पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Saturday, March 21, 2020

गुआची गिया कुत्‍थु मेरा ग्रां

गुआचओ ग्रांए दे घरे दा दुआर
एह् कवता वागड़ी बोलिया च हेमंत भट्ट होरां लिखियो है। एह राजस्थान दे डूंगरगढ़ कनै बांसवाड़ा जिलेयां दी बोली है। बोली है ता नाएं जो ई, मतियां बोलियां साही एह भी हुण थी ही समझा। हेमंत होरां दे साह्मणै अपणी मा बोली वागड़ी दा नां औंदा ता वचपन साह्मणै खड़ोई जांदा। कुछ साल पैह्लें इन्हां अपणे ग्रांए पर लिखियो इसा कवता दा जिक्र कीता था। असां जो लगेया, माऊ मासियां दियां धियां दे सुर मिली जाणे। सिद्धे वागड़िया ते हिमाचलिया च अनुवाद करना असां ताईं मुस्कल था। असां भट्ट होरां जो अर्ज कीती, इसा कवता हिन्दिया च भी लिक्खा। कवि अप्पू दूं: भासां च लिखदा ता सैह् अनुवाद नीं हुंदा कवि अपणे स्हाबे नै दुबरा ई लिखदा। हिन्दिया ते कुशल कुमार होरां अनुवाद कीता। सैह् भी कवि हन। मतलब एह् भई इन्हां तिन्नां ई रूपां च थोड़ा बौह्त फर्क है। सिरजणे दा एही ता मजा है। तार जुड़ी भी रैह्ंदे कनै जुदे जुदे भी रैह्ंदे। तुसां पढ़ी नै दिक्खा।


वागड़ी बोलिया दे बारे जादा जानकारी नीं मिलदी। मजेदार गल्ल है कनै । असां इनां बब्एयां च बड़े भंगळोई रैंह्दे। जित्थी लगणा, तित्थी लांदे कनै जित्थी लगणा तिम्थी लांदे। आळी वागड़ी राजस्थन च गुजरात आळे पासें है कनैं इक्क बोली होर है तिसा दा नां है बागड़ी। सैह् राजस्थान ते हरियाणे आळे पासें है। खास करी नै सिरसा जिले बह्ल। 

डूंगरपुरे दिया हवेलिया दिया दुआला पर बणेया चित्तर 
यह हेमंत भट्ट की मूल वागड़ी बोली की कविता है। वागड़ी डूंगरपुर और बांसवाड़ा जिले की बोली। हेमंत भट्ट के बचपन की बोली – मादरी ज़ुबान। वे अपने बचपन को अपनी बोली में तलाश करते हैं। जैसे संगी-साथी, माता-पिता चले गए, रोजी रोटी की तलाश में पुश्तैनी घर पीछे छूट गए, गलियां गुम हो गईं, उन्हें फिर से जीने की ललक कवि को अपनी बोली की शरण में ले जाती है। बोली जो खुद परिवर्तन के थपेड़ों को सहन नहीं कर पा रही है। हमें लगा वागड़ी और हिमाचली की जुगलबंदी जमेगी। छीजती हुई बोलियों की संगत कराने के इरादे से हेमंत जी को अनुरोध किया कि इसे हिन्दी में भी लिखें। हिन्दी से कशल कुमार जी ने इसे हिमाचली बाना पहनाया। मजेदार बात है कि तीनों आपस में जुड़ी हुई हैं, इनकी गर्भनाल एक ही है, पर तीनों स्वतंत्र हैं। हेमंत और कुशल दोनों ने अपने हिसाब से रचनात्मक छूट ली है। अब आप देखिए यह उपक्रम कैसा है।  
मंदरेे दिया दुआलां पर सीसे दा जड़ाऊ कम्म   

00   गुआची गिया कुथू मेरा ग्रां 

शैैह्रे दिया इसा दौड़-धुप्पा च
गुआची गिया कुत्‍थु मेरा ग्रां,
तोपी तोपी थकी ईया मन मेरा,
पर मिला नीं मिंजो मेरा ग्रां।
कुत्थी ता  मिलगी कोई ठंडी छां।
सैह ठंडियां ठंडियां हौआं
सैह दिआळिया दे जगमग दिए
सैह होळिया जो मस्तेयो छोह्रू;
त्हारां पर बह्रदे
बुजुर्गों दे शीर्वाद,
अज औआ दे मिंजो खूब याद।
बाणे दियां रस्सियां दे गीत,
माऊ साही गाई लोरीयां सुआंदी थी मिंजो मंजी,
पणिहारिया च वाट मेरी झूरदा,
धरयाह्या देह्या बैठया घड़ा,
कतांह गै सैह सब, कुसजो पुछें?
परलोक सिधारयो अम्मा-बापुए जो!
शैह्रे दिया दौड़-धुप्पा च
गुआची गिया कुत्‍थु मेरा ग्रां !!
वाट दिखी दिखी
रोई रोई थकी गइयाँ
गळियां मेरे ग्रांये दियां
कोई ता औऐ शैह्रे ते हुण!
मन बचारा रंडुआ,
यादां बचपने दियां छातिया पिट्टा दियां,
घरे तिकर औंदी सड़क चुपचाप,
देखी मिंजो झूंडे च लुकणा लगी,
अड़ेसे-पड़ेसे दियां नशाणीयां,
खड्डा दिया रेता  साही मने ते मटोणा लगियां;
घरे दिया ड्योडिया दे टुटदे दुराजे,
लह्गन जियां छड़कोया कारंगा,
किल्‍ह्णां लगा देखी नें मिंजो।
कदी होंदे थे खुशियां नैं भरोयो अंगण,
वारां-तुहारां च गोहा-गारा लिपदी,
थकी़ नैं भी कद़ी नीं थकी मेरी मा,
भ्‍यागा पैह्र सबेला ही निकळी जांदी थी,
गोटुआं-लकड़ुआं  चुगणा
कन्‍नै देखी नें तिसां जो
हासी पौंदा था इक अध म्याळू,
तां भी सैह बड़े प्यारे नें
असां जो खुआंदी छल्लियां दी रोटी-खौह्रू
पच्छैण मेरी गुआची गई
हाँ! भुली देह्या गिया मिंजो मेरा घर,
शैह्रे दिया दौड़-धुपा च
गुआची गिया कुथु मेरा ग्रां।
ओढी ने धूड़ा दी चादर,
मग्न सुतया  घरैं लगया जंदरा
जगाया ता,
घरे दे दरवाजे जागी गै;
अंदर चूहेयां-कनाकडि़यां दा
चला दा था लुक-लकाईया दा खेल।
जित्‍थु कदी मेरी माँ,
रामे दा नां जपदी थी,
दूएं पासें चूल्हे च,
लकड़ुआं गोटुंआ दी अग्गी च तपदी थी।
सूरजे दिया पैह्लिया किरणां कन्‍नै,
अंगणे च नचदी,
हसदी, कूकदी, गांदी 
मिठड़े गीत,
चिड़ियां-घटारियां, तोता, मैना;
पूंछा लेह्ळी करदे सुआगत,
दरेह्ळी पर बैठी,
मेरे घरे टबरे साही बचारी कुत्‍ती,
बड़े चाये नें खांदी इक अध रोटी;
सुआड़ुए च खड़ोतया,
हरया-भरया नीमे दा रुख,
कोई भी ता नीं है, कतांह गै सारे !!
शैह्रे दिया दौड़-धुप्पा च
गुआची गिया कुत्‍थु मेरा ग्रां !!

पैह्नी नाड़े वाळे कच्‍छे
खेलदे थे असां मितरां कन्‍ने कबड्डी,
गुल्ली-डंडा होऐ या नाटक,
मता खेलदे थे!
हुण ता मिंजो भुली देह्या गिया मेरा ग्रां,
शैह्रे दिया दौड़-धुप्‍पा च
गुआची गिया कुथु मेरा ग्रां !!
सैह् तारयां दी गिण्‍ती,
हुंदी थी बाळां दिया गिणतिया साही,
माऊ दे हत्‍थां ने बणाईया खिंदा च,
भाउआं कन्‍नै ओंदी थी निंदर मजेदार।
कुत्‍थु गै सैह भाऊ,
घुळी पौंदे थे काह्लकी
चणोई नीं जान दुआंला प्‍यारे बिच,
इस ताईं हन अज चुप,
टुटियां भज्जियां फिरी भी खड़ोतियां। 
सैह जश्न, सैह तारा मंडळ रातां,
बैलगडिया च बही नें चलदियां थियां जन्‍नेतीं,
ढ़ोल-ढमाके, गाजे-बाजे,
लाड़े वाळे इकी दिने दे राजे-महाराजे,
कुत्‍थी गई सैह आन कन्‍ने शान,
शैह्रे दिया दौड़-धुप्‍पा च
गुआची गिया कुत्‍थु मेरा ग्रां !!
ए शैह्र तू ओंदा कैंह् नीं मेरे ग्रां
मिंजो दस ता सही, कुथु गुआची गिया मेरा ग्रां।

मंदरे च बणयो चित्तर 


 00   कै खोवाई ग्यु मारू गाम

आ शेर नी दौड़ धाम मी
कै खोवाई ग्यु मारू गाम
हुदी हुदी ने थाकयु मन मारू
पण नी मलयु गाम मारू ।
ई मिटा मिटा वायराओ
ई दिवाली ना अजवारिया मेरिया
ई होली ना खुमारी भरया गेरिया;
डूआ डूइयो ना आशीर्वाद,
आवया मने घणा याद।
नवार ना संगीत मी
आखी रातर गातु हाला मारू खाटलु
पणियारा मी मारी वाट जोतु
तरसयु ए माटलु,
कै ग्या, कैने पूसू ?
बाई ने बापुजी तो ग्या परलोक जात्रा,
शेर नी दौड़धाम मी
कै खोवाई ग्यु मारू गाम।
गरियो ए गाम नी,
रूई रूई ने थाकी,
कोई तो आवे शेर थकी
वाट ए जूती हती ।
मन बापडु लागे के रंडायु,
नानपण नी अरु आवी साती कूटवा,
रसताओ घर हुदी ना सूमसाम,
लास काढ़ी ने हंताया मने जोई,
आड़ोसी पाड़ोसी नी तो कोई निशानी,
नदी नी रेत जेम मन थकी सरकवा लागी;
खड़की ना भागेला टूटेला बाण्णाओ
जाणे हुकाई ने थई ग्या लाकड़ू,
हंसी-खुशी थी भरेला आंगणाओ,
थाकी ने पण कारे भी न थाकी बाई मारी,
वार तेवारे गार-साण थकी लीपती,
हवार पड़ी ने साणा-लाकड़ा वीणती
तण तण गुणिया माते मिली पाणी लावती,
एने जोई दाँत काड्तु उंबाडीयू
तोय  खवडावती खाटू ने मकीना रोटला
बाई मारी।
कोई तो उरके मने
हौवे, विसरी ग्यु मने मारू घर
शेर नी दौड़-धाम मी
कै खोवाई ग्यु मारू गाम।
उडी ने धुरा नी सादर
भर नीदर मी हुतु घर नु तारु
जगाड्यू इनी तो
घर नां बाण्णा जागी उठया
हंता कूकड़ी खेलतू ,
उंदरा-गरोड़ियों नो टूरु,
जे जगाए
पूजा-पाठ करती थी बाई मारी;
पिली एडी सूला मीं,
लाकड़ा-साणा नी लाय मीं हींकाती।

सूरज दादा ने आवाता नी हाते
आंगणा मी नासती
दाँत काढ़ी ने गाती सकलिए
पोपट ने काबेरे,
वाडा मी अडिग उबो
आशीर्वाद आलतो लीमड़ो
रोटला नी वाट जोती
पूंसड़ी हलावी डेरी पर बेठी
मारा घर-परिवार नी
बापड़ी ए कूतरी
कोई तो नती, कै ग्या सब
शेर नी दौड़-धाम मी
कै खोवाई ग्यु मारू गाम।
पेरी ने बटन वगर नी सड्डी
सूरा रमे कबड्डी;
गिल्ली-डंडा ने भवई,
संता हती नी कईं।
बाई ने हाते हीवेली सूतरा नी गुदड़ी मी,
तारा गणता गणता कारे,
भाइयो हाती आवती मिटी मिटी नींदर,
ए भाई कारे रसतो भूली ग्या,
जे लड़ी पड़ता हामरी ने घर मी पाड़वा भागला,
आजे ए हगपण नी भीते,
भागेली पण मौन अड़ेखम उबी हती। 
ए वर राजा नो लैट वारो तोर्रों
इक दाडा नो राजो,
टासा पुंगी
बरद गाड़ा मी जती जान
कै खोवाई गई आ शान ने आन
आ शेर नी दौड़ धाम मी
कै खोवाई ग्यु मारू गाम।
ए शेर तू आवतू केम नती हाते मारे,
                                   हुदी ने आल रे मुआ मारू ए गाम रे। 


सारियां तस्वीरां इसा कताबा ते
                                   00     खो गया कहाँ मेरा गाँव
इस  शहर की दौड़-धूप में
खो गया कहाँ मेरा गाँव,
थकित मन मेरा ढूँढता,
कहीं तो मिलेगी कोई शीतल छांव।
वे भीगी भीगी हवाएँ
दीवाली के जयोतिमय मेरिए
होली के झूमते मदमस्त गेरिए;
त्योहारों पर बरसते
बुजुर्गों के आशीर्वाद,
आज आ रहे मुझे खूब याद।
जूट की रस्सियों में तनी,
लोरी गुनगुनाती सुलाती मुझे माँ सी  खटिया,
राह मेरी तकता,
पनियारे में प्यासे सा बैठा मटका,
कहाँ गए ये सब, किसे पूछू?
परलोक सिधारे माँ-पिताजी को!
कि  शहर की दौड़ धूप में,
खो गया कहाँ मेरा गाँव!!
रो रो कर थकी अब
गलियाँ वे गाँव की,
राह तकती,
कोई तो आए शहर से अब!
मन बेचारा विधुर,
यादें बचपन की छाती पीटने लगी,
घर तक की सड़कें चुपचाप,
देख मुझे घूँघट में छिपने लगी,
पड़ौसियों की तो कोई निशानी,
नदी की रेत सी मन से मिटने लगी;
घर के मुख्य द्वार के भग्न होते दरवाजे,
जैसे उखड़े हुये कंकाल,
कराहने लगे देख कर मुझे।
कभी होते थे खुशहाली से भरे आँगन,
कभी कभी या त्योहारों में,
थक कर भी ना थकी कभी मेरी माँ,
गोबर-गारे से लीपती थी। 
सूरज की प्रथम किरण के पहले ही,
कंडे-लकड़ी बीनने निकल पड़ती थी
और उसे देख हंस पड़ता था एकाध मुराड़ा,
तो भी खिलाती हमें प्यार से कढ़ी-मक्का की रोटी,
मेरी माँ!!
पहचान मेरी खो गई,
हाँ! भूल सा गया मुझे मेरा घर,
शहर की दौड़-धूप में
खो गया कहाँ मेरा गाँव।
ओढ़ कर धूल की चादर,
शयनमग्न घर पर लगा ताला,
जगाया उसे तो,
घर के किंवाड़ जग उठे;
भीतर चूहे-छिपकलियों के जमे थे लुका छिपी के खेले।
जहां कभी मेरी माँ,
हरि नाम जपती थी,
दूसरी ओर चूल्हे में,
लकड़ी कंडे की आग में तपती थी।
सूरज की प्रथम किरण के संग,
आँगन में नाचती,
हँसती, किलकारती, गाती
मधुर गीत,
गौरैया, तोते और मैना;
पूछ हिला कर करती अभिवादन,
दहलीज पर बैठी,
मेरे घर परिवार सी बेचारी कुतिया,
बड़े चाव से खाती एकाध रोटी;
बाड़े में खड़ा,
हरा-भरा नीम का पेड़,
कोई तो नहीं, कहाँ गए सब !!
शहर की दौड़ धूप में,
खो गया कहाँ मेरा गाँव!!

पहनकर बटन बिना की चड्डी
खेलते थे हम दोस्तों के साथ कबड्डी,
गुल्ली-डंडा हो या नाटक,
खेलते थे खूब!
अब तो मुझे भूल सा गया मेरा गाँव,
शहर की दौड़-धूप में,
खो गया कहाँ मेरा गाँव!!
वो तारों की गिनती,
हुआ करती थी बालों की गिनती सी,
माँ की हाथ से बनाई गुदड़ी में,
भाइयों के संग नींद खूब आ जाती थी।
कहाँ गए वे भाई,
झगड़ पड़ते थे कभी,
न बनाने के लिए स्नेह के बीच दीवारें,
आज मौन,
वे भग्न फिर भी खड़ी थी।
वो जश्न, वो तारों से सजी रातें,
बैलगाड़ी में बैठ चलती थी बारातें,
ढ़ोल-तासे, गाजे-बाजे,
दूल्हे वाले एक दिन के राजे-महाराजे ,
कहाँ गयी वो आन और शान,
इस शहर की दौड़-धूप में,
कहाँ खो गया मेरा गाँव!!
ए शहर चलता क्यों नहीं मेरे गाँव,

मुझे बता तो सही, कहाँ खो गया मेरा गाँव!!




हेमंत भट्ट का गाँव खड़गदा दक्षिणी राजस्थान का एक न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बल्कि अपनी समृद्ध  सांस्कृतिक विरासत और सुदृढ़ धार्मिक और सामाजिक परम्पराओं, निष्ठावान आध्यात्मिक विचारधाराओं और मानवतावादी दृष्टिकोण के कारण सम्पूर्ण राजस्थान में ख्यातिप्राप्त गाँव है। यह गाँव मोरन नदी की गोद में एक शिशु की तरह इस प्रकार से बैठा हुआ है कि इसके मस्तक के दाएँ भाग से बहती हुई यह नदी दाएँ हाथ को स्पर्श करती हुई चरण-स्पर्श करके आगे निकल जाती है। अर्थात् इस गाँव के तीन तरफ़ नदी है। 70 प्रतिशत आबादी ब्राह्मणों की है, 10 प्रतिशत परिवार बनिए, नाई, दर्ज़ी, सुथार और राजपूतों के हैं और 20 प्रतिशत आदिवासी हैं जो अधिकतर नदी के पार खेतों के आसपास रहते हैं।  हेमंत भट्ट ने हायर सेकंडरी तक अपने गाँव खड़गदा में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उच्च शिक्षा अहमदाबाद में प्राप्त की। गुजराती स्कूल में हिंदी अंग्रेज़ी अध्यापक की सेवा देने के बादन्यू इंडिया एश्योरेंस कम्पनी में सहायक के पद पर कुछ समय रहे और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत्त हुए।         

Saturday, November 16, 2019

पंजाबी कविता




उर्दू कनै पंजाबी दे कवि मनीर नियाज़ी होरां दी 
इक पंजाबी कविता दा पहाड़िया, हिन्दिया कनैं अंगरेजिया च अनुवाद दा नंद लेया। 
अनुवाद असांं दे प्‍यारे कवि कनै पत्रकार नवनीत शर्मा होरां कीतेयो। 
गुरुमुखी लिपि च मूल कविता भी पेश है।


...................
कांगड़ी
...................

क्‍लोकणी गल

कल बैठी की सोचा दा था
गल कोई बितेयो बेले दी
अपणे ग्रांए दे पिपले थल्‍लैं
छोटिया ईदा दे मेले दी
मैं जेहड़ा मसहूर है इतणा
मने दे भेद लकाह्णे बिच
गमे दी तिक्‍खी चींड लकाह्ई
बाहरैं हसदेयां जाणे बिच
तिस्‍सी पराणे ध्‍याडे़ अंदरैं
याद करी इक मौके जो
लाई जोर नी रोकी सकेया
अपणे दिले दे हौके जो

...................
ਪੰਜਾਬੀ
...................


ਕੱਲ ਦੀ ਗੱਲ

ਕੱਲ ਬੈਠਾ ਕੁਝ ਸੋਚ ਰਿਹਾ ਸਾਂ
ਗੱਲ ਇੱਕ ਗੁੱਜਰੇ ਵੇਲੇ ਦੀ
ਆਪਣੇ ਪਿੰਡ ਦੇ ਪਿੱਪਲਾਂ ਹੇਠਾਂ
ਛੋਟੀ ਈਦ ਦੇ ਮੇਲੇ ਦੀ
ਮੈਂ ਜੇਹੜਾ ਮਸ਼ਹੂਰ ਹਾਂ ਏਨਾ
ਦਿੱਲ ਦੇ ਭੇਦ ਲੁਕਾਵਣ ਵਿੱਚ
ਗ਼ਮ ਦੀ ਤਿੱਖੀ ਚੀਖ ਨੂੰ ਘੁੱਟ ਕੇ
ਉਪਰੋਂ ਹੱਸਦਾ ਜਾਵਾਂ ਵਿੱਚ
ਓਸ ਪੁਰਾਣੇ ਦਿਨ ਦੇ ਵਿੱਚੋਂ
ਕਰਕੇ ਯਾਦ ਇੱਕ ਮੌਕੇ ਨੂੰ
ਜੋਰ ਵੀ ਲਾ ਕੇ ਰੋਕ ਨਾ ਸਕਿਆ
ਆਪਣੇ ਦਿੱਲ ਦੇ ਹੌਕੇ ਨੂੰ...

...................
हिंदी
...................


कल की बात

कल बैठा कुछ सोच रहा था
बात थी गुज़रे लम्‍हे की
अपने गांव के पीपल नीचे
छोटी ईद के मेले की
मैं ये जो मशहूर हूं इतना
दिल के भेद छुपाने में
ग़म की तीखी चीख घोंट कर
बाहर हंसते जाने में
उसी पुराने दिन के बीच से
करके याद इक मौके को
ज़ोर भी मारा रोक न पाया
अपने दिल की हूक को मैं

...................
English
...................

It happened only yesterday

Was thinking only yesterday
Something that had elapsed already
About the fair of Eid
Beneath the shade of my village banyan 
I, who is well known
For hiding the pangs of my heart
Clad are the shrilling cries of my heart
In the laughter I shower apparently
From one such old day
After remembering a moment
I tried my best but could not stop
The silent cry of the inmost heart.

नवनीत शर्मा

Monday, October 21, 2019

पंजाबी कविता


दर्शन बुट्टर 

                                            पंजाबी कवि दर्शन बुट्टर होरां दी इक होर कविता। 



                     इतणी क गल 

गल ता सिर्फ इतणी थी
भई काणे घासिए दी घसयारनें
मळ्ही ते चक्‍की  
लिपस्टिक लाई नै छपड़े च मुंह दिखेया

इतणी क गल थी न!

छपड़े पर मीनकां दी  
ट्रैं ट्रैं हाली भी कजो चलियो

गल ता सिर्फ इतणी थी
भई डाक गडिया च आया सुरमा
पंज रतियां ते जरा क घट था
चंद्रमे साही चंदकोर  
बह्रले नै रस्‍सा लपेटी नै कैंह् लमकी गई  
गल ता सिर्फ इतणी थी  
भई अज भ्‍यागा भ्‍यागा
ग्रां दिया हद्दा पर आई नै
सूरजे दिया साइकला दी
चेन उतरी गई
एह् ग्रां आळे  
बुझियां लालटैनां पकड़ी कुती जो दौड़दे जा दे  
गल ता सिर्फ इतणी थी  
भई बाज दे पंजे ते छुट्टियां  
चिड़ियां दा फंग
लम्‍मे रस्‍ते च आई पेया
ग्राएं दा सखणा अंबर
संझा तिक  
फंह्गां दियां डारां नै किञा भरोई गेया  
गल ता सिर्फ इतणी क थी  
पर गल सिर्फ इतणी क ही कैंह् थी ... ? … ? 
अनुवाद: अनूप सेठी

                        देवनागरी लिपिया च मूल पंजाबी कवता 


                        ऐनी कु गल्ल
                        गल्ल तां सिर्फ ऐनी सी
                        कि घीचर काणे दी घीचो ने
                        रूढ़ियां तों थियाई
                        लिप्स्टिक ला के छप्पड़ च मुंह वेखिया

                        ऐनी कु गल्ल सी ना!

                        छप्पड़ दे डड्डूआं दी
                        टरैं टरैं अजे वी क्यूं जारी है

                        गल्ल तां सिर्फ ऐनी सी
                        कि डाक गड्डी विच आया सुरमा
                        पंज रतियां तों जरा कु घट्ट सी
                        चन्न वरगी चंदकुर
                        लटैण नाल रस्सा लपेट के कियूं लमक गई

                        गल्ल तां सिर्फ ऐनी सी
                        कि अज सवेरे सवेरे
                        पिंड दी फिरनी ते आ के
                        सूरज दे साइकिल दी
                        चैन उतर गई
                        इह पिंड वाले
                        बुझियां लालटैनां फड़ी किधर भज्जी जांदे ने
                        गल्ल तां सिर्फ ऐनी कु सी
                        कि बाज दे पंजे चौं छुट्टी
                        चिड़ी दा खंभ
                        लम्मी पही च आ डिगिया
                        पिंड दा सखणा असमान
                        आथण तीक
                        खंभा दियां डारां नाल किवें भर गिया

                        गल्ल तां सिर्फ ऐनी कु सी
                        पर गल्ल तां सिर्फ ऐनी कु ही क्यूं सी ...?...?...?

Thursday, September 5, 2019

पंजाबी कविता



पंजाबी कवि दर्शन बुट्टर होरां दी कविता। 

                     घर वापसी

हटी आया मैं
पता नीं कुन्‍हां कुन्‍हां  
नछत्‍तरां गाह्यी नै  
मेरेया ग्रां!

मैं हुण
अजकणे रथे दा
लगामा बगैर
पल पल घसोंदा पहिया है

मैं हिमालय हथ्याळिया पर मीथ्‍या
ग्लोबे जो किक मारी
इलाके खीसे च पाए
पर सांत नी करी सकेया
अपणिया रूहा दे कलपदे मोरे जो

मेरेया ग्रां!
तेरियां चरांदां च
टोळा दा है मैं  
कुतकी गुआची गेह्यो
तिस गोल मटोल मुंडुए जो

तिस शरारती छोह्रुए जो
जेह्ड़ा म्‍हैसी दिया पूछा पकड़ी
टोह्बे दे हिंद महासागरे
पार करी लैंदा हा

तिस जुआने जो जिह्दियां मसां फुटणा लगियां थियां
जेह्ड़ा सूरजे जो
साफे दे लड़े नै बह्न्‍नी नै  
चंद्रमे दिया डाह्टिया नै  
फसलां बढदा हा  

मैं टोळा दा
बापुए दे
तिस पढ़ाकूए पुतरे जो  
जिह्दियां कताबां
आढ़तिए दिया बहिया जो  
गलत सिद्ध नी करी सकियां

तिस हारेयो जोद्धे जो
जेह्ड़ा सड़ेयो- गळयो नजामे दिया छातिया च
बरूद बणी फटी नी सकेया

मेरेया ग्रां!
दूर नछत्‍तरां ते वापस आयो
इस ओपरे जेह् आदमिए जो
जरा दस्‍स ता सही
कुतू है सैह्
'गोल मटोल जेह्या मुंडू' 
अनुवाद : अनूप सेठी, सलाह : तेज सेठी


नागरी लिपिया च मूल पंजाबी कवता

घर वापसी
परत आइया हां मैं
पता नईं किहड़े किहड़े
नच्छत्तरां नूं गाह् के
मेरे पिंड!
मैं हुण
वरतमान दे रथ दा
वाग विहूणा
पल पल घसदा पहिया हां

मैं हिमाला नूं तळी ते मसलिया
गलोब नूं किक मारी
खित्तीयां नूं जेब च पाया
पर शांत न कर सकिया
आपणी रूह दे कलपते मोर नूं

मेरे पिंड!
तेरी जूह चों
तलाश रिहा हां मैं
किधरे गुआच गए
उस गोलू-मोलू जिहे मुंडे नूं

उस इल्लती छोकरे नूं
जो मज्झ दी पुछ फड़ के
टोभे दा हिंद महासागर
गाह लैंदा सी

उस मुछ-फुट गभरू नूं
जो सूरज नूं
साफे लड़ बन्ह के
चन दी दाती नाल
हाड़ी वढदा सी

मैं तलाश रिहा हां
बापू दे
उस पढ़ाकू पुत्त नूं
जिस दियां कताबां
आढ़तिए दी वही नूं
गलत न सिद्ध कर सकियां

उस हारे होए योद्धे नूं

जो गले सड़े निजाम दी
हिक विच
बारूद बण के, फट न सकिया

मेरे पिंड!
दूर नच्छतरां तों परते
इस उपरे जिहे बंदे नूं
जरा दस तां सही
कित्थे है उह
गोलू मोलू जिहा मुंडा