पहाड़ी भाषा दी नौई चेतना .

Tuesday, October 6, 2015

कवि वीरेन डंगवाल

उत्‍तराखंड दे रहणे आळे जनकवि वीरेन डंगवाल 
किछ दिन पैहलैं दिवंगत होए कवि वीरेन डंगवाल जी जो श्रद्धांजलि दे तौर पर तिन्हां दी इक कविता 'पीटी ऊषा' दा अनुवाद।
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पीटी ऊषा
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पीटी ऊषा

काळी जुआन हिरनी
अपणीयां लम्मियां तेज जंघा ने उडदी
मेरे गरीब देसे दी बिट्टी
हाखीं दिया लोई च जीन्दी है हाली
भुख्खा जो पछैणने आळी ल्हीमी
ता ही ता मुँहें उप्पर नी है
सुनील गावस्करे साहयी रंग
मत बैन्हदी पीटी ऊषा
नामे च मिल्लिया तिसा मारुती कारा च
मने च फणसोन्दियां भी
बल्कि हवाई झाजे च भी जाहंगी ता
पैरां रख्खी लियां गद्दिया पर
खांदी बरी
मुँहें ते सुमदी चपचप?
कोई गम नी
सैह जेहडे मनदे चुप डाठी जो सभ्यता
सैह दुनिया दे सबते खतरनाक खाऊ लोक हन।
मूल कविता : स्वर्गीय वीरेन डंगवाल
अनुवाद: नवनीत शर्मा

पी टी ऊषा

वीरेन डंगवाल

काली तरुण हिरनी अपनी लम्बी चपल टांगों पर
उड़ती है
मेरे ग़रीब देश की बेटी
आंखों की चमक में जीवित है अभी
भूख को पहचानने वाली
विनम्रता
इसीलिए चेहरे पर नहीं है
सुनील गावस्कर की-सी छटा
मत बैठना पी टी ऊषा
इनाम में मिली उस मारुति कार पर
मन में भी इतराते हुए
बल्कि हवाई जहाज में जाओ
तो पैर भी रख लेना गद्दी पर
खाते हुए
मुँह से चपचप की आवाज़ होती है ?
कोई ग़म नहीं
वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
दुनिया के
सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं.


1 comment:

  1. "वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता
    दुनिया के
    सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं."
    अद्भुत


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