Sunday, May 10, 2015

पले दी पछैण पीड़ उमरी दी होई गई



हिमाचल दिया जमीना ने जुड़यो कवि मधुकर भारती होरां दा चाणचक्‍क देहांत होई गिया। तिन्‍हां लीखीया इकी चीठीया ने द्विज जी मधुकर होरां जो याद करा दे। 

हिमाचल मित्र दे सच्‍चे मित्‍तर जो पहाड़ी दयार दी श्रद्धांजली।   

 30 अप्रैल 1996 जो मेरे पिता श्री मनोहर साग़र पालमपुरी जी दे स्वर्गवासी होणे पर भाई मधुकर  भारती जी दा संवेदना संदेस                                   
                                   
 
30 अप्रैल 1996 को मेरे पिता जी स्वर्गवास्सी होये थे  अप्रैल-मई दे सैह दिन बुरे पुड़दे मिंजो। प्रकाश बादल भाईऐं ने 2 मई जो भाई मधुकर भारती दे बेमोक्के स्वर्गवास्सी होणे दी  बुरी खबर दित्ती . दुःखें दुखे ने गल कित्ती  ”पिता जी दा बैग ”  चाणचक्क  याद आया मधुकर भाई सम्वेदना सन्देसे कने तिस  बैग्गे   मिल्ले मिंजो इसा चिठिया कने दम दलास्सा दिँदै चिट्ठी बाहज्जी तरीक्का ते अपण मिंजोे यह चिठ्ठी मई महींने दे पहले हफ्ते मिल्ली थी .मिन्जो पक्की याद . ताहल्लू  असां दा सारा टब्बर  सोग्गे था . कने इबकिया  मई मई  "चोरिया चली " चले गए  भाई मधुकर भारती जी भी।
                                                                                          "पले दी पछैण पीड़ उमरी दी होई गई"

मई 1996

"सैह कितणा उच्चा माह्णू था
बेदाग जहान्ना ते निकळी गेया
साग़र इक कण था धर्ती पर
जेह्ड़ा तिक्खेयाँ तुफान्नाँ ते निकळी गेया"

प्रिय भाई द्विजेन्द्र और नवनीत,

अन्तत: मनोहरसागरब्रह्मण्डीय महासागर में लीन हो गए। समाचार पत्रों में खबर पढ़ते ही मेरे मस्तिष्क पर कुछ वर्षों पहले का दृश्य कौंध गया_ दूरदर्शन केन्द्र जालन्धर की कैंटीन का वह दृश्य जहाँ पहली और अंतिम मुलाकात उस शख़्स से हुई थी जिसने मुझे अन्दर तक प्रभावित कर लिया था. पहाड़ी साहित्य संसार में व्याप्त काँगड़ी- महासुवी तनाब के उन दिनों में जिस आत्मीयता से मेरी कविता सुनकर मुझे अपनी गर्मजोशी से बाहों में भर लिया था, मैं तो एकदम भावाकुल हो गया था.
जालन्धर की गर्मी और उस पर चाय- मेरे माथे पर पसीना झलक रहा था. उन्होंने झट से अपना एक शे दे मारा:

ज़र्द चेहरे पे क्यों पसीना है
ज़िन्दगी जेठ का महीना है!

मुझे थोड़ा हतप्रभ-सा देख कर दूसरा शे जड़ दिया:

एक अँगूठी है दिल मेरा जिसमें
आपकी याद इक नगीना है!
इसके बाद उनसे मिलने का कभी जोग नहीं बना पर उनकी रचनाओं को पढ़ने की उत्सुक्ता जगी. कई ग़ज़लें कभी आकाशवाणी से सुन लेता था. लेकिन पहाड़ी कविताएँ और ग़ज़लों की हमेशा तलाश रही. उनकी कोई पुस्तक मेरी नज़रों से नहीं गुज़री. फिर भी कुछ रचनाएँ यत्र-तत्र मैं देख ही लेता . उनकी दो कविताएँ: ”हौळें-हौळें बगदिए ब्यासेतथा "प्हाड़ाँ दी राणी" मुझे बहुत अच्छी लगीं.

पहाड़ी भाषा में अंतर-निहित लय और गेयता के गुणों से भरपूर रचनाएँ हैं. दोनों ही कविताओं में केवल भौगोलिक परिवेश स्पष्ट दिखता है बल्कि पहाड़ी मानस का अंतरमन भी अपना मोहक और प्यारा रूप दर्शाता है. सम्भवत: उस क्षेत्र का अकेला रचनाकारसाग़रही है जिसने यौवन के भार को सेब की झुकी डाली से उपमित किया है! मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि नारी-सम्मान की अभिव्यक्ति की सशक्तता निम्नलिखित जैसे टुकड़ों में पूरी रचनात्मकता से उभर कर सामने आई है:

लाह्ड़़-सुआड़ाँ पुट्टी- खुट्टी कदी इसादे अंग नी दुखदे
इसदे लौहुए दे सेक्के ने बर्फ़्हा बिच भी घियान्ने भखदे
एह दुख पीड़ाँ जरदी आई उमरीं  होएयाँ सांजो दिखदे
लम्मियाँ बत्ताँ हण्डी- हण्डी  कदि इसा दे पैर नीं दुखदे
इद्दे दुधूनुएँ दुध नीं सुअकदा, इसा दे कण्ठे गीत नी मुकदे
एह प्हाड़ाँ री प्यारी बेटी, इसा साह्म्णे अम्बर झुकदे
                           (प्हाड़ाँ दी राणी)

आपके पिछले पत्र में साग़र साहब की बीमारी का ज़िक्र था पर मैणे यह नहीं सोचा था कि वे इतनी जल्दी विदा ले लेण्गे.उनकी उम्र अभी इतने अधिक नहीं थी. सारी उम्र काम करने के बादब धूप सेंकने की बारी थी उनकी. नवनीत भाई अभी पढ़ ही रहे हैं: संभवत: आपको भी उनकी आवश्यक्ता थी. हो सकता है अपनी अगली पीढ़ी के लिए लिए उनके जो स्वप्न थेउन्हें यथार्थ में बदलने के लिए वे काम करना चाह रहे हों परन्तु वे सपने अब आपके हवाले कर गए हैं. आप दोनों तथा अन्य बच्चों में अपना लहू उछालें मारता देखकर उन्हें कितना सुकून मिलता होगा, पर उन्हीं के शब्दों में:दैनिक भास्कार

समें दिया धूड़ी इक मिली जाणाँ सबनीं
चलदेयाँ सुआस्साँ खरे कम्म कमाई दिखिए

पूरी करने तियें हर आस अधूरीसाग़र
ल्हुए ने निश्चे दी इक जोत जगाई दिखिए

" सर्जक परिवार आपके इस दु:  में सम्वेदना प्रकट करता है. हम आशा करते हैं कि आप सब इस दु: से जल्दी ही उबर कर रचनात्मकाता में व्यस्त हो जाएँ. उनके प्रति यही सच्ची श्रद्धान्जलि होगी. उनकी आत्मा को तभी चैन मिलेगा.

द्विज भाई अब तो यही कह सकता हूँ कि:

"पल भर बणे थे जे अपणे गुआच्ची गए
पले दी पछैण पीड़ उमरी दी होई गई"


आपका
मधुकर भारती




6 comments:

  1. याद करने दा एह तरीका बड़ा ई खरा लग्‍गा। कुशल जी चिठिया दी फोटो भी। मधुकरें जेह्ड़े मोती परोयो, तिन्‍हां दे भी दर्सन होई जांह्गे।

    ReplyDelete
  2. शल भाई जी
    मघुकर भाई चिठिया दे फ़ोटो लाई ने यह पोस्ट होर भी निखरी गई।
    अज्ज भाई प्रेम भारद्वाज होरां दी भी पुण्य तिथि है।
    मई सच्च इ बुरा पुड़दा। मई च ता दिले दमाक्के पर मई दयोई जांदा।गळ घटोई घटोई जांदा। कैसियाँ कैसियाँ सूरतां बगतें असां ते खोहयी लईया। क्या हीरे थे यह सब लोक। समें दिया धूडी च समाई ने भी जिन्हां दे ख्याल्लां दी लौ कायम ऐ।

    ReplyDelete
  3. अज्ज भाई प्रेम भारद्वाज होरां दी भी पूण्य तिथि ऎ।

    ReplyDelete
  4. द्विज जी चिठिया दा फोटू लाणे दी सोच अनूप सेठी होरां दी थी। सेठी होरां दे सौंदर्य बोध जो सलाम।
    डॉ. प्रेम भारद्वाज होरां दी अज पुण्य तिथी है। मेरा तिन्हां ने इक बरी ही मिलना होया था पर याद करी आखीं अज भी भरोई गईंयां। तिन्हां दी यादां जो पहाड़ी दयार दी श्रद्धांजली।

    ReplyDelete
  5. मिंजो कदी दर्शनां दा मौक़ा नी मिल्ला। अंतिम यात्रा च शामिल होया था। बाद च हिमाचल मित्र ताईं पवन होरां दे बड़े भावां भरे संस्मरण छापने दा सुभाग मिल्ला हा।

    ReplyDelete
  6. मिंजो कदी दर्शनां दा मौक़ा नी मिल्ला। अंतिम यात्रा च शामिल होया था। बाद च हिमाचल मित्र ताईं पवन होरां दे बड़े भावां भरे संस्मरण छापने दा सुभाग मिल्ला हा।

    ReplyDelete