पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Tuesday, December 16, 2025

रवींद्र कुमार शर्मा दियां कवतां

 


पेश हन घुमारवीं, बिलासपुरे ते रवींद्र कुमार शर्मा होरां दियॉं तिन कवतां। 

इन्हां दे कविता संग्रह गुलदस्ते रे फुल्ल दी समीक्षा तुसॉं पैह्लें एत्थी पढ़ी चुकेयो हन। 

मूह्रली चित्रकृति : शशिभूषण बडूनी  


  1  

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

न पजदे हुण कोल्थ मित्रो

न पजदे हुण खेतें माह

मसर मुंगी बी नज़र नी औंदे

नज़र नी औंदी हुण किती बी कपाह

 

होल़ां किता ते खाणी मित्रो

न कोई हुण बाहन्दा बेरड़ा

मेहसीं नी तांजे पाल़नी किसी बी

खाणे जो किता ते मिलणा छेरड़ा

 

धान नी तां जे बाहणे मित्रो

तां हुणा नियाँ फेरी पराल

सडकां गाँवे गाँवे पूजी गईयाँ

हुण किसी नी चढ़ने क्वाल़

 

बल़द किसी घरा नज़र नी औंदे

जमीनां उज्जड़ पांदे देखे करसाण

चौल़ खाणे जो टोल़दे सारे

बाहणा नी चाहन्दा कोई भी धान

 

पैदल नी कोई चलदा मित्रो

रखी लई सबीं बाइकां कने कार

दिखावा बौहत करयादे सारे

पावें चकणा लोकां ते तवाहर

 

चिट्ठियां हुण कुण लिखदा मित्रो

बन्द हुई गई भेजणा तार

सुखसांद पल पल मिलदा रहन्दा 

तां जे जांदा कोई घरा ते बाहर

 

पढ़ने जो स्कूल बतेहरे मित्रो

कुड़ियां करया करदियाँ चमत्कार

मुंडू नी करदे कोई बी कम्म कार

लगिरे करने हुन चिट्टे रा व्यापार

  

  2  

बधी गई हर चीजा री भुख

अज्जकल जिसजो बी देखो

बधी गई हर चीजा री भुख

दो फुट जमीन खातर भाई दित्ते मारी

बड्ढी दिते छोटे बड़े सारे रुख

 

लूण पिपल़िया कने खाई कने बी करदे थे गुज़ारा

बौहत मुश्क़िला रे टैमा ई चकदे थे पैसा तवाहरा

ब्याज बौहत देणे पौन्दा था पर मुकरदे नी थे

साहूकार ब्याज़ा च ई लेई जांदा था फसला रा नाज सारा

 

पैसे री भुख अज्जकल सबीं जो बौहत ज़्यादा

मेहनत नी करनी पवो रातों रात अमीर बणना चाहन्दे

अपनी संस्कृति भुली कने करदे पुट्ठे कम्म

कई तां पैसे खातर चिट्टे रे गुलाम बणी जांदे

 

कोई नेता बणी कने अपना नांव चमकांदा

पुलसा री वर्दी पहनी कने बी कोई रिश्वत खाँदा

घरें बी किसिरे मन्जयां बिच मिलदे नोट

सोना चांदी बेहिसाब सब लौकरां बिच छुपांदा

 

दो वक्त रिया रोटियां खातर कोई दिन रात कमान्दा

धियाड़ी मज़दूरी बी करदा कने खेतां बी बाहन्दा

पूरी उम्र करदा रहया भ्यागा ते संजा तिक कम्म ई कम्म

पल्ले कुछ नी पया रहया जिंदगी भर करलांदा

 

जे भुख ज्यादा नी हुन्दी तां नी हुंदे कम्म खराब

इसे ज्यादा भुखे करी दिति दुनियां बर्बाद

जितना जे भगवाने दितिरा जे तितने च करो गुज़ारा

तां जिंदगी सुधरी जाणी कने जियुणे रा औणा नज़ारा

  

  3  

सीर गंगा

धर्मपुरा ते चलदी सीर गंगा

घुमारवीं रे लोकां री राणी

जून मिहने छिप नी मिलदी

कने बरसाती खूब पाणी पाणी

 

बम्मा रे रोपे ते तां जे निकल्दी बल खांदी

चाल तेरी मस्तानी कल कल बगदी जांदी

दुनियां जो पाणी देइ कने तारदी

करसाणा रे बेड़े पार लगांदी

 

घुमारवीं शहरा री तां तू ई जान

इक्क दिन पाणी नी आओ तां निकलदे प्राण

धर्मपुर, सरकाघाट जाहू बम्म तू लंघदी

पर लोक गंद पाई कने तिजो करदे बौहत परेशान

 

सीर गंगा रे कंडेह बणया बड़ा मन्दिर आलीशान

बड़ा छैल बणी गया हुण इत्थी रा मोक्षधाम

सवेरे शाम हुणी पूजा बजोना शंख कने घंटियां

आरती हुणी सीर गंगा री सवेरा कने शाम

 

पँजाह स्किमां पाणिए री चलदी

आराम नी करदी रात दिन रहन्दी बगदी

बरसाती तांजे मचांदी तबाई

पितर कम्बदे सारी दुनियां डरदी

 

कोई टैम था तां जे चलदे थे सीरा बौहत घराट

तड़के जांदे थे पीहण चक्की कने नेहरे दिसदी नी थी बाट

नेहरे ई जाणे पौन्दा था पंगयाठुआं रिया लोई

कई बार तां घराटा ई बीतदी थी सारी सारी रात

 

दुनियां री तू प्यास बुझान्दी

पर करदे तू पर सब अत्याचार

खुणी खुणी कने करी दिति डुग्गी

पील़े पंजे कने करदे तेरे सीने पर वार

 

चलदी चलदी पुजदी बलघाड़ी जाई

स्वागत करने जो शुक्र कने सरयाली बी आई

बड्डा चौड़ा डयाव तेरा मांडवे

राती बेले औखा लँगणा देंदी सबीं जो डराई

 

स्याणे ग्लान्दे थे भई सीर शुक्र कने सरयाहल़ी

तीनों जाई मिलदी बलघाड़ी

मुर्दा लैंदी दिहाड़ी

ईसा गल्ला जो अज्ज बी कोई नी सकदा टाल़ी

 

लोकां री सारी गंदगी तू टोह्ंदी

जख्मी करी दित्ती पियूले पंजे पर कदी नी रोंदी

चुपचाप चलिरी रहन्दी कदी नी करलांदी

बरसात स्याला होवे या होवे पावें तौन्दी


रवींद्र कुमार शर्मा
कविता संग्रह : गुलदस्ते रे फुल्ल

Saturday, November 1, 2025

अनंत आलोक दी क्हाणी

 

 

अज पहाड़ी दिवस दे मौके पर पेश है अनन्त आलोक दी इक कैणी मतलब क्हाणी  

जिज्जा बेइंदा न बैठदा 

यदि समझने में दिक्कत आए तो अंत में हिंदी में कहानी का परिचय आप पढ़ सकते हैं। 

रेखांकन शशि भूषण बडूनी का है। 

                                

गुरजी री गाड़ी दे थिए बे हम चार आदमी | ना रे ना सिजे गुरजी न आथि इ | इ तो म्हारे स्कूलो दे पढ़ावणी आले गुरजी थिए | आहो बे, जेतणे ब माश्टर हुओं स्कुलो दे पड़ावणी आले सी सोब गुरजी माने जाओं गाँव दे |  सोबी ख गुरजी बोलों | हेम्बे, एब सोम्झे बे तुम ! स्कूलो रे माश्टर | सिजे गुरूजी तो भ्रागे खाए चेई साले ...लुच्चे-लफंगे, तिने तो गुरु रा नाव ब बदनाम कोरी रो राख दिया | ओरका, पोईली तो साले टेलीविजनो पांद आओ रे भाषण जाड़ों थे | एब लागा पोता जोब एक-एक कोरी रो सामणे आई करतूतो, एब पोड़ा राम जोब्ब भितरे खोटे, हाशी बे | राम पोड़ा | बेशक सारे गुरु जी सी बे एकशे न होंदे पोर इन्ने साले बश्वास खो पाया एब तो डोर लागों कोसी खरेसड़े गुरु जी बोलणी दा ब ! राम राम ! का जमाना आ गुआ ! जिउणा मुश्किल कोर पाया !

गाड़ी दा एक हाँ इ थिया बे रो होरो म्हारी साथी थिए नोयणी रे एक साब, साब एशे तो सी ब गाँव रे इ ओसदिये, पोर आजकली नोयणी नोग्रो दे रों | तेथी आपणे ड्यूटी कोरों, रो तेथी हुंदे रोय रों | मजाकिया पोर भोते, थुड़ी-थुड़ी बातो री एशि बात बणाओं जू  होसी होसी रो बाखी पुलटिओं | छोटे-मोटे कोदो रे रो मस्त आदमी | भई साब तो भोत देखे पोर तेशे न देखिये ! भोत एशे ओसदिये, मतलब का बोली सी अंग्रेजी दु जॉली पर्सन | मुओं दी मूछ एक न राखदे, चिकणे बोणी रो रोंदे | स्मार्ट तो पोयली ओसदिये गोयली जवान !  भोत कोम उम्री म साब बोण गोए | एशि किश्मत सोबी री न उंडी बई | मेणती तो ओसी दिए, जोबे दे आय ब रोये तोबे दे लोको पोता लाग गोवा जे एशा ब साब उओं | पोयली आदे आदमी  इ ब पोता न थिए जे एशा कुई डपाटमेंट ब उओं जिले दा | मितोर एशे जू यारो रे यार | बाकी का बोली बी एब !

म्हारी साथी रेके आदमी थिए सिंघा जी, इब बई भ्होत बोडिया आदमी ओसदिये | पोड़े-लिक्खे सोब्बी दे जादा, डाक्टर ! पढ़ाई डाक्टर ... सिज्जा न सुए लाणी आला न थिए ! डॉक्टरेट री पढ़ाई कोरणी आला डाक्टर ! पोर जेरा ब मान न आपणी पड़ाई रा | कुई गमंड न ! बिलकुल सिंपल आदमी | देखणी तो जाणियो पातले शे रो चुरकदे बेज्जाई | हांडों पोर सरक... सरक.. सरक .. , बई जे मात्मा गांदी ब उओं था न आज तो तेसी ब पाछू छाड़दों थे | जे कोईं पोयदल ब चालणु पोड़ो थो तो हामो दे एक किलो मीटर आगे रों | तिसरा आदमी थिया तिसरे कनारे रा | शास्त्री, नांव पोता न का तेसरू | इशु ब नाव दु का राखो, काम से मोतलब ओणा चेई | बंदा इ ब भोत बोडिया ओसदिया ! बात एशि तो मुओ मेंदी उंडी न छाड़दे रो जे बोल पाई तो लाख टक्के री एक्के | छोटे कोद-काठी रा मेणती रो गंबीर माणु | पांदे दा कोवि, लिखदा रों कुछ न कुछ | बई चोथा आदमी आं तो आपणी तो का लाणी बी बात, एशिए बे आलमाल |

नोकरी लागरी, दिन भोरी ड्यूटी कोरुं रो ब्याल्के रा जु टेम बोचों तेदी म आपणे लिखणी पोडणी रा काम | छुट्टी उयों तो दिन बोरी बेठा रों आपणी घुरी दा | एक द्कान ओसदी घोरे तिओं द्कानी पाछ एक घुरी शि ओस दी बे | तिंदी भीतरी कताबी री ल्मारी रो कंप्यूटर रो पोता न का-का | एसरे तो एके इ काम चाये घोरे कुई पावणा-दावणा ब आई रों | एसरा जी न बोल्दा भेइंडे निकलणी ख | बस एदी  में इ खुश ओसदिया, लिखदा रों रो भेद्जा रों पत्रिका, अखबार रो पोता न का का, दुनिया भोरी रु कबाड़ राखों कोठू कोरी रो | एब का लाणी बात शुणदा तो आथि न कोसरी | अम्मा थी तो बोलों थी जे म्हारे एक तो बेशक ओसदिया पोर काम सारे कोरों | कामो री कुई कणाच न एब बेन मानदा | कोविता रे पाछे पोता न कोथ-कोथ घुम गुआ मुल्को दा | नोखे शोंख एशे भईया जू का लाणी बात !

पांचवें म्हारे गुरजी, बई मानगे बात | हामो मेंज सोबी दे बजुर्ग पोर एकदम नोजवान री साथी नोजवान | एक से बढ़ के एक शटराले मारों, जिंदादिल आमदी | हामो तो पोता न बई पोर लोको गेदा शुण राखा जे घोरे भोत काम कोरों | तकड़े जिमीदार रो एशि का चीज जू घोरो दी आथि न | होस्णी आली कविता तो खूब लिखो ब रो शणाओ ब बोड़े मोज़े से |

कुल मलाई रो एशि ओसदी बात जे सारे कोविता रे आदमी थिए | जाओं थे ब्याओ में, एक दोस्त ओस दिया सी ब कोवि तेसरा ब्या ओसदिया | एक कोवि रे ब्याओ ख न डोवे तोब कोथ जाणो बी ! तोब चाल रोये सारे | हास्सी मज़ाक ठाठे लांदे ! एषा तो आजकली कोस्सी ओसदिया टेम ! इए बे कोईं ब्या कारजों में जांदे जे थोड़ी भोत हास्सी मज़ाक कोरपा | “आज बचारा दुर्गु ब शईद ओजाणा बी |” गुरजी ए म्हारी बातो दा तोड़का लाया, रो सोबी ए ताड़ी मारी रो  हासी रे फ्वारे छाड़े |देइं एजा ध्यान थोई जे हामे पोंयची केथे रोये | आं तो आय ब आगली बेरिया रोया इथे उदा |” साब बोलणी लागा रो सोब चुप उई गोए | “रे तुमे चिंता न कोरो साब जी आं तुओं राचणी न देंदा, तुमे राम से बेठे रो |” गुरजी मोड़ काटदे शटेरिंग गमाया रो यू टर्न लोय रो नोए रोड़ो पांद गाड़ी दबाई दी | “लो जी इ लागा तारा मजुटली रा रोड़ | बस तुमे थुड़ी देर आपणी खुट्टी एल शेप में राखो, कुई पन्दरा मिंट में हाम पोंच ब जाणे |” बोलदे-बोलदे गुरजी ए देशबोर्डो पांदे दा मोबाइल चोका रो टेम ब देखा | “ठीक पांच बाजे हाम ब्याओ आले रे बेड़े दे ओंणे, एबी चार बाजी रो चवाली मिंट ओये | ”ओह ! आमे तो बोड़े शिग्गे पौऊँचे |” बाँव तानी रो डॉ साब बोलणी लागे | सोब एकी रेके री काणी देखि रो मुंडो दे हाथ फेरी रो उंडे पुंडे लागे घिसरणी | बेठे-बेठे सोब जोणे खोड़ी ब रोये थे एब | सोब आपणे-आपणे पाकिस्तान उंडे पुंडे घस्राई रो इनो ख राम लागे देणी | बेठी बेठी रो पिड़ो  लाग रोई थी | होस्दे-खेल्दे रोस्ता कोब कोट गोआ पोता इ न लागिये | गुरजिए गाड़ी बेक कोरो रो लाई दी | ड्रेवर साइड रा काला बोटण उबेख खेंचा रो सारे शीशे बोंद ओये गोए गाड़ी रे |

एक-एक कोरी रो सोब जोणे बाइंडे निकली रो उंडे-पुंडे ख झाड़ो पाछी पीठ फेरी रो खोड़े ओई गोए | उबके दी वाज आई

“लाड़े दा मामा आया रे नंधार

आया  रे नंधार ...

निले घोड़े दे शवार ...|”

साब मेरी काणी देखि रो बोलणी लागे “ये गीत मामा ...” हाँ मोये बीच में इ बात पाकड़ी | तुम बिलकुल ठीक पछाण कोरी साब, इ मामे रा स्वागत लागरा उणी | ठीक टेम रे हाम ब आए रो इनरे मलोखी ब आए बेड़े म ! मलोखी मतलब मामे इ ओ बे सी संस्कार गीत जिनो लिखणी री बात कोरों थे तुम साब जी | आज इनो सोब गीतो हाम रिकॉर्ड कोरोंगे रो तोब लिखोंगे | एक पंथ रो दू काज | ब्याओ रा ब्या रो काम रा काम | “बिलकुल ठीक बोलो तुयें |” मेरी काणी देखि रो डॉ साब बोलणी लागे | शास्त्री ब मूंड लकाणी लागा | सोबी ए आपणी आपणी बेलटी एशि कोशी जेशे एबी जाणो इन रे परेट कोरनी कोईं | साब रो डॉ आपणी कंवगी काड़ी रो मुंडो लागी पजोड़णी | मेरी रो शास्त्री री मुंडो तो पोयली क्रिकेटो रे मदान, हामो तो जरूरत आथी न कान्वगी री रो ना हम राखदे फाग्टो दी कान्वगी | हाम तो टोपी लाई रो राखों बई साची शि बात | न शीशा देखणा न बाल बणाणे | चलो बई चलो एब भोत उई गुए नोखरे | किये बोलो तुमे इ देख रोणे ब्याओ दे  कोसरे |” गुरजिए साब रो डॉ री पीठी दा स्यारा देई रो ऊबे ख दकेये | पाछे-पाछे दे आं रो शास्त्री ब चाल पोड़े | दो चार मिंट में हाम ब्याओ आले रे बेड़े दे थिए | म्हारे सामणे पारली काणी म्लोखी ! आगे-आगे बूढ़े–खाड़े तिनोरे पाछे नोजवान रो छूटू सोबी दी पाछे बोइरो, मुंडो पांद चुंटी लाई रो ओई री थी खोड़ी |

बोइरे मुओं दा चुंटी रा पाला थाम राख था जेशी ब्लो इनो कोयदी षडान लागरी उओं | ब्याव आले रे ग पांच–सात बोइरो मुंडो ग चुंटी और मुओं रे हाथ लायरो लांबी लेर देई रो लागरी थी ब्याव री गितो गाणी | एक लांबी शी बोइयर थी तिनरी ठोकणी, जिओं ख सी सोब बुआ बोलों थी | हाम बेठिये नाथी बस तिनरी गितो लागे शुणणी | हाम एक आदमी पुछा तो तिणीये बताओ जे इनो गितो री सार तो इए जाणो बे बुआ | इ बुआ भोत दुरके दी आई री |  “आछा जी, तोबे तो इ म्हारे बेगे काम की ओसो |” साब मेरी काणी देखियो लागे बुलणी | मोये बोलो बात करूँ | “ना ना गुरु जी एबी न, एबी इनो आपणे टोल दियो निपटाणे दाणिक |” साबे हाथ हिलाया | “देइं शुणो तो तुयें ... चुपे रो उदे |” डॉ बीचो दा बोला | बुआ ए लांबी लेर मारी रो पाछे दी रेकी बोइरो ब लागी गाणी “

“लो जी लो चाय पकोड़े खाओ, दुर्गु जेरा ख बीजी ओस दिया, एबी आला तुमो मिलणी | तुम राम से बेठो |” दो आदमी आए रो तिने चाय रे ग्लास रो नमकीन-बिस्कुट, पकोड़े री प्लेटो पकड़ाई | “हाशी बे भूख ब लाग री एब तो, खांदे ब रो, रो शुण दे ब रो |” गुरुजिये बोलो रो फोटाफोट प्लेट खाली कोर दी | म्लुखी रा स्वागत उणी लागरा था | टिक्के री रस्म, जेतणे मोर्द बूढ़े-नोजवान रो छूटू सोबी रा टिक्का | टिक्के में चोंकी चड़ाय रो टिक्का लगाओं, चोंकी द्वारो पांद रखी जाओं तोब मुओं दा लाड्डू देओं रो एक सूट | जेसरा टिक्का उओं सी थाली दे दश–बीष रुपैये राखला रो उतर जाला चोंकी पांदे दा | जेतणी बोइरी छूटी उल्ली म्लुखणी में, तिनरे सोबी रे टिक्के लाले रो माला पाले टाटी दी, लाड्डू ख्लाय रो मू मिठ्ठा कोरले |

शास्त्री ए बीच में छेड़ कोरी “हारे गुरु जी म्हारा ब कोरले इ टिक्का ? म्हारे ब खाणा था एक –एक लाड्डू |” सोब होसणी लागे, “कोरले तो कोरले बे ठोर जाओ जेरा” बुआ ए बात ताड़ पाई | टिक्के दा बाद मिलणा-चालणा उया रो म्लुखी री सेवा पाणी | हामो मोका मिल गोया बुआ री साथी बात कोरणी रा | हाम सोब बुआ रे दौरे  बेठ गुए रो लागे पुछणी जे कुण जे कुण संस्कार गीत हुए ब्याव रे एब्बी तक ? बुआ ए बोलो “तारे आणे दे पोयली कार संस्कार ओई गुआ क्योंकि सी ब्याव दा तीन दिनों पोयली ओ जाओं | मतलब कार रख देओं तेदरु गीत शणा देऊँ आं तुमो ख | बाकी तो तारे सामणे गाओंगे हाम, शुण दे रोइओ | शुणो

“लिखे-लिखे चिट्ठी बाना बानी जी नो भेजे...

आवना कि ना बानी तेरी राह में

निवें-निवें आवना, जरुरी ए”

अहा ! बुआ जी थारी जीबी पान्द तो साक्षात सुरसती बैठी ओसदी धनो तुमो ख | “ए तो थियु नोसु यानी दुल्हे री काणी दु रो लाड़ी री काणी दु केशो गावों बुआ जी” मुए बात आगे बड़ाई तो | “हाँ बेटा लाड़ी आले गाले... “शुणो बे

“लिखे-लिखे चिट्ठी बानी बन्ने जी नो भेजे

अइयो जी अइयो बाना मेरी राह में

निवें-निवें अइयो जरुरी ए |”

भई क़माल ओसदिये म्हारे संस्कार रो धनो तुम बुआ जी | तुम तो रस गुल देयों कानो दा आहा | बस तेतणीय ख एक बोइयर आई रो बुआ बलाई रो लो गुई | तोब हम रो गये थैठे !

हम ब उट्ठे तो घोरो पाछी दी पुडूये रो आवाज आई, तो हम ब तिओं काणी ख ओई हुए | खूब पुडुआ लाग्रा था ! बोइरे नाची नाची रो बेड़ा खुद दिया था | हम शुणणि लागे !

“जिज्जा भेंइदा न बैठदा कुर्शी बिना ...

जिज्जा भेंइदा न बैठदा कुर्शी बिना ...

जेशु केले रु ठूण्ड...

तेशो मेरे जिज्जे रु मूड...

जिज्जा भेंइदा न बैठदा कुर्शी बिना ...

जिज्जा भेंइदा न बैठदा कुर्शी बिना ...”

 होस्सी होस्सी रो बाक्खी दी पिड़ो लाग गुई | शास्त्री रो साब तो होस्सों बोइरी रा पुडुआ देखी देखी रो ...| हम उन्डू-पुंडू लागे देखणी “म्हारा एक बन्दा कोम ओसदिया कोथ डेया ? मोये बुल्लू तो सोब लागे देखणी ..” “ओहो साची बे डाक्टर कोथ उटा ? एबे का कोरी ?”  साब लागे बोलणी !


कहानी के बार में 

आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी हिमाचल के संस्कार गीतों के साथ साथ सिरमौरी की विवाह परंपरा की कुछ रस्मों की ओर संकेत करती है। इस सिलसिले की यह कहानी दो तीन खंडों में आएगी। पहले खंड में जिला सिरमौर में विवाह संस्कार गीतों को पहले दिन से यानी जिस दिन कार रखी जाती है, जिसे चिट्ठी भेजना भेजना भी कहा जाता है, वहाँ से विवाह संस्कार गीत देखने को मिलते हैं।

कहानी में कुछ रस्मों तक के गीत गाने के बाद, विवाह संस्कार पर किया जाने वाला लोकनृत्य (पुड़वा) दिखाया गया है, उसी के तहत कहानी का शीर्षक गीत है जिज्जा भेइंदा न बेठदा कुर्शी बिना।

कहानी की शुरुआत जिला भाषा अधिकारी के साथ इन विवाह संस्कार गीतों के डोकुमेंटशन के एक सफर पर निकलने से होती है। और विवाह समारोह स्थल पर इस यात्रा के साथ विवाह के गीत एक बुजुर्ग महिला के द्वारा प्रेक्टिकल रूप से गाए जाते हुये रेकॉर्ड भी किए जाते हैं और कुछ जिज्ञासाएँ भी शांत की जाती हैं उस बुजुर्ग महिला/गायिका से पूछ कर।    

अनंत आलोक

कवि, कहानीकार और अनुवादक।

तलाश (काव्य संग्रह-2011 ), यादो रे दिवे (सिरमौरी में हाइकु अनुवाद-2016), 

मिस 420 (ऑडियो उपन्यास-2021) पॉकेट ऍफ़. एम्. पर उपलब्ध एवं चर्चित | 

स्कैंडल पॉइंट और अन्य कहानियाँ- 2022 में प्रकाशित और चर्चा में |

सिरमौर कला संगम, हिमोत्कर्ष द्वारा सम्मानित।


Friday, September 26, 2025

अशोक दर्द दियां कवतां

चित्रकृति:सुमनिका 

 
पेश हन अशोक दर्द होरां दियां कवतां। 


   

धुप्प छां

पहाड़ां साई धुप्प छां ढौंह्दा रिया।

रोज तिल तिल करी छलौंदा रिया।।

 

 रक्खियां पल्याई छुरियां जिन्हां।

जाई अंगणे उन्हां दे बौंह्दा रिया ।।

 

केई लग्गे मगर मेरे हत्थां धोई।

फिरी बी बेफिक्र होई सौंदा रिया।।

 

केई ढकियां थियां  ख्वाबां दियां।

कदी लूंह्दा रिया कदी गौंह्दा रिया ।।

 

बिच्च रस्ते च जेह्ड़े  छड्डदे रेह् ।

उन्हां लोकां ने रस्ते कठौंदा रिया।।

 

बुणे - पट्टु कंबल मैं बुह्तेरे अपर।

भर हीयूंदे मैं नंगा ठह्णौदा रिया।।

 

इत्थे मिल्या नी मैहरम दिले दा कोई।

अंदरो अंदर मैं उम्रां घटौंदा रिया।।

 

लोकां थप्पी ने दाह् लाई झूठी ।

मिठिया गल्लां मैं रोज ठगौंदा रिया।।

 

जाह्लु कित्ती मती मैं भलमाणसी।

ताह्लु हट्टियां घराटां लटौंदा रिया।।

 

नी अपणे होए नी पराए लग्गे।

इदेह् रिश्ते मैं उम्रां हंडांदा रिया।।

 

कन्ने सूरजे दे मैं चलदा रिया ।

कदी चढ़दा रिया कदी घ्रोंदा रिया।।

 

दिक्खी नौंएं तमासे दुनिया दे ।

कदी हसदा रिया कदी रौंदा रिया।।

 

लेई दर्दे दिले दे अल्फ़ाज़ नित।

गीतां-  नज्मां दी मालां परौंदा रिया ।।


  2  

दिक्खी ने चुप रेई गिया...

उपजाऊ खेतर होई गे बंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।

वारे पारे खूनी मंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया ।।

 

कुते राम बणादा बड्डा कुत्ते अल्लाह ताला ए।

रोज लड़ादे मस्जिद मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

टुकड़े खातर लड़ियां बिल्लियां खूब तमासे कित्ते ।

बिल्लियां दे जज बणी गे बंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

भाईयां भाईयां बिच्च झमेले जोरू जोर जमीनां दे।

उट्ठदे नौंएं रोज बवंडर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

नैतिकता ईमानदारी ते कन्ने देस प्यारे दे।

खुन्ने होई गे सारे संदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पैसे सुट्टो करो पढ़ाई आज्ज जमाना पैसे दा ।

बणे दुकानां विद्या मंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

जिन्हां हत्थां उपकार हुंदे थे ओ बी इक्क जमाना था।

उन्हां हत्थां आज्ज पैने खंजर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

खूब कमाईयां कित्तियां लोकां काले धंधे करी करी।

बैट्ठे केई बणी सिकंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

बुक्कल़ी बिच्च छुपाई छुरियां मुक्खे राम उच्चारा दे।

बाहरे चिट्टे काले अंदर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।

 

पापां धरती गेई भरोई खूब सुणाया रोई ने।

किच्छ नी बोल्ले पीर पैगंबर दिक्खी ने चुप रेई गिया।।


  3  

कबता के लिखणी

दिले नी जेकर प्यार ता कबता के लिखणी ।

धोखे च रक्खै यार ता कबता के लिखणी ।।

 

हौन्न बूट्टे सब  ठुंडे ठुंडे  ते पौंग्र सुकी  सुकी ।

होए बदली सब नुहार ता कबता के लिखणी ।।

 

जे दूर बसेरे हौन्न दिल रुचेयां दिलदारां दे ।

अते हवै नी रुत बहार ता कबता के लिखणी ।।

 

दूर जाणी हवै जानी ते बिखड़े रस्ते हौन 

कने हौन सराबी कहार ता कबता के लिखणी ।

 

अपणा आप जलाणा  दुनिया दियां दर्दां ने ।

जे नी समझै संसार ता कबता के लिखणी । ।

 

एहसास नी समझै कोई डुल्ले बरकेयां पुर ।

अते नी मिलै दरकार ता कबता के लिखणी ।।

 

  4  

साह्ड़े हिमाचले दी नी रीस कोई...

अजेह् बी साह्ड़ेयां पहाड़ां च प्रेम प्यार जिंदा ऐ।

निक्केयां बड्डेयां दा आदर - सत्कार जिंदा ऐ ।।

 

अणछूयां रस्तेयां पर जित्थे विचरते देवते ।

चिट्टी चांदिया भरोई साह्ड़ी धार जिंदा ऐ ।।

 

इत्थे झूरिया गंगिया दी मिट्ठड़ी तान जिंदा ऐ ।

ढोल नगारेयां मिट्ठड़ी झंणकार जिंदा ऐ ।।

 

नौआं जमाना आया लोक लाक्ख बोल़ण ।

साह्ड़ा सुनार जिंदा ऐ साह्ड़ा लोहार जिंदा ऐ ।।

 

रैह्न्दे भाईयां साई हिंदू मुस्लिम ते सिक्ख ईसाई।

साह्ड़ेयां पहाड़ां च मोहब्बता दी नुहार जिंदा ऐ ।।

 

करी सकेया नी कोई पहाड़ां दा बाल़ बांका ।

साह्ड़ी संस्कृति जिंदा ऐ साह्ड़ा संस्कार जिंदा ऐ ।।

 

हरणातरां जातरां नुआल़ेयां दे इत्थे नाच जींदे ।

हास्सेयां ठट्ठेयां दी मिट्ठड़ी फुहार जिंदा ऐ ।।

 

पिज्जां ककड़ां दी बणां च हुंकार जिंदा ऐ ।

मोरां मोनाल़ां दी उच्चड़ी उडार जिंदा ऐ  ।।

 

पच्छिमी सभ्यता भवें कितणें ई रंग लाए ।

लोहड़ी सैंरी ते रल़ियां  दा साह्ड़ा हर त्योहार जिंदा ऐ ।।

 

पच्छिमी हवा नी साह्ड़ा किच्छ बिगाड़ी सकदी ।

साह्ड़ेयां पहाड़ां दी ठंडड़ी बयार जिंदा ऐ ।।

 

बेईमानिया ठग्गिया इ नी इत्थे पुच्छदा कोई ।

साह्ड़ा ईमान जिंदा ऐ साह्ड़ा ऐतवार जिंदा ऐ ।।

 

रक्खदा बुक्कतां  प्यासेयां दी प्यास बुझाणे दियां।

साह्ड़ा नौण जिंदा ऐ साह्ड़ा पणिहार जिंदा ऐ ।।

 

गिटपिट अंग्रेजिया च दुनिया लाक्ख लायै ।

साह्ड़िया हिमाचलिया दा अपणा मयार जिंदा ऐ ।।

 

साह्ड़े हिमाचले दी नी कोई रीस दर्द ।

जालु तक एह् चन्न सूरज ते संसार जिंदा ऐ ।।

 

  5  

मुश्कलां के करगियां

मुश्कलां के करगियां उसदा जनाब ।

परां च जिसदे हौसला है बेहिसाब ।।

 

नित नी भरोइयां रैंदियाँ नदियां कदी ।

रक्खयो सम्हाली दोस्तों चढ़दा शबाब ।।

 

धुप्प छां सब वक्त दे ई खेल ने ।

गरीबियाँ नी रैंदियाँ नित नी नबाब ।।

 

अपणे पसीने पुर जिसजो विश्वास है ।

अध्धे अधूरे रैंहदे नी उसदे ख्वाब ।।

 

पढ़ी नी सकेया ओ बी चाला वक्त दा ।

उंगलियां प करदा रिया जेहड़ा हिसाब ।।

 

खरा नी हुन्दा अंहकरियां ने उलझणा ।

खरा नी दैणा हरेक गल्ला दा जबाब ।।

 

कुत्ते दी जात अप्पू पुच्छैणी जांदी ऐ ।

उसदे अग्गे सुट्टी ने दिक्खो कबाब ।।

 

माहणुए दे बिच्च माहणु पढ़णे दी ।

दर्द नी दुनिया च मिल्दी कोई किताब ।।

अशोक दर्द
ख्यालां दी खुशबू (हिमाचली कविता संग्रह),
अंजुरी भर शब्द, संवेदना के फूल, धूप छांव, बटोही (हिन्दी कविता संग्रह),
सिंदूरी धूप (कहानी संग्रह)
,
मेरे पहाड़ में और महकते पहाड़ - कविता संग्रह (संपादित),
कई पुरस्कारां नै सम्मानित