पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

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Monday, June 1, 2026

इक गुजराती कवता

 


हिन्दिया दा इक रसाला है साखी । तिसे दे अंक 39 बिच गुजरातिया दे मशहूर कवि नाटककार सितांशु यशश्चंद्र होरां दा इक लेख कनै इक कविता छपियो है। अनुवाद भी तिन्हां अप्पू ही कीतेयो। असां जो लग्गा भई कवता अज के बग्ते जो बड़े सम्पूर्ण कनै छैळ ढंगे नै पेश करा दी है। तुसां ताईं पेश है पैह्लैं पहाड़ी कनै तिसते बाद हिन्दी च एह् गुजराती कवता। गुजराती ते हिन्दी अनुवाद : सितांशु यशश्चंद्र । पहाड़ी अनुवाद : अनूप सेठी। पहाड़ी अनुवादे पर सलाह-सूतर तेज सेठी होरां दितेया।  


कुमार गंधर्वे गैं इक गूंगे बग्ते दी मंग

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो 

दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

तिज्जो बोली दित्था था कल जिन्हां, अज तिन्हां असां जो भी साफ गलाई ता 

हुण जे नीं छड्डी अजाद संघे नै गाणे दी ख्वाइश

तां जींदे नीं बचणा है जादा हुण इसा दुनिया च 

सैह्मयो जेह् 

कुछ बेबस, कुछ मर्जिया नै चुप देह् इस बग्तें भी किछ गलाणा है

तू ता समझी लैंह्गा इसा गल्ला, कोमकली । 

 

असां भी गाणा है दुबारा, जिञा तैं गाई नै दस्सेया, दुबारा 

भौएं असां न होन पंडित भीमसेने साह्यी लम्मे सुरे दे काबल

निक्के निक्के पगां नै करह्गे पार असां, एह् लम्मा जेह्या फासला, जिञा तैं कीता 

भौएं न रही सकिए राजनगरे च, टोळी लैंह्गे असां अपणा देवास। 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो दुबारा अपणे देवासे च रैह्णा सखाअ,

राजनगरां ते दूर 

क्या हुंदा देवासे च, कोमकली किञा मरी जांदा कुमार,

फिरी भी  किञा जींदा रैंह्दा गंधर्व

अपणे बणायो रागां च गाई नै दस्सा असां जो

दस्सा, कैंह् कम्मै नीं औंदा कोई इक्को ई घराना

तैं बणाया किञा हर इक घराने च अपणा घर

गाई नै सुणाह् संगीत समारोहे च नीं, अपणे निर्दयी किह्लपणे 

ओह्थी ते असां सारे सुणा दे हन अज, सारियां ठाह्रीं अज देवास 

हर आम आदमिये दी अमरता दा गुप्त राज़ दुबारा गाई नै दस्स असां जो,

नौंए मिल्लयो संघे नै, शिवपुत्र 

 

सुणया है जदूं बमार था तू, गाई नीं सकदा था,

तू सुणदा था तदूं पंछियां जो, हौआ जो

बूटेयां जो कनै देवासे दी दयावान रुखियाईया जो 

असां जो भी सखाह् किञा एह् सुणना

पता है असां जो हुण मुस्कल है, सोशल मीडिया दे बग्ते च, मनचाह्या सुणना भी

असां दिया हौआ ते गुआची गइयो हुण पंछियां दी चैह्क 

अपणे ही चार चफेरे घुमदी है असां दी हौआ,

अपणे ही जैकारे दी गर्जना करदी

हौआ दी भंवीरी बणी नै रुक्खां पुटदी चलियो है 

हर इक देवासे जो फटेयो बदळे दिया बौछारा च समेटी लैंदी है, हुण एह् भतोइयो हौआ  

सुलताने दे राज-हाथिये जेह्यी, कबीरे बखा जो बधदी जांदी

सैह्मयो जेह् हन असां   

चुप्पिया दा बग्त सुरु  होई गेया सारिया सृष्टिया च ।

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’, सुआल पुच्छा फटेयां फेफड़यां दा 

फुफकार भरोयो आरोह च, कोमकली कुमार ।

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्तें सिखणा है होर भी किछ, तेह्ते,

सिखणा है तेरे ते धीरज, शिवपुत्र

छींह सालां दा सैह् तेरा देवासी धीरज ।

गिणती करना सखाअ असां जो, इन्सानी सुरां दी बक्ख बक्खरियाँ लय दी,

जिञा सखाया होणा पंडित देवधरें तिज्जो

दस्स असां जो तां छींह सालां च कितणे हुंदे म्हीने

इक्की म्हीने च तां कितणे हुंदे दिन? इक्की दिने च घंटे, घंटेयां दे पल

किञा बिताइए सैह् इक पल

हलाहल कनै अमृत, दूह्ईं नै घुळेया पल

कदूं आया तिस सठयाउंए-कपड़े दिया बुणाइया च इक्की कुमार गंधर्वे दिया मौता दा पल

कदूं आया, देरा ते, दूए कुमार गंधर्वे दे जमणे दा पल

किञा हुंदी सैह् कबीरी बुणाई

सखाह् मेरे काह्ळे पेयो बग्ते जो अपणे तिन्हां छीं: सालां दा ध्रेठ 

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो क्षय ते अक्षय तक जाणे दा रास्ता दस, चिर कुमार

अकाल ग्रसया है अज एह् धरयाया धरयाया थल्ले-यो लौंह्दा बग्त,

भोगेखा जो दौड़-भज्जा दा तेज नाच बहु-ताला है ।

इसच ई सुणाअ अपणी रस-भरिया उआजा च 

विलंबित इकताला च तेरा अप्पू बणाया राग गांधी मल्हार,

 

तेरे राग गांधी मल्हारे च, विलंबित इकताला च, करुणा नै

सुणाह् सारयां जो, ‘तुम हो धीर

अपणैं घरैं गाई नैं अज सुणाह् असां जो, घरानेयां ते दूर,  ‘तुम हो धीर...’,

कबीरे दी रसभरी वाणी सुणाह् असां जो गांधी मल्हारे च,

विलंबित, इकताला च, ‘धीर’ 

फटाफट सब किछ लई लैणा सखाया जांदा है मेरे बग्ते जो अज

कई घराने डटयो बहु-ताले चार चफेरें अपणे अपणे रागे दा समूहगान कराणे ताईं असां ते,

 

देह् देह् इस गूंगे बग्ते जो गुणगुणना सखाह्, सिर्फ अपणे देवासे च

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो भी

निकेयां पगां नै ही भौंए, पर लम्मे रस्ते पर, अपणिया ही ऊर्जा नै, अपणे ही तरीके नै 

अपणा राग गाणा है दुबारा,

क्या हे साधना, क्या है रियाज़, दवा क्या है कनै इलाज,

दस्सा कोमकली कुमार, अमर गंधर्व



सितांशु यशश्चंद्र
प्रसिद्ध गुजराती कवि, नाटककार,
अनुवादक और शिक्षाविद

कुमार गंधर्व के पास एक गूंगे समय की मांग 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले, चुप्पी साधे, मेरे समय को 

फिर से गाना सिखाओ, कुमार गंधर्व 

तुम्हें कह दिया था कल जिन्होंने, आज उन्होंने हमें भी साफ कहा है 

अब अगर छोड़ न दी मुक्त कंठ से गाने की ख्वाहिश

तो जिन्दा नहीं बचोगे ज्यादा अब इस दुनिया में 

सहमे से

कुछ अवश, कुछ स्वेच्छया चुप से इस समय को भी कुछ कहना है

तुम तो जान पाओगे इसे, कोमकली.

 

हमें भी फिर से गाना है, जैसे तुमने गा दिखाया, फिर से 

भले ही पंडित भीमसेन की लंबी सुरावट के हम काबिल न हो 

छोटे छोटे कदमों में पार करेंगे हम, यह लंबा सा फासला, जैसे तुमने किया 

भले ही राजनगर में नहीं रह पाएं, ढूंढ़ लेंगे हम अपना अपना देवास. 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले चुप्पी साधे मेरे समय को फिर से गाना सिखाओ

कुमार गंधर्व.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को फिर से अपने देवास में रहना सिखाओ

राजनगरों से दूर 

क्या होता है देवास में, कोमकली; कैसे मर जाता है कुमार,

 

फिर भी कैसे जीवित रहेता है गंधर्व

अपने बनाये रागों में गा कर हमें दिखाओ.

कहो, कैसे काम नहीं आता कोई एक ही घराना

कैसे तुमने बनाया हर घराने में अपना खुदका घर

गा कर सुनाओ, संगीत समारोह में नहीं, अपने निष्ठुर एकांत में

वहीं से हम सब सुनते हैं आज, सभी जगह आज देवास 

हर आम आदमी की अमरता का गुप्त रहस्य फिर से गा कर बतलाओ हमें

नवप्राप्त कंठ से, शिवपुत्र

 

कहते हैं जब बीमार थे तुम, गा नहीं सकते थे

तुम सुना करते थे तब पंछीयों को, हवा को

पेड़ों को और देवास के सदय सूखेपन को 

हमें भी सिखाओ कैसे यूँ सुनना 

जानते हैं हम अब मुश्किल है, समूह संचार के समय में, मनचाहा सुनना भी 

अब पंछीयों की चहचहाट खो चुकी है हमारी हवा

अपनी ही चारों और घूमती है हमारी हवा

अपने ही जयघोष की गर्जना करती 

चक्रवात बन पेड़ों को उखाड़ती चली है 

हर देवास को फटे बादल की बौछार में सिमट लेती है, अब यह प्रमत्त हवा

सुलतान के राजगज जैसी, कबीर की ओर आगे बढ़ती जाती है

सहमे से हैं हम.

 

चुप्पी का समय शुरु हो गया है सारी सृष्टि में. 

'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो', प्रश्न पूछो फटे हुए फेफड़ों का

फुत्कार भरे आरोह में, कोमकली कुमार.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को सीखना है और भी कुछ, तुमसे

सीखना है तुम से धैर्य, शिवपुत्र,

छह साल का वह तुम्हारा देवासी धैर्य. 

गिनती करना सिखाओ हमें, मानव स्वर के विविध लयों की

जैसे सिखाया होगा पंडित देवधर ने तुम्हें. 

कहो हमें छह साल के कितने होते हैं, तब, माह?

एक माह के कितने होते है दिन, तब ? एक दिन के घंटे, घंटो के पल ?

कैसे बितायें वो एक पल, हालाहल और अमृत, दोनों से घुली पल ?

कब आया उस धैर्यपट की बुनाई में एक कुमार गंधर्व के मृत्यु का पल ?

कब आया, देर से, दूजे कुमार गंधर्व के जन्म का पल ?

कैसे होती है वो कबीरी बुनाई ?

सिखाओ मेरे अधीर समय को तुम्हारे उन छह वर्षों का धैर्य

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को क्षय से अक्षय तक जाने का मार्ग बताओ, चिर कुमार

 

अकाल ग्रस्त है आज यह प्यासा प्यासा हासोन्मुख समय

भोगोन्मुख भागदौड़ का द्रुत नृत्य बहुताल है.

इसी में सुनाओ अपनी जलभरी आवाज में

विलंबित एक ताल में तुम्हारा खुद का बनाया राग गांधी मल्हार,

 

तुम्हारे राग गांधी मल्हार में, विलंबित एकताल में, करुणा से

सुनाओ सभी को, 'तुम हो धीर'.

अपने घर में गा कर आज हमें सुनाओ, घरानों से दूर, 'तुम हो धीर...

कबीर की जलभरी बानी सुनाओ हमें राग गांधी मल्हार में

विलंबित, एकताल से, 'धीर'

अविलंब सब कुछ पाने का सिखाया जाता है मेरे समय को आज

अनेक घराने तुले पड़े हैं बहुताल चहुँदिश अपने अपने राग का समूहगान हमसे करवाने में,

ऐसे इस गूंगे समय को गुनगुनाना सिखाओ सिर्फ, अपने अपने देवास में

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को भी

 

नन्हें कदमों से सही, पर लंबे रास्ते पर, अपनी ही ऊर्जा से, अपनी ही तरह 

अपना खुद का राग फिर से गाना है

क्या है साधना, क्या है रियाज, औषध क्या है और उपचार

कहो, कोमकली कुमार, अमर गंधर्व



Tuesday, December 16, 2025

रवींद्र कुमार शर्मा दियां कवतां

 


पेश हन घुमारवीं, बिलासपुरे ते रवींद्र कुमार शर्मा होरां दियॉं तिन कवतां। 

इन्हां दे कविता संग्रह गुलदस्ते रे फुल्ल दी समीक्षा तुसॉं पैह्लें एत्थी पढ़ी चुकेयो हन। 

मूह्रली चित्रकृति : शशिभूषण बडूनी  


  1  

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

न पजदे हुण कोल्थ मित्रो

न पजदे हुण खेतें माह

मसर मुंगी बी नज़र नी औंदे

नज़र नी औंदी हुण किती बी कपाह

 

होल़ां किता ते खाणी मित्रो

न कोई हुण बाहन्दा बेरड़ा

मेहसीं नी तांजे पाल़नी किसी बी

खाणे जो किता ते मिलणा छेरड़ा

 

धान नी तां जे बाहणे मित्रो

तां हुणा नियाँ फेरी पराल

सडकां गाँवे गाँवे पूजी गईयाँ

हुण किसी नी चढ़ने क्वाल़

 

बल़द किसी घरा नज़र नी औंदे

जमीनां उज्जड़ पांदे देखे करसाण

चौल़ खाणे जो टोल़दे सारे

बाहणा नी चाहन्दा कोई भी धान

 

पैदल नी कोई चलदा मित्रो

रखी लई सबीं बाइकां कने कार

दिखावा बौहत करयादे सारे

पावें चकणा लोकां ते तवाहर

 

चिट्ठियां हुण कुण लिखदा मित्रो

बन्द हुई गई भेजणा तार

सुखसांद पल पल मिलदा रहन्दा 

तां जे जांदा कोई घरा ते बाहर

 

पढ़ने जो स्कूल बतेहरे मित्रो

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

मुंडू नी करदे कोई बी कम्म कार

लगिरे करने हुन चिट्टे रा व्यापार

  

  2  

बधी गई हर चीजा री भुख

अज्जकल जिसजो बी देखो

बधी गई हर चीजा री भुख

दो फुट जमीन खातर भाई दित्ते मारी

बड्ढी दिते छोटे बड़े सारे रुख

 

लूण पिपल़िया कने खाई कने बी करदे थे गुज़ारा

बौहत मुश्क़िला रे टैमा ई चकदे थे पैसा तवाहरा

ब्याज बौहत देणे पौन्दा था पर मुकरदे नी थे

साहूकार ब्याज़ा च ई लेई जांदा था फसला रा नाज सारा

 

पैसे री भुख अज्जकल सबीं जो बौहत ज़्यादा

मेहनत नी करनी पवो रातों रात अमीर बणना चाहन्दे

अपनी संस्कृति भुली कने करदे पुट्ठे कम्म

कई तां पैसे खातर चिट्टे रे गुलाम बणी जांदे

 

कोई नेता बणी कने अपना नांव चमकांदा

पुलसा री वर्दी पहनी कने बी कोई रिश्वत खाँदा

घरें बी किसिरे मन्जयां बिच मिलदे नोट

सोना चांदी बेहिसाब सब लौकरां बिच छुपांदा

 

दो वक्त रिया रोटियां खातर कोई दिन रात कमान्दा

धियाड़ी मज़दूरी बी करदा कने खेतां बी बाहन्दा

पूरी उम्र करदा रहया भ्यागा ते संजा तिक कम्म ई कम्म

पल्ले कुछ नी पया रहया जिंदगी भर करलांदा

 

जे भुख ज्यादा नी हुन्दी तां नी हुंदे कम्म खराब

इसे ज्यादा भुखे करी दिति दुनियां बर्बाद

जितना जे भगवाने दितिरा जे तितने च करो गुज़ारा

तां जिंदगी सुधरी जाणी कने जियुणे रा औणा नज़ारा

  

  3  

सीर गंगा

धर्मपुरा ते चलदी सीर गंगा

घुमारवीं रे लोकां री राणी

जून मिहने छिप नी मिलदी

कने बरसाती खूब पाणी पाणी

 

बम्मा रे रोपे ते तां जे निकल्दी बल खांदी

चाल तेरी मस्तानी कल कल बगदी जांदी

दुनियां जो पाणी देइ कने तारदी

करसाणा रे बेड़े पार लगांदी

 

घुमारवीं शहरा री तां तू ई जान

इक्क दिन पाणी नी आओ तां निकलदे प्राण

धर्मपुर, सरकाघाट जाहू बम्म तू लंघदी

पर लोक गंद पाई कने तिजो करदे बौहत परेशान

 

सीर गंगा रे कंडेह बणया बड़ा मन्दिर आलीशान

बड़ा छैल बणी गया हुण इत्थी रा मोक्षधाम

सवेरे शाम हुणी पूजा बजोना शंख कने घंटियां

आरती हुणी सीर गंगा री सवेरा कने शाम

 

पँजाह स्किमां पाणिए री चलदी

आराम नी करदी रात दिन रहन्दी बगदी

बरसाती तांजे मचांदी तबाई

पितर कम्बदे सारी दुनियां डरदी

 

कोई टैम था तां जे चलदे थे सीरा बौहत घराट

तड़के जांदे थे पीहण चक्की कने नेहरे दिसदी नी थी बाट

नेहरे ई जाणे पौन्दा था पंगयाठुआं रिया लोई

कई बार तां घराटा ई बीतदी थी सारी सारी रात

 

दुनियां री तू प्यास बुझान्दी

पर करदे तू पर सब अत्याचार

खुणी खुणी कने करी दिति डुग्गी

पील़े पंजे कने करदे तेरे सीने पर वार

 

चलदी चलदी पुजदी बलघाड़ी जाई

स्वागत करने जो शुक्र कने सरयाली बी आई

बड्डा चौड़ा डयाव तेरा मांडवे

राती बेले औखा लँगणा देंदी सबीं जो डराई

 

स्याणे ग्लान्दे थे भई सीर शुक्र कने सरयाहल़ी

तीनों जाई मिलदी बलघाड़ी

मुर्दा लैंदी दिहाड़ी

ईसा गल्ला जो अज्ज बी कोई नी सकदा टाल़ी

 

लोकां री सारी गंदगी तू टोह्ंदी

जख्मी करी दित्ती पियूले पंजे पर कदी नी रोंदी

चुपचाप चलिरी रहन्दी कदी नी करलांदी

बरसात स्याला होवे या होवे पावें तौन्दी


रवींद्र कुमार शर्मा
कविता संग्रह : गुलदस्ते रे फुल्ल

Friday, September 26, 2025

अशोक दर्द दियां कवतां

चित्रकृति:सुमनिका 

 
पेश हन अशोक दर्द होरां दियां कवतां। 


   

धुप्प छां

पहाड़ां साई धुप्प छां ढौंह्दा रिया।

रोज तिल तिल करी छलौंदा रिया।।

 

 रक्खियां पल्याई छुरियां जिन्हां।

जाई अंगणे उन्हां दे बौंह्दा रिया ।।

 

केई लग्गे मगर मेरे हत्थां धोई।

फिरी बी बेफिक्र होई सौंदा रिया।।

 

केई ढकियां थियां  ख्वाबां दियां।

कदी लूंह्दा रिया कदी गौंह्दा रिया ।।

 

बिच्च रस्ते च जेह्ड़े  छड्डदे रेह् ।

उन्हां लोकां ने रस्ते कठौंदा रिया।।

 

बुणे - पट्टु कंबल मैं बुह्तेरे अपर।

भर हीयूंदे मैं नंगा ठह्णौदा रिया।।

 

इत्थे मिल्या नी मैहरम दिले दा कोई।

अंदरो अंदर मैं उम्रां घटौंदा रिया।।

 

लोकां थप्पी ने दाह् लाई झूठी ।

मिठिया गल्लां मैं रोज ठगौंदा रिया।।

 

जाह्लु कित्ती मती मैं भलमाणसी।

ताह्लु हट्टियां घराटां लटौंदा रिया।।

 

नी अपणे होए नी पराए लग्गे।

इदेह् रिश्ते मैं उम्रां हंडांदा रिया।।

 

कन्ने सूरजे दे मैं चलदा रिया ।

कदी चढ़दा रिया कदी घ्रोंदा रिया।।

 

दिक्खी नौंएं तमासे दुनिया दे ।

कदी हसदा रिया कदी रौंदा रिया।।

 

लेई दर्दे दिले दे अल्फ़ाज़ नित।

गीतां-  नज्मां दी मालां परौंदा रिया ।।


  2  

दिक्खी ने चुप रेई गिया...

उपजाऊ खेतर होई गे बंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।

वारे पारे खूनी मंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया ।।

 

कुते राम बणादा बड्डा कुत्ते अल्लाह ताला ए।

रोज लड़ादे मस्जिद मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

टुकड़े खातर लड़ियां बिल्लियां खूब तमासे कित्ते ।

बिल्लियां दे जज बणी गे बंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

भाईयां भाईयां बिच्च झमेले जोरू जोर जमीनां दे।

उट्ठदे नौंएं रोज बवंडर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

नैतिकता ईमानदारी ते कन्ने देस प्यारे दे।

खुन्ने होई गे सारे संदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पैसे सुट्टो करो पढ़ाई आज्ज जमाना पैसे दा ।

बणे दुकानां विद्या मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

जिन्हां हत्थां उपकार हुंदे थे ओ बी इक्क जमाना था।

उन्हां हत्थां आज्ज पैने खंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

खूब कमाईयां कित्तियां लोकां काले धंधे करी करी।

बैट्ठे केई बणी सिकंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

बुक्कल़ी बिच्च छुपाई छुरियां मुक्खे राम उच्चारा दे।

बाहरे चिट्टे काले अंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पापां धरती गेई भरोई खूब सुणाया रोई ने।

किच्छ नी बोल्ले पीर पैगंबर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।


  3  

कबता के लिखणी

दिले नी जेकर प्यार ता कबता के लिखणी ।

धोखे च रक्खै यार ता कबता के लिखणी ।।

 

हौन्न बूट्टे सब  ठुंडे ठुंडे  ते पौंग्र सुकी  सुकी ।

होए बदली सब नुहार ता कबता के लिखणी ।।

 

जे दूर बसेरे हौन्न दिल रुचेयां दिलदारां दे ।

अते हवै नी रुत बहार ता कबता के लिखणी ।।

 

दूर जाणी हवै जानी ते बिखड़े रस्ते हौन 

कने हौन सराबी कहार ता कबता के लिखणी ।

 

अपणा आप जलाणा  दुनिया दियां दर्दां ने ।

जे नी समझै संसार ता कबता के लिखणी । ।

 

एहसास नी समझै कोई डुल्ले बरकेयां पुर ।

अते नी मिलै दरकार ता कबता के लिखणी ।।

 

  4  

साह्ड़े हिमाचले दी नी रीस कोई...

अजेह् बी साह्ड़ेयां पहाड़ां च प्रेम प्यार जिंदा ऐ।

निक्केयां बड्डेयां दा आदर - सत्कार जिंदा ऐ ।।

 

अणछूयां रस्तेयां पर जित्थे विचरते देवते ।

चिट्टी चांदिया भरोई साह्ड़ी धार जिंदा ऐ ।।

 

इत्थे झूरिया गंगिया दी मिट्ठड़ी तान जिंदा ऐ ।

ढोल नगारेयां मिट्ठड़ी झंणकार जिंदा ऐ ।।

 

नौआं जमाना आया लोक लाक्ख बोल़ण ।

साह्ड़ा सुनार जिंदा ऐ साह्ड़ा लोहार जिंदा ऐ ।।

 

रैह्न्दे भाईयां साई हिंदू मुस्लिम ते सिक्ख ईसाई।

साह्ड़ेयां पहाड़ां च मोहब्बता दी नुहार जिंदा ऐ ।।

 

करी सकेया नी कोई पहाड़ां दा बाल़ बांका ।

साह्ड़ी संस्कृति जिंदा ऐ साह्ड़ा संस्कार जिंदा ऐ ।।

 

हरणातरां जातरां नुआल़ेयां दे इत्थे नाच जींदे ।

हास्सेयां ठट्ठेयां दी मिट्ठड़ी फुहार जिंदा ऐ ।।

 

पिज्जां ककड़ां दी बणां च हुंकार जिंदा ऐ ।

मोरां मोनाल़ां दी उच्चड़ी उडार जिंदा ऐ  ।।

 

पच्छिमी सभ्यता भवें कितणें ई रंग लाए ।

लोहड़ी सैंरी ते रल़ियां  दा साह्ड़ा हर त्योहार जिंदा ऐ ।।

 

पच्छिमी हवा नी साह्ड़ा किच्छ बिगाड़ी सकदी ।

साह्ड़ेयां पहाड़ां दी ठंडड़ी बयार जिंदा ऐ ।।

 

बेईमानिया ठग्गिया इ नी इत्थे पुच्छदा कोई ।

साह्ड़ा ईमान जिंदा ऐ साह्ड़ा ऐतवार जिंदा ऐ ।।

 

रक्खदा बुक्कतां  प्यासेयां दी प्यास बुझाणे दियां।

साह्ड़ा नौण जिंदा ऐ साह्ड़ा पणिहार जिंदा ऐ ।।

 

गिटपिट अंग्रेजिया च दुनिया लाक्ख लायै ।

साह्ड़िया हिमाचलिया दा अपणा मयार जिंदा ऐ ।।

 

साह्ड़े हिमाचले दी नी कोई रीस दर्द ।

जालु तक एह् चन्न सूरज ते संसार जिंदा ऐ ।।

 

  5  

मुश्कलां के करगियां

मुश्कलां के करगियां उसदा जनाब ।

परां च जिसदे हौसला है बेहिसाब ।।

 

नित नी भरोइयां रैंदियाँ नदियां कदी ।

रक्खयो सम्हाली दोस्तों चढ़दा शबाब ।।

 

धुप्प छां सब वक्त दे ई खेल ने ।

गरीबियाँ नी रैंदियाँ नित नी नबाब ।।

 

अपणे पसीने पुर जिसजो विश्वास है ।

अध्धे अधूरे रैंहदे नी उसदे ख्वाब ।।

 

पढ़ी नी सकेया ओ बी चाला वक्त दा ।

उंगलियां प करदा रिया जेहड़ा हिसाब ।।

 

खरा नी हुन्दा अंहकरियां ने उलझणा ।

खरा नी दैणा हरेक गल्ला दा जबाब ।।

 

कुत्ते दी जात अप्पू पुच्छैणी जांदी ऐ ।

उसदे अग्गे सुट्टी ने दिक्खो कबाब ।।

 

माहणुए दे बिच्च माहणु पढ़णे दी ।

दर्द नी दुनिया च मिल्दी कोई किताब ।।

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित