चा दी। कोई जबरदस्‍ती नीं है। कोई रौळा, आंदोलन नीं है। इक मस्‍ती है तिसा जो सारे गळे लगा दे। सभा ते बाद बजारे च सिंधी समाज दे अध्‍यक्ष जेह्ड़े असां दे परमुख परोह्णे थे, इक्‍की सिंधी भाउए दिया दकाना मिली गै। सैह् दोयो पंजाबिया च गल करी जान। मैं पुच्‍छया बड़ी साईं सिंधी कतांह है? तिन्‍हां दस्सया ऐत्‍थू पंजाबी ही चलदी। मुंबई च ता हिमाचलिया साही लगभग सारे सिंधी अपणिया भासा च गल करदे पर पंजाब दी गल बखरी है। 

असां अपणिया भासां दी लड़ाई लड़ने वाळयां जो पंजाबियां ते सिक्‍खणा चाही दा। कोई रौळा पाणे कनै मारपिट करने दी कोई जरूरत नीं है। र्सिफ अपणिया भासा च मस्तिया नै जीणे कनैं गलाणे दी जरूरत है। लोक अपणे-आप अपणी भुली तुसां दी गलाणा लगी पोंदे। भासां साही कुछ मामलयां च सरकारां ते जादा समाजे दी चलदी। सरकारां कनै भारतीय भासा प्रेमी रही गै नारयां लगांदे। इस देसे देआं लोकां सारियां भारतीय भासां दा स्‍कूलां ते बिस्‍तरा गोळ करी नै ही साह् लिया। जेह्ड़े सरकारी स्‍कूल बच्‍चयां जो तरसा दे थे, अंगरेजी बणदयां ही बच्‍चयां नैं भरोणा लगी पियो। 

आखर च इक मुंबईकर पहाड़ी कनैं मराठी भासा प्रेमी होणे दे कारण मिंजो बड़ा दुक्‍ख होंदा जाह्लू कोई पुच्‍छदा कि मुंबई च एह् क्‍या होआ दा। दुख ताह्लू भी होंदा जाह्लू मैं अपणे ग्रांए च पहाड़िया च सुआल पुच्‍छदा कनैं जवाब पहाड़ी हिंदिया च मिलदा।

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका का कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घर के पास ही था। उस समय सारे देश से लोग रोजी-रोटी के लिए मुंबई आ रहे थे। जो भी गांव जाता था, अपने साथ एक दो जने और लेकर आ जाता था। यह सारे लोग एक जैसा ही काम करते थे। जैसे हिमाचल से मुंबई आने वाले टैक्सियों से मिलते जुलते काम ही करते थे। मुंबई इन सभी रंगों का एक कोलाज रच रही थी।

इन समाजों के निजी स्कूलों के अलावा नगर पालिका के सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिंदी, उर्दू, कन्नड़ और सिंधी भाषा के स्कूल तो मेरे इलाके में ही थे। कांग्रेस और आजादी के आंदोलन की धुरी होने के कारण महात्मा गांधी जी के स्वदेशी और हिंदी प्रेम का मुंबई में प्रभाव था। हिंदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं का माहौल था। इसके अलावा अंग्रेजी मिशनरी स्कूलों का एक अलग ही रुतबा था। यह स्कूल कम थे और भारतीय भाषाओं के स्कूलों की तुलना में महंगे थे। उस समय हमें यह अनुमान नहीं था कि इस अंग्रेजी ने स्कूलों से हमारी सारी भाषाओं का बिस्‍तरा गोल कर देना है। 

मराठी के अलावा गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के प्रांतों से आने वालों की भाषाएं हिंदी के करीब थीं। जहां तक खड़ी हिंदी की बात है, हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी स्कूल की भाषा तो थी पर घर की भाषा नहीं थी। उस जमाने में अनपढ़ और कम पढ़े लिखे उत्तर भारतीय लोगों के लिए भी यह हिंदी कुछ मुश्किल ही थी। इन सब ने मिलजुल कर हिंदी सीख ली। इसमें फिल्मों और रेडियो पर बजने वाले गीतों का बड़ा हाथ था। 

उस जमाने में लगभग सभी लोगों को हिंदी आने वाले कल की भाषा लग रही थी। आज के नूरा कुश्ती विरोध के बावजूद हिंदी के फलने-फूलने में मराठी भाषियों का बहुत बड़ा योगदान है। आज भी यह गैर मराठियों से बात करते समय झट से हिंदी में आ जाते हैं।

यदि ऐसा माहौल न होता तो दूसरे शहरों की तरह मुंबई में भी हमसे हमारी भाषा की संभाल नहीं होनी थी। यहां सबको अपनी-अपनी भाषा में बात करते देखकर सामने वाले को भी लगता है कि मुझे भी अपनी भाषा में बात करना चाहिए। इस शहर में बसने के लिए किसी को भी अपनी भाषा बोली छोड़नी नहीं पड़ी। 

1952 में कांगड़ा मित्र मंडल बनाते समय हमारे बुजुर्गों के सामने यह मुश्किल थी कि कांगड़ा पंजाब का जिला है। यदि कांगड़ा के लोगों को ही सदस्य बनाते हैं तो बहुत सारे पहाड़ियों ने छूट जाना था। उन्होंने भाषा के आधार पर प्रांतों के बनने से पहले ही भाषा के आधार पर मंडल बना लिया। मुंबई में रहने वाला पहाड़ी और डोगरी बोलने वाला कोई भी मंडल का सदस्य बन सकता था। हमारे बुजुर्ग भी मुंबई में रहकर ही ऐसा सोच सके। 

सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय भाषा नहीं बल्कि रोजी-रोटी, गरीबी और सर पर छत का मुद्दा था। मुंबई देश के बीचों बीच एक बहुत बड़ा औद्योगिक शहर था। इस शहर की बनावट और संरचना में अंग्रेजों के अलावा पारसी व्यापारियों और ट्रस्टों का भी बहुत बड़ा हाथ है। मराठी भाषा संस्कृति तो एक प्रतीक था। असल में ठाकरे साहब का मुद्दा शहर की दौड़ और नौकरियों में मराठी भाषियों का पीछे छूट जाना था। बालासाहेब ठाकरे ने 1960 में ‘मार्मिक’ नाम से एक कार्टून व्यंग्य पत्रिका आरंभ की। इसमें उन्होंने मराठी हितों को मुद्दा बनाकर सरकार, समाज, राजनीति और व्यवस्था पर व्‍यंग्‍य कर  लोगों को जागरूक करने की मुहिम चलाई। मार्मिक की सफलता के बाद उत्साहित होकर इन्होंने 1966 में शिवसेना पार्टी बनाई। उसके बाद लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। आज भी मुंबई और महाराष्ट्र के सभी सरकारी और निजी बड़े संस्थानों में स्थानीय लोकाधिकार समितियां काम कर रही हैं। 

मुंबई में हिमाचलियों के लिए एक अलग सा सम्मान था। 1981-82 की बात है। हिमाचल से सरकारी सांस्कृतिक टीम आ रही थी। मुंबई के सबसे बड़े षणमुखानंद हॉल में कार्यक्रम था। हाल वालों को किसी परमिशन की जरूरत थी। परमिशन के लिए पुलिस कमिश्नर के दफ्तर जाने का काम मेरे हिस्से आया। हिमाचल का नाम देख कर उन अधिकारी ने सबसे पहले मुझे बुलाया। वे हिमाचल जाकर आए थे और हिमाचल के लोगों और वादियों की तारीफ करके उनका मन नहीं भर रहा था। उनके लिए इतनी दूर हिमाचली और उनकी संस्था होना आश्चर्य की बात थी। उन्होंने मुझे चाय भी पिलाई और हाथों-हाथ परमिशन दे दी। 

जहां तक पहाड़ी भाषा का सवाल है, हम एक तरफ पहाड़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे पास अपनी बोलियों भाषाओं के बारे में कोई स्‍पष्‍ट नजरिया नहीं है। मुश्किलें तो हैं पर मुश्किलों से ज्यादा हम आपस में तुलना करते रहते हैं। इस कारण लोग और समाज भी दुविधा में है। 

मैं पिछले नवंबर में अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्था संघ के सम्मेलन में अमृतसर गया थाl वहां मैंने महसूस किया कि पहाड़ी के साथ तमाम सहानुभूति होने के बावजूद हमारे कुछ लोगों के लिए पहाड़ी में बात करना वाकई बहुत मुश्किल हो चुका है। दूसरी तरफ समाज के एक काफी बड़े तबके को लगता है कि पहाड़ी भाषा उनकी पहचान का कोई बड़ा हिस्सा नहीं है। यह गांव की ग्रामीण बोली है। घर गांव और सभाओं और अवसरों में गाने-बजाने, नाचने और नाटी डालने तक ठीक है पर इसे सिर पर ढोने की जरूरत नहीं है। 

अमृतसर में एक साहब हिमाचलियों के बड़े नेता, एक संस्था के बड़े पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और पंजाबी के बड़े ही अच्छे वक्ता हैं। उन्होंने हिमाचली पहाड़ी भाषा के मुद्दे को लगभग खारिज करते हुए वीरेंद्र वीर जी, रमेश मस्ताना जी और मेरे जैसे पहाड़ी वकीलों की पंजाबी में ऐसी क्लास ली कि सुनने वालों को मजा आ गया। 

सच में पंजाबी इतने प्यार और विश्वास के साथ पंजाबी बोलते हैं कि कोई उनसे मिलकर पंजाबी से बचकर निकल ही नहीं सकता है। वह अपनी जुबान को इतने प्यार से जीते, गाते और नाचते हैं कि आज हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया पंजाबी गीत-संगीत पर नाच रही है।

कोई जबरदस्ती नहीं। कोई आंदोलन नहीं। एक मस्ती है उसको सब गले लगा रहे हैं। सभा के बाद बाजार में सिंधी समाज के अध्यक्ष जो हमारे कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे, एक सिंधी भाई की दुकान में मिल गए। वह दोनों पंजाबी में ही बात कर रहे थे। मैंने पूछा सांई सिंधी कहां ? उन्होंने बताया कि वे आपस में पंजाबी ही बोलते हैं। मुंबई में तो हिमाचलियों की तरह लगभग सारे सिंधी अपनी भाषा में ही बात करते हैं पर पंजाब की बात अलग है। 

हम अपनी भाषाओं की लड़ाई लड़ने वालों को पंजाबियों से सीखना चाहिए। कोई शोर और मारपीट करने की जरूरत नहीं है। केवल अपनी भाषा में मस्ती से जीने और उसे बोलने की जरूरत है। लोग अपने आप अपनी भूल कर तुम्हारी बोलने लगते हैं। भाषा की तरह कुछ मामलों में सरकारों से ज्यादा समाजों की चलती है। सरकारें और भारतीय भाषा प्रेमी रह गए नारे लगाते हैं। इस देश के लोगों ने सभी भारतीय भाषाओं को स्कूली शिक्षा से बेदखल करके ही सांस ली। जो सरकारी स्कूल बच्चों के लिए तरस रहे थे, अंग्रेजी बनते ही बच्चों से भरने लग पड़े हैं। 

आखिर में एक मुंबईकर पहाड़ी और मराठी भाषा प्रेमी होने के कारण मुझे बहुत दुख होता है कि जब कोई पूछता है कि मुंबई में यह क्या हो रहा है। दुख तब भी होता है जब मैं अपने गांव में पहाड़ी में सवाल पूछता हूं और जवाब पहाड़ी हिंदी में मिलता है।

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।

Thursday, August 28, 2025

मुंबई डायरी - छे

 


 अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त छे। 

 

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 काळे समुद्दर

(मुंबई च 1909 च पैह्ली काळी-प्यूळी टैक्सी चल्ली थी कनैं 1920 दे आस्सें-पास्सें वाया कराची हिमचलियां दे पैर मुंबई दी धरती पर पई चुक्यो थे। मुम्बई च असां दी एह् यात्रा अज भी जारी है। असां एत्थू अपणी इक लग पच्छैण बी बणाइयो कनैं अपणिया भासा कनैं संस्कृति जो भी जीन्दा रक्खेया।)

कमलेश्वर जी दा इक नावल है ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’। तिस च इक्की माह्णुए  दे चाणचक समुदरे च गुआची जाणे दी कथा है। प्हाड़ां च मुंबई जो भी समुदर ही मनया जांदा। इत्थू इक समुदर खारे पाणिये दा ता है ही, होर बी मते सारे हन। माह्णुंआं दा  समुदरगरीबिया-अमिरिया दा समुदर, कितणे की गिणने। जिञा सारियाँ नदियां-नालू समुदरे च गुआची जांदे तिञा ही ऐत्थू सारे समुदर गुआच्यां माह्णुंआं नै ही भरोयो हन। एह् जिसदी गल्ल है तिस दा गुआचणा क्या -ता मिलणा क्या? सैह् पैह्लें ही अपणे आप्पे ते गुआची चुक्या था। सैह् पुतरां दमागी बमारिया दे लाजे तांई ही मुंबई अन्दया था। एह् लग गल है कि छड़यां दे डेरयां च लग ही मस्ती कनैं लापरवाही होंदी। इस साह्बें तिन्हां बुजुर्गां दा गुआचणा लाजमी ही था। इक रोज सैह् घरे ते निकळे कनैं हटी नै नीं आये।

तिन्हां जो ठेट ग्रांचड़ पहाड़िया ते लावा होर कोई भासा नीं औंदी थी। सैह् कुत्थू चली गै कनैं तिन्हां कने क्या होया होंगा? लोक तिन्हां ते कुछ पुच्छदे होंगे सैह् तिन्हां जो समझा नी औंदा होणा कनैं तिन्हां दा गल्लाया भी कुसी जो समझा नी ओआ दा होणा। सैह् कितणा, कुत्थू कनैं किञा जिये होंगे। कुन्नी कुछ खाणे जो भी दित्ता होंगा कि भुक्खे ही मरी गै होंगे। मेरे बाल मने पर एह् सुआल देह्या लखोया कि मटोंदा ही नीं।

मतयां सालां बाद इक अधेड़ जणासा कन्ने बी एह् देई घटना होई गयी थी। सैह् बी बचारी मानसिक लाजे ताईं आइयो थी। गलतिया नै दराजा खुल्ला रइया कनैं बेध्यानिया च सैह् काह्लू बाह्र निकळी गई पता ही नीं लग्गा। पजां-दसां मिंटा च हादसा होई गिया। उसते बाद सारियां संभव कोससां कनै संचार दे साधन होणे दे बावजूद तिसा दा कुछ पता नीं लग्गा। तिसा दे बारे च ता सोची ही नीं होंदा। पाणिए दा समुदर ता डुब्यां माह्णुआं दे जिस्मां बाहर सटी दिंदा। माह्णुआं दा समुदर ता साबतयां ही निगळी जांदा। इक शराब कन्नैं नशयां दा भी समुदर है। सैह् बी अंदरे ते नचोड़ी जिस्मां दे खोखयां छडी जांदा।

तिह्नां बुजुर्गां दे दूईं पुतरां दे ब्याह होए, बच्चे भी होए। पर सैह् दुनिया ते जल्दी चले गै। हालांकि ग्रां-घराँ दे कठेवे च दुःखां दे दिन बी रामे कनै ही सुखे नैं कटोई जांदे। बच्चे भी गांह् बधी जांदे। पर इन्हां दूई दियाँ लाड़िया भाल न कोई रोजगार था, न कमाईया दा कोई जरिया, न सूह्लत थी। फिरी भी इन्हां मुंबई नी छड्डी। एत्थू रही नैं याण्या दी जिन्दगी बणी जाणी एह् ही सोच्या होणा। अंगरेजिया दा भूत तेह्ड़ी बी जोरे पर था। खैर औखी-सोखी कट्टी दोह्यो चली गइयां।

एह् लगदा कि हुण ता माड़ा देह्या बदलाव आई गिया पर सोचा ता क्या होंदी कुड़ियां दी जिन्दगी? कुड़ियां जो या ता राज मिलदा या फ्हिरी तिन्हां दी अन्दरली सैह् कुड़ी बी इक डरौणे बणे च गुआची जांदी। कुच्छ होर ही होई जांदियां कुड़ियां। लोक बोलदे भाग-तकदीर किछ नी होंदे पर एह् ता भागां दी गल है कि कुड़ियां जो ब्याहे ते बाद कदेई जिन्दगी मिलदी है। मेरे ब्याहे कनै-कनै ब्याह होया था। सैह् दुईं-चौंही मीह्नयां च जळी ने मरी गई थी।

अपराधां ते ता दुनिया दा कोई पास्सा नीं छुट्या। शैह्रां च, खास करी गरीबां कनैं घट कमाइया आळयां दियां बस्तियां च ता जादा ही कोप होंदा। उपरे ते तेह्ड़ी उतर भारत च चंबल कनैं डाकुआं दा जोर था। ओत्थू दे लोग राजेयां-महाराजेयां साही डाकुआं दियां भादरिया दा बखान कर दे थे। एह् देइयां फिल्मां दा दौर ता हाली बी गिया नीं। इस ते भी बच्यां दे कोरयां मना कनैं सोचा पर क्या असर पौंदा होणा। कुल मलाई नैं सार एह् निकलदा भई, अपराधी बुरा इंसान नीं, भादर होंदा कनैं कई बरी इसा व्यवस्था च अपराधी होणा मजबूरिया सौग्गी-सौग्गी जरूरी भी होई जांदा।इन्हां बस्तियां च रैह्णे आळेयां बच्चयां दा इसा अपराधां दिआ दुनिया ते बचणा बड़ा जरूरी होंदा। जे इसा ते बची भी जाह्न ता नशयां दा लग फेर है। हुण ता ड्रग्स भी शामिल होई गिओ।

इक ता इन्हां बस्तियाँ च रैहणे वाळे कमियां, दुखां कने मुस्कलां दी जिंदगी जिया दे होंदे। तल्खी कनैं गुस्सा जादा होंदा। लड़ाई झगड़े झट गुनाह वणी जांदे। शराबे दियां भठियां-अड्डे, जूए दे अड्डे, लाटरिया साही मटका नांए दा इक जुआ है। हुण ता घटी ईया पर पैह्लें इस जुए दे शकीन शराबियां ते बी ज्यादा थे। पड़दे पचांह बैठ्या माफिआ गिरोह इस जो बड़े ही व्यवस्थित कारोबारे साही चलांदे थे। इस च लोग नंबरां पर पैसे लांदे थे। जिस दे छीं दे छे नम्बर निकली जाह्न तिस जो चुआनिया दे दो हजार मिल दे थे। इस ते अलावा माफिया करोबारां च जुआ, गैरकनूनी शराब, समग्लिंग, बन्दरगाह चोरी, फिल्मा दे टिकटां दी  काळाबजारी, रंगदारी साही कम्मां च बड़े खूंखार कनैं नामी गिरोह थे। इन्हां दे सरगने फौजी कमांडरां ते बी गांह बधी नै अज के कारपोरेट साही बपार करदे थे। देशां दिआं फौजां साही लाक्यां पर कब्जयां ताईं इन्हां दे अप्पू च युद्ध भी छिड़यो ही रैंह्दे थे। इन्हां सरगनयां कनैं गिरोहां तांई एह् बस्तिआं नौयां रंगरूटां जो भरती करी अपराधी बणाणे दी टरेनिंग देणे दा केंदर थिआं।

मिंजो कने स्कूले च इक दबंग पूरबिया मुंडू था। मार कटाई च गांह रैह्णे दे कारण छोरुआं दा हीरो था। तिस ते पढ़ाई ता पूरी होई नीं। बुढ़ें रेलवे च नौकरिया लगवाई ता। इस जो अंदर बैठणे ते जादा लोकला दिया छत्ती पर बही नै जाणे च जादा मजा औंदा था। ब्याह पैह्लें ही होया था इक बिट्टी भी थी। साहब भाई बणीं नौकरिया छडी लाका संभलणा लगी पै। तिस दिया अर्थिया च मैं पैह्ली बरी जब तक सूरज चांद रहेगा………..। नारा सुणया था। अज भी हर साल इक गणपती पंडाल च तिसदी तसवीर टंगोईयो मिलदी। तिस दी जिन्दगी ता गई पर तिस कनैं चार होर जींदे ही मरी गे।

इक बड़े पैसे आळे दा पुतर था। तिस जो मौज मस्ती करने जो पैसे घट पोंदे थे। ता सैह् अपणिया कारा च राती जो लुट मार करदा था। तिस दे फेरे च मेरा इक पहाड़ी मित्तर वकालत पढ़ी ने बकील बणदा-बणदा जेह्ला च पूजी गिया।

तुसां सोचा दे होणे गुआचयां माह्णुआं दियां कथाँ दा गुनाहां दे किस्सेयां ने क्या मेल है। मेल ता कोई नीं है पर गलाई नीं सकदे कुसी जो कुत्थू क्या मिली जाऐ। समुदरे च इक बरी पैरां हेठे ते रेत जमीन खिसकी जाए ता माह्णुए दा कोई बस नी चलदा।

लेह्रां तिस जो कुसी भी कनारें लई जांदिआं। कनारे पर जीन्दा बची नैं लग्गै या मरी ने, तकदीरा दे हत्थें ही होंदा। पहाड़ा ते इक नौईं जिंदगी भ्याग तोपणा ओणें आळे कई इस समुदरे दे भी शकार बणे। इकना दुईं इसा दुनिया पर भी राज किता कनैं उसते बाद खरी जिंदगिया दा भी नन्द लिया। अज भी मौजां च हन कनैं कुछ जुआनिआ च ही जान गुआई चले गै। इक ता बचारा दो चार दिन पैह्लें ही आया था। तिस बचारे जो कोई होर समझी नैं ही मारी ता था।

एह् बड़े ही दुःखे आळी गल है कि एह् कथा बी हिन्दी फिल्मां साही राजी-खुशी वाळे मोडे़ पर लगभग पूजदी आईयो थी। इक्की माऊ दे दो पुतर थे। इक्की दी पढ़ी लिखी ठीक ठाक नौकरी लगी गइयो थी। दुआ डरैबर बणी गिया था। पर इसा कहाणिया दे किरदारां जो गुनाहां दे समुदरे दियां लैह्रां खिंजी नैं लई गइयां।

लाके दा कोई गुंडा तिह्नां जो तंग करदा था। इक रोज गल बधी गई कनैं मार कटाइया च सैह् मरी गिया। तिनों जेह्ला च पूजी गै। इक बरी जेह्ड़ा चिकडे़ च फसी जाऐ सैह् मंडोंदा ही चला जांदा। तिन्नों बाहर आये फ्हिरी कुछ होया। मा तिस सदमे कनैं बमारिया नै चली गई। पुत्तर जेह्ला च। एह् देह्या कुसी ने कुत्थी भी होई सकदा। मती बरी परिस्थितियां लचार करी दिंदियां पर माह्णुए दी अपनी सोच भी ता जिम्मेवार होंदी। मेद है तिह्नां कनैं गांह् सब ठीक होऐ। सैह् सुखी, स्वस्थ कनैं अपराध मुक्त जिंदगी जीण।

  

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 काळे समंंदर

(मुंबई में 1909 में पहली काली-पीली टैक्सी चली थी और 1920 के आसपास वाया कराची हिमाचलियों के चरण मुंबई की धरती पर पड़ गए थे। उसके बाद मुंबई में हमारी जो यात्रा आरंभ हुई वह आज भी जारी है। हमने यहां अपनी एक अलग पहचान भी बनाई है और अपनी भाषा के साथ-साथ संस्कृति को भी जीवित रखा है।)

कमलेश्वर जी का एक उपन्यास है ‘समुद्र में खोया हुआ आदमी’। उसमें एक इंसान के अचानक समुद्र में खो जाने की कहानी है। पहाड़ों में मुंबई को भी समुद्र ही माना जाता है। यहां एक खारे पानी का समंदर तो है पर और भी बहुत सारे समंदर हैं। इंसानों का समुद्र, गरीबी-अमीरी का समुद्र, कितनों के नाम गिनें। जिस तरह सारी नदियां और नाले समुद्र में आ कर गुम हो जाते हैं, उसी तरह ये सारे समुद्र भी गुम हुए इंसानों से ही भरे हुए हैं। जिसकी यह कथा है। उसका गुम होना क्या, तो मिलना क्यावह पहले ही अपने आप से गुम हो चुका था।उसके बेटे दिमागी बीमारी के इलाज के लिए उसे मुंबई ले कर आए थे। यह अलग बात है कि परिवार से अलग समूह में रहने वाले युवाओं के घरों में अलग ही मस्ती और लापरवाही होती है। इस हिसाब से उन बुजुर्ग का गुम होना लाजमी था। एक रोज वे घर से निकले और वापस नहीं आए। उन्हें ठेठ ग्रामीण पहाड़ी के अलावा और कोई भाषा नहीं आती थी। वे कहां चले गए और उनके साथ क्या हुआ होगा? लोग उनसे जो पूछते होंगे वह उन्हें समझ नहीं आता होगा और वे जो बोलते होंगे, वह भी किसी को समझ में नहीं आ रहा होगा। वे कितना, कहां और कैसे जिए  होंगे? किसी ने उन्हें खाने को भी कुछ दिया होगा या भूखे ही मर गए होंगे। मेरे बाल मन पर यह सवाल ऐसे छपे कि आज भी मिटे नहीं हैं।

बहुत साल बाद ऐसी ही मानसिक स्थिति वाली एक अधेड़ महिला के साथ भी ऐसी ही घटना हो गई थी। वह भी मानसिक बीमारी के इलाज के लिए आई थी। गलती से दरवाजा खुला रह गया और वह कब बाहर निकल गई पता ही नहीं चला। 5-10 मिनट में ही यह हादसा हो गया। उसके बाद सभी संभव कोशिशों और संचार के सारे साधन होने के बावजूद उसका कुछ पता नहीं चल सका। उसके बारे में तो सोच कर ही डर लगता है। पानी का समंदर तो डूबे हुए इंसानों के जिस्मों को बाहर फेंक देता है लेकिन इंसानों का समंदर पूरे के पूरे इंसान को ही निगल जाता है। इसके अलावा शराब और नशों का एक और समुद्र है। वह भी इन्सान को अंदर से निचोड़ कर शरीर के खोखे को छोड़ जाता है।

बुजुर्ग के दोनों बेटों के विवाह हुए, परिवार बसा और बच्चे भी हुए। हालांकि गांव में घरों के कठेवे में दुखों के दिन भी आराम से और सुख से कट जाते हैं। बच्चे भी आगे बढ़ जाते हैं पर उन दोनों की पत्नियों के पास न तो कोई रोजगार था न कमाई का कोई जरिया और न कोई सहूलियत। इसके बावजूद इन्होंने मुंबई नहीं छोड़ी। शायद बच्चों की जिंदगी बनाने के बारे में सोचा होगा। अंग्रेजी का भूत उस समय भी जोरों पर था। खैर, किसी तरह एक संघर्ष की जिंदगी काट कर दोनों चली गईं।

ऐसा लगता है कि अब थोड़ा सा बदलाव आया है। सच में देखा जाए तो लड़कियों की जिंदगी क्या होती है? लड़कियों को या तो राज मिलता है या फिर उनके अंदर की वह लड़की भी एक डरावने वन में खो जाती है। कुछ और ही हो जाती हैं लड़कियां। लोग कहते हैं कि भाग्य और तक़दीर कुछ नहीं होता है पर यह तो भाग्य की ही बात है। एक लड़की को विवाह के बाद कैसा जीवन मिलेगा। मेरे विवाह के साथ-साथ एक लड़की का विवाह हुआ था। उसने दो-चार महीने में ही आत्महत्या कर ली थी।

अपराधों से दुनिया का कोई हिस्सा नहीं छूटा है। शहरों में, खासकर गरीब और कम कमाई वालों की बस्तियों में इनका ज्यादा ही प्रकोप रहता है। उस समय उत्तर भारत में चंबल और डाकुओं का बड़ा जोर था। वहां के लोग मिर्च-मसाला लगा कर डाकुओं की बहादुरियों का बखान करते थे। ऐसी फिल्मों का दौर अभी भी जारी है, जिनमें नायक अपराधों की दुनिया से आते हैं। इससे भी बच्चों के कोरे मन पर और सोच पर क्या असर होता होगा? कुल मिलाकर सार यह निकलता है कि भई अपराधी बुरा इंसान नहीं, बहादुर होता है और कई बार व्यवस्था में अपराधी होना मजबूरी के साथ-साथ जरूरी भी हो जाता है। इन बस्तियों में रहने वाले बच्चों का अपराधों की इस दुनिया से बचना बहुत जरूरी होता है। इससे बच भी जाएं तो नशों का एक अलग जाल है। अब तो ड्रग्स भी शामिल हो गई हैं।

एक तो इन बस्तियों में रहने वाले कमियों, दुखों और मुश्किलों की जिंदगी जी रहे होते हैं। तल्खी और गुस्सा ज्यादा होता है। छोटे-मोटे लड़ाई झगड़े झट से गाली गलौज और गुनाह में बदल जाते हैं। शराब की भट्टियाँ और अड्डे, जुए के अड्डे, लॉटरी की तरह मटका नाम का एक जुआ है। जो अब तो कम हो गया है लेकिन उस समय इसके शौकीन शराबियों से भी ज्यादा थे। पर्दे के पीछे बैठे माफिया सरगना इसको बड़े ही व्यवस्थित व्यापार की तरह चलाते थे। इसमें लोग एक से छह नंबरों पर दाव लगाते थे। जिसके छह के छह नंबर निकल जाते थे उसे चार आने के 2000 मिलते थे। इसके अलावा माफिया कारोबारों में स्मगलिंग, बंदरगाह चोरी, सिनेमा के टिकटों की काला बाजारी, रंगदारी जैसे अपराधों में लिप्त बड़े खूंखार और नामी गिरोह थे।

इनके सरगना फौजी कमांडरों से भी आगे बढ़कर आज के कारपोरेट की तरह व्यापार करते थे। देश की फ़ौजों की तरह इलाकों पर कब्जे के लिए उनके बीच युद्ध छिड़े रहते थे। इन सरगना और गिरोहों के लिए यह बस्तियां नए रंगरूटों की भर्ती करने और उन्हें अपराधी बनाने का प्रशिक्षण देने का केंद्र हुआ करती थीं। मेरे साथ स्कूल में एक दबंग लड़का था। मारपीट में हमेशा आगे रहने के कारण वह आवारा लड़कों का हीरो था। उससे पढ़ाई तो पूरी हुई नहीं पर पिता ने रेलवे में नौकरी लगवा दी। इस को लोकल में अंदर बैठने के बजाए छत पर ज्यादा मजा आता था। विवाह पहले ही हो चुका था एक लड़की भी थी।यह साहब नौकरी छोड़कर भाई बन गए और इलाका संभालने लगे। मैंने उसकी अंतिम यात्रा में पहली बार जब तक सूरज चांद रहेगा…  यह नारा सुना था। आज भी हर साल एक गणपति पंडाल में उसकी तस्वीर टाँगी जाती है। उसका जीवन तो गया साथ में चार और जीते जी मर गए।

 

एक बड़े पैसे वाले का बेटा था। उसको मौज मस्ती करने के लिए पैसे कम पढ़ते थे तो वह अपनी कार में रात को लूट मार करता था। उसके चक्कर में मेरा एक पहाड़ी मित्र वकालत पढ़कर वकील बनते-बनते जेल में पहुंच गया था।

आप सोच रहे होंगे कि खोए हुए आदमियों की कथाओं के साथ गुनाहों के क़िस्सों का क्या तुक है? कुछ कहा नहीं जा सकता है। जिंदगी में किसको कहाँ क्या मिल जाए? समुद्र में एक बार पैरों के नीचे से रेत खिसक जाए तो आदमी का कोई बस नहीं चलता है। लहरें उसे किसी भी किनारे पर ले जाती हैं। अब किनारे पर वह जिंदा पहुंचे या उसका मृत शरीर, सब तकदीर के हाथ होता है। पहाड़ों से एक नई जिंदगी की तलाश में आने वाले कई इस समुद्र के भी शिकार बने। दो चार ने इस दुनिया पर राज भी किया और उसके बाद अच्छी जिंदगी का आनंद भी लिया। आज भी मौज में हैं और कुछ जवानी में ही जान गवां कर चले गए। एक बेचारा तो दो-चार दिन पहले ही आया था, उसे कोई और समझ कर मार डाला गया था।

यह बड़े ही दुख की बात है कि यह कथा भी हिंदी फिल्मों की तरह राजी खुशी वाले मोड़ पर पहुंच रही थी। एक मां के दो बेटे थे। एक की पढ़ लिख कर ठीक-ठाक नौकरी लग गई थी, दूसरा ड्राइवर बन गया था। परंतु इस कहानी के किरदारों को गुनाहों के समुद्र  की लहरों ने अपनी तरफ खींच लिया।

इलाके का कोई गुंडा मां बेटे को तंग करता था। एक रोज बात बढ़ गई और  मारपीट में वह गुंडा मर गया। तीनों जेल में पहुंच गए। एक बार जो कीचड़ में फंस जाता है, वह और फँसता ही जाता है। वे तीनों जेल से बाहर आए और फिर से कुछ ऐसा ही हो गया। उसके बाद सदमे और बीमारी से माँ का देहान्त हो गया और बेटे जेल में हैं।

यह महज़ एक संयोग ही है। ऐसा किसी के साथ कहीं भी हो सकता है। कई बार परिस्थितियाँ लाचार कर देती हैं लेकिन इंसान की अपनी सोच भी कुछ हद तक तो जिम्मेदार होती होगी। उम्मीद है आगे सब ठीक हो। वे सुखीस्वस्थ और अपराधमुक्त  जिंदगी जीएं।

(चित्रकृति : एडवर्ड मंच। इंटरनेट से साभार)

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।



Tuesday, June 3, 2025

मुंबई डायरी -पंज

 


अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त पंज। 

 

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 राग रसोई 

शैह्रां जो ता कम करने वालयां दी जरूरत होंदी। ग्रां देयाँ बरोजगारां जो बाहर निकळी करी दुनिया दिखणे कनैं पैसे कमाणे दी खुरक भी होंदी। खुरक कैंह् कि बाहर निकली थोड़े बौह्त पैसे भले हत्थें आईं जान पर जीणा बड़ा मुस्कल कनैं गरीबां आळा होई जांदा। एह् ता जाह्लू अगली पीढ़ी पैरां पर खड़ौई जांदी ता किछ सुआस औंदा पर ताह्लू तिकर सुआस टुटणा लगी पियो होंदे। शैह्रां च अज त्री-चौथी पीढ़ी जेह्ड़ी जिन्दगी जिया दी पैहली पीढ़ी सोच्ची भी नीं सकदी थी।

जे असां दे बुजुर्गां जो एह् खुरक नी हौंदी ता तिन्हां दा ओत्थू भी कुछ न कुछ ता होई ही जाणा था। ग्रां च सारी उमर कटणे आयां दी जिन्दगी कोई माड़ी नीं बीती। तैह्ड़ी बगैर नौकरिया ते बी ब्याह होई जांदे थे। तिन्हां पैसे भले थोड़े घट कमाए पर सुअरगे साही अपणे ग्राएं च  जंग्घां भारी सुत्ते कनै सिरे चुकी करी जिये। शैह्रां साही समझौते करी संगड़ोनै जीणा नीं पेया। तिन्हां दे याणे बी पढ़ी लिखी कामयाब होई गै। इस मामले च एह् बी लगदा कि शैह्रां आयां दे बच्चे कई गल्लां च मते पचांह रही गै। पिछें नीं भी हन तां भी तपस्या दा कुछ हासल नी होया।

इन्हां डरैबरां कने इक गल होर थी। चौबियां घंटेंया आळा अपणा कम्म होणे दे कारण टैमे दी कोई पाबंदी नी थी। सौणे, जागणे, खाणे, पीणे कैसी दा कोई ठकाणा नी था। जिआं होर कम्मां वाले टैमे ते औंदे जांदे थे कने अप्पू बणाई ने रोटी खांदे थे। इन्हां ते न दिन सूते औंदा था न उमर आई। इहियां ही लंग्घी गई।

बचपने च सयाणेयां ते प्रवासी पूरबियां  दे बारे च इक सणोणी सुणियो थी। अठ  पुरबिये नौ चुल्हे। सैह् सारे अपणयां अपणयां चुल्हयां च अपणी बखरी रसो बणांदे थे। इक चुल्हा परोहणे पच्छे ताई होंदा था। इस मामले च मुंबई दे टैक्सी डरैबरां दा हाल होर खराब कनैं पुट्ठा था। इत अठां चा ते इक चुल्हा भी नीं बदा था।

खैर, दिन ता ओक्खा-सोक्खा निकळी जांदा था। राती रोटिया दी फसी जांदी थी मन करदा था घरे दी रोटी मिल्लै। पर बणा कुण। बारें तुहारें मिली जुली सांझा चुल्हा बदा था। तित भी स्यापा ही रैंह्दा था। खाणे ते पैह्लें लगभग सारयां ही थोडा़ बौह्त घुट लाणा होंदा था।

कुछ जेह्ड़े नित नेम वाळे थे सैह् अपणा माडा़-मोटा जुगाड़ करी लैंदे थे। सारयां जो  डरैबर बणने तांई ओणे वालेयां नोयां रंगरूटां ते ही आस होंदी थी। सैह् भी कोई ही होंदा था कम्मे दा, बाकी ता जबरदस्ती गळें पईया ढोलकिया बजाणे साई रोटिआं बणांदे थे। इक टेकू नाएं दा रंगरूट संझा साफ चिट्टे कड़क प्रेस  कित्यो पेंट कमीज़ पैहनी हीरो बणी निकलदा था। सैह् राती थकया मांदयां डरैबरां जो खाणा खुआंदा डरैबरां दा सेठ लगदा था। इक भाणजा मामे भाल आया था। शायद सैह् छिंजां दा शकीन था। कद छोटा पर जिस्म कसोया था। इक रोज भ्यागा पंज बजे हाली सारे निन्दरा च ही थे। इन्हां साह्बां रेता ने भरोया बोरू बिच टुंगया कनैं दस्ताने पेह्णी बॉक्सिंग करना लगी पै। दुईं चोहीं मुक्कयां ने बोरू फटी गिया। सारयां सोणे वालेयां दे बिस्तरे रेता ने भरोई गे। सारयां ते बुरा हाल मामे दा था। मामे भाजा अपणिया मथुरा ते कड्ढी लाया। बड़िया मुस्कला ने माफीनामा पास होया। इकी रंगरूटे दा नां जोंडू था पर सैह् था बड़ा चेंट। तिस दियां गप्पां बड़ियाँ मीस्णियां होंदिया थिआं। इक रोज तिन्नी जोरे दी खिट लाईयो थी कनैं दकानदार बणिया पचांह दोड़या था। इकनी पुच्छया भाई होया क्या?  क्या दस्सिए बड़क्या एह् मन्ना दा ही नीं। पुत्रेला पाई घर जुआई बणाणे जो बोला दा। इस दी लाड़ी कनैं धी दिक्खियो मेरा ता जींदे जी सोग पई जाणा। असल च इन्नी धुआर सौदा लिया था कनैं उसते बाद दकाना आळी बत ही छडी तियो थी। तैह्ड़ी गलतिया नैं सामणे आई गिआ कनै बणिएं दड़ाई लाया। एह् देह्या रंगरूटा तांई अपणी रोटी बणाणा ही मुस्कल थी। 

भागां कने संजोगां दी गल्ल होंदी। बरठीं बिलासपुर ते इक बुजुर्ग पंडत परगट होए। सैह वोटचारा कन्नै ढाबयां च खाणा बणाणे दा कम्म करदे-करदे रोजी रोटी तांई मुम्बई आई फसयो थे। तिन्हां घरें ही ढाबा खोली लिया पर कम्म चल्ले नीं। मेरे घरे सामणे इक भोजा नाए दा अन्ना पत्थरां पीह्णे आलै क्रेशरे दे मजूरां तांई चाह्-पकौडे़, उसळ बड़ा बणांदा था। तिस भाल जगह थी पर क्रेशर बंद होंणे ते बाद तिसदा कम्म ठीक नी चल्ला दा था। दोयो मेरे पिता होरां भाल गप्प मारना बैठदे थे। पंडत बोलदा था इस ते कुत्थी ढाबे च नौकरी मिली जा ता ठीक है नहीं तां मुम्बई छडणा पोणी। सैह् अन्ना भी रोंदा था पेहेल ठीक था अवी धंदा ई च नहीं होता है। मेरे पिता होरां अन्ने जो सलाह दित्ती छड उसल पाव कनैं खाणे दा कम्म शुरू कर। एह् पंडत जी हन इन्हां खाणा बणाणा कनैं सारयां पहाड़ियां तेरे ढाबे च ही खाणा ओणा।

मेरे पिता जी दी गल्ल सच होई गई। भोजे दा होटल राती पहाड़ी डरैबरां नैं भरोणा लगी पिया कन्ने ढाबे च पहाड़ी भासा ही चलदी थी। अन्ना भी हौळैं हौळैं टुटी-फुटी पहाड़ी बोलणा लगी पिया। तिस दे ढाबे जो ता फंग लगी गै। तिस दा कम्म बधदा ही गिया।

पंडते जो ध्याड़ियां मिली गईयां। जाह्लू तिकर शरीरें साथ दित्ता सैह् कोई दस-पंदरा साल अन्ने दे ढाबे च कम्म करदे रैह्। फिरि हटी ने हिमाचल चली गै।

डरैबरां जो खाणे कनैं शराब भी चाही दी। तिन्नी गैरकनूनी शराब भी बेचणा शुरू करी ती। डरैबरां सौगी-सौगी सैह् ढाबा गुंडयाँ, लफ़ंग्याँ, अपराधियां दा भी अड्डा बणी गिया। एह् भी भागां दी गल्ल थी। तिन्हां दुईं दा ता भला होई गया पर असां दे घरे ते इकदम साह्मणे होणे दे कारण इक देई बमारी चिमड़ी जिसा दा कोई लाज नीं था

ग्ते ब्हाल सारियां मरजां दा लाज़ है। सैह् अन्ना भी चली गआ। तिस दे पुतरें कुत्थी होरथी अपणा लग होटल खोली लिआ। एह् ढाबा धियां जुआईयां दे हिस्से आया अपर तिन्हां ते चल्ला नीं कनैं बंद होई गिया। हुण बिकणे तांई रक्खया पर मुल जादा मंगणे दे कारण बिका दा नीं। मेरा घर बी लगभग बिकी ही गिया। यादां हन कनैं इसा डायरी दे भाने मैं तुसां ने गप्प मारा दा। अज सैह् ग्त ता यादां ते भी गांह लंघी गिआ।





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राग रसोई

शहरों को तो काम करने वालों की जरूरत होती है। गांव के बेरोजगारों को भी बाहर निकल कर दुनिया देखने और पैसे कमाने की खुजली होती है। खुजली इसलिए क्योंकि बाहर निकल कर थोड़े बहुत पैसे भले हाथ में आ जाएं पर जीवन बहुत ही मुश्किल और गरीबों वाला हो जाता है। यह तो जब अगली पीढ़ी पांव पर खड़ी होती है तो कुछ सांस आती है पर तब तक सांसें टूटने लग पड़ी होती हैं। शहरों में आज की तीसरी चौथी पीढ़ी जो जिंदगी जी रही है। पहली पीढ़ी उसके बारे में सोच भी नहीं सकती थी। 

यदि हमारे बुजुर्गों को यह खुजली नहीं होती तो उनका भी वहां गांवों में कुछ ना कुछ हो ही जाना था। गांव में सारी उम्र बिताने वालों की जिंदगी भी कोई बुरी नहीं बीती है। उस समय बिना नौकरी के भी विवाह हो जाते थे। उन्होंने पैसे भले थोड़े कम कमाए पर स्वर्ग जैसे अपने गांव में टांगे फैला कर सोए और सिर उठा कर जिए। शहरों की तरह समझौते करके सिकुड़ कर जीना नहीं पड़ा। उनके बच्चे भी पढ़ लिख कर कामयाब हो गए हैं। इस मामले में यह भी लगता है कि शहर वालों के बच्चे बहुत सी बातों में बहुत पीछे रह गए हैं। पीछे नहीं भी रहे तो भी इतनी बड़ी तपस्या का कुछ हासिल नहीं हुआ है। 

इन ड्राइवरों के साथ एक बात और थी। इनका चौबीस घंटे वाला अपना काम होने के कारण समय की कोई पाबंदी नहीं थी। सोने जागने, खाने पीने, किसी भी चीज का कोई ठिकाना नहीं था। जैसे और काम करने वाले समय पर आते जाते हैं और खुद खाना बनाकर खाते हैं; इनसे न दिन काबू में आता था और ना उम्र काबू में आ पाई। ऐसे ही बीत गई। 

बचपन में बुजुर्गों से प्रवासी पूर्वियों  के बारे में एक कहावत सुनते थे। आठ पूर्विए और नौ चूल्हे। सारे अपना अलग-अलग चूल्हा जलाकर अपना खाना बनाते थे और एक अतिरिक्त चूल्हा आने वाले मेहमान के लिए आरक्षित होता था। इस मामले में मुंबई के टैक्सी ड्राइवरों का हाल और भी खराब और उल्टा था। यहां इन आठों से एक चूल्हा भी नहीं जलता था। 

खैर, दिन तो जैसे तैसे गुजर जाता था पर रात को खाने की मुश्किल हो जाती थी। मन करता था कि घर की रोटी मिले तो मज़ा आ जाए पर बनाए कौन? कभी कभार छुट्टी के दिन मिल जुल कर सांझा चूल्हा जलता था। उसमें भी स्यापा ही रहता था। खाने से पहले लगभग सभी ने थोड़ी बहुत पीनी भी होती थी। 

जिनके पास जीवन में अनुशासन था, वे अपना छोटा-मोटा जुगाड़ कर लेते थे। बाकी सबको ड्राइवर बनने के लिए आने वाले नए रंगरूटों से ही आस होती थी। उनमें से भी काम का कोई एक आध ही होता था। बाकी तो इस तरह खाना बनाते थे मानो गले में जबरदस्ती पड़ा ढोल बजा रहे हों। एक टेकू नाम का रंगरूट शाम को साफ सफेद कड़क प्रेस किए हुए पेंट कमीज पहनकर हीरो बनकर निकलता था। वह रात को जब थके मांदे ड्राइवरों को खाना खिलाता तो उनका मालिक लगता था। एक भांजा मामा के पास आया था। शायद वह कुश्ती का शौकीन था। कद छोटा था पर शरीर कसा हुआ था। एक दिन सुबह पांच बजे, जब सभी लोग नींद में ही थे, इन साहब ने रेत से भरा थैला बीच में लटकाया और दस्ताने पहन कर बॉक्सिंग करने लगे। दो चार घूंसों में ही थैला फट गया। सब सोने वालों के बिस्तरे रेत से भर गए। सबसे बुरा हाल मामा जी का था। मामा ने भानजे को अपनी मथुरा से देश निकाला दे दिया। बड़ी मुश्किल से माफीनामा पास हुआ। एक रंगरूट का नाम जौंडू था पर वह था बहुत ही होशियार। उसकी बातें बड़ी ही मजाकिया होती थीं। एक रोज उसने जोर की दौड़ लगाई हुई थी और उसके पीछे दुकानदार बनिया दौड़ रहा था। एक ने पूछा भाई क्या हुआ। बड़े भाई क्या बताऊं? यह मान ही नहीं रहा है। कब से पीछे पड़ा है और घर जवाई बनने को बोल रहा है। इसकी पत्नी और बेटी देखी है। मेरा तो मरण हो जाएगा। असल में इसने उधार सामान खरीदा था और उसके बाद दुकान वाला रास्ता ही छोड़ दिया था उस दिन गलती से सामने आ गया और बनिया इसके पीछे दौड़ पड़ा। ऐसे रंगरूटों के लिए अपनी रोटी ही बनाना मुश्किल होता था। 

भाग्य और संयोग की बात होती है। बरठीं बिलासपुर से एक बुजुर्ग पंडित प्रकट हुए। वह शादियों में और ढाबों में खाना बनाने का काम करते-करते रोजी-रोटी के लिए मुंबई में आकर फंस गए थे। उन्होंने घर में ही ढाबा खोल लिया था पर काम चल नहीं रहा था। मेरे घर के सामने एक भोजा नाम का अन्ना पत्थर पीसने वाले क्रेशर के मजदूरों के लिए चाय-पकोड़ी, उसळ-बड़ा बनाता था। उसके पास जगह थी पर क्रेशर बंद होने के बाद उसका धंधा ठीक से नहीं चल रहा था। दोनों ही मेरे पिताजी के पास अपना दुख-सुख करने बैठते थे l पंडित बोलता था इससे तो कहीं ढाबे में नौकरी मिल जाए तो ठीक है नहीं तो मुंबई छोड़ना पड़ जाएगी। वहां अन्ना भी रोता था। पहले ठीक था पर अवी धंधा ही च नहीं होता है। मेरे पिता ने अन्ना को सलाह दी कि यह उसळ पाव छोड़ कर खाना बनाने का काम शुरू करो। यह पंडित जी हैं। यह खाना बनाएंगे और सारे पहाड़ी ड्राइवर तेरे ढाबे में खाना खाने आएंगे। 

मेरे पिता की बात सच हो गई। भोजा का होटल रात को पहाड़ी ड्राइवरों से भर जाता और ढाबे में पहाड़ी भाषा ही ज्यादा चलती थी। अन्ना भी धीरे-धीरे टूटी-फूटी पहाड़ी बोलने लग पड़ा। उसके ढाबे को तो पंख लग गए थे। उसका काम बढ़ता ही जा रहा था। पंडित जी को भी काम मिल गया था। जब तक शरीर ने साथ दिया। वे कोई 10-15 साल अन्ना के ढाबे में काम करते रहे और उसके बाद हिमाचल लोट गए।

ड्राइवरों को खाने के साथ शराब भी चाहिए होती थी। अन्ना ने गैर कानूनी शराब भी बेचना शुरू कर दिया। इससे ड्राइवरों के साथ-साथ वह ढाबा गुंडों, लफंगों और अपराधियों का भी अड्डा बन गया। यह भी भाग्य की बात थी। उन दोनों का तो भला हो गया पर हमारे घर के एकदम सामने होने के कारण यह एक नई बीमारी गले पड़ गई। इसका कोई इलाज नहीं था।

समय के पास सभी बीमारियों का इलाज होता है। वह अन्ना चला गया। उसके बेटे ने कहीं और दूसरी जगह अपना अलग होटल खोल लिया है।  यह ढाबा बेटियों और जवाइयों के हिस्से आया मगर उनसे चला नहीं और बंद हो गया। अब बिकने के लिए रखा है परंतु ज्यादा मूल्य  मांगने के कारण बिक नहीं रहा है। मेरा घर भी लगभग बिक ही गया है। यादें हैं और इस डायरी के बहाने मैं आपसे बातें कर रहा हूं। आज वह समय यादों से भी आगे निकल गया है।

(सुधीर पटवर्धन की चित्रकृति, इंटरनेट से साभार)

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।