फौजियां दियां जिंदगियां दे बारे च असां जितणा जाणदे, तिसते जादा जाणने दी तांह्ग असां जो रैंह्दी है। रिटैर फौजी भगत राम मंडोत्रा होरां फौजा दियां अपणियां यादां हिंदिया च लिखा दे थे। असां तिन्हां गैं अर्जी लाई भई अपणिया बोलिया च लिखा। तिन्हां स्हाड़ी अर्जी मन्नी लई। हुण असां यादां दी एह् लड़ी सुरू कीती है, दूंई जबानां च। पेश है इसा लड़िया दा तीह्उआं मणका।
.....................................................................
समाधियाँ दे परदेस च
अरुणाचल प्रदेश दे लुम्पो
च पोस्टिंग दे टैमे मिंजो आर्मी क्लर्क्स ट्रेनिंग स्कूल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) च हेड क्लर्क ड्यूटी कोर्स ताँईं
भेज्या गिया था। तिस कोर्स ताँईं कुसी दी उम्मीदवारी दा फैसला आर्टिलरी
रिकॉर्डज, नासिक रोड कैंप च कित्तेया जाँदा था।
उम्मीदवार चुणने ताँईं, होरनीं शर्ताँ कन्नै, सीनियोरिटी दा खास वजन होंदा था। औरंगाबाद पोंह्ची करी उम्मीदवाराँ जो अगले दिन इक
लिखित म्तिहान देणा पोंदा था। मेरी यूनिट जो
तिस कोर्स ताँईं मेरे चुणे जाणे दी खबर देणे वाळिया चिट्ठिया च साफ-साफ लिखोह्या था
कि मिंजो तित्थू खूब पढ़ी नै तियार होयी करी जाणा था। जेकर तिस म्तिहान च कोई फेल होई जाँदा था ताँ तिस्सेयो
तिस कोर्स ते कढी दिंदे थे कनै वापस यूनिट च
घली दिंदे थे। नायब सूबेदार बणने ताँईं तिस
कोर्स जो पास करना इक जरूरी शर्त होंदी थी।
तित्थू कम्म दा बोझ ज्यादा
होणे दिया वजह ते मिजों तिस कोर्स दे एंट्रेंस एग्जाम ताँईं तियारी करने ताँईं टैम
नकाळणा मुश्कल होआ दा था। मेरे कमाण अफसर
इसा गल्ला जाणदे थे। मिंजो व्ह्ली प्रैक्टिकल
गियान था पर इम्तिहान ताँईं थ्योरैटिकल गियान होणा भी बहोत जरूरी था। लुम्पो च मिजों
व्ह्ली कोई मटीरियल नीं था जिस्सेयो पढ़ी करी मैं अपणा थ्योरैटिकल गियान बद्धायी सकदा। हाँ, तित्थू मेनुअल ऑफ मिलिट्री लॉ दे चारेह्यो
वॉल्यूम कनै डिफेंस सर्विसेज रेगुलेशंस (डी एस आर) दे दोह्यो वॉल्यूम थे जिन्हाँ पर
मैं टैम मिलणे पर नजर मारी लैंदा था।
सैह् कोर्स छे हप्तेयाँ दा
था। मैं कमाण अफसर दे अग्गैं अरज कित्ती कि मिंजो कोर्स खत्म होणे ते परंत घर जाणे
ताँईं बीह् दिनाँ दी कैजुअल लीव दित्ती जाए जेह्ड़ी मंजूर होयी गयी थी। तिसते मिंजो लुम्पो ते इक बरी ही थल्लैं लोह्णा
पोणा था। जिंञा कि मैं पहलैं भी इस गल्ल दा जिक्र कित्तेह्या है कि मिजों तिन्हाँ पहाडाँ
गास चढ़णे च कोई मुश्कल नीं होंदी थी अपर उतरने च जाह्नूं बड़े दुखदे थे।
सैह् कोर्स फौज दे तमाम आर्म्स
कनै सर्विसेज दे चुणेह्यो हौळदार क्लर्कां ताँईं था। मैं दोपहराँ परंत औरंगाबाद पोंह्ची गिया था। तित्थू किछ लोक मेरे पैह्ले ते वाकम थे जिन्हाँ
सौगी मैं तिस स्कूल च तकरीबन पंद्रह साल पैह्लैं अपणी रंगरूटी दी नौ महिनेयाँ दी एडवाँस्ड
ट्रेनिंग पूरी कित्तिह्यो थी। तिन्हाँ कन्ने
गल्लबात करी नै मिजों पता चल्लेया था कि अगले दिनैं होंणे वाळे म्तिहान च ऑब्जेक्टिव
टाइप सुआल ओंणे वाळे थे। तिन्हाँ च कइयाँ व्ह्ली
चार पंज-पंज कागद थे जिन्हाँ च सुआल कनै तिन्हाँ दे जवाब टाइप कित्तेह्यो थे। मैं कइयाँ ते लई करी खडोतैं-खड़ोतैं ही तिन्हाँ
कागदाँ पर नजर मारी जिसते मेरी जाणकारी ताजी होयी गयी। तित्थू तकरीबन सौ दे अक्ख-बक्ख
हौळदार आह्यो थे। अगलैं दिनैं म्तिहान होया
कनैं मैं पास होई गिया। म्तिहान दा नतीजा निकळने परंत चार-पंज हौळदार चैंपियन बणाये
गै जिन्हाँ च इक मैं भी था। जिसदा मतलब था कि मैं ठीक-ठाक नंबर लई करी पास होह्या था।
तित्थू जेह्ड़ा किछ भी इंस्ट्रक्टर
पढाँदे थे, मैं तिस्सेयो ध्यान लगायी नै सुणी-समझी करी स्कूल च ही चलदा-फिरदा दोहराई
लैंदा था। मते लोक देर राती तिकर पढ़दे रैंह्दे
थे। मैं चैन दी निंदर सोंदा था। आखिर कोर्स
खत्म होया, फाइनल टेस्ट होया कनैं सारेयाँ जो अपणियाँ-अपणियाँ यूनिटाँ च भेजी दित्ता
गिया। म्तिहान दा रिजल्ट यूनिटाँ जो भेज्या
जाणा था। मिंजो व्ह्ली लीव सर्टिफिकेट था इस ताँईं मैं सिद्धा अपणे गाँओं चला गिया।
छुटी कट्टी नै रेलगडिया च बैठी करी असम दे मीसामारी ट्राँजिट कैम्प च पोंह्ची गिया। तित्थु ते फौजी गडियाँ दे काफले च तवाँग ताँईं चली पिया। रस्ते च सेसा नाँयें दिया ठाहरी ते पहलैं
पोणे वाळे 'कर्नल मोड़' च अपणे जाण-पछाण दे गुजरी चुक्केह्यो कर्नल अनिल दामोदर धरप
होराँ दिया समाधिया जो सलूट कित्ता था। कर्नल
साहब होराँ दे बारे च मैं इसा लड़िया दे पंजमें, छठे कनै पंद्रह्में मणकेयाँ च जिक्र
कित्तेह्या है।
तवाँग च पोंह्ची नै, तिस इलाके
दे होआ-पाणी च ढळनें परंत, मैं किछ होर साथियाँ सोगी, इक ट्रक 1 टन च बैठी नै 'गोरसम'
जाई रिहा। तित्थू ते लुम्पो ताँईं पैदल चढ़ाई चढ़नी पोंदी थी। तिस चढ़ाई च कई जगहाँ पर
शार्ट कट थे। तित्थू शार्ट कट मारना इक खतरनाक कम्म होंदा था अपर समै कनै मेहनत दी
भली-चंगी बचत होई जाँदी थी। शार्ट कट मारने ताँईं कुत्थी दरख्ताँ दियाँ जडाँ जो ताँ
कुत्थी ड़ाळियाँ जो पकड़ी करी उप्पर गोह्णा पोंदा था।
तैह्ड़ी चढ़ाई चढ़दे बग्त, तकरीबन
अद्धे रस्तैं, मिंजो जिमिथांग दे नेडैं अपणी यूनिट दे कमाण अफसर, उपकमाण अफसर कनै कुआटर
मास्टर मेजर सुंदर दास कबीर होराँ मिल्ले। सैह् ज़िमीथांग ते लुम्पो वापस जाह्दे थे।
मैं कमाण अफसर होराँ जो सलूट कित्ता। तिन्हाँ सलूट दा जवाब देई करी मिंजो ते पुच्छेया,
"आ गये?"
"हाँ, सर" मैं अपणे
फुल्लेह्यो साह जो काबू करने दी कोसस करदे होयें जवाब दित्ता।
"घर में सब ठीक हैं?"
"जी, सर।"
तिन्हाँ औरंगाबाद वाळे कोर्स
दे बारे च किछ भी नीं पुच्छेया। तिसते मिंजो लग्गेया कि कुत्थी मेरा रिजल्ट खराब नीं
रिहा होये। किछ दूर तिकर ताँ मैं तिन्हाँ पिच्छैं-पिच्छैं चलदा रिहा अपर जिंञा ही चौड़ा
रस्ता मिल्लेया, मैं तिन्हाँ गाँह होयी गिया। मेजर कबीर होराँ भी मिजों कन्नै-कन्नै
चलणा लग्गे। चाणचक सैह् मिजों ते पुच्छणा लग्गे, "ओ मुन्नू, तू कोर्स च फर्स्ट
कैंह् नीं आया?"
"सर, मैं समझेया नीं!"
मैं तिन्हाँ पासैं हैरान होयी करी दिक्खणा लग्गा।
"मुन्नू, तू सारे कोर्स
च सेकंड आह्या, मिंजो तिज्जो पर फक्र है" मेजर साहब होराँ मिंजो दस्सेया था।
(मेजर सुंदर दास कबीर होराँ
हिमाचल प्रदेश दे हमीरपुर ते थे। तिन्हाँ दी दुःखद मौत अरुणाचल प्रदेश च ही होयी थी।
तिसा घटना दा जिक्र मैं इसा लड़िया दे पचीह्मे मणके च कित्तेह्या है।)
मैं खुस होया था कि मैं पास
होयी गिह्या था। यूनिट च पोंह्ची करी पता चल्लेया था कि औरंगाबाद दे तिस स्कूले ते
कमाण अफसर होराँ जो इस मामले च इक डी.ओ (डेमी ऑफिसियल) लेटर आह्या था।
आर्मी क्लर्क्स ट्रेनिंग स्कूल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) च सारेयाँ
फौजी क्लर्कां जो अपणी सर्विस दे दौरान घट ते घट दो बरी जाणा ही पोंदा था। पहली बरी
सैह् तित्थू नौ महीनेंयाँ दी शुरआती ट्रेनिंग पूरी करी नै सिपाही क्लर्क बणदे थे कनै
दूजी बरी छे हप्तेयाँ दा 'हेड क्लर्क्स डयूटीज' कोर्स पूरा करी नै हौळदार क्लर्क नायब सूबेदार
बणने ताँईं इक जरूरी शर्त पूरी करी लैंदे थे।
जिंञा कि मैं इसा लड़िया दे चौबह्मे मणके च दस्सेह्या है, पहले नौ महीनेंयाँ
दी ट्रेनिंग दे दौरान सारेयाँ रंगरूटाँ जो ‘माइनर स्टाफ ड्यूटीज' पढ़ाइयाँ जाँदियाँ
थियाँ। फौजी अफसराँ जो सैही ‘स्टाफ ड्यूटीज'
स्टाफ कॉलेज च पढ़ाये जाणे दा रूल है। इसदे
इलावा तित्थू ‘मिलिट्री लॉ' कनै जनरल इंग्लिश पढ़ाये जाँदे थे, कन्नै ही टाइपिंग दी
घणी प्रेक्टिस करायी जाँदी थी। यूनिट दी डॉक्यूमेंटेशन
दी विस्तार च जाणकारी दित्ती जाँदी थी कनै तिसदी प्रेक्टिस करायी जाँदी थी। छे हप्तेयाँ
दी दूजी ट्रेनिंग दे दौरान टाइपिंग कनै जनरल इंग्लिश जो छड्डी करी बाकी बचेह्याँ दूजे
सब्जेक्टाँ कनै ऑफिस मनेजमेंट पर जोर दित्तेया जाँदा था। फौज पर होणे वाळे खर्च जो घट करने दी कार्रवाई दे
चलदे भारत सरकारें तिस स्कूल जो सन् 1993-94 दे आसपास डिसबैंड करी दित्ता था जिसदा
फौज दे क्लर्कां दे स्टैण्डर्ड पर बुरा असर पिया था। हुण फौजी क्लर्क अपणे-अपणे ट्रेनिंग
सेंटराँ च ही ट्रेंड कित्ते जाँदे हन्न।
कंप्यूटराँ दे चलण ते अज्जकल सैह् कई कम्म फौजी अफसर
करदे सुझदे हन्न जिन्हाँ जो म्हारे बग्ताँ च क्लर्क करदे थे।
.....................................................................
समाधियों के प्रदेश में (तीसवीं कड़ी)
अरुणाचल प्रदेश के लुम्पो
में सेवाकाल के दौरान मुझे आर्मी क्लर्क्स ट्रेनिंग स्कूल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में हेड क्लर्क ड्यूटी पाठ्यक्रम
(कोर्स) के लिए भेजा गया था। उस कोर्स के लिए किसी की पात्रता का निर्णय तोपखाना
अभिलेख, नासिक रोड कैम्प में लिया जाता था।
प्रत्याशी चुनने का मुख्य मापदंड, अन्य शर्तों के साथ, उसकी वरिष्ठता होता था।
औरंगाबाद पहुंच कर अगले दिन प्रत्याशियों को एक लिखित प्रवेश परीक्षा से गुजरना
पड़ता था। मेरी यूनिट को उस पाठ्यक्रम के लिए मेरे चयन की सूचना देने वाले पत्र में
स्पष्ट तौर पर लिखा था कि मुझे वहाँ अच्छी तरह पढ़ाई करके तैयार हो कर जाना था। अगर
उस प्रवेश परीक्षा में कोई फेल हो जाता था तो उसे उस पाठ्यक्रम में शामिल न करके वापस
यूनिट में भेज दिया जाता था। नायब सूबेदार बनने के लिए इस पाठ्यक्रम को पास करना एक
अनिवार्य शर्त हुआ करती थी।
वहाँ कार्यभार अधिक होने के
कारण मुझे उस पाठ्यक्रम की प्रवेश परीक्षा के लिए तैयारी के लिए समय निकालना कठिन हो
रहा था। मेरे कमान अधिकारी इस बात से परिचित थे। मेरे पास व्यावहारिक ज्ञान तो था पर
परीक्षा के लिए सैद्धांतिक ज्ञान होना अति जरूरी था। लुम्पो में मेरे पास कोई सामग्री
नहीं थी जिसे पढ़ कर मैं अपना सैद्धांतिक ज्ञान बढ़ा पाता। हाँ, वहाँ मेनुअल ऑफ मिलिट्री लॉ के चारों खंड और डिफेंस सर्विसेज
रेगुलेशंस (डी एस आर) के दोनों खंड उपलब्ध थे जिन पर में समय मिलने पर नजर डाल लेता
था।
वह पाठ्यक्रम छह सप्ताह का
था। मैंने कमान अधिकारी से प्रार्थना की कि मुझे कोर्स की समाप्ति के बाद घर जाने के
लिए बीस दिन का आकस्मिक अवकाश दिया जाए जिसे स्वीकार कर लिया गया था। इससे मुझे लुम्पो
से एक ही बार नीचे उतरना पड़ना था। जैसा कि मैंने पहले भी इस बात का जिक्र किया है
कि मुझे उन पहाड़ों पर चढ़ने में कोई कठिनाई नहीं
होती थी परंतु उतरने में घुटने बहुत दर्द करते थे।
वह पाठ्यक्रम थलसेना की समस्त
आर्म्स और सर्विसेज के चयनित हवलदार क्लर्कों के लिए था। मैं दोपहर बाद औरंगाबाद पहुंच गया था। वहाँ कुछ लोग मेरे पूर्व परिचित थे जिनके साथ मैंने
उसी स्कूल में तकरीबन पन्द्रह वर्ष पहले अपनी रंगरूटी का नौ मास का अग्रिम प्रशिक्षण
पाया था। उनसे बातचीत करके मुझे पता चला कि
अगले दिन होने वाली परीक्षा में ऑब्जेक्टिव टाइप प्रश्न आने वाले थे। उनमें से कईयों के पास चार पांच-पांच कागज थे जिनमें
प्रश्न और उनके उत्तर टाइप किये हुए थे। मैंने
कई लोगों से ले कर खड़े-खड़े वे पेपर पढ़े जिससे मेरी जानकारी तरोताजा हो गयी। वहाँ तकरीबन सौ के आसपास हवलदार आये थे। अगले दिन परीक्षा हुई और मैं पास हो गया। परीक्षा
परिणाम के बाद चार पांच 'चैंपियन' मनोनीत किये गये जिनमें एक मैं भी था। जिसका अर्थ था कि मैं अच्छे नंबर लेकर पास हुआ था।
वहाँ जो कुछ भी इंस्ट्रक्टर
पढ़ाते थे मैं उसे ध्यान से सुन-समझ कर स्कूल में ही चलते फिरते दोहरा लेता था। कई लोग देर रात तक पढ़ते रहते थे। मैं आराम की नींद सोता था। अन्ततः कोर्स समाप्त
हुआ, फाइनल टेस्ट हुआ और सभी को अपनी-अपनी यूनिटों में भेज दिया गया। परीक्षा परिणाम बाद में यूनिटों को भेजा जाना था।
मेरे पास छुट्टी का प्रमाणपत्र था अतः मैं
वहाँ से सीधा अपने गाँव चला गया। छूटी काट
कर रेलगाड़ी में बैठ कर असम के मीसामरी ट्राँजिट कैम्प में पहुंचा। वहाँ से सैनिक कॉन्वॉय में तवाँग के लिए रवाना हुआ।
रास्ते में सेसा नामक स्थान से पहले पड़ने वाले 'कर्नल मोड़' पर मैंने अपने परिचित स्वर्गीय
कर्नल अनिल दामोदर धरप की समाधि को सेल्यूट किया था। कर्नल साहब के बारे में मैंने
इसी श्रृंखला की पांचवीं, छठी और पन्द्रहवीं कड़ी में ज़िक्र किया है।
तवाँग में पहुंच कर अनुकूलन
की प्रक्रिया से गुजरने के उपराँत, मैं कुछ अन्य साथियों के साथ, एक ट्रक 1 टन में
गोरसम पहुंचा। वहाँ से लुम्पो के लिए पैदल
चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। उस चढ़ाई में कई जगहों पर शार्ट कट थे। वहाँ शार्ट कट मारना एक जोख़िम
भरा काम था परंतु समय और श्रम की अच्छी खासी
बचत हो जाती थी। शार्ट कट मारने के लिए कहीं
वृक्षों की जडों तो कहीं टहनियों को पकड़ कर ऊपर चढ़ना पड़ता था।
चढ़ाई चढ़ते समय तकरीबन आधे
रास्ते में, जिमिथांग के पास, मुझे अपनी यूनिट के कमान अफसर, उपकमान अफसर व क्वार्टर
मास्टर मेजर सुंदर दास कबीर मिले। वे ज़िमीथांग से लुम्पो लौट रहे थे। मैंने कमान अफसर को सैल्यूट किया। उन्होंने सैल्यूट
का जवाब दे कर मुझ से पूछा, "आ गये?"
"हाँ, सर" मैंने अपनी फूली हुई सांस को काबू करने का प्रयास
करते हुए जवाब दिया।
"घर में सब ठीक हैं?"
"जी, सर।"
उन्होंने औरंगाबाद वाले कोर्स
के बारे में कुछ भी नहीं पूछा। उससे मुझे लगा कि कहीं मेरा रिजल्ट खराब न रहा हो। कुछ दूरी तक तो मैं उनके पीछे-पीछे चलता रहा परंतु
जैसे ही चौड़ा रास्ता मिला मैं उनसे आगे हो गया।
मेजर कबीर भी मेरे साथ-साथ चलने लगे।
अचानक वे कहने लगे, "ओ मुन्नू, तू कोर्स च फर्स्ट कैंह् नीं आया?"
"सर, मैं समझेया नीं!"
मैं उनकी तरफ हैरान होकर देखने लगा।
"मुन्नू, तू सारे कोर्स
च सेकंड आह्या, मिंजो तिज्जो पर फक्र है" मेजर साहब ने मुझे बताया था।
(मेजर सुंदर दास कबीर हिमाचल
प्रदेश के हमीरपुर से थे। उनका दुःखद देहाँत अरुणाचल प्रदेश में ही हुआ था। उस घटना का जिक्र मैंने इस शृंखला की पच्चीसवीं
कड़ी में किया है।)
मैं खुश हुआ था कि मैं पास
हो गया था। यूनिट में पहुंच कर पता चला था, औरंगाबाद के उस स्कूल से कमान अधिकारी महोदय
के पास इस विषय में एक डी.ओ (डेमी ऑफिसियल) लेटर आया था।
आर्मी क्लर्क्स ट्रेनिंग स्कूल, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में हर सैनिक
क्लर्क को अपने सेवाकाल के दौरान कम से कम
दो बार जाना ही पड़ता था। पहली बार वे वहाँ नौ महीने का प्रारंभिक प्रशिक्षण
पाकर सिपाही क्लर्क बनते थे और दूसरी बार छह सप्ताह का 'हेड क्लर्कस डयूटीज' कोर्स
पूरा करके हवलदार क्लर्क नायब सूबेदार बनने के लिए एक आवश्यक योग्यता हासिल कर लेते
थे। जैसा कि मैंने इसी शृंखला की चौबीसवीं
कड़ी में लिखा है पहले नौ महीने के प्रशिक्षण के दौरान सभी प्रशिक्षणार्थियों को ‘माइनर
स्टाफ ड्यूटीज' पढ़ायी जाती थीं। सैन्य अधिकारियों
को यही ‘स्टाफ ड्यूटीज' स्टाफ कॉलेज में पढ़ाए जाने का प्रवधान है। इसके अतिरिक्त वहाँ ‘मिलिट्री लॉ' व जनरल इंग्लिश
पढ़ाये जाते थे और टाइपिंग का गहन अभ्यास कराया जाता था। यूनिट की डॉक्यूमेंटेशन की विस्तृत जानकारी दी जाती
थी व उसका अभ्यास करवाया जाता था। छह सप्ताह
के दूसरे प्रशिक्षण के दौरान टाइपिंग और जनरल इंग्लिश को छोड़ कर शेष अन्य विषयों और ऑफिस प्रबंधन पर जोर
दिया जाता था। सेना पर होने वाले खर्च को कम
करने की प्रक्रिया के चलते भारत सरकार ने उस स्कूल को सन् 1993-94 के आसपास विघटित
कर दिया था जिसका सेना में क्लर्कों के स्तर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा था। अब सैनिक
क्लर्क अपने-अपने ट्रेनिंग सेंटरों में ही प्रशिक्षित किये जाते हैं।
कंप्यूटरों के प्रचलन से आजकल वे कई कार्य सैन्य अधिकारीगण
करते दिखाई पड़ते हैं जिन्हें हमारे जमाने में क्लर्क किया करते थे।
 |
हिमाचल प्रदेश के जिला काँगड़ा से संबन्ध रखने वाले भगत राम मंडोत्रा एक सेवानिवृत्त सैनिक हैं। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं ― जुड़दे पल, रिह्ड़ू खोळू, चिह्ड़ू मिह्ड़ू, परमवीर गाथा.., फुल्ल खटनाळुये दे, मैं डोळदा रिहा, सूरमेयाँ च सूरमे और हिमाचल के शूरवीर योद्धा। यदाकदा 'फेस बुक' पर 'ज़रा सुनिए तो' करके कुछ न कुछ सुनाते रहते हैं। |