Friday, January 13, 2023

हिमाचली पहाड़ी चर्चा

 


असां दिया भाषा दे बारे च चर्चा मतेयां सालां ते चलियो है। कदी जरा तेज होई जांदी कदी मंदी। इलैक्शनां परंत दिव्य हिमाचल आळेयां इक दिन चर्चा कराई। तिसते परंत दूंह् लेखकां आशुतोष गुलेरी कनै यतिन होरां अलग-अलग लेख भी लिखे। तिसते परंत भूनेंद्र होरां अपणे वचार रखे। एह् सारे ई लेख कनै अखबारा दी चर्चा दयारे पर है। तुसां एह्थी पढ़ी सकदे।  हुण कुशल कुमार होरां होरां इस बारे च अपणे वचार रखे हन। गल गांह् बधैइस ताईं एह् लेख भी एत्थी पेश है। एह् लेख भी हिंदिया च है।

हिमाचली पहाड़ी भाषा एक विवशता

देश में भाषाओं के आधार पर प्रदेशों के गठन के दौर में पहाड़ी प्रदेश और पहाड़ी भाषाओं के आधार पर ही हिमाचल प्रदेश का गठन किया गया था। प्रदेश के गठन के पहले हिमाचल में पहाड़ी रियासतें थीं और शायद ही उनमें से किसी का नाम हिमाचल रहा होगा। यह हिमालयी पहाड़ भोगौलिक, संस्कृतिक दृष्टि से  भिन्न-भिन्न होने के बावजूद यहां की पहाड़ी भाषाएं ही हिमाचल प्रदेश को साकार करती हैं और सारे देश के प्रांतों में अपनी एक अलग पहचान को पुख्ता भी करती हैं। 

जहां तक हिमाचली पहाड़ी भाषा की बात है, मेरी हिंदी की पाठ्यपुस्तक में शायद सातवीं-आठवीं में एक निबंध था। लेखक का नाम भूल रहा हूं। इस निबंध में दो लोग एक वन में से यात्रा कर रहे थे। उनमें से एक कहता है। देखो कितना घना वन है। यह सुनकर वहां के सभी पेड़ चिंता में पड़ जाते हैं कि हमारी तो सारी उम्र यहां बीत गई पर हमने वन नाम का कोई प्राणी या पेड़-पौधा देखा ही नहीं। इस निबंध के पेड़ तो नहीं जानते थे कि वन उनका सामूहिक नाम है। 

परंतु हम हिमाचली जानते हैं कि हिमाचली पहाड़ी भाषा एक अवधारणा, योजना और सोच है, जो प्रदेश को एक प्रतिनिधि भाषा देने और हिमाचली पहाड़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के आंदोलन से उपजी है। इसके पीछे सोच यही थी कि भाषा के नाम को लेकर कोई विवाद न हो और सभी भाषाएं सम्मिलित हो कर एक साथ आ सकें। यह बीच का रास्ता इसलिए निकाला गया था ताकि एक नाम से ही सही हिमाचल की सभी भाषाओं को मान्यता तो मिल जाए।   

अब सोच और योजना से तो कोई भाषा बनाई नहीं जा सकती है। कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी। हिमाचल ही नहीं हमारा सारा देश बहुभाषी और भाषा वैविध्य से संपन्न है।  भाषा समाज का विषय है और समाज के अलावा सत्‍ता, धर्म, और बाजार का इसमें दखल रहता है। जब अलग-अलग भाषाओं को बोलने वाले लोग अपनी-अपनी भाषाओं में संवाद करते हैं तो इस संवाद से एक तीसरी भाषा बनकर उभरती है। जो सबको साथ लेकर चलती है और शेष भाषाएं भी उसमें शामिल होती हैं और अपना वजूद एक उपभाषा के तौर पर बनाए रखती हैं। 

दुर्भाग्य से हिमाचल में कोई एक संवाहक भाषा बनकर नहीं उभर सकी। जो थोड़ा बहुत मेल-मिलाप हुआ भी, वह नामों के स्‍यापे में स्वाहा हो गया है।  हम अपनी हिमाचली पहाड़ी की देश की जिन बड़ी भाषाओं से तुलना करते हैं। उन सभी के साथ उनकी उपभाषाओं की एक लंबी सूची मिलती है। एक कहावत है कि हाथी के पांव में सबका पांव। यह पांव राजनीतिक भी हो सकता है, बाजार, समाज और धर्म का भी हो सकता है। इसी के चलते भाषाएं फलती, फूलती भी हैं और सिमटती, सिकुड़ती और मिटती भी रहती हैं।   

जहां तक किसी एक बड़ी भाषा को प्रदेश की प्रतिनिधि भाषा मानने का प्रश्न है, मुझे नहीं लगता कि अब किसी भी एक भाषा के नाम पर राजनीतिक और सामाजिक तौर पर यह आम सहमति संभव है, जिस नाम के पीछे सारा प्रदेश इकट्ठा हो कर एक साथ चल सके। यदि ऐसा हो सकता तो हिमाचली पहाड़ी नाम ही अस्तित्‍व में ना आता।  

वैसे दुनिया में दो भाषाएं ही चलती हैं - एक जनता की और एक राजा की।  यदि हिमाचल के जो इलाके पंजाब में थे पंजाब में ही रहते तो वे पंजाबी हो जाते। स्कूल और प्रशासन की भाषा पंजाबी होने के बाद इन भाषाओं के लिए पंजाबी की उपभाषा के रूप में भी खुद को बचा पाना बहुत कठिन था। कर्नाटक में शामिल मराठी भाषी  इलाकों की स्थिति को देखकर इस बात को आसानी से समझा जा सकता है। 

अब हिमाचली पहाड़ी भाषा मंजूर नहीं है और किसी एक लोकप्रिय और स्थापित भाषा पर सहमति बनने की संभावना भी नहीं है। इसलिए पहाड़ी भाषाओं को प्रेम करने वाले लेखक, कवि व नेता अपनी-अपनी भाषाओं के साथ अपने भाषाई समाज में काम करें, मेहनत करें और उन्हें संपन्न बनायें। हमारी भाषाओं के लिए किसी सूची-अनुसूची में जगह मिलने से ज्‍यादा जरूरी है, हमारे घर, समाज और बाजार में उनकी जगह का बने रहना। जरूरी है हमारी जुबानों का हमारी जुबान पर बने रहना।  (मूह्रला चित्र : यदु मेहरा, कैनवस पर तैलरंग) 

कुशल कुमार
कवि, व्यंग्यकार, अनुवादक। 'मुठ भर अंबर' चर्चित कविता संग्रह 

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