पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Wednesday, May 6, 2026

मुंबई डायरी - अट्ठ

 


अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त अट्ठ।  

 

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रोजी-रोटी कनै भाषा-बोली

बड़ी पराणी गल्‍ल है। हिमाचल दे शिक्षा मंत्री  नारायण चंद पराशर होरां मुंबई च पहाड़ी गांधी दी स्‍मृति च इक पहाड़ी कवि सम्‍मेलन कराया था।  इक्‍की सभा च इस सम्‍मेलन दी गल्‍ल निकळी कनैं हिमाचल मित्र मंडल दे प्रधान गजेंद्र कटोच साहब गल्‍ला जो पहाड़ी भासा पर लई गै। हालांकि सैह् पहाड़िया च ही गल करा दे थे पर तिन्‍हां दा सुआल कनैं तंज पहाड़ी भासा पर था। तिनां दा गलाणा था कि पता नी कैंह् असां पहाड़ी भासा-पहाड़ी भासा करदे रैंह्दे। मुयो दिक्‍खा ता सही न इसा दी कोई लिपि है, न स्‍कूलां च इसा दी पढ़ाई होंदी। न कोई कताब मैं दिक्‍खी। उपरे ते दरयाए ऊआरले बोलदे मेरे को दरयाए पारले की भासा नीं ओती है। 

जितणा कि बणी पिया मैं इस सुआले दा जवाब दित्ता। मैं पुच्‍छया, कटोच साह्ब तुसां बोलदे असां राजेयां दे परुआरे ते हन। पराणे जमाने च ता राजयां दे सारे बही खाते पहाड़ी च कनैं टांकरी लिपि च लखोंदे दे थे। असां सैह् लिपि भुलाई ती कनैं हुण असां देवनागरी च पहाड़ी लिखदे। भासा कनै लिपि दो लग चीजां हन। इक भासा कइयां लिपियां च लखोंदी कनैं इक्‍की लिपिया च कई भासां लखोंदियां। जियां मतियां खड्डां दे मिलणे ते इक नदी बणदी तियां ही कइयां बोलियां ते इक भासा बणदी। निजी बैहसां कनैं सभां ते लावा इस सुआले पर मैं हिंदी-पहाड़ी च लेख भी लिखे। मिंजो साही होर भी हन  पहाड़िया दे वकील पर लगदा नीं इक्‍की भी बंदे दी सुई इस सुआले ते गांह बधी होऐ। 

भासा हौआ साही होंदी। जाह्लू  तिकर कोई नक्‍के न बूज्‍जै इसा दे होणे दा पता ही नीं लगदा। इस ताईं अपणिया सूइया जो ही गांह् बधाणे च खैर है। असल च माह्णूए दे जीणे दा सारयां ते बड्डा इक ही मुद्दा है - ढिड्ड भरना। ढिड्डे दी भासा दुइया भासां ताई जगह ही नीं छडदी। हालांकि कोई भी भासा ढिड्ड नी भरदी पर असां इस देसे दे लोग अंगरेजिया जो ढिड्डे दी भासा ही नीं बल्कि ज्ञान कनैं सत्‍ता दी भासा बी मनदे कनैं इसा नै प्‍यार करदे। अपणियां भासां जो गरांचड़ कनैं पिछड़िया समझी गलाणे च भी शर्म महसूस करदे। जिन्‍हां दा प्यार असां दियां अपणियाँ भासा हन तिन्‍हां दा बी रिश्ता कनैं ब्याह अंगरेजिया नै होया। हुण इस अवैध प्यारे जो जीणा मुस्कल है। बस कूणा बही नैं रोई ही सकदे।    

ढिड्ड ता मुनिया साही बैह्ला बदनाम है। इक बहाना है, सब मनै दी डुआरियां हन। लोग सूने साही जमीनां छड्डी बदेसां च मजदूरी करी खुश हन। हुण हिमाचली मुंडू मुंबई ढिड्ड भरना आए थे या सुपनयां पूरा करना। सुपनयां कनैं भी मुश्‍कल एह है कि ढिड्ड भरोया होअे तांही सुपने दिक्‍खी होंदे। इक सोच ऐह् बी है कि मुंबई च असां दी पैह्ली पीढ़ी कराची, लहौर-अंबरसरे दे पंजाबी बपारियां सौगी रसोइया बणी तिन्‍हां कनैं अपणे ढिड्ड भरना आई थी।     

मेरे ग्रां लाटे ते बी सारयां ते पैह्ले सुखानंद कनैं हरिभगत दो बुजुर्ग अजादिया ते पैह्लें ही बाया लहौर मुंबई च मिल मालकां दे रसोइए बणी ने पूजी चुक्‍कयो थे। इस ते बाद मेरे ताऊ अमरनाथ होरां ते प्‍चांह मेरे पिता होरां साही टैक्‍सी-डरैबरां दी लंघीर बध दी गई। मेरे पिता ब्‍हाल डरैबरां कनैं खानसामयां दुईं दे किस्‍से होंदे थे। मेरे पिता सौगी दीनानाथ जी टैक्सियां धोई डरैबरी सिक्‍खा दे थे। तिन्‍हां दे पिता कुसी सेठे दे घरें रसौइए थे कनैं सैह् इन्‍हां ताईं भी खाणा लई ओंदे थे। इक रोज मेरे पिता होंरा सैह् औंदे दिक्‍खी ले कनैं दीनाना‍थ जी जो छेड़ने ताईं पुच्‍छया। दीना नाथ खाणा खाई लिया। दीनानाथ होरां लापरवाही च जवाब दिता। मेरा खानसामा लेकर आ र‍हा है और हम खाणा खाणे के बाद केळा भी खाएगा। दीनानाथ जी दे पिता होरां एह् सुणी लिया। तिन्‍हां गुस्‍से च खाणे दे डब्‍बे दी चोट चळे च र्दई ती कनैं शुरु होई गै। खाएगा बाबा जी का। अज से खाणा लाणा बंद। 

एह् 1978 दी गल्‍ल है। दसियां ते बाद मैं टाइपिंग सिक्‍खी नौकरी तोपा दा था। मेरे इक्की पड़ेसिए दिया कंपणिया च इक नौकरी थी। तिनी मेरी एप्‍लीकेसन लाई ती। जादा नीं दो-चार ही लोक थे। मेरा टेस्‍ट, इंटरव्‍यू सब ठीक-ठाक होया। मनैजरें मिंजो अपणे केबिने च सद्दी नै बधाई दिती कनैं बैठणे जो गलाया। मेरे बैठ्यो-बैठ्यो ही कुछ लोकां आई ने मनेजर घेरी लिया। सैह् सारे अपणे ग्रांए दिआ इक्‍की कुड़िया जो एह् नौकरी दुआणा चाह्ंदे थे। आखर च मनेजरें तिसा कुड़िया जो नौकरी देई नैं मिंजो ते माफी मंगी लई। जगह मुंबई थी पर सैह् लोक मराठी नीं थे। सैह् मेरा बड़ा मुश्‍कल वग्‍त था। मैं दुखी, निराश होई नै बड़ी देरा तक सड़कां पर भटकदा रिह्या। 

कुसी जो कुत्‍थी भी बगैर भेदभाव ते रोजी-रोटी कमाणे कनै बसणे दी अजादी होणा चाई दी। एह् बड़ी बड्डी  तरक्‍की पसंद,  सोच है। क्‍या असल च एह् होई सकदा? जे दुयां प्रांता ते आई नै लोक एह् करा दे ता अपणी जगहां कनैं भासां ताईं लड़ने वाळयां महाराष्‍ट्र दे स्‍थानीय लोकां दी सोच किह्यां गलत होई सकदी। 

असल च इन्‍हां परिस्थितियां दे कारण ही बाला साह्ब ठा‍करे होरां दे आंदोलन जो मुंबई च जनसमर्थन मिल्‍ला। इस आंदोलन कनैं मिल्लियां नोकरियां दे बलबूते पर 1960 ते 1990 औणे तिकर हासिए पर रैह्णे आळे मराठी समाजे च इक नौंआ संप्‍पन्‍न, पढ़या-लिखया मध्‍य वर्ग आकार लई चुक्‍कया था। इसा सफलता दिया पूंजिया पर ही ठाकरे साह्ब दी पार्टिया दी बादशाहत अज्‍जे तिकर चल्ला दी।

जित्‍थू तिकर हिमाचलियां पर इस आदोंलन दे असर दी गल है, असां मुंबई च टैक्सियां साह्यी अपण्‍यां कम्मां कनैं बपारां च थे। नौकरियां च असां दी कोई खास हिस्‍सेदारी नी है। नां ही असां दी ऐसी कोई बड्डी संख्‍या है, जेह्ड़ी कुसी जो चुभै।  

बैसे दिक्‍खया जाए ता इक छोटी देई नौकरी कनै  मजदूरी करने ताईं अपणा घरबार, जमीन छड्डी परदेसी जगहा च आई नै बसणा सौखा कम्‍म नीं है। जितणी की कमाई होंदी तिसा च रोटी ता मिली जांदी पर छत नीं मिलदी। सेठां देआं मैह्लां कनैं कारखानयां दे अक्‍खे-बक्‍खें झु‍ग्गियां दे नरक बसदे। दो दिन पैह्लें हांगकांग दे कॉफिन घरां दा वीडियो दिक्‍खी नैं रुह कंबी गई। इन्‍हां नरकां बगैर मजदूर ता ग्रां च रोटी खाई सकदे पर सेठां कनैं सरकारां दे कम्‍म कनैं बपार-कारखाने नीं चली सकदे। इस सारे कारोबार च फायदा शोषण करने वाळयां पूंजी‍पतियां दा ही होंदा। अंगरेज कोई मूरख नीं थे। गन्नयां दी खेती कनैं खंडा देआं कारखानयां ताईं जहाजां च भरी नैं मजदूर लई जांदे थे। हुण ता असां अप्‍पू ही डंकी की डोंकी बतां च समाने साही लदोई पूजी जा दे।

 


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रोजी-रोटी और भाषा-बोली

बहुत पुरानी बात है। हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन  शिक्षा मंत्री नारायण चंद्र पराशर जी ने मुंबई में पहाड़ी गांधी की स्मृति में एक पहाड़ी कवि सम्मेलन कराया था। एक सभा में उस सम्मेलन की बात निकली और हिमाचल मित्र मंडल के प्रधान श्री गजेंद्र सिंह कटोच जी बात को पहाड़ी भाषा पर लेकर चले गए। हालांकि वे पहाड़ी में ही बात कर रहे थे पर उनका सवाल और व्यंग्य दोनों पहाड़ी भाषा पर थे। उनका कहना था कि पता नहीं क्यों हम पहाड़ी-पहाड़ी करते रहते हैं। न इस भाषा की कोई लिपि है, ना स्कूल में पढ़ाई जाती है, न इसकी कोई किताब मैंने देखी है। नदी के इस पार का बंदा बोलता है कि मुझे उस पार वालों की भाषा नहीं आती है। 

जितना मुझ से बन पड़ा मैंने इस सवाल का जवाब दिया। मैंने पूछा कटोच साहब, आप लोग खुद को राज परिवार का बताते हैं। पुराने जमाने में राजाओं के सारे वही खाते पहाड़ी और टांकरी लिपि में लिखे जाते थे। अब हम लोगों ने वह लिपि भुला दी है और देवनागरी में पहाड़ी लिख रहे हैं। भाषा और लिपि दो अलग वस्तुएं हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जाती है और एक लिपि में कई भाषाएं लिखी जाती हैं। जिस तरह कई छोटी नदियों के मिलने से एक बड़ी नदी बनती है, उसी तरह कई बोलिया से एक भाषा बनती है। निजी बहसों और सभाओं के अलावा इस सवाल पर मैंने हिंदी और पहाड़ी में लेख भी लिखे हैं। मेरी तरह और भी पहाड़ी भाषा के वकील हैं पर लगता नहीं है कि एक भी बंदे की सुई इस सवाल से आगे बड़ी हो। 

भाषा हवा की तरह होती है। जब तक कोई नाक न दबाए इसके होने का पता ही नहीं चलता है। असल में इंसान के जीने का सबसे बड़ा एक ही मुद्दा है पेट भरना। पेट भरने की भाषा दूसरी सारी भाषाओं के लिए जगह ही नहीं छोड़ती है। हालांकि कोई भी भाषा पेट नहीं भर सकती है पर हमारे देश के लोग अंग्रेजी को पेट की ही नहीं बल्कि ज्ञान, ताकत और सत्‍ता की भी भाषा मानते हैं।  वे इसे प्यार करते हैं और इसकी पूजा करते हैं। अपनी भाषाओं को पिछड़ी और ग्रामीण मानते हैं। 

पेट तो मुन्नी की तरह बेवजह बदनाम है। एक बहाना है सब मन की उड़ाने हैं। लोग सोने जैसी कीमती जमीन छोड़कर विदेश में मजदूरी करके खुश हैं। अब हिमाचली युवा मुंबई में पेट भरने आए थे या सपने पूरे करने? सपनों के साथ एक मुश्किल होती है कि पेट भरा हो तभी सपने देखे जा सकते हैं। एक सोच यह भी है कि मुंबई में हमारी पहली पीढ़ी कराची, लाहौर और अमृतसर  के व्यापारियों के साथ रसोईया बनकर उनके और अपने पेट भरने आई थी।  

मेरे गांव लाहट से भी सबसे पहले सुखानंद और हरी भक्त दो बुजुर्ग आजादी के पहले ही वाया लाहौर मुंबई में मिल मालिकों के रसोइये बनकर पहुंच चुके थे। इसके बाद मेरे ताया अमरनाथ जी के पीछे मेरे पिताजी जैसे टैक्सी ड्राइवरों की कतार सी लग गई। मेरे पिताजी के पास टैक्सी-ड्राइवरों के साथ-साथ रसोइयों के भी किस्‍से होते थे। मेरे पिता के साथ दीनानाथ जी भी ड्राइविंग सीख रहे थे। उनके पिता किसी सेठ के घर खाना बनाने का काम करते थे और वह इनके लिए भी खाना लेकर आते थे। एक रोज मेरे पिताजी ने उन्हें आते हुए देख लिया और दीनानाथ जी को छेड़ते हुए पूछा भाई दीनानाथ खाना खा लिया? दीनानाथ जी ने लापरवाही में जवाब दिया। मेरा खानसामा लेकर आ रहा है और हम खाना खाने के बाद केला भी खाएगा। दीनानाथ जी के पिताजी ने यह सब सुन लिया। उन्होंने गुस्से में खाने के डब्बे को जोर से पटका और शुरू हो गए। खाएगा बाबा जी का। आज से तेरा खाना बंद। 

यह 1978 की बात है। दसवीं के बाद में टाइपिंग सीख कर नौकरी ढूंढ़ रहा था। मेरे एक पड़ोसी की कंपनी में एक नौकरी निकली थी। उसने उस पद के लिए मेरा आवेदन कंपनी में लगा दिया। ज्यादा नहीं दो-चार ही लोग थे। मेरा टेस्ट इंटरव्यू सब ठीक-ठाक हो गया। मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुलाकर बधाई दी और बैठने के लिए कहा। मेरे बैठे-बैठे ही कुछ लोगों ने आकर मैनेजर को घेर लिया। वे अपने गांव की एक लड़की को यह नौकरी दिलाना चाहते थे। आखिर में मैनेजर ने उस लड़की को नौकरी देकर मुझसे माफी मांग ली। जगह मुंबई थी पर वे लोग मराठी नहीं थे। वह मेरा बड़ा मुश्किल वक्त था। मैं दुखी निराश होकर बड़ी देर तक सड़कों पर भटकता रहा। 

किसी को कहीं भी बिना किसी भेदभाव से रोजी-रोटी कमाने और बसने की आजादी होनी चाहिए। यह एक बड़ी ही तरक्की पसंद सोच है। क्या असल में यह हो सकता है? यदि दूसरे प्रांत से आए लोग यह सब कर रहे हैं तो अपनी जगह और अपनी भाषा के लिए लड़ने वाले स्थानीय महाराष्ट्र के लोगों की सोच कैसे गलत हो सकती है।

असल में इन परिस्थितियों के कारण ही बाला साहेब ठाकरे के आंदोलन को मुंबई में इतना भारी  जनसमर्थन मिल सका। इस आंदोलन के कारण मिली नौकरियों के बलबूते पर 1960 से 1990 आने तक हाशिए पर रहने वाले मराठी समाज में एक नया संपन्न पढ़ा लिखा मध्य वर्ग आकार ले चुका था। इस सफलता की पूंजी पर ही ठाकरे साहब की पार्टी की बादशाहत आज तक चल रही है। 

जहां तक हिमाचलियों पर इस आंदोलन के असर की बात है, हम मुंबई में टैक्सी जैसे अपने कामों और व्यापारों में थे। नौकरियों में हमारी कोई खास हिस्सेदारी नहीं थी। न हमारी ऐसी कोई बड़ी संख्या है जो किसी को चुभ सके। 

वैसे देखा जाए तो एक छोटी सी नौकरी और मजदूरी करने के लिए अपना घर-बार जमीन छोड़कर परदेसी जगह में जाकर बसना कोई आसान काम नहीं है। जितनी कमाई होती है, उसमें रोटी तो मिल जाती है पर छत नहीं मिल पाती है। हमारे सभी शहरों में सेठों के महलों और कारखानों के अगल-बगल में झुग्गियों के नर्क बसते हैं। दो दिन पहले हांगकांग के कॉफिन घरों का वीडियो देखकर रूह कांप गई। इन नरकों के बिना मजदूर तो गांव में रोटी खा सकते हैं पर मालिकों और सरकारों के काम और व्यापार कारखाने नहीं चल सकते हैं। इस सारे कारोबार का फायदा शोषण करने वाले पूंजीपति व्यापारियों को ही होता है। अंग्रेज कोई मूर्ख नहीं थे, जो गन्नों की खेती और शक्कर के कारखाने के लिए जहाज में भरकर मजदूर ले जाते थे। अब तो हम अपने आप ही डंकी या डोंकी मार्ग से सामान लेकर खुद ही पहुंच जा रहे हैं।

ऊपर दिए गए चित्र जानी मानी चित्रकार निर्मला सिंह के हैं। पहली कृृृति का शीर्षक है होप और दूसरी का कन्ट्रास्ट। 28 अप्रैल से 4 मई तक निर्मला जी के चित्रों की प्रदर्शनी मुंबई स्थित जहांगीर आर्ट गैलरी में लगी थी और खूूब सराही गई थी। हमें भी इस प्रदर्शनी को देखने का अवसर मिला। यहां ये चित्र उनके कैटलॉग से साभार लिए गए हैं। बगल के चित्र में खड़े हैं बाएं से - जुवी सिंह, जयशंकर, ओमा शर्मा, निर्मला सिंह, सुमनिका सेठी और अनूप सेठी। 


मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।


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