पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Saturday, August 15, 2020

वसंत आबाजी डहाके होरां दियां कवतां

महेश वर्मा : जलरंग 


अज मराठी भाषा दे कवि वसंत आबाजी डहाके होरां दियां पंज कवतां दी त्रिधारा पेश है। मूल कवतां सौगी हिमाचली पहाड़ी कनै हिन्दी अनुवाद दा नंद लेया। पहाड़ी अनुवाद कुशल कुमार होरां कीतेया कनै हिन्दी अनुवाद शुभांगी थोरात होरां दा है। मूह्रला चित्तर महेश वर्मा होरां जलरंग पर बणाया है कनै असां जो प्यारे नै दित्तेया है। महेश  होरां हिन्दिया दे छैळ कवि भी हन।   


वसंत आबाजी डहाके 



होणा 

किछ भी नीं होणे वाळा है

थोड़ीया देरा बाद सड़कां खुली जाणा,

थोड़े पत्थर खिलरयो,  सीसे,

माण्‍हुआं दे खूने दे किछ दाग ।

बरखा दा इक छैबर पोणा

कनै सैह् भी धयोई जाणे।

 

घडणं 

काहीच घडणार नाहीय

थोडया वेळानंतर रस्‍ते मोकळे असतील.

थोडे दगड विखुरलेले.  काचा.

माणसाच्‍या रक्‍ताचे काही डाग.

पावसाची एक सर येईल

नि तेही धुतले जातील.

घटित 

कुछ नहीं होगा।

कुछ समय बाद सड़कें खाली होंगी,

थोड़े पत्थर बिखरे हुए, काँच,

मानवी खून के कुछ दाग.

बारिश की एक बौछार होगी

और वें भी धुल जाएंगे।

 


जीणे दियां छवियाँ

 

कविता दे सादे होन भौएं सजेयो,

कुसी भी किस्‍मां दे लफ्जां नै,

रुक्‍खे दा इक पत्ता भी नीं हिलदा।

जाह्लू असां दे चफिरदे दी दुनिया,

होळें होळें असां जो निगळा दी हुंदी,

ताह्लू कविये दे गळे च फसयो लफ्ज,

समीक्षा दे दायरे च नीं औंदे

होआ जो नांह् ने खुरचणे तिकर ही

हुंदी लफ्जां दी धार

कविये दियां हाखीं खुड़ीयां होणे तिकर ही

तिस दे चेहरे पर पढ़ी जाई सकदियां

जीणे दियां छवियाँ।

सैह् बंद होईयां ता किछ भी नीं बचदा

जहा्ंरा मीलां दे डरौणे लाके च।

पर एह् तां पता ही नीं हुंदा

अजकला देयां लवारस भड़कीलयां लफ्जां च लिखियां सुर्खियां जो।

 

जगण्याच्या प्रतिमा

 

कवितेच्‍या साध्‍या किंवा अलंकृत,

कोणत्‍याही प्रकारच्‍या शब्‍दांनी

झाडाचं पानदेखील हलत नाही.

जेव्‍हा आपल्‍या सभोवतालचं जग

आपल्‍याला हळूहळू गिळून टाकत असतं,

तेव्‍हा कवीच्‍या घशात अडकलेले शब्‍द

समीक्षेच्‍या कक्षेत येत नाहीत.

हवेला नखांनी ओरखडण्‍यापुरतं

असतं शब्‍दांचं धारदारपण.

कवीचे डोळे उघडे असतात तोवरच

त्‍याच्‍या चेहऱ्यावर वाचता येतात

जगण्‍याच्‍या प्रतिमा.

ते मिटले की काहीच उरत नाही

हजारो योजनांच्‍या भणभण प्रदेशात.

अर्थात हे गावीही सतं

समकालीन बेवारशी भडक अक्षरांच्‍या मथळयांच्या.

अस्तित्व की छवियाँ

 

कविता के सरल या अलंकृत,

किसी भी प्रकार के शब्दों से,

पेड़ का एक पत्ता भी नही हिलता।

जब हमारे आसपास का जगत,

धीरे धीरे आप को निगल रहा होता है,

तब कवि के गले में अटके हुए शब्द,

समीक्षा के दायरे में नहीं आते।

हवा को नाखूनों से खरोंचने के लिए ही

होता है शब्दों का तीखापन.

जब तक कवि की आँखें खुली हों तब तक ही

उसके चेहरे पर पढ़ी जा सकती है

अस्तित्व की छवियाँ।

जब वें मिट जाती हैं तो कुछ भी नहीं बचता

हजारों योजन के भयावह प्रदेश में।

किंतु यह तो पता ही नहीं होता है

समकालीन लावारीस भडकीले अक्षरों मे लिखी सुर्खियों को

 


चुणना 

मिंजो किछ चुणने दा मौका ही नीं है।

सब किछ सिरे पर लदया जा दा।

एह् लै।

एह् लै।

दूर चोट देई दें तां भी

हटी ने औंदा रैहन्‍दा

कनै तगड़ी जप्फी मारी बही जांदा

छुटी भी नीं सकदे, छडी भी नीं हुंदा

मिंजो एह् नीं चाही दा

जे गुस्सा भी करां तां

इस जो सुणनेवाळा कोई नीं है.

कोई भी किछ नीं सुणदा

सिर्फ एह् ही सणोह्ंदा रैहन्‍दा

एह् लै।

एह् लै।

निवड 

मला काही निवडायची संधीच नाही.

सगळं काही लादलं जातंय मस्‍तकावर.

हे घे.

हे घे.

दूर भिरकावून दिलं तरी

परत येत राहतं

आणि घट्ट बिलगून बसतं.

सुटता येत नाही, सोडवता येत नाही.

मला हे नकोय

असा आक्रोश केला तरी

तो कणारं कुणी नसावं.

कुणीही काही ऐकत नाही.

फक्‍त बोलणं ऐकू येत राहतं

हे घे.

हे घे.

 

चयन 

मेरे पास चुनने के लिए कोई विकल्प ही नहीं बचा है।

सब कुछ सिर पर थोपा जाता है।

यह लो।

यह लो।

दूर फेंक दिया तो भी

वापस आता रहता है

और कसकर चिपक जाता है

छूट नहीं सकता, उस से पिंड छुड़ाया नहीं जाता

मुझे यह नहीं चाहिए

चिल्लाता रहता हूँ

पर शायद सुननेवाला कोई है नहीं।

कोई कुछ भी नहीं सुनता

केवल चिल्लाहट सुनाई देती है

यह लो।

यह लो।


पुतळे 

पुतळयां जो क्या समझा ओंदा,

तुसां खड़ेरी ते ता सैह् खड़ोई रैह्ंदे;

तुसां थल्लें  खिंजदे ता सैह् थल्लें आई जांदे।

पुतळयां जो कैसी दी भी जरूरत नीं हुंदी

बरखा-धुप्‍पा च खड़ोणे दी।

जरूरत हुंदी तुसां जो ही पुतळयां दी।

तिह्नां जो तुसां खरेड़दे,  फुल-हार पनांह्दे,

कनै तुसां दा गौं बदलोई जाऐ ता

दुअे पुतळे खरेड़ी दिंदे;

फिर तिन्‍हां देयां गीता-ऊतां गांदे।

एक पुतळा खरेड़या ता तुसां

इक पिंजरा तयार कर दे

कनै तुसां खरेड़यां पुतळयां दे गीत

जेड़े नीं गांदे तिन्‍हां जो तिस च पाई दिंदे।

दुअे पुतळे खरेड़दिया वेल़ा

पैह्लके पुतळयां खड़ेरने वाळयां जो

तिह्नां देयां चबूतरयां च दबी दिंदे।

तुसां खड़ेरेयो इक्‍की-इक्‍की पुतळे दे पैरां हेठ

लब्‍बड़ां बंद करी,  हत्‍थ पिछें बन्‍ह्यो

माण्‍हू दबयो हुंदे हन।

इक्‍क पुतळा थल्लें औऐ  ता

तिस दे टुट्टेया मलवे ते

एह् खुड़दा जांदा।

काह्ली ता अपणया हत्था लाल फुल्‍ल औणे हन

इस ताईं वाट दिखणे वाळयां दे हिस्‍सें

धूड़, खोपड़ियाँ, हडियां  औंदियां।

जे पुतळयां ढैह्णे नैं चबूतरे नीं टुटदे

ता एह् भी पता नीं लगणा था।

पुतळे 

पुतळयांना काय कळतं,

तुम्‍ही उभे केले की ते उभे राहतात;

तुम्ही खाली ओढलं की ते खाली येतात.

पुतळयांना कसलीच गरज नसते

उन्‍हापावसात उभं राहण्‍याची.

गरज असते तुम्‍हालाच पुतळयांची.

त्‍यांना तुम्‍ही उभे करता, हारबीर घालता,

आणि तुमची मर्जी फिरली की

दुसरे पुतळे उभे करता;

मग त्‍यांची गाणबिणी गाता.

एक पुतळा उभारला की तुम्‍ही

एक पिंजरा तयार करता

आणि तुम्‍ही उभारलेल्‍या पुतळयांचं गाणं

जे गात नाहीत त्‍यांना त्‍यात टाकता.

दुसरे पुतळे उभारताना

पहिले पुतळे उभारणाऱ्यांना

त्‍यांच्‍या चौथऱ्यात चिणता.

तुम्‍ही उभारलेल्‍या प्रत्‍येक पुतळयाच्‍या पायाखाली

ओठ बंद असलेली, हात मागे बांधलेली

माणसं दडपलेली असतात.

एक पुतळा खाली आला की

त्‍याच्‍या चौथऱ्याच्या ‍भग्‍न अवशेषांतून

हे उघड होत जातं.

कधीतरी आपल्‍या हाती लाल फुलं येतील

म्‍हणून वाट पाहाणाऱ्यांच्या वाटयाला

येते ही राख, कवटया, हाडं.

पुतळे कोसळून चौथरे नष्‍ट झाले नसते

तर हेही कळलं नसतं  

पुतले 

पुतलों को क्या पता,

आप ने खड़ा किया तो वे खड़े रहते हैं;

आप उन्हें खींचते हैं तो वे नीचे आते हैं।

पुतलों को कोई भी जरूरत नहीं होती

धूप-बारिश में खड़े होने की।

बस आप को ही जरूरत होती है पुतलों की।

आप उन्हें खड़ा करते हैं, हारवार पहनाते हैं,

और जब आप खफा हो जाए तो

दूसरे पुतले बना देते हैं;

फिर आप उनके गीत गाते हैं।

एक पुतला खड़ा किया तो आप

एक पिंजरा बना देते हैं

और आपने जिन्हें बनाया उन पुतलों के गीत

जो गाते नहीं उन्हें उस में डाल देते हैं।

नये पुतले बनाते वक्त आप

पुराने पुतले बनाने वालों को

उन के चबूतरों में गाड़ देते हैं।

आप के द्वारा खड़े किये गये हर पुतले के नीचे

जिन के होंठ बंद हैं, जिनके हाथ पीछे बंधे हैं

ऐसे कई लोग दबा दिए होते हैं।

एक पुतला नीचे आ जाता है तब

उस के चबूतरे के टूटे अवशेषों से

यह जाहिर होता रहता है।

कभी तो अपने हाथों में लाल फूल होंगे

इस का जिन्हें इंतजार है उन्हें

मिलती है राख, खोपड़ीयाँ, हड्डीयां।

पुतले ढह नहीं जाते चबूतरे टूट नहीं जाते तो

यह भी ज्ञात नही होता।


व्यवहार  

घर-घरां ते लोक सड़कां पर आई गियो,

बंदूकां दियां गोळियां साही।

इस ताईं कुसा गाळीया च अपणे मुंहें लुकाइऐ

दंगाईयों जो एह् समझा नीं ओआ दा।

तिह्नां देयां वग्‍ती नेतयां जो

मुहां लुकाणे ताईं बयान देणा पोआ दे।

बंदोबस्‍ते ताईं आयो सपाहीयां दी हालत खराब है।

छोटे छोटे बच्चे हात्‍थां च फुलां दे गुलदस्ते लई

सरेआम घुमा दे।

बच्चयां देया हत्‍थां च फुल्‍ल नीं जियां बंब हन

इस ताईं डरी गईयो भड़काऊ भीड़

चराहे-चराहे पर लोक हन कनै सैह् बिलकुल शांत हन।

तिसा शांतिया ते डर लगा दा

राजनीतिक चकरिया दे कारवाई बहादरां जो।

हुण कुण कदेह्या फट्टा बचांगा अपणिया डुब्‍बदिया  नेतागिरिया जो

इस ताईं सैह् व्‍याकुल होई तोपा दे तिनके दा स्हारा।

ऊपर खिड़कियां ते थल्लें झांकी नैं

अण्‍दाजा लगा दे।

थल्लें सड़का पर लोक

जरूरता दियां चीजां लै दे, इक्‍की-दुए नै गलबात करा दे, हासा दे,

उपरले लोक जणता देस मरीइया कनैं सूतकें बैठ्यो 

बच्चे खेला दे, खेलदयां याण्‍यां दियां जोरे दियां चींडां

नीं सणोह्न इस ताईं  कन्नां ढका दे वग्‍ती नेते।

शांतीया नें चला दा सारा व्यवहार

व्यवहार 

घराघरांतून नागरिक रस्‍त्‍यांवर आलेले आहेत,

बंदुकीच्‍या गोळयांसारखे.

त्‍यामुळे कुठल्‍या गल्‍लीत तोंड लपवावे

हे दंगलखोरांना कळेनासे झाले आहे.

त्‍यांच्‍या औटघटकेच्‍या नेत्‍यांना  

काढावी लागताहेत निवेदने चेहरे झाकायला,

बंदोबस्‍तासाठी आलेल्‍या सैनिकांची दैना उडाली आहे.

छोटी छोटी मुले हातांत फुलांचे गुच्‍छ घेऊन हिंडताहेत सर्रास.

मुलांच्‍या हातांत फुले नसून जणू काही बॉम्‍ब आहेत

म्‍हणून घाबरून गेलेला आहे चिथावणारा जमाव.

चौकाचौकांत लोक आहेत आणि ते कमालीचे शांत आहेत.

त्‍या शांततेची भीती वाटते आहे

राजकीय वर्तुळातील कारवायाखोरांना.

आता कुठले फळकूट वाचवील आपल्‍या बुडत्‍या पुढारीपणाला

म्‍हणून कासावीस होऊन शोधताहेत ते काडीचा आधार.

वरून खिडकीतून खालच्‍या रस्‍त्‍यावर डोकावत

अदमास घेताहेत.

खालच्‍या रस्‍त्‍यावरची माणसे

गरजेच्‍या गोष्‍टी घेताहेत, एकमेकांशी बोलताहेत, हसताहेत.

वरची माणसे देश मेल्‍यासारखी सुतकात बसली आहेत.

मुले खेळताहेत. खेळताना होणारे त्‍यांचे मुक्‍त चीत्‍कार

ऐकू येऊ नयेत म्‍हणून कान झाकून घेताहेत

हंगामी नेते.

शांतपणे चाललेले आहेत सगळे व्‍यवहार.

 

व्यवहार 

नागरिक अपने अपने घरों से सड़कों पर आ गए हैं,

बंदूक की गोलियों की तरह।

इसलिए किस गली में अपना चेहरा छिपायें

दंगाईयों की समझ में नहीं आ रहा।

उनके अल्पकालीन नेताओं को

बयान देना पड़ रहा है चेहरे छिपाने के लिए।

सुरक्षा के लिए तैनात जवानों की दुर्दशा हो गयी है।

छोटे छोटे बच्चे हाथों मे फूलों के गुलदस्ते लेकर घूम रहे हैं सरेआम

बच्चों के हाथों मे मानो फूल नहीं बम हैं

इसलिए सहम गयी है भड़काऊ भीड़

हर चौराहे पर लोग हैं और वे बिलकुल शांत हैं।

उस शांति से डर लगता है

राजनीतिक हलकों में सक्रिय कारवाईखोरों को।

अब कौनसी लकड़ी बचाए उनकी डूबती नेतागिरी को

इसलिए वे ढूँढ़ रहे हैं तिनके का सहारा।

ऊपर से, खिड़की से नीचे झांक कर

अनुमान लगा रहे हैं।

नीचे सड़कों पर खड़े लोग

आवश्यक चीजें ले रहे हैं, आपस में बातें करते है, हँसते हैं,

ऊपर के लोग इस तरह बैठे हैं जैसे देश की मृत्यु पर पातक लग गया हो

बच्चे खेल रहे हैं, खेलते वक्त उन की मुक्त किलकारियाँ

सुनाई न दें इसलिए कान ढँक रहे है हंगामी नेता।

शांति से चल रहे हैं सब व्यवहार।


कुशल कुमार 
 
शुभांगी थोरात

                                                           

Sunday, July 26, 2020

हिंदुस्तानी फ़ौज : बहादर भी दिलदार भी


26 जुलाई कारगिल विजय दिवस 
दे मौके पर देसे ताईं शहीद होणे वाळे वीर जुआनां जो 
विनम्र श्रद्धांजलि कनै सादर नमन।



पेश है भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी' होरां दा इक लेख।      


हिंदुस्तानी फ़ौज : बहादर भी दिलदार भी

कारगिल दी लड़ाई दुनियां दियां बाकी लड़ाइयां ते 'लग्ग थी। इसा लड़ाइया विच दो ऐसे मुल्क लड़ा दे थे जिह्नां वल्ल परमाणु हथियार थे । जाहलू हिंदुस्तानी फ़ौजी सर्दियां विच अपणेयां बंकरां ते उतरी के वापस आए ताहलू ही पाकिस्तानी फौजियां तिह्नां मोर्चेयाँ पर कब्ज़ा करने दी साज़िश करी लेइओ थी। सन 1999 दे मई महीने दी तिन्न तारीख जो डंगरां चारने वालेयां दस्सेया तां फौजा जो पता लगा कि मोर्चेयाँ पर पाकिस्तान देयाँ फौजियां कने उग्रवादियां कब्ज़ा करी लेया है। त्रीएं दिनें जाहलू असां दे फ़ौजी ओत्थू गए तां तिह्नां पर पाकिस्तानियाँ दा हमला होया कने सैह शहीद करी दित्ते गए। नौ मई 1999 जो तिह्नां असां देयाँ हथियारां वगैरह जो भी उड़ाई दित्ता। हालात ऐसे थे कि सांजो एह भी पता नी था कि पाकिस्तान दे कितने सपाही तित्थू हैंन। 
  कारगिल दियां चोटियां दे नाँ नी हैंन ; बस नम्बर हैंन। जिञा पॉइंट 4875, पॉइंट 5140 वगैरह । 
 पर एह चूण्डियां सांजो ताईं बहुत ही ख़ास हैंन। इह्नां ते सिद्धे थल्ले श्रीनगर-लेह हाईवे है। इसी रस्ते ते लेह दे इलाके जो सामान कने राशन भेजेया जांदा है। हालांकि इक्क सड़क वाया मनाली भी है पर सैह ज़ादा लंबी है। दुश्मण उप्पर पहाड़ियां पर बैठेया था कने असां दे फ़ौजी थल्ले थे। जे सड़का जो नुक्सान हुंदा तां लेह तक पुज्जणा बड़ा औक्खा होई जाणा था। इसा वजह ते भी तिह्नां ते तौळी तौळी कब्ज़ा छडाणा ज़रूरी था। पर दुश्मणे दी पोज़िशन खरी थी , इस करी के असां दी फ़ौज ओत्थू पुज्जी नी पा दी थी । इसा लड़ाइया विच असां दे मते बहादुर अफ़सर कने फ़ौजी शहीद होई गए । एयरफोर्स जो दख़ल दैणा पेया , बड़िया मुश्कला कने हालात काबुए विच औणा लग्गे । कैप्टन सौरव कालिया,कैप्टन विक्रम बत्रामनोज पांडेय, शीशराम, विनोद , राजकुमार , गणपत सिंह  वगैरह केइयाँ इसा लड़ाइया विच शहादत लेई। लगभग दूंह महीनेयाँ बाद लड़ाई ख़त्म होई। 
     जित्थू तिकर दुश्मणे दी गल्ल है पाकिस्तान एह भी मन्नणे जो त्यार नी था कि घुसपैठ करने वाळे पाकिस्तान दे फौजी थे। असां देयां फौजियां कने तिह्नां ऐसियां ऐसियां बेचिळस हरकतां कित्तियाँ थियाँ कि दिखणे वाळेयां दा काळजा कम्बी जाएं। कैप्टेन सौरभ कालिया दिया देह्इया दिक्खी के कुसी दा भी खून उबाळ खाई जाए , इतनी बुरी हालत कित्ती गेइयो थी। ऐसा घटिया कने राक्शां वाळा कम्म पाकिस्तान ही करी सकदा था।  दूजी तरफ़ असां देयाँ अफ़सरां जाहलू दिखेया कि तिह्नां दा इक्क कैप्टन बहुत ही बहादरिया ने लड़ा दा, तां तिह्नां बाकी पाकिस्तानी फौजियां साहीं तिसदा आखरी संस्कार करने ताईं तिसजो दबाया नी बल्कि तिस दे शरीरे जो बाक़ायदा सम्हाळी के रखेया कने दिल्ली पुजाई के पाकिस्तान हाई कमीशन दे हवाले कित्ता । सैह पाकिस्तान दा कैप्टन कर्नल शेरखान ( तिसदे दादुए तिसदा नाँ ही 'कर्नल' शेर ख़ान रखी दित्तेया था, पर तिसदा रैंक कैप्टन ही था ) था। हिंदुस्तानी अफ़सरां तिसदिया बहादरिया जो पछैणी के पाकिस्तान सरकार जो एह सन्देसा भजवाया कि इस अफसर जो ज़रूर कोई बड्डा सम्मान मिलणा चाहिदा है। पर पाकिस्तानियाँ तिस दिया देह्इया लैणे ते भी मना करी दित्ता। ख़ैर जाहलू तिस कप्ताने दे रिश्तेदार कने ग्राएँ दे बाकी लोक पाकिस्तान सरकार पर दबाव लग्गे पाणा तां पाकिस्ताने मन्नी लेया कने बादे विच कैप्टन कर्नल शेर खान जो पाकिस्तान दा सबते बड्डा फौजी सम्मान निशाने हैदर दित्ता। 
     असां दी फौज न सिर्फ़ बहादर है बल्कि बड्डे दिले वाळी भी है। असां देयाँ अफ़सरां पाकिस्तान वाळेयां साहीं बेचिळसां वाळियां हरकतां नी कित्तियाँ बल्कि दुश्मणे जो भी सम्मान दुआणे दी कोशिश कित्ती। कारगिल दिया लड़ाइया देयाँ चौंह बहादर लड़ाकेयां जो देशे दा सबते उच्चा सम्मान परमवीर चक्र मिल्ला, जिह्नां विच दो हिमाचल दे , कैप्टेन विक्रम बत्रा ( शहादत ते बाद )कने राइफलमैन संजय कुमार भी शामल हैंन। अज्ज कारगिल विजय दिहाड़े उप्पर हर हिंदुस्तानी दिले ते अपणिया फ़ौजा जो सलाम करादा है ; सैह जागा दे तां असां सौआ दे हैंन।
      --- भूपेन्द्र जम्वाल 'भूपी'

Tuesday, July 21, 2020

करोना परोह्णे


मितरो अज सारी दुनिया कोरोना महामारी ने लड़ा दी। इस वग्‍त सारे सरबंध कनै रिश्‍ते कोरोना दे डरे नें संगड़ोंदे जा दे। पेश है गिरीराज दे 15 जुलाई 2020 दे अंक च छपईयो कुशल कुमार होरां लीखीयो इक कथा।




करोना परोह्णे


एह् कथा है पहाड़ी मुंडुआं दी जेह्ड़े मुंबई दे समुदरे च गुआची गै। इक दो नी हज़ारां आये हटी नैं कोई
बिरला ही गिया। इस समुदरे ता पाणी ता खारा है ना तिरयाह् बुझदी ना ठण्ड पौंदी ऊपरे ते एह् पाणी जख्‍मां पर लूण मल़दा। जख्म अपणे घरे दूर छड़ी ओणे दे, पख्लिया जमीना पर औक्‍खे जीणें दे. जख्म ही जख्म हन बस छेड़ने दी देर है।
अपर हुण इह्नां जख्‍मां कनैं जीणे वाळी पीढ़ी मुकदी चल्लियो। सैह् तारां जेह्डि़यां गांदियां थियां पीड़ां ढल्‍लरोई गेईयाँ। इयाँ ता तारां मतियाँ थियां पर हौळें-हौळें सारियाँ टुटदियाँ चलियाँ। जाह्लु मुंडु आये थे ता कठपुतलियां साही काठ आया था, पुतलियाँ आइयाँ थियां। डोरियाँ सब मुल्‍खें बज्झियाँ थियां। जरा की होआ चलदी थी, ता दिले च होक्‍का आई जांदा था। काह्ली काळजे च लुआंटा बळी जांदा था।
मुंडु ऐत्‍थु समुंदरे दे कनारें तिन्हां तारा दिया खिंजा पर नचदे, हसदे, कुंजू-चंचलो, रान्झु-फुलमू गांदे दिनां कटदे थे। होई बीतीयां ओ मेरी जान फुलमु गल्लां होई बीतीयां। ऐत्‍थु बम्बई रान्झु रोंदे थे ता ओत्‍थु फुलमू गांदी, कपड़यां धौएं कनै रोएँ कुंजुआ, गल्लां होई बीतीयां। पर वग्‍त अपणे टेमें लई ही बीतया। कुस्‍सी दा झट बीती गिया ता कुसी दा टैम लई बीतया। न्दे-औन्देयां तारां कस्‍सोईयाँ थियां, ता मुंडु बदलोंदे मौसमे साही झट हटी जांदे थे। हौळें-होळें धागे कमज़ोरे पई पतळे होई टुटणा भी लगी पे। एह् जख्‍म दूंई  लड़ाईयां दे हन अंग्रेजां दा राज था। क्या क्या गणाणा मुंडु जित्‍थु ते आये थे तित्‍थु तिकर पूजणे ताईं सूरजे जो भी कई रीडि़यां लोह्णा गोह्णा पौंदियां थियां। नज़र गास अम्बरे पर टिक दी थी कनै दो चार मील रिडियां ने टकरां मारी हटी औंदी थी। मैं भी इसा लड़िया दी ही इक कड़ी है। 
हुण मुंडु ता मरी मुक्‍की गे। मुंडुआं दे याणे पढ़ी लीखी बडे होई गे। तिन्हा दी भासा भी बदलोई गईयो। पैंह्लें अपणा कोई हिंदी भी बोलदा था तां भी पछणोई जांदा था। हुण कोई अपणा पहाड़ी भी बोल्दा ता लगदा तरफेन है। असां दे याणयां ते खरी पहाड़ी ता पड़ेसी पूरबिया बोली लैंदा। जेड़ा बचपने ते असां पहाड़ियां बिच्‍च रेह् दा। क्या दस्सिये जमीन ता बड़ी उपजाऊ थी पर असां ते बूटे सारी नीं होये। असां किछ करी नीं सके।
कुत्‍थु ते शुरू करें इसा कथा। इसा दे सारे कूंजु-चंचलो इसा दुनिया ते दूर जाई चुक्‍केयो। क्या वग्त था, क्या लोक थे। एह् कथा ता अमरो दे चाचे शंभुऐ ते शुरू होंदी। सैह् कराची ते सेठां सोगी तिह्ना दे महाराज बणी नें आये थे। एत्‍थु रसोइयो जो महाराज बोलदे। तिस जमाने च महाराज महाराज ही हौंदे थे। पेटे दे रस्‍तें सेठां दे टब्बरां दे दिलां पर राज करदे थे। चाचा छुट्टी जांदा कनै सारे ग्रांये जो बम्बइया दियां गप्पाँ सुणादां। हर बारिया इक ना इक मुंडु कताबां बेची। मीलां पैदल चली चाचे दे बुज्‍झके चक्‍की रेला चड़ी जांदा था।
अमरो बम्बई पूजी गिया। चाचें सेठां दे बंगलें रोटी खुआई कनै नोकरां दे कमरे च चटाईया पर सुआई ता। दो तिन क्या हफ्ता ही बीती गिया। इकी पास्‍सें कालबादेवी दियां तंग गळीयां थियाँ कनै दुएं पास्‍सें दुईं त्रीं मीलां पर लेह्रां च ठाठीयां मारदा समुदर। गेट वे ऑफ इंडिया। कालबादेवी दियां गळीयां च हत्‍्थ गड्डियां पर समाने ढोणे व्‍हाल्यां, सिरे पर बोझा चकी दौड़ने व्‍हालयां कनै बड़ियां बड़ियां बसां कारां  दे बिच्‍चे ते रस्ता कडी ने चलदे लोग। पटरिया पर सज्‍जईयाँ दकानां। चाई व्‍हाले दे बांकड़याँ पर बैट्ठयो डरेबर। ढोत्‍तयां भाड़यां दियां। खटियाँ मिठ्ठीयां गप्‍पां। भाड़ा यानी कराया देई टैक्सीया च बैठ्ठणे वाळा जातरी। अज इतणा धंधा होया, नीं होया। बस इह्नां दियां गपाँ सुणी सुणी। अमरो भी सोचे च कमाई दे पैसे कनै गाडिया बही घुमणे दे सुपन्यां दे झूटे लेणा लगी पिया। गड्डियां धोणे व्‍हाल्‍यां क्लींडरां दिया फ़ौजा च शामिल होई गिया। मैं भी मरगार्ड मरगार्ड सुणदा ही बडा होया। असल च मडगार्ड हौंदे। गाडिया कनै टेरां जो चिकड़े ते बचाणे व्‍हाले। बरसाती च सैह् धोणा बड़े कट्ठण होंदे। सैह् गलांदे थे। मरगार्ड धोणे च ही कईयां दी बीत्‍ती गई। तेह्ड़ी डरेवर बणना सोखा नीं था। इक ता स्कूले दिया टेरेनिगं नें टेस्ट पास नीं होंदा था। कोई ना कोई गडिया वाळा डरेवर गुरु जरूरी था। सैह् बगैर रिस्तेदारी मिलणा मुश्कल था। अमरो जो भी कई पापड़ बेलणा पैए थे। होर नोकरियां भी मिलदियाँ थियाँ पर डरेवर होणे दा रुतबा भारी था।
वग्त बीती गिया। अमरो दी सारी पीढ़ी हटी नें नीं जाई सकी। जेड़े गे सैह् याद करदे गै। अमरो दा मुन्‍नु देवु सोच दा ऐत्‍थु जम्‍मे कनैं रेह्ंदया जो उमर बीत दी आई। त्रिया पीढ़ीया दा भी ब्‍याह होणा लगया। पर एह् नीं गल्‍लाई सकदे कि भई एत्‍थु दे बसिंदे होई गियो। ऐत्‍थु ता घर भी बणाई नीं सके। जाह्लु जुआनी, जोर कनै कमाई थी ता मुल्‍खें बापूऐं जेड़ा कुर्स दित्‍या था तिस पर अठां कमरयां दा मकान बणाणे च सारी कमाई लाई ती। मुल्‍खें अठां कमरयां दा बंगला कनै ऐत्‍थु दस गुणा दस दी दुरुड। दुरुडी बाहर करोना कनै अंदर समिंटे दिया छत्‍ती हेठ दुरुड छल्लियां दिया भठ्ठीया साही भक्‍खियो। मन करे कियां भी सणें टब्‍बरें खिट लाई ही रिडि़या पर अपणे बंगलुऐं पूजी जाएं। बांईं दा ठंडा पाणी कनै खड्डा दा नोह्ण।
हर साल गरमियां च चली ही जांदे थे। देवुऐं इसा बह्रिया भी टिकट लेइ्यो थे करोना आई गिया। मते चले गै अपणियां गडियां लई। इक ता देवुऐ दी गडी पराणी कनै गडिया च तिसदा टब्‍बर भी नीं ओणा। हुण ईंह्या भी मन नीं लगदा। एह् टैक्‍सियां दा धंधा भी मुकदा आया। असां दियां गडियां कनै असां भी थक्‍की गियो। हाल ऐह् है कि गडिया दी कीमत सोसायटी-या दे करजे ते भी घट है। बेची नें भी किछ नी बटोणा। करोना च हिमाचले दी याद कनै रोणा ही ओआ दा। चाणचक रोळा पिया कि रेल चलणे वाल़ी है। देवुऐं भी मबाईले पर सारे टब्‍बरे दा नां पाई ता।
रेल चल्‍ली ता तिन्‍नी मुंबई दी धरत बंदी। सरकार कनै माता महाराणियां दी किरपा नैं सैह् सरकारी रेला च सरकारी परोह्णा बणी टब्‍बरे समेत हिमाचल पूजी गिया। ओत्‍थु इक्‍की स्‍कूले च टैस्‍ट होए। तिन्‍नां चौंह् दिनां बाद रपोटां आईयां ता घरे दे दर्शन होये। घरें पूजी बी देवुऐं धरत बंदी। केम्‍पे च भी त‍कलीफां ता थियां पर दिन ही माड़े हन फिह्री भी तिसा दुरुडा कनै भट्ठीया ते ठीक था। पर जेह्ड़े जेह्ड़े सुखां ते थे आयो। तिह्नां ताईं मुश्‍कल था।
बड़ी लम्‍मी थी एह् मसाफरी। रिड़की-रिड़की ठोकरां खांदे घरें पूजे ता ठंड पई। देवू सोचे च पई ईया। बापुऐं कमाई ता टब्‍बरे ताईं लगाई ती थी। मैं बी अपणिया कमाईया जोड़ी एह घर ही बणाई सकया। इस ग्रांए दे इक्‍की-इक्‍की पत्‍थरे कनै झुड़े च पराण बस दे मेरे कनै मेरे टब्‍बरे दे। भले इसा धरती पर पंजाहं सालां दिया उमरा च गिणुआं दिन ही कटणा नसीब होये होन। पर पूजी गै हुण जै मरजी होंदा रैह्। देवुएं ठंडी साह् लई।  
एत्‍थु ग्रांए च क्‍या सारें ही लोक इसा बमारीया ते डरा दे। कोई कुस्‍सी दे नेड़े नीं ओआ दा। देवुऐ जो इस गल्‍ला च किछ भी माड़ा नीं महसूस होया। बमारी देह्ई है डरना ही चाही दा अपर रतनुऐं ऐह् क्‍या गल्‍लाया। आई गे करोना परोह्णे-टूरिस्‍ट परोह्ड़े लई। रतनू ता दूरे ते गल्‍लाई नें पारें-पारें चली गिया। देवुऐ जो सारी रात निंदर नीं आई। अपणे ग्रांए कनै घरे च मैं टूरिस्‍ट। मेरे बापुएं कनै मैं सारी उमर लाई ती। घरे दे, क्‍हरेंता-सरिकां दा कोई कारज बड़ी-छोटी होई ता दोड़ी नैं आये। मंदर होये, मस्‍साणें पर छत कनै टियाळा होऐ। जितणा होई सकया दिता कनैं अज पैहली बरी दुक्‍खी होई आया ता मैं टूरिस्‍ट होई गिया।
सोचदयां-सोचदयां कनै पळसेटयां खाद्ंया-खाद्ंया भ्‍याग होई गई। दमागे ते एह् करोना-परोह्णे दा भूत उतरने जो तयार नीं था। देवुऐ दा मन करे जाई ने तिस्‍स रतनूऐ दी खोपड़ी तोड़ी दें। मन थोड़ा सांत होया ता सोच आई। अरा। तू इतणा कजो दुक्‍खी-परेशान होआ दा। इत माह्णु माह्णुऐ ते डरा दा। मैं भी ता बंबई ते न्‍ह्ट्ठी नैं आया।
असां ते लावा डाक्‍टर-नरसां, होर स्‍टाफ पुल़सा व्‍हाले, डरेवर, रसौईये। कितणे लोक सेवा करा दे। तिह्ना जो अपणी फिकर भी नीं है। दिन-रात लगयो। मेरी रेल भी ता राती दो बजे पूजी थी ऊनें। कितणे लोक थे ओत्‍थु हिमाचले दे मिंजो ताईं जाग्‍गा दे। इन्‍हां रतनुआं सतनुआं साही छोटिया सोचा व्‍हाल्‍यां जो गोळी मार। जै सोचणा है, फिकर करनीं है ता देवभूमी दे तिह्नां देवतयां दी कर। जेह्ड़े इस्‍सा विप्‍पता च भी अपणा कम्‍म करी जा दे। देवुऐं धोलाधार जो इक जोर दार सलामी दित्‍ती कनै माता राणी व्‍हाल अरदास किती की करोना दे सपाहियां दी रक्‍सा करयां। रतनु ऐ दिया सोचा जो अपणा पैंरा हेठ्ठ पईयो पतरेना साही थुक्‍की मरोड़ी ने इक जोरे दी लत मारी। फिह्री तिह्नी मतयां दिनां दी पेईयो पतरेन कठेरी नीं पछवाड़ें बाह्रले चुह्ल्‍ले च फूकी ती।                                      

कुशल कुमार