पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Wednesday, February 4, 2026

मुंबई डायरी - सत्त


 अपणिया जगह छड्डी लोक मुंबई पूजे। न अपणे ग्रां भुल्ले, न शैह्र छुट्या। जिंदगी पचांह् जो भी खिंजदी रैंह्दी कनै गांह् जो भी बदधी रैंह्दी। पता नीं एह् रस्साकस्सी है या डायरी। कवि अनुवादक कुशल कुमार दी मुंबई डायरी पढ़ा पहाड़ी कनै हिंदी च सौगी सौगी। किस्त सत्त। 

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका दा कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घरे बक्‍खें ही था। तैह्ड़ी सारे देसे ते रोजी रोटी ताईं लोक अपणियाँ भासां लई मुंबई औआ दे थे। इक भासा बोलणे आळे शैह्रां च इक्की टबरे साही रैह्न्दे थे। जेह्ड़ा बी नौकर ग्रांए जो जांदा था, अप्पू  कन्नै इक दो जणे होर लई औंदा था। एह् सारे लोक इक्को देह्या ही कम्म करदे थे। जिञा हिमाचल ते मुंबई औणे वाले टैक्सियां नें मिलदे जुलदे कम्मां च ही थे। इन्हां च महाराष्‍ट्र दे ग्रां ते औणे वाले लोक भी शामल थे। मुंबई इन्‍हां सारयां रंगा दा कौलाज रचा दी थी। 

इन्हां समाजा देआं निजी स्कूलां ते अलावा नगरपालिका दे सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिन्दी, उर्दू, कन्‍नड़ कनैं सिन्धी भासा दे स्कूल ता मेरे लाके च मैं दिख्यो। कांगरेस कनैं अजादिया दे आंदोलन दी धुरी होणे दे कारण महात्मा गांधी जी दे स्वदेशी कनैं हिन्दी प्रेम दा मुंबई च असर था। मोह्ल हिन्दिया दी लीडरी च देसी भासाँ दा था। इस ते अलावा मिसनरी अंग्रेजी स्कूलां दा ता लग ही रुतबा था। एह् स्कूल घट कनैं देसी फ्री स्कूलां दिआ तुलना च बड़े मैह्ंगे थे। देसे जो अंगरेजां ते अजाद होयां जो हाली दस बीह साल ही होये थे। तिहाड़ी असां जो एह् अनुमान ही नीं था कि इसा अगंरेजिया स्‍कूलां ते असां दियां सारियां भासां दा बिस्तरा गोळ करी देणा है। 

मराठी ते अलावा गुजरात, राजस्‍थान, कनैं उत्‍तर भारत दे प्रांता ते औणे वाळयाँ दिआं सारियाँ भासां हिन्दिया ते करीब थियां। जित्थू तिकर खड़ी बोली हिन्दिया दी गल्ल है, एह् हिन्दी प्रातां च स्कूले दी भासा ता थी पर घरे दी भासा नीं थी। तिस जमाने दे अनपढ़ कने घट पढ़यां उत्तर भारत दे लोकां तांई एह् हिन्दी भी कुछ मुश्‍कल ही थी। इन्हां सारयां मिली जुली हिन्दी सिक्खी लई। इस च फिल्मां कनैं रेडियो पर बजणे वाळयां गीतां दा बड़ा हथ था। 

तिस जमाने च हिन्दी लगभग सारयां लोकां जो औणे वाले कल दी भासा लग दी थी। अज कणे नूरा कुस्ती वरोधे दे बाबजूद हिंदिया दे फलणे फुलणे च मराठी भाषियां दा बड़ा जोगदान है। अज भी एह् गैर मराठियां नैं गल्ल करने दी बारिया झट हिन्दिया च आई जांदे।

जे एह् देह्या मोह्ल नी हौंदा ता होरनां शहरां साही मुंबई च बी असां ते अपणी भासा सांभी नीं होणी थी। इत सारयां जो अपणिया भासा च गल्ल करदे दिक्खी नै सामणे वाले जो भी लगदा कि मिंजो भी अपणिया भासा च गल्ल करना चाई दी। इस शैह्रे च आई नें बसणे ताईं कुसी जो भी इस तांई अपणी भासा-बोली छडणा नीं पई।

1952 च कांगड़ा मित्र मण्डल बणांदे टैमे असां दे बुजुर्गां साह्मणै मुस्कल एह् थी कि कांगड़ा पंजाब दा इक जिह्ला था। जे सैह् कांगड़े देयां लोकां जो ही सद्स्‍य बणाणे दी शर्त रखदे ता मते सारयां पहाड़ियां छुटी जाणा था। तिन्हां भासाई अधार पर प्रांतां दे बणने ते पैंह्लैं ही भासा दे अधार पर मंडळ बणाई लिया था। मुंबई च रैहणे वाळा कनै पहाड़ी डोगरी बोलणे वाला कोई भी मेम्बर बणी सकदा था। असां दे बुजुर्ग भी मुंबई च रही नैं ही एह् सोची सके। 

सारयां ते बड्डी गल्ल एह् है कि भई तिहाड़ी भासा मुद्दा ही नीं था। रोजी-रोटी, गरीबी कनैं सिरे पर छत मुद्दा था। मुंबई देसे दे गबों-गब इक बड़ा बडा औद्योगिक शैह्र था। मजबूत पूंजीपतियां, बपारियां कनैं मजबूर मजदूरां दा शैह्र था। इस शैह्रे दी बणावटा कनै सार्वजनिक संरचना च अंगरेजां ते अलावा पारसी बपारियां कनैं ट्रस्‍टां दा सबते जादा योगदान था।

मराठी भासा ता इक प्रती‍क कनैं झंडा था। मुद्दा शैह्रे दिया दौड़ा कनै नौकरियां च मराठी भासियां दा पचांह् रही जाणा था। असल च ठाकरे साह्ब मराठी भासा-संस्‍कृति दे नाएं पर नौकरियां दी लड़ाई लड़ा दे थे। 

बाळा साब ठाकरे होरां 1960 च मार्मिक नांए दी कारटून व्यंग पत्रिका शुरु किती। इसा च इन्‍हा मराठी हितां जो मुद्दा बणाई नै सरकार, समाज, राजनीति कनैं व्‍यवस्‍था पर तंज कसी नै लोकां जो जागरूक करने दी मुहिम चलाई। मार्मिक दिया कामयाबिया ते उत्‍साहित होई नै इन्‍हां 1966 च शिवसेना पार्टी बणाई। उसते बाद लोक जुड़दे गै, कारवां बधदा गया। अज भी मुंबई कनै महाराष्‍ट्र दे सारयां सरकारी कनै निजी बडेयां संस्‍थाना च स्‍थानीय लोकाधिकार समितियां कम्‍म करा दियां। 

मुंबई च हिमाचलियां तांई इक लग देह्या आदर-मान था। 1981-82 दी गल है। हिमाचले ते सरकारी सांस्‍कृतिक टीम औआ दी थी। मुंबई दे सारयां ते बड्डे हॉल षणमुखानंद च कार्यक्रम था। हॉले वाळयां जो कोई परमिशन चाही दी थी। परमिशना ताईं पुलिस कमिश्‍नर दे दफ्तर जाणे दा कम्‍म मेरे हिस्‍सें आया। हिमाचल दा नां दिक्‍खी नैं तिन्‍नी अफसरें सारयां ते पैह्लें मिंजो सद्दी लिया। सैह् हिमाचल जाई नै आया था। हिमाचल देआं लोकां कनैं वादियां दी तरीफ करी नै तिसदा मन नीं भरोआ दा था। तिस ताईं इतणी दूर हिमाचली कनै संस्‍थां होणा चरजे दी गल थी। तिन्‍नी मिंजो चाह् भी पयाई कनैं हत्‍थों-हत्‍थ परमिशन पकाड़ाई ती।

जित्थू तिकर असां दी पहाड़ी भासा दा सुआल है।  असां इक्‍की पास्‍सें हिमाचली पहाड़ी जो अठमी अनुसूची च शामल करने दी लड़ाई लड़ा दे; दुएं पास्‍सें असा ब्‍हाल अपणियां बोलियां दे बारे च ही कोई साफ नजरिया नीं है। मुस्‍कलां ता हन पर मुश्‍कलां ते जादा असां अप्‍पू च तलोंदे रैंहदे। इस दे कारण लोग कनैं समाज बी दुविधा च ही रैंह्दा।

पिछले नवंबर च मैं अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्‍था संघ दे सम्‍मेलन ताईं अंबरसर गया था। तित्‍थू मैं एह् महसूस कीता कि पहाड़िया ने तमाम सहानुभूति होणे दे बावजूद कुछ लोकां ताईं पहाड़ि‍या च गल्‍ल करना वाक़ई बड़ा मुश्‍कल होई चुक्‍या। दुए पास्‍सें समाजे दे काफी बड्डे तबके जो लगदा कि पहाड़ी भासा तिन्‍हां दी हिमाचली पच्‍छैण दा कोई हिस्‍सा नीं है। एह् ग्रांए दी ग्रांचड़ बोली है। घरां-ग्रां च सभां-मौकयां च गाणे, बजाणे, नचणे नाटी पाणे ताईं ठीक है पर इसा जो ढोणे दी जरूरत नीं है। इक भाई साह्ब अंबरसर च हिमाचलियां दे बड्डे नेता कनैं इक्‍की संस्‍था दे बड्डे पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता कनैं पंजाबी दे बड़े अच्‍छे वक्‍ता हन। सैह् असां दे पहाड़ी दे मुद्दे जो लगभग खारिज करी नें विरेंदर वीर जी, रमेश मस्‍ताना जी कनैं मिंजो साही पहाड़ी दे वकीलां दी पंजाबिया च देई क्‍लास लेंदे कि सुणने वाळयां जो मजा आई जांदा।

पंजाबी इतणे प्‍यारे कनै विश्‍वास नै पंजाबी बोलदे कि कोई तिन्‍हां ने मिली नैं  पंजा‍बिया ते बची नै निकळी ही नीं सकदा। सैह् अपणिया जबाना जो इतणे प्‍यारे नें जींदे, गांदे, नचदे कि अज हिंदोस्‍तान ही नीं सारी दुनिया पंजाबी सुरां कनैं गीतां पर नच्चा दी। कोई जबरदस्‍ती नीं है। कोई रौळा, आंदोलन नीं है। इक मस्‍ती है तिसा जो सारे गळे लगा दे। सभा ते बाद बजारे च सिंधी समाज दे अध्‍यक्ष जेह्ड़े असां दे परमुख परोह्णे थे, इक्‍की सिंधी भाउए दिया दकाना मिली गै। सैह् दोयो पंजाबिया च गल करी जान। मैं पुच्‍छया बड़ी साईं सिंधी कतांह है? तिन्‍हां दस्सया ऐत्‍थू पंजाबी ही चलदी। मुंबई च ता हिमाचलिया साही लगभग सारे सिंधी अपणिया भासा च गल करदे पर पंजाब दी गल बखरी है। 

असां अपणिया भासां दी लड़ाई लड़ने वाळयां जो पंजाबियां ते सिक्‍खणा चाही दा। कोई रौळा पाणे कनै मारपिट करने दी कोई जरूरत नीं है। र्सिफ अपणिया भासा च मस्तिया नै जीणे कनैं गलाणे दी जरूरत है। लोक अपणे-आप अपणी भुली तुसां दी गलाणा लगी पोंदे। भासां साही कुछ मामलयां च सरकारां ते जादा समाजे दी चलदी। सरकारां कनै भारतीय भासा प्रेमी रही गै नारयां लगांदे। इस देसे देआं लोकां सारियां भारतीय भासां दा स्‍कूलां ते बिस्‍तरा गोळ करी नै ही साह् लिया। जेह्ड़े सरकारी स्‍कूल बच्‍चयां जो तरसा दे थे, अंगरेजी बणदयां ही बच्‍चयां नैं भरोणा लगी पियो। 

आखर च इक मुंबईकर पहाड़ी कनैं मराठी भासा प्रेमी होणे दे कारण मिंजो बड़ा दुक्‍ख होंदा जाह्लू कोई पुच्‍छदा कि मुंबई च एह् क्‍या होआ दा। दुख ताह्लू भी होंदा जाह्लू मैं अपणे ग्रांए च पहाड़िया च सुआल पुच्‍छदा कनैं जवाब पहाड़ी हिंदिया च मिलदा।

 

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भाषा-बोली

मुंबई नगर पालिका का कन्नड़ प्राइमरी स्कूल मेरे घर के पास ही था। उस समय सारे देश से लोग रोजी-रोटी के लिए मुंबई आ रहे थे। जो भी गांव जाता था, अपने साथ एक दो जने और लेकर आ जाता था। यह सारे लोग एक जैसा ही काम करते थे। जैसे हिमाचल से मुंबई आने वाले टैक्सियों से मिलते जुलते काम ही करते थे। मुंबई इन सभी रंगों का एक कोलाज रच रही थी।

इन समाजों के निजी स्कूलों के अलावा नगर पालिका के सरकारी स्कूल भी थे। मराठी, हिंदी, उर्दू, कन्नड़ और सिंधी भाषा के स्कूल तो मेरे इलाके में ही थे। कांग्रेस और आजादी के आंदोलन की धुरी होने के कारण महात्मा गांधी जी के स्वदेशी और हिंदी प्रेम का मुंबई में प्रभाव था। हिंदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं का माहौल था। इसके अलावा अंग्रेजी मिशनरी स्कूलों का एक अलग ही रुतबा था। यह स्कूल कम थे और भारतीय भाषाओं के स्कूलों की तुलना में महंगे थे। उस समय हमें यह अनुमान नहीं था कि इस अंग्रेजी ने स्कूलों से हमारी सारी भाषाओं का बिस्‍तरा गोल कर देना है। 

मराठी के अलावा गुजरात, राजस्थान और उत्तर भारत के प्रांतों से आने वालों की भाषाएं हिंदी के करीब थीं। जहां तक खड़ी हिंदी की बात है, हिंदी भाषी प्रांतों में हिंदी स्कूल की भाषा तो थी पर घर की भाषा नहीं थी। उस जमाने में अनपढ़ और कम पढ़े लिखे उत्तर भारतीय लोगों के लिए भी यह हिंदी कुछ मुश्किल ही थी। इन सब ने मिलजुल कर हिंदी सीख ली। इसमें फिल्मों और रेडियो पर बजने वाले गीतों का बड़ा हाथ था। 

उस जमाने में लगभग सभी लोगों को हिंदी आने वाले कल की भाषा लग रही थी। आज के नूरा कुश्ती विरोध के बावजूद हिंदी के फलने-फूलने में मराठी भाषियों का बहुत बड़ा योगदान है। आज भी यह गैर मराठियों से बात करते समय झट से हिंदी में आ जाते हैं।

यदि ऐसा माहौल न होता तो दूसरे शहरों की तरह मुंबई में भी हमसे हमारी भाषा की संभाल नहीं होनी थी। यहां सबको अपनी-अपनी भाषा में बात करते देखकर सामने वाले को भी लगता है कि मुझे भी अपनी भाषा में बात करना चाहिए। इस शहर में बसने के लिए किसी को भी अपनी भाषा बोली छोड़नी नहीं पड़ी। 

1952 में कांगड़ा मित्र मंडल बनाते समय हमारे बुजुर्गों के सामने यह मुश्किल थी कि कांगड़ा पंजाब का जिला है। यदि कांगड़ा के लोगों को ही सदस्य बनाते हैं तो बहुत सारे पहाड़ियों ने छूट जाना था। उन्होंने भाषा के आधार पर प्रांतों के बनने से पहले ही भाषा के आधार पर मंडल बना लिया। मुंबई में रहने वाला पहाड़ी और डोगरी बोलने वाला कोई भी मंडल का सदस्य बन सकता था। हमारे बुजुर्ग भी मुंबई में रहकर ही ऐसा सोच सके। 

सबसे बड़ी बात यह है कि उस समय भाषा नहीं बल्कि रोजी-रोटी, गरीबी और सर पर छत का मुद्दा था। मुंबई देश के बीचों बीच एक बहुत बड़ा औद्योगिक शहर था। इस शहर की बनावट और संरचना में अंग्रेजों के अलावा पारसी व्यापारियों और ट्रस्टों का भी बहुत बड़ा हाथ है। मराठी भाषा संस्कृति तो एक प्रतीक था। असल में ठाकरे साहब का मुद्दा शहर की दौड़ और नौकरियों में मराठी भाषियों का पीछे छूट जाना था। बालासाहेब ठाकरे ने 1960 में ‘मार्मिक’ नाम से एक कार्टून व्यंग्य पत्रिका आरंभ की। इसमें उन्होंने मराठी हितों को मुद्दा बनाकर सरकार, समाज, राजनीति और व्यवस्था पर व्‍यंग्‍य कर  लोगों को जागरूक करने की मुहिम चलाई। मार्मिक की सफलता के बाद उत्साहित होकर इन्होंने 1966 में शिवसेना पार्टी बनाई। उसके बाद लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। आज भी मुंबई और महाराष्ट्र के सभी सरकारी और निजी बड़े संस्थानों में स्थानीय लोकाधिकार समितियां काम कर रही हैं। 

मुंबई में हिमाचलियों के लिए एक अलग सा सम्मान था। 1981-82 की बात है। हिमाचल से सरकारी सांस्कृतिक टीम आ रही थी। मुंबई के सबसे बड़े षणमुखानंद हॉल में कार्यक्रम था। हाल वालों को किसी परमिशन की जरूरत थी। परमिशन के लिए पुलिस कमिश्नर के दफ्तर जाने का काम मेरे हिस्से आया। हिमाचल का नाम देख कर उन अधिकारी ने सबसे पहले मुझे बुलाया। वे हिमाचल जाकर आए थे और हिमाचल के लोगों और वादियों की तारीफ करके उनका मन नहीं भर रहा था। उनके लिए इतनी दूर हिमाचली और उनकी संस्था होना आश्चर्य की बात थी। उन्होंने मुझे चाय भी पिलाई और हाथों-हाथ परमिशन दे दी। 

जहां तक पहाड़ी भाषा का सवाल है, हम एक तरफ पहाड़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं, दूसरी तरफ हमारे पास अपनी बोलियों भाषाओं के बारे में कोई स्‍पष्‍ट नजरिया नहीं है। मुश्किलें तो हैं पर मुश्किलों से ज्यादा हम आपस में तुलना करते रहते हैं। इस कारण लोग और समाज भी दुविधा में है। 

मैं पिछले नवंबर में अखिल भारतीय हिमाचल सामाजिक संस्था संघ के सम्मेलन में अमृतसर गया थाl वहां मैंने महसूस किया कि पहाड़ी के साथ तमाम सहानुभूति होने के बावजूद हमारे कुछ लोगों के लिए पहाड़ी में बात करना वाकई बहुत मुश्किल हो चुका है। दूसरी तरफ समाज के एक काफी बड़े तबके को लगता है कि पहाड़ी भाषा उनकी पहचान का कोई बड़ा हिस्सा नहीं है। यह गांव की ग्रामीण बोली है। घर गांव और सभाओं और अवसरों में गाने-बजाने, नाचने और नाटी डालने तक ठीक है पर इसे सिर पर ढोने की जरूरत नहीं है। 

अमृतसर में एक साहब हिमाचलियों के बड़े नेता, एक संस्था के बड़े पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और पंजाबी के बड़े ही अच्छे वक्ता हैं। उन्होंने हिमाचली पहाड़ी भाषा के मुद्दे को लगभग खारिज करते हुए वीरेंद्र वीर जी, रमेश मस्ताना जी और मेरे जैसे पहाड़ी वकीलों की पंजाबी में ऐसी क्लास ली कि सुनने वालों को मजा आ गया। 

सच में पंजाबी इतने प्यार और विश्वास के साथ पंजाबी बोलते हैं कि कोई उनसे मिलकर पंजाबी से बचकर निकल ही नहीं सकता है। वह अपनी जुबान को इतने प्यार से जीते, गाते और नाचते हैं कि आज हिंदुस्तान ही नहीं सारी दुनिया पंजाबी गीत-संगीत पर नाच रही है।

कोई जबरदस्ती नहीं। कोई आंदोलन नहीं। एक मस्ती है उसको सब गले लगा रहे हैं। सभा के बाद बाजार में सिंधी समाज के अध्यक्ष जो हमारे कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि थे, एक सिंधी भाई की दुकान में मिल गए। वह दोनों पंजाबी में ही बात कर रहे थे। मैंने पूछा सांई सिंधी कहां ? उन्होंने बताया कि वे आपस में पंजाबी ही बोलते हैं। मुंबई में तो हिमाचलियों की तरह लगभग सारे सिंधी अपनी भाषा में ही बात करते हैं पर पंजाब की बात अलग है। 

हम अपनी भाषाओं की लड़ाई लड़ने वालों को पंजाबियों से सीखना चाहिए। कोई शोर और मारपीट करने की जरूरत नहीं है। केवल अपनी भाषा में मस्ती से जीने और उसे बोलने की जरूरत है। लोग अपने आप अपनी भूल कर तुम्हारी बोलने लगते हैं। भाषा की तरह कुछ मामलों में सरकारों से ज्यादा समाजों की चलती है। सरकारें और भारतीय भाषा प्रेमी रह गए नारे लगाते हैं। इस देश के लोगों ने सभी भारतीय भाषाओं को स्कूली शिक्षा से बेदखल करके ही सांस ली। जो सरकारी स्कूल बच्चों के लिए तरस रहे थे, अंग्रेजी बनते ही बच्चों से भरने लग पड़े हैं। 

आखिर में एक मुंबईकर पहाड़ी और मराठी भाषा प्रेमी होने के कारण मुझे बहुत दुख होता है कि जब कोई पूछता है कि मुंबई में यह क्या हो रहा है। दुख तब भी होता है जब मैं अपने गांव में पहाड़ी में सवाल पूछता हूं और जवाब पहाड़ी हिंदी में मिलता है।

मुंबई में पले बढ़े कवि अनुवादक कुशल कुमार
2005-2010 तक मुंबई से हिमाचल मित्र पत्रिका का संपादन किया।
चर्चित द्विभाषी कविता संग्रह मुठ भर अंबर।