पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Showing posts with label तेज सेठी. Show all posts
Showing posts with label तेज सेठी. Show all posts

Monday, June 1, 2026

इक गुजराती कवता

 


हिन्दिया दा इक रसाला है साखी । तिसे दे अंक 39 बिच गुजरातिया दे मशहूर कवि नाटककार सितांशु यशश्चंद्र होरां दा इक लेख कनै इक कविता छपियो है। अनुवाद भी तिन्हां अप्पू ही कीतेयो। असां जो लग्गा भई कवता अज के बग्ते जो बड़े सम्पूर्ण कनै छैळ ढंगे नै पेश करा दी है। तुसां ताईं पेश है पैह्लैं पहाड़ी कनै तिसते बाद हिन्दी च एह् गुजराती कवता। गुजराती ते हिन्दी अनुवाद : सितांशु यशश्चंद्र । पहाड़ी अनुवाद : अनूप सेठी। पहाड़ी अनुवादे पर सलाह-सूतर तेज सेठी होरां दितेया।  


कुमार गंधर्वे गैं इक गूंगे बग्ते दी मंग

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो 

दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

तिज्जो बोली दित्था था कल जिन्हां, अज तिन्हां असां जो भी साफ गलाई ता 

हुण जे नीं छड्डी अजाद संघे नै गाणे दी ख्वाइश

तां जींदे नीं बचणा है जादा हुण इसा दुनिया च 

सैह्मयो जेह् 

कुछ बेबस, कुछ मर्जिया नै चुप देह् इस बग्तें भी किछ गलाणा है

तू ता समझी लैंह्गा इसा गल्ला, कोमकली । 

 

असां भी गाणा है दुबारा, जिञा तैं गाई नै दस्सेया, दुबारा 

भौएं असां न होन पंडित भीमसेने साह्यी लम्मे सुरे दे काबल

निक्के निक्के पगां नै करह्गे पार असां, एह् लम्मा जेह्या फासला, जिञा तैं कीता 

भौएं न रही सकिए राजनगरे च, टोळी लैंह्गे असां अपणा देवास। 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे, लबड़ां बट्टयो, मेरे बग्ते जो दुबारा गाणा सखाअ, कुमार गंधर्व

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो दुबारा अपणे देवासे च रैह्णा सखाअ,

राजनगरां ते दूर 

क्या हुंदा देवासे च, कोमकली किञा मरी जांदा कुमार,

फिरी भी  किञा जींदा रैंह्दा गंधर्व

अपणे बणायो रागां च गाई नै दस्सा असां जो

दस्सा, कैंह् कम्मै नीं औंदा कोई इक्को ई घराना

तैं बणाया किञा हर इक घराने च अपणा घर

गाई नै सुणाह् संगीत समारोहे च नीं, अपणे निर्दयी किह्लपणे 

ओह्थी ते असां सारे सुणा दे हन अज, सारियां ठाह्रीं अज देवास 

हर आम आदमिये दी अमरता दा गुप्त राज़ दुबारा गाई नै दस्स असां जो,

नौंए मिल्लयो संघे नै, शिवपुत्र 

 

सुणया है जदूं बमार था तू, गाई नीं सकदा था,

तू सुणदा था तदूं पंछियां जो, हौआ जो

बूटेयां जो कनै देवासे दी दयावान रुखियाईया जो 

असां जो भी सखाह् किञा एह् सुणना

पता है असां जो हुण मुस्कल है, सोशल मीडिया दे बग्ते च, मनचाह्या सुणना भी

असां दिया हौआ ते गुआची गइयो हुण पंछियां दी चैह्क 

अपणे ही चार चफेरे घुमदी है असां दी हौआ,

अपणे ही जैकारे दी गर्जना करदी

हौआ दी भंवीरी बणी नै रुक्खां पुटदी चलियो है 

हर इक देवासे जो फटेयो बदळे दिया बौछारा च समेटी लैंदी है, हुण एह् भतोइयो हौआ  

सुलताने दे राज-हाथिये जेह्यी, कबीरे बखा जो बधदी जांदी

सैह्मयो जेह् हन असां   

चुप्पिया दा बग्त सुरु  होई गेया सारिया सृष्टिया च ।

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’, सुआल पुच्छा फटेयां फेफड़यां दा 

फुफकार भरोयो आरोह च, कोमकली कुमार ।

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्तें सिखणा है होर भी किछ, तेह्ते,

सिखणा है तेरे ते धीरज, शिवपुत्र

छींह सालां दा सैह् तेरा देवासी धीरज ।

गिणती करना सखाअ असां जो, इन्सानी सुरां दी बक्ख बक्खरियाँ लय दी,

जिञा सखाया होणा पंडित देवधरें तिज्जो

दस्स असां जो तां छींह सालां च कितणे हुंदे म्हीने

इक्की म्हीने च तां कितणे हुंदे दिन? इक्की दिने च घंटे, घंटेयां दे पल

किञा बिताइए सैह् इक पल

हलाहल कनै अमृत, दूह्ईं नै घुळेया पल

कदूं आया तिस सठयाउंए-कपड़े दिया बुणाइया च इक्की कुमार गंधर्वे दिया मौता दा पल

कदूं आया, देरा ते, दूए कुमार गंधर्वे दे जमणे दा पल

किञा हुंदी सैह् कबीरी बुणाई

सखाह् मेरे काह्ळे पेयो बग्ते जो अपणे तिन्हां छीं: सालां दा ध्रेठ 

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो क्षय ते अक्षय तक जाणे दा रास्ता दस, चिर कुमार

अकाल ग्रसया है अज एह् धरयाया धरयाया थल्ले-यो लौंह्दा बग्त,

भोगेखा जो दौड़-भज्जा दा तेज नाच बहु-ताला है ।

इसच ई सुणाअ अपणी रस-भरिया उआजा च 

विलंबित इकताला च तेरा अप्पू बणाया राग गांधी मल्हार,

 

तेरे राग गांधी मल्हारे च, विलंबित इकताला च, करुणा नै

सुणाह् सारयां जो, ‘तुम हो धीर

अपणैं घरैं गाई नैं अज सुणाह् असां जो, घरानेयां ते दूर,  ‘तुम हो धीर...’,

कबीरे दी रसभरी वाणी सुणाह् असां जो गांधी मल्हारे च,

विलंबित, इकताला च, ‘धीर’ 

फटाफट सब किछ लई लैणा सखाया जांदा है मेरे बग्ते जो अज

कई घराने डटयो बहु-ताले चार चफेरें अपणे अपणे रागे दा समूहगान कराणे ताईं असां ते,

 

देह् देह् इस गूंगे बग्ते जो गुणगुणना सखाह्, सिर्फ अपणे देवासे च

 

राजरोगे नै ग्रसयो फेफड़यां आळे मेरे बग्ते जो भी

निकेयां पगां नै ही भौंए, पर लम्मे रस्ते पर, अपणिया ही ऊर्जा नै, अपणे ही तरीके नै 

अपणा राग गाणा है दुबारा,

क्या हे साधना, क्या है रियाज़, दवा क्या है कनै इलाज,

दस्सा कोमकली कुमार, अमर गंधर्व



सितांशु यशश्चंद्र
प्रसिद्ध गुजराती कवि, नाटककार,
अनुवादक और शिक्षाविद

कुमार गंधर्व के पास एक गूंगे समय की मांग 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले, चुप्पी साधे, मेरे समय को 

फिर से गाना सिखाओ, कुमार गंधर्व 

तुम्हें कह दिया था कल जिन्होंने, आज उन्होंने हमें भी साफ कहा है 

अब अगर छोड़ न दी मुक्त कंठ से गाने की ख्वाहिश

तो जिन्दा नहीं बचोगे ज्यादा अब इस दुनिया में 

सहमे से

कुछ अवश, कुछ स्वेच्छया चुप से इस समय को भी कुछ कहना है

तुम तो जान पाओगे इसे, कोमकली.

 

हमें भी फिर से गाना है, जैसे तुमने गा दिखाया, फिर से 

भले ही पंडित भीमसेन की लंबी सुरावट के हम काबिल न हो 

छोटे छोटे कदमों में पार करेंगे हम, यह लंबा सा फासला, जैसे तुमने किया 

भले ही राजनगर में नहीं रह पाएं, ढूंढ़ लेंगे हम अपना अपना देवास. 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले चुप्पी साधे मेरे समय को फिर से गाना सिखाओ

कुमार गंधर्व.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को फिर से अपने देवास में रहना सिखाओ

राजनगरों से दूर 

क्या होता है देवास में, कोमकली; कैसे मर जाता है कुमार,

 

फिर भी कैसे जीवित रहेता है गंधर्व

अपने बनाये रागों में गा कर हमें दिखाओ.

कहो, कैसे काम नहीं आता कोई एक ही घराना

कैसे तुमने बनाया हर घराने में अपना खुदका घर

गा कर सुनाओ, संगीत समारोह में नहीं, अपने निष्ठुर एकांत में

वहीं से हम सब सुनते हैं आज, सभी जगह आज देवास 

हर आम आदमी की अमरता का गुप्त रहस्य फिर से गा कर बतलाओ हमें

नवप्राप्त कंठ से, शिवपुत्र

 

कहते हैं जब बीमार थे तुम, गा नहीं सकते थे

तुम सुना करते थे तब पंछीयों को, हवा को

पेड़ों को और देवास के सदय सूखेपन को 

हमें भी सिखाओ कैसे यूँ सुनना 

जानते हैं हम अब मुश्किल है, समूह संचार के समय में, मनचाहा सुनना भी 

अब पंछीयों की चहचहाट खो चुकी है हमारी हवा

अपनी ही चारों और घूमती है हमारी हवा

अपने ही जयघोष की गर्जना करती 

चक्रवात बन पेड़ों को उखाड़ती चली है 

हर देवास को फटे बादल की बौछार में सिमट लेती है, अब यह प्रमत्त हवा

सुलतान के राजगज जैसी, कबीर की ओर आगे बढ़ती जाती है

सहमे से हैं हम.

 

चुप्पी का समय शुरु हो गया है सारी सृष्टि में. 

'कौन ठगवा नगरिया लूटल हो', प्रश्न पूछो फटे हुए फेफड़ों का

फुत्कार भरे आरोह में, कोमकली कुमार.

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को सीखना है और भी कुछ, तुमसे

सीखना है तुम से धैर्य, शिवपुत्र,

छह साल का वह तुम्हारा देवासी धैर्य. 

गिनती करना सिखाओ हमें, मानव स्वर के विविध लयों की

जैसे सिखाया होगा पंडित देवधर ने तुम्हें. 

कहो हमें छह साल के कितने होते हैं, तब, माह?

एक माह के कितने होते है दिन, तब ? एक दिन के घंटे, घंटो के पल ?

कैसे बितायें वो एक पल, हालाहल और अमृत, दोनों से घुली पल ?

कब आया उस धैर्यपट की बुनाई में एक कुमार गंधर्व के मृत्यु का पल ?

कब आया, देर से, दूजे कुमार गंधर्व के जन्म का पल ?

कैसे होती है वो कबीरी बुनाई ?

सिखाओ मेरे अधीर समय को तुम्हारे उन छह वर्षों का धैर्य

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को क्षय से अक्षय तक जाने का मार्ग बताओ, चिर कुमार

 

अकाल ग्रस्त है आज यह प्यासा प्यासा हासोन्मुख समय

भोगोन्मुख भागदौड़ का द्रुत नृत्य बहुताल है.

इसी में सुनाओ अपनी जलभरी आवाज में

विलंबित एक ताल में तुम्हारा खुद का बनाया राग गांधी मल्हार,

 

तुम्हारे राग गांधी मल्हार में, विलंबित एकताल में, करुणा से

सुनाओ सभी को, 'तुम हो धीर'.

अपने घर में गा कर आज हमें सुनाओ, घरानों से दूर, 'तुम हो धीर...

कबीर की जलभरी बानी सुनाओ हमें राग गांधी मल्हार में

विलंबित, एकताल से, 'धीर'

अविलंब सब कुछ पाने का सिखाया जाता है मेरे समय को आज

अनेक घराने तुले पड़े हैं बहुताल चहुँदिश अपने अपने राग का समूहगान हमसे करवाने में,

ऐसे इस गूंगे समय को गुनगुनाना सिखाओ सिर्फ, अपने अपने देवास में

 

राजरोग से ग्रस्त फेफड़ों वाले मेरे समय को भी

 

नन्हें कदमों से सही, पर लंबे रास्ते पर, अपनी ही ऊर्जा से, अपनी ही तरह 

अपना खुद का राग फिर से गाना है

क्या है साधना, क्या है रियाज, औषध क्या है और उपचार

कहो, कोमकली कुमार, अमर गंधर्व



Thursday, March 19, 2026

गल सुणा

 


भाषा बगदा नीर है। बगते दियां रगड़ां नै एह् संगरोदी पंगरोदी बदलोंदी गांह् बधदी जांदी। दूइयां भाषां दे लफ्जां नै समरिध हुंदी रैंह्दी। सिखदी भी सखांदी भी। असां दिया भाषा दे दरियाए च इक अर्ध दयोया है इक्की कताबा नैं। मेरियां कवतां दे संग्रह दा तेज सेठी होरां अनुवाद कीता। लेखकां सौगी मिली बैठी नै असां कताबा दा लोकार्पण कीता कनै कवियां ते तिन्हां दियां कवतां सुणियां। धर्मसाळा होए इस कारजे दा ब्योरा तुसां ताईं पेश है। 

अनूप सेठी  


इसा बारिया असां धर्मसाळा गै ता लेखकां नै मिलणे दा ब्हाना बणी गया। हिन्दिया च मेरी कवतां दी इक कताब है – चयनित कविताएं। मेरे बड्डे भाई तेज सेठी होरां हौळें हौंळें तिसा कताबा दा पहाड़िया च अनुवाद करी ता। प्रकाशक न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन चयनित कवतां दिया इसा कड़िया दियां कताबां दे अनुवाद भी छापदे। तिन्हां पहाड़िया च एह् कताब छापी ती। मिंजो ताईं एह् बड़िया खुसिया कनै तसल्लिया दी गल थी भई मेरियां कवतां पहाड़ियां च छपियां। होर भी खरी गल एह् भई एह् अनुवाद तेज भाई होरां कीता। इसा कताबा दे कवर पर मुदित सेठी दी पेंसला नै बणाह्इयो पहाड़ां दी सुंदर चित्रकृति है। इक्की तरीके नै एह् पारिवारिक मामला जेह्या भी होई गया। पर घरे च सारे ही कलाकार होन ता क्या कीता जाऐ। 


असां सोच्या भई अपणे शैह्रे धर्मसाळा च इसा कताबा दा विमोचन कीता जाऐ। इस ब्हाने नै अपणेयां लेखकां नै मुलाकात होई जांह्गी। 

जिन्हां जिन्हां लखारियां जो असां बिनती कीती, तकरीबन सैह् सारे ही 23 फरवरी जो इन्द्रूनाग दे जस्टा बर्डिंग होटल भ्यागा साढे दस बजे पधारी गै। त्याह्ड़ी सोमवार था। इस वजह नै कम्मे पर जाणे आळे लेखक शामल नीं होई सके। असां जो एह् मलाल रेह्या। 


प्रोग्राम दे सुरु च गणमान्य लेखकां दे हत्थां दूंह् कताबां दा विमोचन होया। पैह्लें चुह्णियां कवतां दा विमोचन होया। रेखा ढडवाल होरां इसा कताबा पर अपणे विचार रखे। कइयां कवतां दी व्याख्या कीती  कनै अनुवाद दिया बरीकिया पर भी लो पाई। अनुवादक तेज सेठी होरां पहाड़ी भाषा दी जरूरत कनै अनुवाद प्रक्रिया पर विस्तार च अपणे विचार पेश कीते। तिन्हां पुराणेयां लेखकां दी प्रेरणा दा जिक्र कीता कनै अपणी इक ग़ज़ल गाई नै सुणाई। इसते बाद रेखा ढडवाल दे कहानी संग्रह दा विमोचन होया। रेखा जी दियां कहाणियां पर सेंट्रल यूनिवर्सिटी दी शोध छात्रा कनै युवा समीक्षक रूचि शर्मा नै अपणा पर्चा पढ़ेया। तिन्हां कहाणियां दे स्त्री पख पर पर डुग्घी नजर पाई। 

कार्यक्रम दे अगले हिस्से च कविता पाठ होया। पवनेंद्र पवन, रेखा ढडवाल, हरि कृष्ण मुरारी, द्विजेन्द्र द्विज, विनोद भावुक, प्रभात शर्मा, रमेश मस्ताना, राजीव त्रिगर्ती, कुशल कटोच, युगल डोगरा कनै  पृथिपाल सिंह होरां अप-अपणियां कवतां नै समां बन्हेया। कवि पत्रकार सौरभ चौहान अजकल बौद्ध दर्शन पर शोध करा दे हन। तिन्हां भी अपणियां कवतां सुणाइयां। पहाड़िया च सांझ नाएं आळी पैह्ली फीचर फिल्म बणाणे आळे नौजवान फिल्मकार पत्रकार अजय सकलानी  होरां भी आह्यो थे। तिन्हां भी अपणी कवता सुणाई। 

हिमाचल दस्तक दे संपादक हेमंत कुमार होरां नै मतेयां सालां परंत मुलाकात होई। तिन्हां अपणी गल रखदे होए जिक्र कीता कि एह् प्रोग्राम बड़ा सादा कनै सिद्धा था। कोई औपचारिकता नीं। इस च कोई अध्यक्ष नीं था, कोई मुख्य अतिथि या विशेष अतिथि नीं था। सारे खास कनै अपणे ही लोक थे। असां कल्पना भी एह् देह्यी ही कीतियो थी। 


कवि रंगकर्मी, कांगड़ा लोक साहित्य परिषद नै जुडे़यो कनै बाणेश्वरी पत्रिका दे संपादक दुर्गेश नंदन नै भी पैह्ली बरी मुलाकात होई। दुर्गेश होरां शुरु ते आखर तक मंच सम्हाळेया कनै सारी कारवाई निर्बिघ्न पूरी कराई। 

पत्रकार कार्टूनिस्ट मित्तर अरविंद शर्मा होरां सारे इंतजाम सम्हाळे कनै मनमोहणे फोटो भी खिंजे। 

विनोद भावुक होरां सारे कारजे दी वीडियो रिकॉर्डिंग कीती। 

एह् कारज अरविंद शर्मा दे उद्यम सांभ कनै पहाड़ी भाषा दे ब्लॉग दयार दे पासे ते सम्पन्न होया। 

लेखकां विद्वानां नै मिली ने बड़ा नंद आया।  



 

 विनोद भावुक होरां दिया फेसबुक चैनला ते कवियां दे कविता पाठ दे लिंक 

हरिकृष्ण मुरारी 

द्विजेन्द्र द्विज 

पवनेंद्र पवन 

कुशल कटोच 

राजीव त्रिगर्ती 

अजय सकलानी 

रमेश मस्ताना 

पृथीपाल सिंह 

सौरभ चौहान 

दुर्गेश नंदन 

विनोद भावुक 

चन्द्ररेखा डढवाल 

अनूप सेठी 




    

 


Wednesday, March 5, 2025

तेज सेठी दियां कवतां

 


कवि लोक भांत भांत दियां कवतां लिखदे। संस्कृता च ता ज्ञान-विज्ञान भी कवतां सलोकां च ही लखोंदा था। 
तेज सेठी होरां पहाड़ी व्यंजन बणाणे दी विधि कवतां च पेश कीती है। तिन चार नमूने हाजर हन। चक्खी नै दिक्खा।  

मद्धरा

दस्सणा मैं अज्ज है   बणाणा मद्धरा ।

असान जेह्या ढंग कनै  सिद्धा पधरा ।


अद्धा किलो काबुली     चणे आनणे ।

डॉलर ही जरूरी नी बस दरमियानणे ।


सेड़ी पाणे रात्ती जो  भ्यागा उबाळने ।

कुक्करे च लाणी सीटी  अद्धे गाळने ।


प्हाड़ी आलू रक्खणे  तोप्पी-ताप्पी नै ।

छिल्ली-छल्ली पाव भर रख माप्पी नै ।


आल्लू हो बरोटे दा जां फिरी ल्हौळा दा ।

मिल्लै न जे मौके दा    तां हो परौरा दा ।


चूल्हे पर  घ्योये दी    कड़ाही रक्खणी ।

खड़ेयाँ मसालेयाँ दी         बुक सट्टणी ।


दाळचीनी लौंग  जीरा   काळी मरचाँ ।

तेजपत्ता  जावित्रिया    दीयां किरचाँ ।


मिट्ठे मिट्ठे सेक्कैं  सब्भ  आल्लू तळने ।

भूरा रंग पकड़न तां      कड्ढी रक्खणे ।


तिसा ही कड़ाहिया  छोल्ले झारी लै तू।

अद्धपक जाह्लु  होन    उतारी  लै  तू ।


गाढ़ा गाढ़ा दहीं पाईया   भर रिड़कणा ।

तिसा ही कड़ाहिया च  देणा सिड़कणा ।


धनिया बुसार  मेथी       लूण पाणा जी ।

मिट्ठी-मिट्ठी अग्गी राह्ड़ा खूब लाणा जी ।


कड़छीया दा चल्लै  हौळी-हौळी छेड़ा जी ।

जिन्ना देणा  छेड़ा   रंग    होणा तेह्ड़ा जी ।


बदाम गरी दाख  कनै    काजू पाई लेया।

फुल मखाणा पाई नै  मद्धरा बधाई लेया ।


दहींयें जाह्लु घ्यो तेल    छड्डी देणा है।

आलु छोल्ले त्यार माल   ढबी देणा है।


द्रिमक-द्रिमक पाणीयें दी लान्दे जाणा जी ।

हौळी-हौळी कड़छी     चलान्दे जाणा जी ।


भत्ते सौग्गी  जेहड़ा इस   मद्धरे जो खांह्नगा जी।

मद्धरे तां खांह्नगा ऊंगळां वी  चट्टी जांह्न्गा जी ।



दाळ  'काळी बरीक' मसरी 

लग्गा   अज्ज    दस्सणा   बणाणा   मसरी

खाह्नगा प्रौह्णा कदी वी तां जाह्न्गा पसरी

 

खान्दे इसा दाळी   जो म्हाजन – खत्तरी

दाणा-दाणा     डग-डग        कनैं    खसरी

 

औह्री दाळ  उन्हाँ तांईं   रामबाण है

पेट्टे  देयां  किरमां   ते  जेह्ड़े कसरी

 

जेट्ठे-हाड़ैं   तपदींयां    जाह्ल   तौन्दियां

बुक्कतां इसा  दाळी दींयां ताह्ल पौन्दियां

 

दो कौल मसरीया दे  धोई- धाई नै

कुक्करे च अट्ठ कौल पाणी पाई नै

 

अदरक 'नै लह्सण पाणा मर्जीया दा 

लूण  कनै  बुसार  पाणा  गर्जीया दा

 

दाळी सांह्यीं दाळ जिह्ज्यां होर बणान्दे

पर   मसरीया   जो   सीटी  घट्ट   लान्दे

 

चौंह सीटियाँ पर  कुक्कर थल्लैं रखणा

अपणे आप खरा  कित्तैं  देणा  ठण्डणा

 

दाळ करनी  दूंह्     डूंघेयां   च   बखरी

इक औह्रीया आळी   दूई  मौह्री सखरी

 

राईया जो  कूंडिया  च घोटा  लैणा लाई 

मिर्च पाणी तीखणी  'नै  दहीं देणा लाई

 

घंटा भर रक्खी   छड्डा  देयी ढक्कणा

त्यार होई जाह्लु   झाळ  लगी उट्ठणा

 

दाळी औह्रीया च इमली पाई रक्खणी

औह्रीया दी कड़छी    रळाई  रक्खणी

 

नक्के च ते 'तूस ' कपाळैं   चढ़ी  जायै

हाक्खीं ते तराळे ब्रह्म - रंघ्र खुड़ी जायै 

 

दूये डूंहगे आळी दाळ बणाणी मौह्री है

तिसा  च न ता खटियाई  न तां औह्री है

 

खाणे दे  शकीन  सारी  जहान खाई गै

जिन्हां घुट्टे पेट तिन्हां मकान बणाई लै

 

दस्सीया तरकीबा ने जे बणाह्नगे मसरी

मौज लैंह्न्गे  चौळां ने जे खांह्न्गे मसरी




पहाड़ी खट्टा



रात भर सिज्जेयो काळे छोल्ले ताळने ।

भ्यागा उठी कुक्करे च पाई नै बुआळने ।


चुल्हे पर  रखणा   कड़ाह्ऊ   लोहे दा ।

देणा पाई नसौंच कौड़ा तेल  थौह्ये दा ।


सट्टणीयां  मरोड़ी नै  दो लाल  मिरचां ।

कजो वी करनीयां बेथौह्यियां किरसां ।


अमचूर कनै   बेसण  बरोबर नापणा ।

उट्ठै  खुश्बू   ताह्लु  तिक्कर  तापणा ।


गुठळियां  कड्ढी  नै   छुआरे  पाई  लैं ।

मूली  वी भणे  कस्सी  कनै   लाई  लैं।


उब्बळेयो  छोल्ले कनै  पाणी ढब्बणा ।

फिरी अद्धा घंटा इह्जो देणा रिज्झणा ।


मिट्ठी- मिट्ठी  अग्गी  ए खट्टा  रिज्झगा ।

चखगा जे कोई  फिरी सैह्यी गिज्झगा ।


खट्टे बाह्जी धाम हुन्दी कदी  वी नी पूरी ।

खट्टे रैहन्दे निहाळदी  परौह्णी झूरी-झूरी ।


बोटी आया पुच्छदा :   मद्धरा- खट्टा, मद्धरा- खट्टा ?

साढू बोल्या "क्या ऐ लाह्येया मद्धरा- खट्टा, मद्धरा- खट्टा" ?

मद्धरे इस चन्दरे यो सट्ट उरुआंह् , प्रोह्णे यों सट्टा खट्टा ।




बड़ियॉं दा सलूणा


मामी हण     बड़ीयाँ 

बणाणा     लग्गी है ।

मामियाँ दी  भैण गीतां

गाणा        लग्गी है ।


कौड़ा तेल कड़ाहिया च 

पाया           मामीयें

चुल्हे देयाँ    लक्कड़ूआँ

सरकाणा     लग्गी है।


मिट्ठैं-मिट्ठैं सेक्कैं  बड़ीयाँ

पाईंयां            तळना 

हौळी-हौळी     झारना

चलाणा       लग्गी है।


होई गईयां     भूरियाँ तां

कड्ढी           रक्खीयाँ

पित्तळू दे      बाटुये च,

पाणा           लग्गी है।


मुसक जे      बड़ीयाँ दी

लग्गी            उड्डणा

पड़ेसण ढक्कैं   पसरियो

नि जाणा      लग्गी है ।


"करा उरांह     कूंडीया

मैं मसाला       घोटदी "

प्याज ल्हसण  छिल्ली करी

पाणा           लग्गी है।


घोटे    विच्च       पाया

बीह्ण  बुसार     धनिया,

जीरा     लैची-दाणा वी

रळाणा          लग्गी है।


होईय्या मसाला   जाह्लु

इक्क         जान   जी

पत्तीलुये च  मामी राह्ड़ा

लाणा           लग्गी है।


कट्टी रक्खे   म्हीन-म्हीन

टमाटर           पड़ेसणी

भुज्जदे         मसाले च

मलाणा         लग्गी है।


आल्लू चार    रक्खेयो हे 

छिल्ली कट्टी             नै

रिज्झदे मसाले    बिच्च

चलाणा           लग्गी है ।


खेत्तरा ते     लम्मे भैण्ठू

आणी हे          रक्ख्यो

ऐन मौका दिक्खी तिन्हें

पाणा             लग्गी है ।


भुज्जदे     मसाल्लैं तेल

जाह्लु           छडी  त्ता

तळीयाँ       बड़ीयाँ भी

ढबाणा          लग्गी है।


रती रती        ढबदी सैः

जान्दी            पाणियें

पित्तळू दी     कड़छिया

चलाणा         लग्गी है।


अंगणैं   द्वारैं      जाह्लु

लगी  मुसक      उड्डणा

हण कुती    पड़ेसण वी

जाणा            लग्गी है ।


(मूह्रली तस्वीर इंटरनेट ते : धामा दी त्यारी)

 
तेज सेठी
कवि अनुवादक