Sunday, December 30, 2018

पहाड़ी भासा – अज के हलात कनै गांह् दी चिंता

डॉ अरुणजीत ठाकुर


पहाड़ी भासा पर चर्चा दा लिंक ठियोग दे वट्सऐप ग्रुप सर्जक च पाया ता ओथी गल चली पई। 
कनै खरी ई चली पई। एह जरूर है भई एह हिंदिया च सुरू होई अपर बाह्द च पहाड़िया तक भी पूजी। 
मुशी शर्मा होरां सुआलां दे जुआब भी दई ते। सैह् भी पहाड़िया च। 
असां जो एह लग्‍गा भई एह गलबात इसा चर्चा दी इक कड़ी ई है। 
किछ होर पैह्लू साम्‍हणै औआ दे। 
पढ़ी नै दिक्‍खा भला।

Anup Sethi: असां पहाड़ी भासा दी चर्चा सुरू करी ती है। दिक्खा कनै अपणे वचार भी देया।
Dr.Arunjit Thakur: Sir का हार्दिक स्वागत
Ashwini Ramesh: पहाड़ी भाषा यानि बोलियों की संख्या हिमाचल में इतनी ज्यादा है और भिन्नता उनमेँ इतनी है कि हिमाचल में एक पहाड़ी भाषा का होना अभी कतई मुश्किल है । कांगड़ी बोली कांगड़ा और हमीरपुर में तो लगभग समझने बोलने हालांकि भिन्नता वहां भी है जैसे उदाहरण नूरपुर में मिंजो सांजो को मेकी तेकी बोला जाता है ।
बाकी कहानी ही बिल्कुल भिन्न है। शिमला और मंडी जिले को ही लें तो कई बोलियां हैं और कहीं तो 15 कि. मी. में भी बोली में आंशिक परिवर्तन आ जाता है । ऊना में पंजाबी का ज़्यादा प्रभाव है। कुल मिलाकर संभावना हिमाचल में एक क्षेत्रीय भाषा की नहीं लग रही है।
Anup Sethi : सर मेरे ख्याल से अपनी बोली से प्यार करना जरूरी है, बाकी बातें बाद की हैं। वैसे डोगरी के कई इलाकाई रूप हैं पर भाषा चल रही है। विविधता और बहुलता ताकत है, बाधा नहीं। मांईडसेट का मामला है।
Ashwini Ramesh: बिल्कुल अपनी बोली से प्यार और  लगाव तो स्वभाविक ही है क्योंकि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा है और हम तो बचपन से पहाड़ी बोलते आए हैं।
पहाड़ी लोगों को जो भी विचार मूलतः  पहाड़ी भाषा आएगा उसे किसी अन्य भाषा में जब व्यक्त किया जाता है तो वो अपनी मौलिकता खो देता है... पहाड़ी शब्दावली के कुछ शब्द अन्य भाषाओं में उपलब्ध भी नहीं है.. जैसे कि डाम=आग के जलने से पैदा हुआ दर्द और निशान... . पहाड़ी भाषा का सरलीकरण व एकीकरण की कोशिश होनी चाहिए... पहाड़ी संस्कृति को अन्य भाषाओं में समझना आसान नहीं है... पहाड़ी में कई कालजयी रचनायें भी बनी हुई है... पहाड़ी कहावतों का तो कहना ही क्या है...
Ashwini Ramesh: कंवरसाहब, पहाड़ी कहावतों का मैं इसलिए कायल हूँ कि इनमें कुछ ही शब्दों में जीवन का सार तत्व छिपा होता है।
जैसे
बुरी नी हांडनी दूरी हांडनी ।
 Virendra Kanwar: हाँ सर... पहाड़ी भाषा में बहुलता और फरक होने के बावजूद लोग आसानी से समझ सकते हैं... ज्यादातर पहाड़ी भाषाओं की जननी संस्कृत व हिंदी ही है..
Ashwini Ramesh: कंवर साहब हिंदी नहीं संस्कृत और प्राकृत ही बोलियों का सोर्स है
Virendra Kanwar: हाँ सर... हिन्दी प्रेम मुझे थोड़ा पक्षपाती बना देता है..  पहाड़ी को सजोने की जरूरत है.. कब सीढ़ी को शीढ़ बोला जाता है और कब सगआह... जानना जरूरी है आदि
.. कहीं ऐसा न हो हम मंदिर जाएं और good morning देवता जी बोलें.. बाकि फर्क पड़े या न पड़े पर संस्कृति पर तो पड़ता ही है..
Ashwini Ramesh: मेरे ख्याल से मंदिर की सीढ़ी को सगाह और आम घर की सीढ़ी को शीढ़ बोलते हैं
Anup Sethi: पहाड़ी भाषा पर आप मित्रों के विचार उत्साहजनक हैं।
Anup Sethi: अगर इन्हें आप अपनी बोली में पहाड़ी दयार ब्लॉग के कमेंट बॉक्स में डालें तो हमारी चर्चा सार्थक हो जाएगी। कुछ नए रास्ते भी निकलेंगे।
Virendra Kanwar: हाँ sir.. आप तो बखूबी जानते हैं पर अब हम अपने बच्चों को पहाड़ी भाषा और संस्कृति से दूर कर रहे हैं.....भाषा खून में दो‍डती हैं...
Virendra Kanwar: अभी में घर से बाहर हूँ... बैट्री भी ख़त्म हो रही है.. मिलता हूँ...
Ashwini Ramesh: अनूप सेठी जी पहाड़ी दयार में ये बोली ठियोग की सिर्फ शिमला ज़िला वाला समझ सकता है । आप चाहो तो जो आपको ठीक लगे शेयर कर दें ।
Anup Sethi: कोई दिक्कत नहीं। पहाड़ी की सामर्थ्य और सीमा ऐसे ही पता चलेगी। हम समावेशी होना चाहते हैं।
Ashwini Ramesh: 19 साल की उम्र में जब मैने अपनी पहली कविता ठियोग के साहित्यिक मंच पर पढ़ी तो वो पहाड़ी में ही थी। आप यहां की पहाड़ी चर्चा चाहो तो शेयर कर सकते हो पर यदि हमने लिखना होगा तो विषयवार ही लिखना पड़ेगा।
Anup Sethi: धन्यवाद। यह शेयर कर देता हूं। और वो छह सवाल यहां शेयर कर देता हूं जिन पर चर्चा शुरू की है।
Ashwini Ramesh: बिल्कुल ।
Virendra Kanwar: Sir, पहाड़ों की संस्कृति एक ही है और पहाड़ी भाषा खून की तरह है... अलग अलग पहाड़ी भाषाएं तो blood group की तरह हैं जो अलग तो हो सकते हैं.. पर समझ से परे नहीं... मिलजुल कर कोशिशें होनी चाहिए..
Ashwini Ramesh: स्पीति और किन्नौर की मुश्किल है, पर दिलचस्पी हो तो वो भी समझी बोली जा सकती है
Virendra Kanwar: हाँ sir... थोड़ा संस्कृति में भी फर्क है...
Ashwini Ramesh: मुंशी राम जी कुछ बहुत टाइप कर रहे हैं


इसते बाह्द असां दे सुआलां दे मुंशी राम होरां दे पहाड़िया च एह जुआब आए।

जी आपका स्वागत पर एथि पाडीया च लिखने बोलणे आले कट ही ए जी । गलाणे च बी फर्क़ रहीी जान्दा क्यूंकि कुसी जो भि भ्यास नी ए । तां 
पहले-पहल स्वल्ला पर तां सम्जो बिल्कुल बी कट कम होयदा ।
दूजे स्वाला रा एडा जे कुसी जो टेम नी कुसी रा ध्यान नि तां कुसी जो ये स्यापा ल्ग्दा ए । ए बी गल ए जे इन्ने सारे च्मेले पेयादे कि पाडीया इंदीया या ग्रेजी च फर्क़ ई सोचणे रा टेम नि ।
तीजे रा एद्दा जे जालू लिक्ने पढ़ने जो क्तबां मिल्दी रेंहगी तां लोकों जो थोड़ा थोड़ा भ्यास पोंगा तां सोची सक्दे जे कियां अगे ब्दीये ।
चौथा सुआल जे गलान्दे तुसां अग्लिया पीडिया जो गल पूजाणे रि तां म्हारे मुल्खा च तां ग्लाई बोली के ई पौन्चदी । बाकी हुन तां क्तबां क्न्ने ओर सारे तरिके आई ज्ञे हन ।
पंजवां सुआल इस साबा ने ता ना मिल्णी भासा न रेह्णे गीत जी ।
छेउआं सुआल अज तां कितनी बी भासा बोली ओए तां कट ल्ग्ती ईयां इक्की ने बी च्लेया ओया कम तां।न बी ओवे तां मोबाईल तां ए ही ।
तुसां जो जय राम जी की ।

Anup Sethi: ओ साबासे।

Munshi Sharma:  इयां आसे तां म्हसुई पहाडिये पर ग्लाई सम्ज लेन्दे जी क्लूरि कंग्ड़ी क्न्ने थोड़ी मंडियैली

Ashwini Ramesh: मुंशी राम जी तोहाँ खरी ग्ला दे कांगड़ी बी । शाबासी  ते बनदी है । इक महासुई दा मुंडा इहाँ कांगड़ी भावें मिक्स होवे ग्ला सकदा है । इहाँ ही कांगड़ी ग्लाने आले जो बी महासुई दी प्रैक्टिस करनी चाहिदी ताँ ही आपसी आदान प्रदान होना।


Tuesday, December 25, 2018

पहाड़ी भासा–अज के हलात कनै गांह् दी चिंता

 नैनसुख (1710-1778)


पहाड़ी भासा दे बारे च चर्चा करने ताईं असां मतेयां लखारियां जो छे सुआल भेजयो थे। जुआब औणा सुरू होई गै हन तां हुण असां एह चर्चा गजलकार, लेखक कनै अनुवादक द्विजेंद्र द्विज होरां दे विचारां नै सुरू करा दे। चर्चा दिया इसा लड़िया ताईं मसहूर चित्‍तरकार कनै कला पारखी विजय शर्मा होरां पुराणे मास्‍टर कलाकार नैनसुख (1710-1778) होरां दे कुछ चित्‍तर भेजयो हन। इन्‍हां चितरां पर टांकरी लिपि लिखियो है।


1. तुसां दे स्‍हाबे नै पहाड़ी लेखन असां दे मुल्के दियां दूइयां भासां दे मुकाबले च कुतू खड़ोंदा  
द्विजेंद्र द्विज: सुआल करड़ा है। मैं असाँ दे मुल्के दियाँ मतियाँ दूइयाँ भासाँ च लखोह्या मता जादा किछ नीं पढ़ेया, अपण इतना त पता इ है जे हिन्दी, उर्दू, बंगाली, कन्नड़, मराठी, गुजराती, तेलगू, राजस्थानीपंजाबी, कने होर भी मतियाँ भासाँ जिह्नाँ दा लेखन साहित्य अकादमी, कने ज्ञानपीठ ते भी पणछोन्दा, तिह्नाँ दे मुकाबले च ता जादा तर प्हाड़ी लेखन कुथी  भी नी खड़ोन्दा, अपण फिरी भी किछ लेखन ऐसा भी है जिसजो पणछैणया जाणा जरूरी है। 

2. तुसां दे स्‍हाबे नै पहाड़ी भासा च इतनी समर्थ्‍या है भई अजकिया जिंदगिया दी अन्‍नोह्-बाह् दौड़ कनै सारे ढक-पळेस लखोई सकदे? कि एह् चील्‍हां दे डाळुआं झुलाणे जोगी ई है 
द्विजेंद्र द्विज: जी मेरा एह पक्का बसुआस है जे प्हाड़ी भासा च इतनी समर्थ्या है जे एह अजकिया जिँदगिया दी अह्न्नो-बाह दौड़ कने सारे ढक-पळेस अप्पूँ च समेटी सकदी है। जे पंजाबी, डोगरी, राजस्थानी कनै भोजपुरी च एह समर्थ्या है (मैं इह्नाँ भासाँ दे लेखन जो पढ़ी सह्म्झी लैन्दा ता गलाअ दा।) ता प्हाड़िया बिच भी है।   किछ लखारी बड़िया सोह्गमानिया  ने इस कम्मे करा दे भी। फिरी भी मती मिह्णत करने दी जरूर्त है। अपण मते करी लखारी अजैं भी चीलाँ दे डाळुआँ ही झलेरी जा दे। तिह्नाँ तियैं लेखन दा मतलब इसते उप्पर किछ नीं है। 

3. तुसां दे स्‍हाबे नै पहाड़ी लेखन कनै पाठकां दे रिस्‍ते दी कदेई सकल बणदी है ?   इस ताईं होर क्‍या क्‍या करना चाहिदा 
पैह्ली सतर: तस्वीर राजा बलवंत देव जी। राग मलार सुण दे। 
उबजा बाईया कछ। नऊ घरे दीआ निआ पर खड़ोते दे लीखे दे। 
दसे दे समते दे साउणे बीच। खीआल है। 
दूई सतर:  ताँ बणेआ दा था। आई रे नहनी नहनी बूँदनीआँ रित 
साऊण की आई रे। चहुँ देस बीज चमके सीरी सीरी पऊंन सुहाई रे। 
आई रे नहनी नहनी बूँदनीआँ।।
द्विजेंद्र द्विज: प्हाड़ी लेखन कने पाठकाँ दे रिस्ते दी बड़ी खरी सकल ता नी बणदी।  पहाड़िया च गलाणा-बोलणाँ ता असाँ बिच  मतेयाँ जो खरा लगदा अपण  लिखिया / छपिया प्हाड़िया जो पढ़ने दिया बरिया मते पढ़ेयो-लिखेयो भी  हत्थाँ  खड़ेरी दिन्दे।  जे खरे लेखक  घट हन ता खरे पाठक होर भी घट। जादा की लखारी लिखा दे मतापढ़ा दे घट। लिखणे आळे मते हन, पढ़ने आळे घट्ट हन। जे हर कोई लखारी होई गेया ता पढ़गा कुणकोई कुसी जो पढ़ी नैं राजी नीं है। कोई कुसी जो सुणी नैं राजी नीं है।  गाई रिह्न्नेया कने बळ्दैं खाह्द्दा, गोह्यी जो मिली गोह जदेह्यी ओह तदेह्यी ओह। सब अप-अपणेयाँ भाण्डेयाँ सराह्यी जा करदे। बस इसते उप्पर किछ भी नीं। है ता राम रौळा ही। फिरी भी एह जोड़ना भी जरूरी लग्गा दा भई लोक्काँ जो प्हाड़ी लेखन कनै प्यार होऐं नीं होऐं भासा कनै प्यार  जरूर है। एह इ प्यार तिह्नाँ जो  प्हाड़ी लेखन जो धळोफणे जो भी मजबूर करदा। एह इ प्यास तिह्नाँ जो प्हाड़ी लेखन दे खूह्ये बखी भी घेरी ल्योन्दी। पहाड़ी लेखन दी चील्लाँ देयाँ डाळुआँ झुलाणे दी छवि टुटणा जरूरी है। जाह्ल्लू तिकर एह छवि नीं टुट्टी ताह्ल्लू तिकर लेखन कने पाठक दे रिस्ते एह देह्ये ही रैह्णे हन।
  
4. अगलिया पीढ़िया तक तुसां दी गल-बात किञा पूजदी  
द्विजेंद्र द्विज: अगलिया पीढ़िया तिकर मेरी उवाज ता प्हाड़िया च इ पुजदी। बच्चे प्हाड़ी बोलदे सह्म्झदे । कैंह जे तिह्नाँ दी मा  प्हाड़िया च तिह्नाँ नै गलान्दी। जे सैह भी अपणेयाँ बच्चेयाँ कनैं अपणियाँ भासा च गलाह्न्गे  ता अगलेयाँ भी अप्पूँ चीं तीह्याँ इ गलाणा। 
  
5. तुसां दे स्‍हाबे नै अगली पीढ़ी पहाड़िया जो भासा बणाणे दा ख्‍यो करह्गी कि गीतां सुणदेयां गांह् बधी जांह्गी  
द्विजेंद्र द्विज: असाँ दिया पीढ़िया च मता जोस है, प्हाड़ी बोलिया जो भासा बनाणे दा। मेद ता है अगली पीढ़ी भी एह ख्यो करगी ही। प्हाड़िया च फिल्माँ पैह्ल्लैं नीं बणदियाँ थियाँ, हण बणा दियाँ। बाह्र्लेयाँ मुल्खाँ च रैह्णे आळे लोक अपणिया भासा च फोन्नाँ पर गलाई-बोल्ली सका दे। टेक्नॉलोजी इतनी अडबाँस होई् गेइह्यो जे अपणियाँ भासा दा हर अक्खर सम्हाळी ने रक्खेया जाई सकदा। अगलिया पीढ़िया ते मतियाँ मेद्दाँ हन।   मतेयाँ लखारियाँ जो एह बैह्म  है भई सैह प्हाड़ी भासा जो  बचाणे तियैं लिखा दे, जे सैह नीं लिखगे ता भासा खतम होई याणी, मरी याणी। टटीह्री सोचदी गास तिसा ही थम्मेया। जे सैह नीं होयैं ता गास्सैं टिरी याणाँ है। प्हाड़ी दिलाँ दी भासा है, प्हाड़ी माऊँ दी भासा है, इसा जो खतरा कोई नीं है।   
6. तुसां दे स्‍हाबे नै अज आम जिंदगी जीणे ताईं सिर्फ इक्‍की भासा नै कम चली सकदा कि इक्‍की ते जादा भासां जरूरी हन ?  
द्विजेंद्र द्विज: जानबराँ दी कोई भासा नी हुन्दीजिँदगी सैह भी जीन्दे। माह्णू जितणियाँ भासाँ सिक्खी सकै तितणियाँ घट।  हर भासा दी अप-अपणी बाँक है, अप-अपणा छळैप्पा है, अप-अपणा रस, अप-अपणा तुड़का कनै, सुआद है। अजकणे ग्लोबल ग्रायें च जीणे दा मजा लैणे तियैं, बग्ते दी चाल जो सह्म्झणे तियैं जितणियाँ भासाँ सिखियाँ जाह्न घट हन। इक्की भासा दे खूह्ये दे मीनक बणी नै ता किछ फाइदा है इ नीं। लखारिआँ तियैं ता होर भी जरूरी है, अपणे कैनबसे जो बड्डा करने तियैं भी। जे टैगोर जो अँग्रेजी नीं औन्दी हुन्दी ता गीतांजलि सारिया दुनिया च कीह्याँ पढ़ोणी थी? अज जे सारिया दुनिया दा  लेखन गूगल होई सका दा ता एह इक्की ते जादा भासाँ जाणने दा ही कमाल है। मैं मते सारे अनुवाद अंग्रेजिया ते हिंदिया कनैं  प्हाड़िया च कित्तेयो। मिन्जो लगदा सैह कई ऐसेयाँ  पाठकाँ पढ़े जिह्नाँ सैह लेखन अँग्रेजिया च ता कदी भी नीं पढ़ना था।  
                                        द्विजेंद्र द्विज 

Saturday, December 15, 2018

द लास्ट लैसन



कुछ दिन पैह्लें हाड़ी भाषा दे मूह्रले कवि पीयूष गुलेरी होरां देह छडी ती। तिन्हां दी कवता दी देह असां व्‍हाल है। असां दी पूंजी। नौजुआन कवि दुर्गेश नंदन तिन्‍हां जो याद करा दे। दुर्गेश होरां पैह्लें अपणा संस्‍मरण हिन्‍दिया च लिखया हा। असां दी अर्जी मन्‍नी नै तिन्हां एह पहाड़िया च दुबारा लिखया। तुहां दाेेआ ई रूप पढ़ा। पैह्लें पहाड़ी फिरी हिन्‍दी। कांगड़ा लोक साहित्‍य परिषद दे पासे ते फोटो भी दुर्गेश होरां भेजियां। कवि माधवी शर्मा गुलरी होरां पीयूष जी दे गुलेर आळे पुश्‍तैनी घरे दियां फोटो भेजियां। 



 स्कूले दी बाड़छ (चारदीवारी) तिसजो बन्हीं रखणे च स्मर्थ नी थी। पढ़ने च मन नी लगदा। स्कूलें टैमे पर नीं पुजी पान्दा, कदी कुसी खास बजह ने कने कदी तिसदिया ढिला-मिला ने जाणी-बुझी। सारा मतल़ब एह कि सैह पक्का नस्हाकड़ था बणी गिया। इक दिन तिसदे जीणे च चाणचक बदलाव आया ।
सैः स्कूले पुज्जा ता दिख्या स्कूल रंग-बरंगियां झंडियां ने सजरया-संवरेया था। सारें चहल-पहल थी  तिसजो समझदे देर नी लग्गी जे अज कोई खास प्रोग्राम है, पढ़ाई-सढ़ाई नी होणी। सैह हाले च लगयो डैस्कां पर इक्की पर जाई टिकी गिया।
प्रोग्राम शुरु होया ता तिसजो पता लग्गा अज्ज स्कूले दे भाषा अध्यापक होरां दा विदा समारोह है। नौयें कनूने मताबक जिसा भाषा जो सैह अध्यापक पढ़ांदे थे तिसदे बोलणे आल़ेयां दी गिणतरी तिस प्रांते च नाएं मात्र थी। सरकारा तिस विषय जो बन्द करणे दा फैसला लई लेया था इस करी मास्टर होरां जो कुथी होरथी जाणा था । प्रोग्राम बदीया होया तिसदा मन खूब रमया खीर च तिन्नी मास्टर होरां दा भाषण बड़े ध्याने ने सुणया । तिसजो सुणदे सार तिदे मने च पढ़ाईया कने भाषा दे प्रति बड़ी दिलचस्पी होई गई । तिन्नी सोची लेआ "जे हुण तिन्नी स्कूले ते नी न्हठणा कने खूब पढ़ाई करी तिसा भाषा जो मुड़ी जीन्दा करगा"। मैं एह पाठ जमा दो दे नियाणेयां जो जाहलू पढ़ाया था तां तिन्हां जो समझाया था जे एह जेहड़ा मुण्डुए दा करैक्टर है न, सैः कोई होर नी राइटर अप्पूं ही है सैही अपणी कहाणी सुणादा ।

पीयूष गुलेरी और गौतम व्‍यथित - कांगड़ा लोक साहित्‍य परिषद 
अलफांसो नाएं लेखके दा लिखया एह पाठ 2006 च पढ़ाया था ताहलू स्हाढ़ा स्कूल जमा दो तक चलदा था । प्लस टू दीया कताबा च एह पहला पाठ था नां था "द लास्ट लैसन " । पाठें दू तिन्ना दिनां ते बड़ा भ्रमित करी रखया । पीयूष सरां दे जाणे बाद मते यादगारी लेख पढ़ने जो मिल्ले, मैं भी लिखने जो बड़ा मगज़ मारया बड़ी कोस्त कित्ती पर कुछ नी बणेया । कमजोरी अपणी थी मैं अपणे अध्यापके पर कुछ वि लिखणे च अस्मर्थ रिहा दा था बजह एह कि मैं तिन्हां दिया क्लासा ते अक्सर गायब रैहंदा था । सैह स्हांझो समीक्षा सिद्धांत पढ़ांदे । जितणा क तिन्हां जो सुणया कने याद है सै कुसी वि गल्ला जो पढ़ांदे तिसा जो रोज़के जीणे, समाजे कने जोड़ी ने समझांदे । मिन्जो बड्डे-बड्डे समीक्षकां, विचारकां दा गलाया-लिखया पल्लैं नी पौंदा पर जाहलू सर व्याख्या करदे समझांदे मसाल दई, कहाणी जोड़ी ने सुणांदे ता समझ झट्ट गल्ला पकड़दी । जितणियां क्लासां जां पीरड लायो थे, तितड़ेक नम्बर आई गै । जिह्आं तिह्ंआ थर्ड डवीजने च एम. ए. पास होया । जितणा लखोया था तितड़े ई नम्बर औणे थे कैंह जे सारा ज़ोर तां एंटन चेखव दे "गिरगिट" कने बादल सरकार दे " जनता पागल हो गई है " नाटकां दे अभिनय च लगी रेहा । रही-सही कसर कबतां प्रतियोगितां च हिस्सा लैणे, इनामा बटोल़ने कने अभिनय कला मन्दिर पठानकोट दा मिस्टर ए. के. एम बणने च पूरी होई ।
पढ़ाईया बाद भी पीयूष सर होरां ने मिलणा-जुलना हुण्दा रेहा । फादर साहब दे संगी साथी थे दुएं-चौथें ध्याड़े तिन्हां दी कोई न कोई गल जरुर लगदी, सार एह भई सैह म्हेसा जीणे च रैह ।
सन2012 च अन्ना अंदोलने च 15 दिन दिल्लिया रामलीला मदाने च कट्टी ने घरैं आया ता भ्रष्टाचारे ने लड़ने दी खुमारी चढ़ियो थी पर जाहलू रोज़के जीणे दे भ्यारी पक्खे ने बाह पिया ता बड़ी नरासा होई । मन बाबेयां साधुआं पक्खें गिया , संगता च सूटा मारणा लग्गा । स्कूल छुटी गिया । ढाई साल काहलू निकली गै, पता नि लग्गा । घरे आल़े डाक्टरां बाहल लई गै, दुआईं कने पहरे-पैरविया दा दौर शुरु होया । शुरु च दुआईं वौंजल़ा वि कित्ता पर कुछ टैमे बाद बझोया-मैं ठीक होआ दा । तिन्हां दिना च कालेज दे सहपाठी रेहो संदीप परमार होरां दा फून आया- धर्मशाला धौलाधार होटल च कवि सम्मेलन दी नियुन्दर थी ।
पीयूष गुलेरी, लालचंद प्रार्थी कनै होर कविगण- 
कांगड़ा लोक साहित्‍य परिषद
मतेआं साल्लां बाद कवि सम्मेलने  दी नियुंदर मिल्ली, चाए दा भरोया मैं टैमे ते पहलै तित्थू पुज्जी ने हाल्ले च इक्की कुर्सिया पर टिकी गिया । गौएं-गौएं नियुंदरयो पुज्जणा लग्गे। पीयूष सर वि तिन्हां च इक थे । मंच सजेया, अध्यक्ष कुर्सिया पर डा. अग्नि होरां बराजे । अक्खे-बक्खे ए.डी.एम साहब, पीयूष सर, मैडम रेखा डढवाल, ललित सर होर मते सारे लोक थे ।
परमार इक नसा नवारण संस्था चलांदे, तिसा तरफा था एह कवि सम्मेलन । पधारयो माननीयां नसे पर अपणे-अपणे बचार रक्खे, मैं ऊहंदे सरें सुणदा रेहा । तिसदे परन्त कवि सम्मेलन शुरु होया । मेरा त्रीया-चौथा नम्बर था। जेहड़ी कबता पढ़ने तांई लई गिया था सैः खीहसें रही कने अपणा ही लिख्या बच्चेयां कने फिल्माया गीत, जेहड़ा मिन्जो याद था, तिसजो गाणे-सुणाणे दा मन बणाई अपणीयां बारिया दी भाल़ करना लग्गा । बारी आई पता नि कुत्थू ते हिम्मत आई, मैं बोल्या-कबता ते पहलैं मैं वि कुछ गलाणा चांहदा । कने मैं बोली पिया- हुणी जिस करैक्टरेपर जितणा कुछ बोल्या -गलाया गिया - सैह होर कोई नीं मैं ई आं । मैं इसा मरज़ा दा सकार - अजकल इलाज चलया । मैं बोलदा - बोलदा अटकया ता रेखा मैडम बोले- सच्च बोलेया-अच्छा लगेया । मैं फिरी बोलणा लग्गा, बोलदे बोलदे झिझकया ता पीयूष सर इकदम बोले - सच बोलणे ते डरना नी पुत्तर । अहां सुणा दे । मेरा जिगरा बधया । अपणी गल्ल पूरी किती कने गाणा लग्गा -
सुआद बसदा लूणे च मितरा
बाकी तुड़के छेड़े न
कम्मे दियां हुंदियां हंडियां मितरा
बाकी बेहले गेड़े न ।

सुर सही लगियो थे, गीत बधिया चुकोया-चलया, सबना बधाईयां दितियां, मै बड़ा खुस होया । कार्यक्रमे बाद पीयूष सर मिल्ले-मैं पैर बंदे, सीसां दिन्दे बोले- बधिया गाया,  हां,  सच गलाणे ते डरना नी । तिसते बाद सिद्धबाड़िया, रेडियो स्टेसने पर तिन्हां ने कवता पढ़ने दा मौका मिलया पैर छूते, सीस मिल्ली, मता याद नी ।
जीण फिरी पटरिया पर दौड़ना लग्गा । पीयूष सर फेफबुका पर सुझणा लगे । इसी दुरान पता लग्गा जे सैः लाइलाज मरजा दे सकार होई गियै । हंडणे-फिरने दी समर्थ नी । पर फेसबुका पर सर बड़े सतर्क रैहंदे । जाहलू वि कुसी दीया रचना पर कोई गल्ल जां कोई साहितक चर्चा चलदी तां तिन्हां दा कमैंट पढ़ने जो जरुर मिलदा ।
इत मेरे जीणे च वि बड़ा बदलाव आया । स्कूल बंद करना पेया । कम्म कारे दी जगह बदलोई गई, मैं बुझया-बुझया, नरास रहणा लग्गा । मने च गुब्बार देया रैहंदा, कडणे दी कोस्त करदा पर व्यर्थ -----।

पीयूष जी दा गुलेर आळा पुश्‍तैनी घर - माधवी गुलेरी
इक दिन फेसबुका पर पीयूष सरां इक कवता शेअर कित्ती- "दिल बोला दा उठी खड़ो" । कविता कोई बीह बरी पढ़ी, बड़ी प्रेरक लग्गी । संयोगवश तध्याड़ी लाईबरेरिया च पुराणे फोटुआं दिया एलबमा दिखदयां पीयूष सरां दी जुआनिया दी फोटू मिल्ली, मैं झट्ट मोबाईले च कैद कित्ती कने तिसा कवता दे कमैंट बाक्से च पोस्ट करी ती । तिन्हां झट लिखेया - तैं पुराणियां यादां ताज़ा करीतियां दुर्गेश । फोटो दी कापी मिली जाए तां । मैं सोच्या - समा मिल्लगा ता जरूर पुजांगा ।
मने दी गल्ल मने च रही गई । पता लगेया पीयूष सर नी रैह । तिन्हां दे सुरगवास होणे दिया खबरा ने जितणाक लिखी सकेया, तध्याड़ी लिखेया कने सैः फोटो सारेयां ने शेअर कित्ती । नकाल़े ध्याड़ी स्कूले ते हटया तां फादर होरां तित्थू ते हटी ने नौहा दे थे, सामणे होया ता तिन्हां गलाया-इक बीडियो बणाणा है, टी.वी. आल़ेयां मंगेया-ज़रूर भेजणा है पीयूष होरां बारे -बसोई ने बोहड़ी पर आई जायां ।

बीडियो बणादिया बरि फादर होरां जो गलांदेया सुणेया - "डा. पीयूष गुलेरी इक पूरी कताब रैह । असां जो तिन्हां दा लिखेया पढ़णा चाहिदा कने तिन्हां दे प्हाड़ी-हिमाचली भाषा बाबत सुपणेयां जो जरूर पूरा करना चाहिदा "। तिन्हां देआं इन्हां शब्दां सुणी मिंझो फिरी "टुणक"लग्गी । मैं लाइबरेरिया बखी गिया, कृष्ण गोपाल पीयूष गुलेरी होरां जो कताबां च तल़ोफणा-तोपणा लग्गा । सैः मतियां ठाहरीं मिल्ले अपणीयां गल्लां, सोचां रखदे । इक्की ठाहरी इयां लिखिया-छपेया-तुसां वि पढ़ा -
"इक्क समां था तिन्हां दी बेद्दण जे बें मुच्चां मारी धड़दी
याद तिन्हां दी औंदी जांदी मिंजो बिच्छुआं सांहीं लड़दी ।
हण मंजला पर पुज्जणे आल़ा ,होई चुक्की अगन परीच्छा,
दिक्खा खुशियां मारै मेरे, ताह्यों हत्थ वठोणा लग्गे ।

दिक्खी नोक्खी रंगत शोभा मेरी मैं अज्ज गल़दी जा दी ,
लग्गा दा गंगाजल होया, बर्फ गमां दी घल़दी जा दी ।
औआ हंडा सौगी-सौगी, हस्सा मेरे हास्से कनैं--
मार उडारी गास्सैं पुज्जणा, देए-देए फंग सरोणा लग्गै ।

मतलब---
" इक टैम था जाह्लू संसारी मायारी बेद्दण मिन्जो हर वक्त अपणे पास्सें खिंजदी, ललचांदी कने जाह्लू खाब औंदी ता बिच्छुए सांही डंगदी । पर हुण मैं इसा माया ते पल्ला छुड़ाई चुकेया, मेरी परख परीखेया होई चुक्कियो, मैं अध्यात्मकता च कामयाब होई चुकेया । मेरे सारे हत्थ संसार कम्मा ते पंचाह रही, हटी गियो ।
अध्यात्मकता दी शोभा जो हेरी ने बर्फ सरीखा मेरी तड़ (अहं) घल़ी ने गंगाजल बणदी जा दी । तुसां वि औआ ! मेरे ने सौगी चला, मेरिया इसा अकथ्य खुशिया च साझी बणा "।
सुणया पीयूष होरां जो । मिन्जो ता मते सुणोए !!
डा. गुलेरी होरां जो जाणने ताईं, तिन्हां जो पढ़णा-सुणना -, गुणना, तुसां असां ताई इ नी, औणे आल़िया पीढ़ियां जो वि ज़रूरी है कने तिन्हां जो पढ़णे तांई "माल़ा दे मणके " (हिमाचली-प्हाड़ी काव्य संग्रह) जो पाठ्य पुस्तकां च पुजाणा ज़रूरी है कने तिस तांई हिमाचली भाषा जो संविधाने दीया अठवींया सूची च दर्ज होणा ज़रूरी है - औआ अपणा धरम नभा ।
   

   

पीयूष जी दा गुलेर आळा पुश्‍तैनी घर - माधवी गुलेरी

हिन्दी रूप
स्कूल की चारदीवारी उसे बांध नहीं पाती थी, पढ़ाई मे जी नहीं लगता, स्कूल पंहुचने में कभी परिस्थतियां लेट करवा देती ,कभी वह जानबूझकर लेट हो जाता, कुल मिलाकर सार यही था कि वह "नस्हाकड़" बन चुका था। तभी उसकी जिंदगी में एक नया मोड़ आया।
एक दिन वह स्कूल पंहुचा तो देखा स्कूल को खूब रंग-विरंगी झंडियों से सज़ाया गया था । खूब चहल- पहल थी, सारे बच्चे खुश थे, उसे अन्दाज़ा लगाते देर न लगी कि आज़ कोई खास कार्यक्रम है - पढ़ाई-बढ़ाई नहीं होगी सो वह भी हाल में लगे डैस्कों में से एक पर बैठ गया ।
कार्यक्रम शुरु हुआ तो पता चला कि आज उसके भाषा अध्यापक का विदाई समारोह है । नये नियमोंनुसार जो विषय वह अध्यापक पढ़ाता था उसे बोलने वालों की संख्या उस प्रान्त में नगण्य थी सरकार ने विषय को बंद करने का निर्णय ले लिया था अतः अध्यापक को कहीं और जाना था । खूब कार्यक्रम हुआ लड़के का जी खूब रमा उसने अध्यापक के संबोधन को ध्यान से सुना । संबोधन सुन उसे पढ़ाई के साथ-साथ भाषा में गहरी रुचि हो गई, उसने प्रण लिया कि वह विद्यालय से नहीं भागेगा, खूब पढ़ेगा और एक दिन उस भाषा को पुनर्जीवित करेगा । मैंने यह पाठ प्लस टू के बच्चों को पढ़ाया था तो व्याख्या करते समय उन्हें कहा था कि देखो यह जो लड़के का कैरेक्टर है यह लेखक खुद है वही अपनी कहानी सुना रहा है ।
अलफांसो द्वारा लिखित यह पाठ 2006 में पढ़ाया था तब विद्यालय +2 तक चलता था । उनकी पाठ्यपुस्तक में यह पहला पाठ था नाम था "लास्ट लैसन "। पाठ ने पिछले दो -तीन दिन से बड़ा उद्वेलित कर रखा है। पीयूष सर के जाने के बाद बहुत से संस्मरण पढ़ने को मिले, मैंने खुद बहुतों बार लिखने का प्रयास किया पर असफल रहा, खुद की कमज़ोरी थी मैं एक छात्र के रूप में अपने अध्यापक पर कुछ नहीं लिख पा रहा था कारण मैं कक्षा से अक्सर गायब रहा करता था । वह हमे समीक्षा सिद्धांत पढ़ाया करते थे जितना कि उन्हें सुना था इतना ही स्मरण रह पाया है कि वे किसी भी बात को पढ़ाते-समझाते तो व्याख्या करते समय उसे दैनिक जीवन, समाज़, लोकाचार से अवश्य जोड़ते । मुझे बड़े-बड़े समीक्षकों, मत प्रकट करने वालों का कहा लिखा कुछ समझ नहीं आता पर जब सर व्याख्या करते समय सामाजिक, दैनिक जीवन के उदाहरण देते तो सब समझ आ जाता । जितनी की कक्षाएं लगाई थीं उतने की नम्बर आ गये जैसे-तैसे थर्ड डिवीजन में एम. ए. पास हुआ, जितना लिखा था, इतने की अंक आने थे क्योंकि सारा जोर तो एंटन चेखव के "गिरगिट" और बादल सरकार के "जनता पागल हो गई " नाटकों में अभिनय करने में लगा रहा, रही- सही कसर, कविता प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर और अभिनय कला मंदिर पठानकोट में मिस्टर ए. के.एम बनकर पूरी हुई ।
पढ़ाई पूरी करने के बाद भी पीयूष सर से मिलना-जुलना होता रहा, फादर साहब के संगी थे घर पर हर दूसरे -चौथे दिन उनकी कोई न कोई बात सुनने को मिलती अतः वे हमेशा जीवन में रहे ।
पीयूष जी दा गुलेर आळा पुश्‍तैनी घर - माधवी गुलेरी
2012 में अन्ना आंदोलन में 15 दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में बिताकर घर लौटा तो भ्रष्टाचार से लड़ने का रंग चढ़ा हुआ था परंतु दैनिक जीवन में परिस्थितियों से जब दो-चार हुआ तो निराशा में डूब गया । निराशा बाबाओं की ओर ले गई, मैं सूटा मारने लगा । स्कूल छूट गया दो अढाई साल कब निकले पता न चला । घरवाले पकड़ कर डाक्टर के पास ले गये, दवाइयों, पहरों का दौर शुरु हुआ, शुरु-शुरु में दवाईयों ने खूब बौंझल़ा किया कुछ समय बाद लगने लगा कि मैं ठीक हो रहा हूं । उन्हीं दिनों कालेज़ के सहपाठी रहे संदीप परमार का फोन आ गया -कवि सम्मेलन का न्यौता था धौलाधार होटल धर्मशाला में ।
सालों बाद किसी सम्मेलन का न्यौता आया था चाव भरा मैं दिये समय से पहले ही हाल में पंहुच कर कोने की एक कुर्सी पर धंस गया । धीरे-धीरे सभी लोग पंहुचना शुरु हो गये पीयूष सर भी उनमें एक थे । मंच सजा, अध्यक्ष की कुर्सी पर डा. अग्नि विराजमान हुये, ए.डी.एम. साहब थे प्रत्यूष सर, चंद्ररेखा मैडम, ललित सर बहुत सारे लोग थे ।
परमार एक नशा निवारण संस्था भी चलाते हैं उसी के सहयोग से कवि सम्मेलन हो रहा था । सब माननीयों ने नशे के उपर अपने-अपने विचार रखे, मै सिर झुकाए सबके विचार सुनता रहा । तदोपरांत कवि सम्मेलन शुरु हुआ, मेरा तीसरा या चौथा नम्बर था । जो कविता मैं पढ़ने गया था वो मुझे व्यर्थ सी लगी । अपना लिखा बच्चों के साथ फिल्माया गाना मुझे याद आ रहा था उसी को गाने का निश्चय कर मैं बारी का इंतजार करने लगा । बारी आई मैं खड़ा हुआ, न जाने कहां से हिम्मत आई मैंने कहा -कविता से पहले मैं भी नशे पर कुछ कहना चाहता हूं और बोल पड़ा - कि अभी जिस कैरेक्टर के उपर इतना कुछ कहा गया वो कोई और नहीं, मैं हूं , मैं इस लत का शिकार रहा हूं, आजकल उपचार चल रहा है । मैं बोलते -बोलते अटका तो रेखा मैडम बोल पड़ी -सच बोला अच्छा लगा, मैंने फिर बोलना चाहा, झिझका तो पीयूष सर एकदम से बोले -सच बोल़णे ते डरना नीं पुत्र, अहां सुणा दे- हौंसला बढ़ा, मैंने अपनी बात पूरी की और गा उठा ------

सुआद बसदा लूणे च मित्रा, बाकी तुड़के छेड़े न
कम्मैं दीयां हुंदियां हंडिंयां मित्रा, बाकी बेह़ले गेड़े न ।

सुर अच्छे लग गये थे, गीत बढ़िया हुआ, सबने बधाइयां दीं, मैं खूब आनंदित हुआ । कार्यक्रम समाप्ति उपरांत पीयूष सर मिले, मैंने पैर छुये- आशीष देते उन्होंने कहा - बढ़िया गाया और हां सच बोल़ने ते डरना नीं । उस सम्मेलन के बाद सिद्धबाड़ी में, रेडियो स्टेशन में उनके साथ कविता पढ़ने का मौका मिला, पैर छुये/आशीष मिला, ज्यादा स्मरण नहीं ।
पीयूष जी दा गुलेर आळा पुश्‍तैनी घर - माधवी गुलेरी
जीवन फिर पटरी पर दौड़ने लगा- पीयूष सर फेसबुक पर दिखने शुरु हो गये इसी बीच पता चला वो किसी असाध्य रोग का शिकार हो गये हैं चलने फिरने में अस्मर्थ । पर फेसबुक पर वो काफी सक्रिय रहते । जब भी किसी की रचना पर या दूसरी कोई साहित्यिक चर्चा चलती उनका कमैंट ज़रुर पढ़ने को मिलता । इधर मेरे जीवन में बड़ा बदलाव आया स्कूल बंद करना पड़ा, कार्यक्षेत्र बदल गया, मैं बुझा-बुझा सा रहने लगा, मन में गुबार रहता, मैं निकालने का भरसक प्रयास करता पर ---।
तभी एक दिन पीयूष सर ने फेसबुक पर एक कविता शेअर की- "दिल बोल़ा दा उठी खड़ो" । कविता बीसीयों बार पढ़ी, काफी प्रेरणादायक लगी, संयोगवश उसी दिन लाइव्रेरी में कुछ पुराने फोटू ढूंढ रहा था वहीं पीयूष सर की युवावस्था की फोटो मिली, मैंने झट्ट से उसे मोबाइल में कैद किया और उसी कविता के कमैंट बाक्स में पोस्ट कर दी । तुरंत प्रतिक्रिया आई - तुमने पुरानी यादें ताज़ा करा दीं दुर्गेश, फोटो की एक प्रति मिल जाये तो । मैंने सोचा मौका मिलेगा तो ज़रूर पंहुचाऊंगा ।
बात मन की मन में रह गई, पता चला पीयूष सर नहीं रहे । उनके देहावसान की खबर के साथ जितना लिख सका था उस दिन लिखा और फोटो सबके साथ शेअर की । अंत्येष्टि वाले दिन स्कूल से वापिस लौटा तो फादर साहब वहीं से वापिस लौटकर नहा रहे थे । सामना होते ही उन्होंने कहा- एक वीडियो बनाना है, टी.वी. पर भेजना है पीयूष जी के उपर, तुम जल्दी काम निबटाकर उपर आ जाओ ।
वीडियो बनाते वक्त फादर साहब को कहते सुना - "डा. पीयूष गुलेरी एक संपूर्ण किताब रहे ........ हमें उनके भाषा को लेकर जीये गये अधूरे सपनों को पूरा करने का बीड़ा उठाना चाहिए" । उनका वक्तव्य सुनकर मुझे फिर टुणक लगी, मैं लाईब्रेरी की ओर मुड़ गया, कृष्ण गोपाल पीयूष गुलेरी को किताबों में ढूंढने लगा । वे कई जगह मिले अपनी बात कहते-रखते । अकादमी द्वारा संपादित पुस्तक "माला के मणके " में, पढ़िये- सोचिए ,वे क्या कह रहे हैं --–- ------
इक्क समां था तिन्हां दी बेद्दण जे़बें मुच्चा मारी धड़दी
याद तिन्हां दी औंदी जांदी, मिंजो बिच्छुआं सांहीं लड़दी
हण मंज़ला पर पुज्जणे आल़ा, होई चुक्की अगन परीच्छा

दिक्खा खुशियां मारै मेरे, ताहयों हत्थ वतोणा लग्गै ।
दिक्खी नोक्खी रंगत शोभा मेरी मैं अज्ज गल़दी जा दी
लग्गा दा गंगाजल होया, बर्फ गमां दी घलदी जा दी
औआ हंडा सौगी-सौगी, हस्सा मेरे हास्से कन्नैं---

मार उडारी गास्सैं पुजणा, देए- देए फंग सरोणा लग्गै ।
अर्थात ---
"एक समय था जब संसारिक माया की वेदना मुझे खंरोच रही थी और याद आते मुझे बिच्छू के डंक की भान्ति पीड़ित करती थी । परंतु अब मैं इस माया से किनारा कर चुका हूं । मेरी परीक्षा हो चुकी है , मैं अध्यात्मिकता में सफल हो गया हूं । सभी मेरे हाथ दुनियादारी के कामों से पीछे रह गये हैं ।
अध्यात्मिकता की शोभा को देखकर बर्फ रुपी मेरी अहं भावना क्षीण होती जा रही है । मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरे ह्रदय में गम रूपी बर्फ पिघलकर गंगाजल बनता जा रहा है । आप लोग भी आएं और मेरे साथ चलें और मेरी प्रसन्नता में भाग लें "।
सुनाई दिये पीयूष, भई मुझे तो खूब सुनाई दिये ।

डा. कृष्ण गोपाल पीयूष गुलेरी को जानने के लिये उन्हें पढ़ना - सुनना ज़रुरी है हमारे -आपके लिए ही नहीं, आने वाली पीढियों को भी । और इन्हें पढ़ने के लिये इन "माला के मणकों " (हिमाचली-प्हाड़ी काव्य संग्रह) का पाठ्यपुस्तकों में संपादित होकर विद्यार्थियों तक पंहुचना ज़रूरी है और इसके लिए हिमाचली भाषा को आठवीं सूची में दर्ज करवाना समय की मांग है -आईये सार्थक प्रयास करें ।
दुर्गेश नंदन